विशेष आलेख : भाई-बहनों के बीच स्नेह दर्शाने वाला पर्व है करमा

  • झारखंड और बिहार में विशेष तरह से से मनाते हैं

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पटना।करमा पर्व भादो शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि को मनाया जाता है, जिसे भादो एकादशी भी कहते हैं।जनजातीय समुदाय खेती–बारी के कार्यो की समाप्ति के बाद इसे हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। इस पर्व के अनेक रूप हैं, जिसे विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न–भिन्न तरीकों से मनाया जाता है। जैसे जितिया करम, दसई करम, राजी करम आदि। इनमें राजी करम सभी स्थानों पर एक ही साथ निश्चित तिथि अर्थात भाद्रपद शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि को मुख्यत: खुखरा परगना में मनाया जाता है। प्रो. सतीश कुमार भगतदोज सगे भाई थे करमा और धरमा। करमा बड़ा था ओर धरमा छोटा। दोनों अलग–अलग मनोवृत्तियों वाले थे। करमा कठोर मेहनत, समय की बचत और धन की बचत पर विश्वास रखता था। उसका मुख्य पेशा व्यापार था, जबकि धरमा प्रेम, विनम्रता, पूजा, धर्म, नैतिकता, सरलता, सामूहिकता पर विश्वास करता था। उसका मुख्य पेशा कृषि था। 


एक बार करमा व्यापार के सिलसिले में विदेश चला गया। व्यापार से उसने काफी धन अर्जित किया। फलत: वह घमंडी हो गया और अपने आप को ताकतवर महसूस करने लगा। तब विदेश से वह अपने गांव–घर के लिए रवाना हुआ। अपार संपत्ति अर्जित करने के बाद वह अपने गांव की सीमा पर अपने सहयोगियों के साथ विश्राम करने लगा। उसने अपने भाई धरमा को आने की सूचना दी, ताकि गांव की परिपाटी के अनुसार उसके स्वागत के लिए उसका भाई सीमा पर पहुंचे, परंतु छोटा भाई धरमा उस समय अपने परिवार और गांव के लोगों के साथ पूजा–अर्चना में मशगूल था। अत: वह अपने भाई का स्वागत करने के लिए समयानुसार वहां पहुंच नहीं सका। इस पर करमा आग–बबूला हो गया और गुर्राता हुआ वह अपने घर पहुंचा। उसने धरमा के पूजा स्थल को नष्ट कर दिया और करम राजा को उखाड़ कर फेंकना चाहा। भाई धरमा तथा गांव के लोगों द्वारा जोड़ी–बिनती करने के बावजूद करमा ने करम देवता को उखाड़ कर फेंक दिया। उसके इस व्यवहार से गांव के लोग बहुत दुखी हुए और रोने चिल्लाने लगे, विलाप करने लगे। इसके बाद करमा पुन: गांव की सीमा पर पहुंचा, जहां उसकी कमाई हुई धन–संपत्ति रखी थी। वहां वह यह देख कर चकित रह गया कि उसकी पूरी संपत्ति गायब थी। यह देखकर वह निराश और दुखी मन से संपत्ति की खोज करने लगा। संपत्ति नहीं मिलने पर उसने अपने सहयोगियों से सलाह मांगी। उन्होंने उसे करम राजा की पूजा–आराधना करने की सलाह दी। चूंकि वह करम राजा के निवास स्थान से परिचित नहीं था, इसलिए उसे सात समुंदर पार जाकर करम राजा को लाने को कहा। करमा करम देवता की खोज में निकल पड़ा। रास्ते में उसे जोरों की प्यास लगी। वह पानी पीने के लिए तालाब पर पहुंचा तो उसके पानी में कीड़े भरे हुए थे। इसलिए वह पानी नहीं पी सका। उसे भूख लगी तो वह एक गूलर के पेड़ के पास गया, लेकिन गूलर के सभी फलों में कीड़े कुलबुला रहे थे। अत: वह फल भी नहीं खा सका। वह आगे बढ़ा तो देखा कि एक गाय अपने बच्चे को दूध पिला रही थी। उसने गाय को अपना दुखड़ा सुनाया तो गाय ने उसे दूध पीने की अनुमति दे दी, लेकिन जब वह गाय को दूहने लगा तो उसके थन से दूध के बदले खून गिरने लगा। इससे वह दूध भी पी नहीं सका। आगे बढ़ने पर उसने देखा कि एक महिला चूड़ा कूट रही है। वह उसके पास पहुंच कर उसे बताया कि वह भूख से परेशान है। तब महिला ने उसे चूड़ा खाने को दिया, लेकिन चूड़े में कंकड़ और धूल ऐसे भरे पड़े थे कि वह खा नहीं सका। वहां से वह आगे बढ़ा तो उसे एक घोड़ा दिखाई पड़ा। उसने घोड़े से अपनी परेशानी बता कर मदद मांगी, लेकिन घोड़ा भी वहां से भाग निकला। हताश निराश होकर वह आगे बढ़ा तो एक दी मिली। नदी में वह बीचोबीच एक मगरमच्छ आ पहुंचा। उसने उसे अपनी पीठ पर बैठा कर करम देव के पास पहुंचा दिया। करम देवता उसको परीक्षा में सफल देखकर प्रसन्न हो उठे और उन्होंने वरदान दे दिया। साथ ही करम डाली की पूजा करने की सलाह दी। वहीं से करम देव की पूजा शुरू हो गई। एक था करमा, एक था धरमा पर्यावरण का पर्व करमा वस्तुत: पर्यावरण का पर्व है। करम देव के आदेशानुसार कर्मा पर्व के अवसर पर व्रती और उनके परिजन ढोल–मांदर की ताल पर नाचते गाते घर से निकलते हैं और जंगल में जाकर करम डाली लेकर पूरे सम्मान के साथ अपने घर ले आते हैं। उसे आंगन में गाड़ कर उसकी पूजा–अर्चना करते हैं। 


