विशेष आलेख : सर्वप्रिय अद्भुत व प्राणों को सर्वाधिक शुद्ध करने वाला वृक्ष पीपल

सभी वय के लोगों के लिए परिचित, सर्वप्रचलित और सर्वप्रिय भारत के प्रसिद्ध वृक्ष पीपल की महिमा वेद , पुराण, चरक, सुश्रुत और निघण्टु आदि आयुर्वेद शास्‍त्रों में सर्वत्र गाई गई है, वहीं अतिप्राचीन काल से ही छोटे- बड़े वैद्य, चिकित्सक, ग्रामीणों के द्वारा पीपल के विभिन्न भागों अर्थात अंगों का औषध रूप में प्रयोग किये जाते रहने के कारण लोगों में बिश्वास है कि पीपल अनेक रोगों के लिए स्वयं औषध ही नहीं, अपितु औषधालय का भी रूप है। प्राचीन काल से ही नीम, बड़ और पीपल इन तीन वृक्षों को एक साथ लगाने की परिपाटी है, जिसे त्रिवेणी की संज्ञा प्रदान की गई है। यह दुःखों, रोगों से छुड़ाकर सुखी करने वाला और सच्चे तीर्थ का फल देने वाला कार्य करता है। विदेशों में इस बात पर हैरत प्रकट करते हुए कहा जाता है कि भारत देश में पीपल का ऐसा वृक्ष है, जो प्राणवायु अर्थात आक्सीजन प्रदान दिन में तो करता ही है रात में भी प्रदान करता है, जबकि अन्य सभी वृक्ष रात्रि में विषैला घातक वायु (कार्बन) छोड़ते हैं । इसीलिये पीपल की सर्वश्रेष्ठता को प्रदर्शित करते हुए श्रीमद्भगवद्गीता 10-26 में श्रीकृष्ण ने कहा है कि समस्त  वृक्षों में सर्वश्रेष्ठ पीपल का वृक्ष और देवर्षियों में अर्थात् जो देव होकर मन्त्रों के द्रष्टा होनेके कारण ऋषिभावको प्राप्त हुए हैं, उनमें मैं नारद हूँ। गन्धर्वों में मैं चित्ररथ नामक गन्धर्व हूँ, सिद्धों में अर्थात् जन्म से ही अतिशय धर्म, ज्ञान,वैराग्य और ऐश्वर्य को प्राप्त हुए पुरुषों में मैं कपिलमुनि हूँ। गीता की इस उक्ति से यह स्पष्ट है कि वृक्षों में सर्वश्रेष्ठ गुणवाला होने के कारण पीपल सर्वश्रेष्ठ वृक्ष है। इसलिये धर्मवृक्ष, शुचिद्रुमः, याज्ञिकः, श्रीमान और पवित्रकः आदि अनेक नाम पीपल वृक्ष के निघन्टुओं में दिये गए हैं। महात्मा बुद्ध ने भी इस पीपल वृक्ष के नीचे ही बैठकर तपस्या की थी। इसी कारण गया में आज भी उपस्थित इस वृक्ष का नाम बोधिवृक्ष भी है क्योंकि इसके नीचे तपस्या करने से महात्मा बुद्ध को बोध अर्थात ज्ञान की प्राप्‍ति हुई थी।


