विशेष आलेख : भारत एक गड्ढा प्रधान देश

देश में विकास सड़क के गड्ढों की तरह फैलता जा रहा है। दरअसल ये छोटे-छोटे गड्ढे भारत मां पर जख्म है। ये जख्म आजादी के सत्तर साल बाद सोने वाली चिड़िया की हाल-ए-दास्तां है। हर पांच साल बाद कोई न कोई महापुरुष जीतता है और इन जख्मों को भरने की बजाय सहलाता है और नमक छिड़क कर चला जाता है। वैसे भारत एक गड्ढा प्रधान देश है। यहां गड्ढा खोदने वाले बहुतायत में पाये जाते है। लेकिन गड्ढा पूर्ति करने वाले लोगों का यहां बीते सात-आठ दशकों से भयंकर अकाल है। देशवासियों की भलाई को न जाने कौनसा भूत खा गया है ! कोई मायका लाल गड्ढा भरने की हिम्मत नहीं करता। देश के लिए जान देने की बात भी कौन करता है। वो भी आज के इस डिजिटल युग में। युग इतना डिजिटल हुआ कि मोबाईल के छोटे-छोटे गेम बच्चों की जान लेने लग गये। ऐसी डिजिटल क्रांति पर वज्र गिरे। तौबा-तौबा ! बरहाल गड्ढा भरने की बात पर आना ही ठीक रहेगा। हर कोई देश के गड्ढो का जिक्र तो करता है और इसकी क्षतिपूर्ति करने का वायदा भी करता है। लेकिन सत्ता जैसी सौतन आने के बाद हर किसी का अपनी मां (भारत माता) के प्रति मोहभंग हो ही जाता है। सत्ता भले-भले भले लोगों का मानसिक संतुलन हिला कर जो रख देती है।


देश में बीते सात दशकों में हमें 2जी 3जी नामक गड्ढे मिले है। यहां तक देश के भक्तों ने कोयला और चारा खाकर भी अपना गड्ढा भरने का भरसक प्रत्यन्न किया है। जब सब खुद के गड्ढों को भरने लगे तब से देश में गड्ढों की गहराई दिन दुगुनी और रात चैगुनी गहरी होती गयी। हमारे इन्हीं गड्ढों का स्वर्णिम इतिहास बखान करनी वाली सड़के इसका पुख्ता सबूत है। देश की नामी-गामी कंपनियों ने इन गड्ढों से परेशान होकर ऐसी-ऐसी ए.सी. वाली गाड़ियां बनायी कि अंदर बैठने वालों को जरा भी इन गड्ढों से होने वाली तकलीफ से तू-तू मैं-मैं न करनी पड़ी। कंपनी वालों ने अपना काम कर लिया। पर देश के आकाओं ने गड्ढों पर कभी गंभीरतापूर्वक ध्यान ही नहीं दिया। देश के हूक्मरानों से इन गड्ढों को भरने की आस रखना भी बेमानी है। क्योंकि इनकी आंखों में न लाज है और न ही शर्म का पानी है। रावण घूमे हजार पर यहां शीर्षक राम कहानी है। आखिर ये कैसी मनमानी है ?

पहले तो सिर्फ गिने-चुने लोग ही देश में गड्ढा खोदते थे। अब तो गड्ढा खोदने वालों की कतार लग चुकी है। सबको सत्ता नामक कुदाल से गड्ढा खोदकर लखपति-करोड़पति बनने की बेताबी है। जितने गड्ढे सड़क के बढेंगे इतने ही मृगतृष्णा के गड्ढे इन लोगों के भरेंगे। अब तो साधु के वेश में बाबा लोग भी बाबियों को पटा रहे है। न पटे तो मजबूर करके अपनी दाल गला रहे है। आस्था और धर्म का कचुम्बर कर रहे है। धर्म को बेचकर अपना गड्ढा भर रहे है। इन्होंने गड्ढा खोदकर अपनी आलिशान कुटिया बना ली है। कुटिया भी ऐसी कि किसी फाइव स्टार होटल से कम नहीं है। आज हर छोटे से लेकर बड़े तक सभी प्राणी कुत्ते की तरह गड्ढा खोदने लग गये है। कुत्ता तो बेचारा अपने बैठने के लिए गड्ढा खोदता है लेकिन, ये मनुष्य प्रजाति न जाने क्यूं गड्ढा खोदने पर उतारू है। जब कि इन्हें पता है कि एक दिन गड्ढों में इन्हें ही हमेशा के लिए सोना है। यह मौत के बाद का तो बंदोबस्त नहीं कर रहे है ! 


लोकतंत्र में कितने सावन और कितने बसंत बीते। सर्दी में लोगों को अखबार ओढ़कर सोते देखा तो गर्मी में झुलसते। बरसात की बाढ़ में डूबते देखा तो पतझड़ में लूटते। न जाने कब इनके जीवन से सूखा खत्म होगा ? ये सूखा तभी खत्म होगा जब इन गड्ढों को भरने के लिए फिर से भगतसिंह और सुभाषचंद्र बोस पैदा होंगे। बरहाल तो आजादी के नाम पर कोढ़ में खाज है। गोरे तो जाते रहे कालो का राज है। भगवान ! इन लोगों को गरीबी, महंगाई के गड्ढे भरने की शक्ति देवें। साथ ही खुद के गड्ढे न भरने की सद्बुद्धि भी देवें। 






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--देवेंद्रराज सुथार--
जालोर, राजस्थान। 
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