प्रसाद में चना, उड़द, जौ, गेहूं, मकई, ज्वार, कोदो का अंकुर और गुड़ होता है, जिसे करम देव को अर्पित कर वहां उपस्थित लोगों के बीच वितरण करते हैं। इस दौरान करमा और धरमा की कहानी सुनी जाती है, जो संदेश देती है कि जीवन को खुशहाल बनाने के लिए कर्म और धर्म दोनों की आवश्यकता होती है। फिर शुरू होता है नाच–गान का सिलसिला, जिससे रात भर आस–पास का क्षेत्र गूंजता रहता है। दूसरे दिन सुबह करम डाली को नदी या तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है। इस दिन हर परिवार के लोग अपने खेतों में केंदु, करम और भेलवा की पत्ती एवं डाली गाड़ते हैं। भेलवा की पत्ती फसल में लगे कीड़ों को मारने का काम करती है। खेतों में डालियों का गाड़ना कर्म करने का प्रतीक है तो वहीं पेड़ों की रक्षा करते हुए पर्यावरण को बचाने का प्रयास धर्म का प्रतीक। खेतों में वृक्षों की डालियों को गाड़ने से उनपर चिडि़यां बैठती हैं और फसल के हानिकारक कीड़ों को खा जाती है। फलत: फसल अच्छी होती है। इस प्रकार कर्मा पर्व कृषि एवं पर्यावरण की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण पर्व है। कर्म भी चाहिए और धर्म भी नजातीय मानव समुदाय आदि काल से ही धरती माता की गोद में जीवन व्यतीत करता आ रहा है। उसके लिए धरती पर जंगल–झाड़, पहाड़, पेड़–पौधे, नदी–नाले, पोखर–तालाब एवं बहती छाएं इत्यादि बिल्कुल अपनी सी लगती है। धरती की इन सारी चीजों की बदौलत ही इस समुदाय का जीवन सुखी और मंगलमय रहा है। इन प्राकृतिक उपहारों को प्रकृति पूजक आदिवासी कतई बिसार नहीं पाते। आदिवासी समाज, जो न केवल जन्म से लेकर मृत्यु तक, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी पेड़– पौधों के साथ अपने आचार–व्यवहार से, अपनी संस्कृति से और अध्यात्म से इस प्रकार बिल्कुल करीब से जुड़ा है, रच बस गया है कि चाह कर भी इन्हें विश्व का बदलता परिवेश उनकी मौलिक धारणाओं और उनके विश्वासों को छू न सका। यही वजह है कि सृजन से लेकर आजतक प्रकृति पर पूर्ण आस्था रखनेवाले जनजातीय समुदाय आज करम वृक्ष में कर्म देव को निरूपित कर भादो महीने की शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि को प्रतिवर्ष हर्षोल्लास के साथ करमा पर्व मनाते आ रहे हैं। यह करमा पर्व कर्म को ही धर्म बतानेवाला पर्व है। झारखंड राज्य के जनजातीय क्षेत्रों का सर्वाधिक लोकप्रिय पर्व है करमा, जिसे आदिवासी और सदान मिलजुल कर सदियों से मनाते रहे हैं।