पीपल वृक्ष का विस्तार व फैलाव तथा ऊँचाई बहुत होती है। पीपल का वृक्ष सौ फुट से भी अधिक ऊँचा देखने में मिलता है। विस्तार, फैलाव व ऊँचाई इतना कि सैकड़ों पशु- पक्षी व मनुष्य उसकी छाया में विश्राम कर सकते हैं। भारत में सर्वत्र उपलब्ध इस वृक्ष को पौराणिक बहुत पवित्र और पूज्य मानते हैं तथा इसे देववृक्ष अर्थात इसे देवताओं का वृक्ष मानते हैं। झारखण्ड, छतीसगढ़,उड़ीसा, असम आदि प्रदेशों में तो आश्विन कृष्ण पक्ष के अष्टमी, जिसे श्राद्ध अष्टमी भी कहते हैं, को निर्जला उपवास रख कर पीपल वृक्ष के तना (डाल) को आंगन के मध्य में गाड़कर नृत्य- गान व संगीत के मध्य एक पौराणिक कथा का श्रवण और विधिवत पूजन-अर्चा करते हुए जीवित्पुत्रिका व्रत का आयोजन पुत्रमयी माताओं के द्वारा किया जाता है और अपने संतानों व परिवार के उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं। दूसरे दिन महिलाएँ चौबीस घंटे पश्चात उपवास तोड़ पारण करती हैं। इस बात को भले ही उनका अंधविश्वास व अंधश्रद्धा समझा जाये, किन्तु इसका मूल कारण है कि पीपल में अनेक दिव्य गुण हैं और प्राणवायु को शुद्ध करने का सबसे अधिक गुण इसमें पाया जाता है। इस कारण फुसफुस अर्थात फेफड़े के रोगों, क्षय अर्थात तपेदिक, श्वास (दमा), कास (खांसी) तथा कुष्ठ, प्लेग, भगन्दर आदि रोगों पर बहुत लाभदायक सिद्ध हुआ है। यही कारण है कि भारतीय इसे बहुत श्रद्धा से लगाते हैं, और देवता समझकर प्रतिदिन जल सींचते हैं। जोहड़ों, घरों के अंदर व बाहर, ग्रामों के आस-पास तथा खेतों तक में सर्वत्र बड़ी भारी संख्या में पीपल के पाए जाने का यही कारण है।

 पीपल का वृक्ष स्वयं भी अत्यन्त उदार अर्थात् परोपकारी वृक्ष है। इसके सम्बन्ध में कहा गया है -परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः। इसकी छाया, फल, पत्ते, वल्कल अर्थात छाल और लकड़ी सभी प्राणियों के कार्य में आती है। इसकी दाढ़ी तो पुत्रदा होने से सर्वत्र प्रसिद्ध है । यह किसी सामान्य पीपल के वृक्ष में नहीं मिलती, इसलिए इसे लोग ढ़ूंढ़ते फिरते हैं। बहुत ढ़ूंढ़ने से किसी पीपल में पीपल की दाढ़ी मिलती है जो पुत्रदा होती है। इस दाढ़ी के प्रयोग अत्यंत फलप्रद हैं। इसके मूल से लेकर चोटी तक सब कुछ औषध रूप में कार्य में आता है। अतः इसको यज्ञिय वृक्ष कहते हैं। सभी प्राणियों को यह सुख ही देता है इसीलिए इसको देवता भी कहते हैं। सबको जो सुख देवे उसे देवता कहना उचित ही है। अनेक दिव्य गुणों का भंडार होने से भी यह देवता कहलाता है। वेद में भी फल के स्थान पर पिप्पल शब्द का ही प्रयोग किया है -

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषष्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्‍नन्नन्यो अभि चाकशीति ॥
-ऋग्वेद मण्डल 1 सूक्त 164 मन्त्र 20

अर्थात -दो सदैव साथ रहने वाले सखा (मित्र) पक्षी हैं। दोनों एक ही वृक्ष (प्रकृति) पर निवास करते हैं। इनमें एक पक्षी जीवात्मा है जो इस वृक्ष के फल (पिप्पल) को स्वाद लेकर खाता है। दूसरा पक्षी परमात्मा इस जीव के अपने मित्र के अच्छे बुरे कर्मों को साक्षी रूप में देखता है और इसके अच्छे बुरे कर्मों का फल सुख तथा दुःख के रूप में सदैव देता ही रहता है। यहां फल के स्थान पर पिप्पल (पीपल) का प्रयोग किया गया है। प्रकृति जीवात्मा के भोग के रूप में कार्य में आती है, यही इसका पिप्पल (पीपल) रूपी फल है।

