विशेष आलेख : जुर्म से नहीं रुकेगी कलमकारों की आवाज

यह पहली बार नहीं जब किसी पत्रकार, एक्टिविस्ट, लेखक की आवाज शांत करने के लिए हिंसा का सहारा लिया गया हो, इससे पहले लगातार ऐसे जघन्य हत्याकांड होते रहे हैं। खनन माफियाओं का विरोध करने, पुलिस एवं प्रशासनिक अफसरों के काले-कारनामों को उजागर करने समेत सरकार द्वारा संचालित कल्याणकारी योजनाओं का बंदरबांट करने वाले बाहुबलियों की करतूत उजागर करने पर पत्रकारों का उत्पीड़न किया गया है। लेकिन बड़ा सवाल तो यही है क्या हर वाकयों की तरह यह भी लिपपोत चिक्कन हो जायेगा या असल गुनाहगार जेल सलाखों के पीछे जायेंगे? हो जो भी लेकिन यह सच है कि इस तरह के घृणित मानसिकता वालों को समझ लेना चाहिए कि प्रेस की आवाज को दबाया नहीं जा सकता 



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गौरी लंकेश सिर्फ और सिर्फ एक पत्रकार थी। वह अपनी कलम के जरिए समाजसेवा से लेकर हर उस पीड़ित, शोषित व मजलूमों की आवाज थी, जो किसी न किसी वजह से उत्पीड़न के शिकार थे। वह हर अराजकता, कुरितियां, भ्रष्टाचार के खिलाफ थी जो समाज को दीमक की तरह खोखला कर रहे थे। यही वजह थी कि उन्होंने नक्सलियों के अधिकारों से लेकर उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने की भी लड़ाई कलम के जरिए लड़ती रही। जैसा कुछ लोग कह भी रहे है कि उन्होंने हाल ही में कुछ नक्सलियों का समर्पण भी करवाया है। हो सकता है उनके द्वारा ऐसा करने से किसी दल का नफा-नुकसान हो रहा हो, किसी की विचारधारा मेल ना खा रही हो तो किसी को नागवार भी लग रहा हो। कुल मिलाकर वे एक-दो नहीं बल्कि कई मसलों की लड़ाई लड़ रही थी। ऐसे में कौन उनसे खफा था, किसने हत्या की या कराई, यह बगैर किसी जांच एजेंसी के नतीजे पर पहुंचे किसी पर आरोप लगा देना उतना ही बड़ा जुर्म है जितना गौरी लंकेश की हत्या का। लेकिन अफसोस है कि ऐसी शख्सियत को कुछ राजनीतिक पार्टियां विचारधारा से जोड़कर उन्हें किसी दल का विरोधी बता रहे है तो कोई दल अपनी विचारधारा से जोड़कर देख रहा है, जो कहीं से भी न्यायसंगत नहीं हैं। मतलब साफ है गौरी लंकेश एक तेज तर्रार पत्रकार थी, उनकी हत्या सिर्फ राजनीतिक दलों के आसपास ही सिमटकर क्यों रह जानी चाहिए। लोकतंत्र का असली अर्थ तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। उस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए क्या समूचे देश को आवाज नहीं उठाना चाहिए। अच्छा तो तब होता जब पूरा देश मांग करता कि सरकार हिंसा करने वालों से सख्ती से निपटें। जांच कराकर उनका चेहरा बेनकाब करें। क्योंकि इस तरह की घटनाएं लोकतंत्र को कमजोर करती है, राजनीतिक विद्रोह की खाई को चैड़ा करने में भी सहायक होती है। 

बता दें, गौरी लंकेश की पिछले दिनों बेंगलुरु में उनके घर पर ही गोली मारकर हत्या कर दी गई। ये हमला किस वजह से किया गया, इस बारे में किसी जांच एजेंसी की रिपोर्ट से पहले अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। 1962 में जन्मी गौरी ने पत्रकारिता की शुरुआत बैंगलुरू में एक अंग्रेजी अखबार से की थी। यहां कुछ समय काम करने के बाद वो दिल्ली चली गईं। दिल्ली में भी कुछ साल काम करने के बाद वो दोबारा बैंगलुरू लौट आईं और यहां 9 साल तक संडे नाम की मैग्जीन में काम किया। पत्रकार होने के साथ गौरी एक सामाजिक कार्यकर्ता भी थीं। गौरी के पिता पी लंकेश कन्नड़ में ‘पत्रिका‘ नाम से एक साप्ताहिक पत्रिका निकालते थे। पिता के निधन के बाद गौरी इसकी संपादक बनीं। लेकिन साल 2005 में नक्सलियों से जुड़ी एक खबर के चलते गौरी ने ‘पत्रिका‘ छोड़ दी। इसके बाद गौरी ने अपना खुद की साप्ताहिक कन्नड़ गौरी लंकेश पत्रिका निकालनी शुरू की। गौरी ने लंकेश पत्रिका के जरिए ‘कम्युनल हार्मनी फोरम‘ को काफी बढ़ावा दिया। लंकेश पत्रिका को उनके पिता ने 40 साल पहले शुरू किया था और इन दिनों वो इसका संचालन कर रही थीं। लंकेश पत्रिके ने प्रदेश और देश मैं सांप्रदायिकता के खिलाफ जमकर आवाज उठायी. इसके चलते बीजेपी और आरएसएस के लोगों से उनका खुला टकराव चलता रहता था। बीजेपी के स्थानीय नेताओं ने उनके खिलाफ मानहानि का मुकदमा किया था और अदालत में जीत हासिल की थी। माना जा रहा है कि गौरी के विचार भी डॉ एमएम कलबुर्गी और डॉ पंसारे जैसे ही थे। डॉ कलबुर्गी की भी उनके घर के दरवाजे पर हत्या कर दी गई थी। ये सच है कि गौरी राइट विंग के खिलाफ थीं, पर वो एक ऐसी इंसान थीं, जिन्होंने वाकई कोशिश की थी कि इन लोगों को समझाया जा सके। उन्होंने अपनी आखिरी ट्वीट्स में लिखा था, ‘हम लोग कुछ फर्जी पोस्ट शेयर करने की गलती करते हैं। आइए एक-दूसरे को चेताएं और एक-दूसरे को एक्सपोज करने की कोशिश न करें।‘ अपने अगले ट्वीट में लिखती हैं, ‘मुझे ऐसा क्यों लगता है कि हममें से कुछ लोग अपने आपसे ही लड़ाई लड़ रहे हैं। हम अपने सबसे बड़े दुश्मन को जानते हैं। क्या हम सब प्लीज इस पर ध्यान लगा सकते हैं।‘ वाकई में उनका लिखा, ट्वीट सही थीं, हम सबको चाहिए कि बिना किसी पर दल विशेष पर आरोप लगाएं निष्पक्ष जांच कर दोषियों को सजा देने की मांग करनी चाहिए। 