मान्यता के अनुसार करमा पर्व के अवसर पर बहनें अपने भाइयों की दीर्घायु एवं मंगलमय भविष्य की कामना करती हैं। यह सर्वविदित है कि जनजातियों से जिन परंपराओं एवं संस्कृति को जनम दिया, सजाया–संवारा, उन सबों में नृत्य, गीत और संगीत का परिवेश प्रमुख है। झारखंड राज्य की संस्कृति, इतिहास, परंपरा और विविध लोककथाएं अति समृद्ध और अनूठी हैं। इस राज्य की जनजातीय भाषा, गीत, लोककथाएं, नृत्य एवं प्रथाएं अन्य क्षेत्रों से भिन्न और अपने आप में विशिष्ट हैं। विशिष्टता ही इसकी पहचान और अस्मिता है। इस सांस्कृतिक विशिष्टता की अभिरक्षा, संवहन एवं परिव‌र्द्धन के दायित्व का निर्वहन करना भी समाज का कर्तव्य है। आदिवासी समाज के पूर्वज महान थे। उन्होंने एक वैज्ञानिक तथा रचनाकार के रूप में कार्य किया। उनके द्वारा ब्रंाांड प्रकृति, जलवायु, वन–संपदा, भूमि आदि की पूजा की गई तथा पर्यावरण संतुलन एवं वातावरण समायोजन आदि को ध्यान में रखकर करम पर्व तथा अन्य पर्वो का शुभारंभ जन जातीय समाज में किया था, ताकि पूरे संसार में शुद्ध तथा पवित्र वातावरण बना रहे। करमा पर्व भादो शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि को मनाया जाता है, जिसे भादो एकादशी भी कहते हैं। जनजातीय समुदाय खेती–बारी के कार्यो की समाप्ति के बाद इसे हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। इस पर्व के अनेक रूप हैं, जिसे विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न–भिन्न तरीकों से मनाया जाता है। जैसे जितिया करम, दसई करम, राजी करम आदि। इनमें राजी करम सभी स्थानों पर एक ही साथ निश्चित तिथि अर्थात भाद्रपद शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि को मुख्यत: खुखरा परगन में मनाया जाता है। रांची के पश्चिम में दसई करम तथा कसमार परगन में सोहराई करम के नाम से मनाया जाता है। राज्य के पश्चिम क्षेत्र में करम मनाने के विधि विधान में थोड़ा–बहुत अंतर पाया जाता है, लेकिन उसका मतलब एक सा ही होता है। करम मुख्यत: कुड़ुख यानी उरांव समुदाय के बीच करम देवता के रूप में आस्था के प्रतीक हैं।

मौके पर एक महिला कहती है कि क्या कर  रही हैं? वह जवाब देती है कि अपन करम भइया के धरम करमा झूर में घुसीआवेला। तब फिर सवाल करती हैं कि संतुष्ट हो गयी? तब कहती है कि जी संतुष्ट हो गयी।इसी तरह उपस्थित बहना झूर पकड़-पकड़ कर कहती हैं। दीद्या थाना क्षेत्र में है डाक बाबा ढकनी भाई मंदिर । ग्राम मखदुमपुर की महिलाएं जुटी थीं अपने-अपने भाइयों की आजीवन खुशहाली के लिये व्रत रखी। बाजार से झूर खरीदकर लायी। भगवान गणेश, पार्वती, भगवान शंकर ,सिद्धी की मिट्टी प्रतिमा बनायी। सुबह से व्रर्ती केवल रात्रि में आहार के रूप में शर्बत पीयेगीं। व्रर्ती मालती देवी कहती हैं कि आज करमा  भादो शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि को मनाया जाता है। आज पुलिस भइया पन्ना लाल यादव की खुशहाली और सुरक्षित जीवन की कामना के लिए करमा-धरमा के समक्ष गुहार लगा रही हैं। इस तरह की पूजा कई जगहों पर आयोजित की गयी है।                
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