 वेद में अश्वत्थ, पीपल के विषय में अनेक मन्त्र मिलते हैं। पीपल को संस्कृत में पिप्पलः कहा जाता है। इसके अनेक नाम हैं। धन्वन्तरीय निघण्टु 78- 79 में पीपल के विभिन्न नामों का अंकन करते हुए कहा गया है कि पीपल के अन्य नाम पिप्पल, केशवावास, चलपत्र, पवित्रक, मंगल्य, श्यामलः, अश्‍वत्थ, बोधिवृक्ष, गजाशन, श्रीमान्, क्षीरद्रुमः, विप्र, शुभद, श्यामलश्छद, गुह्यपत्र, सेव्य, सत्य, शुचिद्रुम, चैत्यद्रुम, वनवृक्ष, चन्द्रकर, मिताह्वय आदि हैं। इसके अतिरिक्त गुरु, गुह्यपुष्प, कपीतन, कृष्णावास, महाद्रुम, नागबन्धु, वृक्षराज, नारायणम् आदि अनेक नाम और भी इस पीपल वृक्ष के अन्य निघन्टुओं में मिलते हैं। वक्षों में सर्वश्रेष्ठ होने से वृक्षराज, धर्मवृक्ष आदि भी इसके नाम दिये हैं। संस्कृत भाषा में पिप्पलः, अश्वत्थः आदि दो दर्जन से अधिक नाम हैं। हिन्दी में पीपल, पीपली, गुजराती में  पीप्पलो, पीपुलजरी, बंगाली में अश्वत्थ, असुद, असवट, पंजाबी में भोर, पीपल, तामिल में अचुक्तम्, अटास, अरशमरस, अस्वत्तम्, कुजीरावनम् इत्यादि, तेलगू में अश्वथ्यम्, बोधि, रावीचेट्ट आदि, फारसी में दरख्त-तेरजो, अंग्रेजी में पीपल ट्री और लैटिन में Ecus  Religiuse कहते हैं।


अथर्ववेद में अश्वत्थ सम्बन्धी पांच मन्त्र अंकित प्राप्य हैं पीपल के गुणों तथा औषध रूप सेवन से लाभादि का वर्णन अंकित हैं। अथर्ववेद काण्ड 5, सूक्त 4, मन्त्र 3 में पीपल की महिमा गान करते हुए कहा गया है - 

अश्वत्थो देवसदनस्तृतीयस्यामितो दिवि।
तत्रामृतस्य चक्षणं देवाः कुष्ठमवन्वत॥
- अथर्ववेद काण्ड 5, सूक्त 4, मन्त्र 3

अर्थात- अश्वत्थ वृक्ष की छाया देवताओं के बैठने योग्य है । जहां वीर और उनके अश्वों के बैठने योग्य पीपल की छाया है, वहां देवताओं को भी ब्राह्मणों और विद्वानों के लिए पीपल वृक्ष की छाया बहुत हितकारक है । इसलिये पीपल को देवसदन कहते हैं । वीरों और विद्वानों के ठहरने का स्थान है, यह स्थान मध्यम और निकृष्ठ अवस्था से परे है । अर्थात् द्वितीय वा तृतीय दर्जे का यह स्थान नहीं, यह सर्वोत्तम प्रकार का स्थान है । श्रेष्ठ गति वालों का यह उत्तम स्थान है । इसके सेवन से अमृत की (शुद्ध प्राणों की) शुद्ध वायु की प्राप्‍ति होती है । देव विद्वान् लोग पीपल के स्थान की, रोगनाशक स्थान की प्राप्‍ति की मांग करते हैं ।
  