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कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को चाहिए कि वह शीघ्र ही जांच कराकर दोषियों को बेनकाब करें। जहां तक गौरी लंकेश की हत्या पर वामपंथियों के क्रोध का सवाल है तो वह जायज है लेकिन केरल और कर्नाटक में ही नहीं देश भर में हजारों पत्रकारों की हत्याएं हुई तो वे चुप क्यों रहे। बेशक, हर किसी को अपनी बात कहने का अधिकार है और उसका सम्मान किया जाना चाहिए। कर्नाटक की यह घटना पहली नहीं है। कलबुर्गी के हत्यारों को भी अभी तक नहीं पकड़ा जा सका है। वहां सरकार किसकी है। क्या राहुल गांधी या वामपंथी बतायेंगे कि वह सीधे राज्य सरकार को घेरने के बजाय मोदी को ही निशाना क्यों बना रहे हैं? सोशल मीडिया में उन्हें खुलेआम गालियां दी जा रही है, जो गलत है। यह खुशी की बात है कि कर्नाटक सरकार ने लंकेश की हत्या करने वाले का सुराग देने वाले को 10 लाख रुपये देने का ऐलान किया है। लेकिन कर्नाटक सरकार को यह भी बताना चाहिए कि से अगर गौरी लंकेश नक्सलियों को सरकार की सहमति से सरेंडर करने के लिए प्रोत्साहित कर रही थीं? तो उन्हें पर्याप्त सुरक्षा मुहैया क्यों नहीं कराई गईं। क्योंकि कानून-व्यवस्था कायम रखना राज्य सरकार का काम है। लंकेश के भाई इंद्रजीत ने हत्या की सीबीआई जांच की मांग करते हुए खुद कहा है, जहां तक हमें पता है कि किसी तरह की कोई धमकी उन्हें नहीं मिली थी। सीसीटीवी फुटेज और लंकेश के मोबाइल फोन से ठोस सबूतों की मदद से हत्यारों को पकड़ा जाना चाहिए। अफसोस है कि हत्यारे अब तक पुलिस की गिरफ्त से दूर हैं। हालांकि पुलिस अब तक मिले सुरागों के आधार पर कई पहलुओं से छानबीन कर रही है। एक नया एंगिल ये सामने आ रहा है कि कहीं इस हत्या में गौरी से नाराज नक्सलियों का हाथ तो नहीं है? गौरी की मौत की जांच के लिए बनी एसआईटी पत्रकारिता से लेकर नक्सल एंगल तक जांच कर रही है। 

कहा जा रहा है कि गौरी ने कई नक्सलियों को हथियार छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लाने का काम किया था, जिससे नक्सली उनसे नाराज चल रहे थे। यह अलग बात है कि गौरी लंकेश और कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के बीच पिछले शनिवार को दो घंटे तक चली एक बैठक भी चर्चा का विषय बनी हुई है। कुछ लोग कह रहे हैं कि गौरी सरकार में हो रही किसी गड़बड़ी पर बड़ा धमाका करने जा रही थीं और मुख्यमंत्री से बैठक उसी सिलसिले में हुई थी। कर्नाटक के राजनीतिक गलियारों में कुछ लोग इस हत्याकांड के पीछे लिंगायत वोटबैंक की राजनीति का हाथ भी देख रहे हैं। कुल मिलाकर गौरी लंकेश की हत्या पर कई अलग-अलग नजरिए से जांच हो रही है। लेकिन बुनियादी सवाल तो अब भी वही बना हुआ है कि गौरी लंकेश के हत्यारे कब पकड़े जाएंगे? क्या अब नेता ही न्यूज चैनलों और अखबारों की संपादकीय नीति भी तय करेंगे? क्या इंसाफ की देवी की तलवार की धार कमजोर पड़ गई है? बेंगलुरु में एक पत्रकार की हत्या हुई या बीजेपी विरोधी पत्रकार की? कोई कैसे इतनी संवेदनशील और सहज महिला से इतनी घृणा कर सकता है? कहीं कोई निजी रंजिश का मामला तो नहीं था? इन सवालों का जवाब अब हर कोई जानना चाहता है। यूं भी हत्या के मामलों को अखबार के पन्नों या टीवी स्टूडियो की चर्चा में निपटा देना कोई समझदारी का काम नहीं है। हत्या के सुराग इकट्ठा करना, आरोपियों की शिनाख्त करना और उन्हें सजा दिलाना पुलिस का काम है। 




(सुरेश गांधी)
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