पितरों के मोक्ष के लिए फल्गू तक आने से नहीं रोक पाया समंदर, विदेशियों ने किया पिंडदान

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गया 08 सितंबर, धर्म और सांस्कृतिक स्तर पर बिल्कुल अलग पहचान रखने के बावजूद विदेशी महिला सैलानियों को पूर्वजों की मुक्ति के लिए विश्व में मुक्तिधाम के रूप में विख्यात बिहार के गया में फल्गू नदी के तट पर पिंडदान करने आने से सात समंदर भी नहीं रोक पाया, धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के विपरीत होने के बावजूद केवल आस्था का संबल लिये अमेरिका, रूस, यूक्रेन और कनाडा से आयी 20 महिला सैलानियों ने आज फल्गु नदी के किनारे देवघाट पिंडवेदी पर इस विश्वास के साथ पिंडदान और तर्पण किया कि उनके पूवर्जों को मुक्ति जरूर मिल जाएगी। मोक्षस्थली गया जी में पितरों की मुक्ति के महापर्व पितृपक्ष मेला के दौरान देवघाट का नजारा आकर्षक होने के साथ ही सम्मोहक भी था। विदेशी श्रद्धालुओं का एक समूह अपने पितरों की मुक्ति की कामना लिये तर्पण एवं पिंडदान कार्यों में जुटा था। इन श्रद्धालुओं को गयापाल पंडा पुरूपोत्तम लाल कटरियार, गोपाल लाल कटरियार सहित अन्य के नेतृत्व में लोक नाथ गौड़ दास ने पिंडदान करवाया। इन विदेशी पिंडदानियों को पूरे मनोयोग से पितरों की मुक्ति के लिए पिंडदान करते देखने के लिए लोगों का हुजूम जमा हो गया था। विदेशी श्रद्धालुओं ने कहा कि उन्होंने गया में पिंडदान करने से पूर्वजों का मोक्ष मिलने के बारे में काफी कुछ सुना है और इसने उन्हें प्रभावित भी किया है। इससे प्रभावित होकर ही वे यहां आयी हैं। पिंडदानियों में शामिल रूस की क्रिकोव अनतोल्ला ने कहा, “मैं अपने पूर्वज, पति, परिवार और देश में शांति के लिए यहां आयी हूं। गया में पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों के मोक्ष के लिए होने वाले पिंडदान और तर्पण के बारे में काफी सुना है। इसने ही मुझे यहां आने के लिए प्रेरित किया।” वहीं, जर्मनी से आयीं अन्ना बैरोन ने कहा, “मेरे परिवार और घर में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। मैंने सुना है कि पूर्वज नाराज होते हैं तो चारों ओर अशांति फैल जाती है। इसलिए मैं अपने इस दुर्भाग्य से छुटकारा पाने के लिए यहां आयी हैं।” उन्होंने कहा कि भारत धर्म और आध्यात्म की धरती है और गया आकर उन्हें आंतरिक शांति की अनुभूति हो रही है। 


गया के जिलाधिकारी कुमार रवि भी पिंडदान के कर्मकांडों को पूरा करने के दौरान इन पिंडदानियों से मुलाकात करने देवघाट पहुंचे। उन्होंने श्रद्धालुओं से पिंडदान के लिए गया पहुंचने से लेकर अन्य कई विषयों के बारे में जानकारी ली। सभी विदेशी पिंडदानियों ने भी जिलाधिकारी के साथ अपने अनुभव बांटते हुए पितृपक्ष मेला के दौरान जिला प्रशासन द्वारा की गई व्यवस्थाओं को सराहा। इस दौरान विष्णुपद मंदिर के निकट स्थित संवास सदन समिति के कार्यालय में जिलाधिकारी ने सभी विदेशी पिंडदानियों के साथ बैठकर काफी देर तक अनेक विषयों पर चर्चा की। श्री रवि ने सभी पिंडदानियों को गया जिला प्रशासन की ओर से पितृपक्ष मेला के अवसर पर प्रकाशित स्मारिका ‘तर्पण’ भेंट कर उन्हें सम्मानित किया। मान्यता है कि जो लोग अपना शरीर छोड़ जाते हैं, वे किसी भी लोक में या किसी भी रूप में हों, श्राद्ध पखवाड़े में पृथ्वी पर आते हैं और श्राद्ध एवं तर्पण से तृप्त होते हैं। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, पिंडदान मोक्ष प्राप्ति का एक सहज और सरल मार्ग है। अंतःसलिला फल्गु नदी के तट पर बसे गया में पिंडदान का काफी महत्व है। गया को विष्णु का नगर माना गया है। यह मोक्ष की भूमि कहलाती है। विष्णु पुराण और वायु पुराण में भी इसकी चर्चा की गई है। विष्णु पुराण के कहा गया है कि गया में पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष मिल जाता है और वे स्वर्गवास करते हैं। माना जाता है कि स्वयं विष्णु यहां पितृ देवता के रूप में मौजूद हैं, इसलिए इसे ‘पितृ तीर्थ’ भी कहा जाता है। एक प्रचलित कथा के अनुसार, भस्मासुर के वंशज में गयासुर नामक राक्षस ने कठिन तपस्या कर ब्रह्मा जी से वरदान मांगा था कि उसका शरीर देवताओं की तरह पवित्र हो जाए और लोग उसके दर्शन मात्र से पाप मुक्त हो जाएं। लोग बिना भय के पाप करने लगे और गयासुर के दर्शन से पाप मुक्त होने लगे। इससे बचने के लिए देवताओं ने गयासुर से यज्ञ के लिए पवित्र स्थल की मांग की। गयासुर ने अपना शरीर देवताओं को यज्ञ के लिया दे दिया। लेकिन, गयासुर के मन से लोगों को पाप मुक्त करने की इच्छा नहीं गई और फिर उसने देवताओं से वरदान मांगा कि यह स्थान लोगों को तारने (मुक्ति) वाला बना रहे। लोग यहां पर किसी की मुक्ति की इच्छा से पिंडदान करें, उन्हें मुक्ति मिले। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष पितृपक्ष मेला 06 सितंबर मंगलवार से शुरू हुआ था और 20 सितंबर तक जारी रहेगा। मेले में लोगों को बेहतर सुविधा उपलब्ध कराने के लिए जिला प्रशासन की आेर से व्यापक इंतजाम किये गये हैं। इस बार मेले में 10 लाख श्रद्धालुओं के भाग लेने की संभावना जतायी गयी है। 

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