इसी प्रकार का इससे मिलता-जुलता एक मन्त्र और अथर्ववेद काण्ड 6, सूक्त  95, अनुवाक 20 में भी अंकित है। वेद में पीपल को पुत्रदा औषध की संज्ञा प्रदान की गई है। पुत्रदा योग के सम्बन्ध में पीपल की महिमा मण्डन करते हुए अथर्ववेद काण्ड 6 सूक्त 11 मन्त्र 1 में कहा है - 

शमीमश्वत्थ आरूढस्तत्र पुंसवनं कृतम्।
तद्वै पुत्रस्य वेदनं तत्स्त्रीष्वा भरामसि ॥
- अथर्ववेद काण्ड 6 सूक्त 11 मन्त्र 1

अर्थात - जो अश्वत्थ (पीपल) का वृक्ष शमी वृक्ष पर उत्पन्न होकर आरूढ रहता है अर्थात् जो पीपल का वृक्ष शमी वृक्ष के ऊपर उगता है और उसी पर बड़ा होकर रहता है, चढा रहता है, उस पर ही सवार रहता है (जिसकी जड़ भूमि में नहीं जाती), वह पीपल का वृक्ष पुंसत्व शक्ति देने वाला होता है । वह पुत्रदा अर्थात् पुत्रोपन्न करने वाला होता है । इसका औषध रूप में सेवन किया जाये तो पुत्र की प्राप्ति करवाता है । ऐसे पीपल के फल, छाल, पत्र और दाढी, बल्कल आदि का स्त्रियों को सेवन कराने से उनका बांझपन दूर होता है और पुत्र की प्राप्ति होती है । 
  
पीपल के विभिन्न गुणों का उल्लेख करते हुए अथर्ववेद काण्ड 4, सूक्त 37 मन्त्र 4 में कहा है कि जिन स्थानों पर पीपल, बड़ आदि ऊंचे ऊंचे महावृक्ष होते हैं वहां पर अश्वारोही बलवान योद्धा होते हैं । पीपल के, बड़ के वृक्षों के नीचे उनके अश्व तथा वे स्वयं भी विश्राम करके सब रोगों से मुक्त रहते हैं । आकाश में दूषित वायु से उत्पन्न होने वाले छूत के रोगों, प्लेग, चेचक, हैजा, ज्वर आदि से वे सुरक्षित रहते हैं क्योंकि वे "प्रतिबद्धा" ज्ञानी जागरूक रहने वाले होते हैं । वे इन पीपल, वट आदि महावृक्षों के गुणों से परिचित होकर इनको औषध रूप में सेवन करते हैं तथा इन महावृक्षों की छाया, फल, फूल, दूध, पत्तों की शक्तिशाली औषध का सेवन करके मिरगी, अपस्मार, पागलपन आदि रोगों से बचे रहते हैं तथा विद्वान प्रतिबद्ध जागरूक होकर सुखी रहते हैं ।

अथर्ववेद काण्ड 19 सूक्त 39 मन्त्र 6 के अनुसार पीपल का वृक्ष देव विद्वान् ब्राह्मण संन्यासियों और वीर क्षत्रियों के बैठने तथा ठहरने का सर्वोत्तम स्थान है । यह मध्यम वा निकृष्ठ स्थानों से सर्वथा परे है अर्थात् सर्वोत्तम है । वहां सर्व प्रकार के रोगों दुःखों की निवृत्ति होती है तथा सर्व प्रकार के रोगों से छुटकारा मिलता है और अमृत रूपी आनन्द के दर्शन, प्राप्‍ति होती है । कुष्ठ और ज्वारादि रोग दूर होते हैं । सब की पीड़ायें दूर होती हैं। 

