विशेष : बेरोकटरोक पुलिस का डंडा, नीट के खिलाफ 'जस्टिस फॉर अनीता' पर रोक।

  • गलत कौन है-संविधान, संविधान लागू करने वाली सरकार या सुप्रीम कोर्ट?

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संविधान के अनुच्छेद 21 में सम्पूर्ण गरिमा के साथ जीवन जीना प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 226 एवं 32 में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने की गारण्टी न्यायपालिका के कंधों पर है। बावजूद इसके सम्पूर्ण भारत में हर दिन पुलिस लोगों को बेइज्जत करते हुए बेरहमी से डंडा बरसाती रहती है। एक आम नागरिक से लेकर समस्त जनप्रतिनिधि, मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रधानमंत्री, जज और राष्ट्रपति तक, सब के सब जानते हैं कि हर दिन संविधान को तार-तार करते हुए पुलिस हर रोज सरेराह लोगों पर डंडा बरसाती रहती है। मगर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है, क्योंकि पुलिस के डंडे का बार केवल आम लोगों पर होता है।


इसके विपरीत 8 सितम्बर, 2017 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरुण मिश्रा, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील सूरतसिंह को प्रस्तुत मामले में जिरह करने से वंचित करते हुए याचिका को निरस्त कर देते हैं। साथ ही 50 हजार का जुर्माना भी लगा देते हैं। केवल इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरुण मिश्रा को वरिष्ठ वकील सूरतसिंह को द्वारा जिरह करने की मांग करने से इतना अपमान और असम्मान महसूस होता है कि न्यायिक अवमानना की धमकी देते हुए वकील को जेल भेजने की धमकी देते हैं। जबकि उसी सु्प्रीम कोर्ट के समक्ष न्याय की आस में हत्या के हजारों मुकदमें दशकों तक लम्बित पड़े रहते हैं। दशकों बाद अनेक आरोपियों को निर्दोष मानकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रिहा कर दिया जाता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट निर्दोष करार दिये जाते समय किसी भी निर्दोष व्यक्ति के सम्मान या जीवन की भरपाई करने के लिये कभी कोई आदेश जारी नहीं करता है? शायद ऐसे लोगों का सम्मान सुप्रीम कोर्ट को याद ही नहीं रहता है?

देशभर में सरेआम लोगों के साथ विभेद और अत्याचार जारी है! क्या यही वजह है कि राजस्थान की राजधानी जयपुर के रामगंज बाजार में 8 सितम्बर, 2017 को ही अकारण ही पुलिस का जवान एक बाइक सवार निर्दोष व्यक्ति पर डंडा बरसा देता है? जिसकी कड़ी प्रतिक्रिया होती है। आम लोग भड़क जाते हैं और जयपुर जल उठता है! इसके बावजदू सभी संवैधानिक संस्थान मौन साधे रहते हैं! एक ओर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस को अपने सम्मान की रक्षा करने की इतनी चिन्ता है कि जज की कुर्सी पर बैठकर वरिष्ठ वकील को जेल भेजने की धमकी दी जाती है। दूसरी ओर पुलिस बेरोकटोक लोगों पर डंडा बरसाती रहती है। पुलिस पीड़ितों के मुकदमें तक दायर नहीं करती है और हत्यारें, चोर, डकैत और सफेदपोश लोगों को संरक्षण प्रदान किया जाता है।

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि संविधान के अनुच्छेद 21 में गरिमापूर्ण जीवन जीने का मूल अधिकार किसको दिया गया है? अपने सम्मान के लिये उतावली न्यायपालिका जानवरों की भांति लोगों पर डंडा बरसाने वाली पुलिस के विरुद्ध कभी स्वयं संज्ञान क्यों नहीं लेती है? ऐसे मामलों में पुलिस तथा सरकारों के विरुद्ध संविधान प्रदत्त मूल अधिकारों की अवमानना की कार्यवाही नहीं की जाती है! क्या सुप्रीम कोर्ट को केवल अपनी स्वघोषित और स्वपरिभाषित अवमानना की तुलना में संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों अवमानना की कोई परवाह नहीं है? यदि ऐसा नहीं है तो ऐसा क्यों हो रहा है? जनता को पूछने का हक है कि इस सब के लिये कौन जिम्मेदार है?


'जस्टिस फॉर अनीता' नाम से तमिलनाडू में नीट के खिलाफ जारी प्रदर्शनों को भी 8 सितम्बर, 2017 को ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा गलत मानते हुए, प्रदर्शनों को रोकने के आदेश जारी किये जाते हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि लोक सेवकों द्वारा हड़ताल करने को असंवैधानिक ठहरा चुके सुप्रीम कोर्ट द्वारा-ओबीसी को उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण प्रदान करने के खिलाफ हड़ताल करने वाले अनारक्षित वर्ग के लोक सेवकों की असंवैधानिक और गैर कानूनी हड़ताल को सही ठहराते हुए सप्रीम कोर्ट केन्द्र सरकार को आदेश जारी कर चुका है कि हड़तालियों को सरकारी सेवा से अनुपस्थित मानकर, उनका वेतन काटने का निर्णय लेकर केन्द्र सरकार हड़तालियों के प्रति निर्मम नहीं हो सकती है? आरक्षण के विरुद्ध हड़ताल करने वालों को ड्यूटी पर माना जावे और उनको पूर्ण वेतन दिया जावे। वही सुप्रीम कोर्ट 'जस्टिस फॉर अनीता' की मांग पर रोक लगा देता है! क्या यही लोकतंत्र है?

इन सब हालातों में देश के लोगों को क्या यह सवाल पूछने का हक नहीं है कि गलत कौन है-संविधान, संविधान लागू करने वाली सरकार या सुप्रीम कोर्ट? इस सवाल का जवाब तो तलाशना ही होगा? क्योंकि लोकतंत्र का दूसरा नाम सवाल पूछने की आजादी है!




-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल
(HRD Mission-90 For MOST) 
संपर्क : 9875066111, 09092017
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