पीपल वृक्ष को सदा से ही सर्वश्रेष्ठ ,पूज्य और देववृक्ष माने जाने का मुख्य कारण यह है कि यह यज्ञीय वृक्ष है, अर्थात इसका प्रत्येक भाग सभी प्रणियों के लिये और विशेष रूप से मानव के कल्याणार्थ व उपादेय है। इसकी छाया अत्यंत शीतल व सुखद, पत्र कोमल, चिकने हरे रंग के आंखों को सुहाने लगने , फल पकने पर मधुर तथा स्वादु लगते हैं। औषध के रूप में इसके पत्र, त्वक, फल, बीज, दुग्ध (लाख), लकड़ी आदि इसका प्रत्येक अंग व अंश हितकर है। इसकी लकड़ियाँ भी यज्ञ में समिधा के रूप में काम आती हैं। दैनिक यज्ञ करने वाले को तोड़ने की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि पीपल वृक्ष की छोटी-छोटी तथा पतली-पतली लकड़ियां स्वयं सूख कर झड़तीं रहतीं हैं, जो पीपल के वृक्ष के नीचे पड़ी हुई स्वयं मिल जातीं हैं। पीपल वृक्ष की आयु भी लम्बी होने के कारण यह लम्बे समय तक सुख देने वाला है, सर्व हितकर है । इसीलिये इसे देववृक्ष, यज्ञीयवृक्ष और पूज्य वृक्ष मने जाने से यह सर्वप्रिय वृक्ष बन गया है । यह भारत का अद्‍भुत् वृक्ष है जो प्राणों को सबसे अधिक शुद्ध करने वाला तथा शक्तिदायक है । सब वृक्षों में सबसे अधिक जीवन शक्ति आक्सीजन प्रदान करता है इसीलिये इसको घर और मन्दिरों सभी स्थानों पर श्रद्धा से लगाया जाता है । चैत्यद्रुम अर्थात मंदिरों का वृक्ष, विप्रः , शुभदः और मंगल्यः आदि इसके नाम हैं । एक और नाम है केशवावासः अर्थात श्रीकृष्ण  केशव, इस के नीचे आवास करते रहते थे । हाथी का प्रिय भोजन होने से गजाशनः, गजभक्षकः आदि भी नाम पीपल के हैं ।

पीपल के गुण का बखान करते हुए पुरातन ग्रन्थों में कहा गया है कि पीपल का वृक्ष रक्त, पित्त और कफ के रोगों को दूर करने वाला है। राजनिघन्टु में पीपल के गुण का वर्णन करते हुए कहा गया है कि पीपल सुमधुर (खूब मीठा स्वादिष्ट), कषायः (कषैला), शीतल (ठण्डा), कफ और पित्त रोगों का विनाश करने वाला है । रक्त सम्बंधी रोगों तथा दाह (जलन) को शान्त करने वाला है और योनिसंबन्धी स्‍त्री रोगों को तुरन्त शान्त करने वाला है । इसी में फलों के गुण का भी वर्णन करते कहा गया है कि पीपल वृक्ष के पके हुये फल हृदय रोगों को शान्त करने वाले और शीतल होते हैं । पित्त, रक्त और विष के कष्ट को दूर करते हैं । दाह, वमन, शोथ, अरुचि आदि रोगों को दूर करते हैं । फल पाचक, आनुलोमिक, संकोच, विकास-प्रतिबन्धक और रक्त शोधक हैं । आयुर्वेदिक ग्रन्थों के अनुसार पीपल मधुर, शीतल, कषैला, दुर्जर, भारी, रूखा, कान्ति को उज्जवल करने वाला, कड़वा, योनिशोधक और रक्तदोष, दाह (जलन), पित्त, कफ और व्रण (फोड़ों) जख्मों को ठीक और दूर करने वाला है ।

पीपली का वर्णन करते हुए राजनिघन्टु में कहा गया है कि पीपली छोटे पत्तों वाली - ह्रस्वपत्रिका भी इसका नाम है । पवित्रा, पिप्पलिका, क्षुद्रा और वनस्था इसके नाम हैं । पीपल के समान गुण वाली पिप्पलिका अर्थात पीपली भी होती है । पिप्पली (पीपली) मधुर, कशाय (कषैली), रक्तपित्त के दोषों को जीतने वाली है। विष विकारों तथा दाह (जलन) को शमन करने वाली है । कुछ भारी तथा हितकारी होती है। भावप्रकाश निघण्टु में पीपल को भारी, देर से पचने वाला, शीतल, कषैला, रूखा, व्रण (फोड़ों) जख्मों को ठीक करने वाला, योनि को शुद्ध करने वाला और पित्त, कफ, व्रण तथा रक्त विकार को नष्ट करने वाला कहा गया है। व्यवहार में पीपल के पत्र, त्वक् (छाल), फल, बीज, दुग्ध, लाख और दाढ़ी के रूप में प्रयुक्त होता है । इसके पत्ते कोमल, चिकने, हरित पाण्डुर वर्ण के होते हैं । पत्रवृन्त (डंठल) पतला, लम्बा होता है । पत्राकृति पान के समान किन्तु विशेष नोकदार शिरापूर्ण होती है । पुष्प इसके गुह्य (गुप्‍त) होने से इसका नाम गुह्यपुष्पक है । चैत्र में अर्थात पतझड़ के काल में इसके पत्ते झड़ जाते हैं और वर्षा से पूर्व ही कोमल पत्तों से पुनः शोभित हो जाता है । फल बहुत लगते हैं । जब कच्चे होते हैं तो हरे और पकने पर हल्के रक्त वर्ण के होते हैं । फलों का स्वाद मधुर होता है और वे गुणकारी होते हैं । इसका दूध बहुत ही शीघ्र रक्तशोधक, वेदनानाशक, शोषहर होता है । दूध का रंग सफेद होता है । कोमल पत्तों का लेप व्रण पर हितकारक होता है । लाख पुराने पेड़ों पर लगती है जो रक्तशोधक, रंजक, शीतल तथा ज्वर और निर्बलता को दूर करती है । लाक्षादि वा महालाक्षादि तैल में इसी पीपल की लाख का ही प्रयोग होता है, जो बहुत गुणकारी है। इस प्रकार प्रत्येक भाग पीपल का हितकारी होता है। इसी कारण पीपल का वृक्ष सब वृक्षों में श्रेष्ठ, पूज्य, पवित्र और गुणकारी माना गया है। इस महान गुणकारी व लोकहितकारी पीपल के विषय में वेद में कहा है -

अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता ।

वेद में आये पीपल के इस अश्वत्थ नाम की निरुक्ति और अर्थ इस प्रकार किया गया है - अश्वत्थः श्‍वः स्थास्यति न स्थास्यति वा । अर्थात् जिस प्रकार असार संसार में हमें पता नहीं हम कल रहेंगे वा नहीं इसका कोई ज्ञान नहीं । इसी प्रकार पीपल वा पीपल के पत्तों का यह पता नहीं कि वह कल रहेगा वा नहीं। इसीलिये चलपत्र पीपल का नाम है । इसके पत्ते सदैव चलते हिलते रहते हैं, गति में रहते हैं। वे स्थायी नहीं हैं। प्रतिवर्ष पतझड़ में चले ही जाते हैं, फिर नये पत्ते फूट आते हैं। इसीलिये पीपल के पत्तों का भी पता नहीं वे कल रहेंगे वा नहीं। जब पीपल बहुत पुराना भारी हो जाता है तब इसका भी पता नहीं होता वह कल रहेगा वा नहीं । इसीलिये इसका अश्वत्थ नाम है । इस विनाशशील संसार में पीपल वा पीपल के पत्ते समान संसार में हम सब का जीवन अनित्य है। सदा रहने वाला नहीं। अतः सावधान रहकर धर्माचरण करने की ही अश्वत्थ से शिक्षा मिलती है।




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अशोक “प्रवृद्ध”
करमटोली , गुमला नगर पञ्चायत ,गुमला 
पत्रालय व जिला – गुमला (झारखण्ड)
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