विशेष : रोहिंग्याई मुसलमान : खतरों को आमंत्रण

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रोहिंग्या मुसलमान के बारे में अब यह स्पष्ट हो रहा है कि आतंकी गतिविधियों में शामिल रहे हैं। इन्होंने म्यांमार में अशांति फैलाने का काम किया है। इस प्रकार की गतिविधियों में संलिप्त रहकर काम करने वाले रोहिंग्याई मुसलमान के पक्ष में भारत में वातावरण बनाना निश्चित रुप से एक भीषण खतरे का संकेत है। इस बारे में म्यांमार की नेता आंग सान सू की ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि रोहिंग्या मुसलमान आतंकी गतिविधियों में लिप्त रहे हैं। लेकिन हमारे भारत देश में मात्र वोट बैंक बनाने के लिए बिना विचार किए इस संभावित खतरे को खुलेआम आमंत्रण देने का काम कुछ संस्थाएं कर रही हैं। भारत देश में आज जो समस्याएं विद्यमान हैं, वह अंदर की कम बाहर से आई हुई ज्यादा दिखाई दे रही हैं। वास्तव में आज देश में घुसपैठ एक ऐसी समस्या है, जो बाहरी लोगों द्वारा पैदा की गई है। भारत पहले से ही बांग्लादेशी घुसपैठ से परेशान था, अब रोहिंग्या मुसलमानों की घुसपैठ से परेशानी और बढ़ती जा रही है। कहा जाता है कि घुसपैठ करने वाला व्यक्ति भले ही भारत में आकर निवास कर रहा हो, लेकिन उसका मानसिक जुड़ाव अपने मूल देश के साथ ही रहता है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि घुसपैठ हमेशा ही देशद्रोह को बढ़ावा देती है। देश के प्रति विद्रोह की भावना को पनपाने वाली यह घुसपैठ प्रारंभ में भले ही दया का पात्र जैसी लगती हो, लेकिन कालांतर में यही घुसपैठ विभाजन के बीज बो सकती है। ऐसी बात नहीं है कि यह समस्या वर्तमान की ही है, हम पहले भी ऐसे षड्यंत्रों का शिकार हो चुके हैं। रोहिंग्या मुसलमानों की घुसपैठ की बारीकी से जांच की जाए तो कई गंभीर बातों से साक्षात्कार हो सकता है। यह भी हो सकता है कि यह कदम भारत में मुसलमानों की संख्या बढ़ाने का अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र हो।


भारत में सर्वोच्च न्यायालय ने रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में केन्द्र सरकार से भी सवाल किया। केन्द्र सरकार ने वही कहा जो म्यांमार ने भुगता है। इससे यह भी सिद्ध हो रहा है कि वर्तमान केन्द्र सरकार देश की सुरक्षा के साथ किसी भी प्रकार का समझौता करने के लिए तैयार नहीं है। वास्तव में देश की सुरक्षा में किसी भी प्रकार की राजनीति नहीं की जाना चाहिए, लेकिन भारत में हमेशा ही देखा जाता है कि कुछ सामाजिक संगठन और राजनीतिक दल केवल अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए देश की सुरक्षा को भी बलाए ताक पर रख देते हैं। इस प्रकार का भाव रखने वाले संगठन देश का किस प्रकार से भला कर सकेंगे, यह सोचने का विषय है। केन्द्र सरकार ने जो अपना मत प्रकट किया है, वह देश की जनता की भावना का समर्थन कर रहा है। देश की जनता अब ऐसा कतई नहीं चाहती कि जानबूझकर खतरे को आमंत्रित किया जाए। यहां सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि रोहिंग्या मुसलमानों के पक्ष में जिस प्रकार से भारत में माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है, उस प्रयास की दिशा चीन और बंग्लादेश के प्रति क्यों नहीं हैं। जबकि चीन और बंग्लादेश म्यांमार के ज्यादा समीप हैं। चीन में उनके रहने के लिए मांग क्यों नहीं की जा रही। रोहिंग्याई भारत ही आना क्यों चाहते हैं। इन सवालों का जवाब तलाश किया जाए तो शायद यही दिखाई देगा कि यह किसी साजिश के तहत किया जा रहा है।

मुसलमानों के बारे में आज का सबसे बड़ा सच यह भी है कि उसे किसी देश से कोई भी सरोकार नहीं है, न ही वह किसी देश के साथ सांमजस्य स्थापित करने की मानसिकता में रहता है। वह तो केवल अपने संप्रदाय के प्रति समर्पित रहता है। इसमें चाहे सामान्य जीवन जीने वाला मुसलमान हो या फिर आतंकी गतिविधियों में भाग लेने वाला मुसलमान हो। सभी अपने संप्रदाय के लिए ही काम करते दिखाई देते हैं। रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में भी यही कहा जाता है कि वह केवल अपने मजहब के लिए समर्पित होकर काम करते हैं। फिर चाहे उनको विदेश से ही संकेत क्यों न मिलें। अब तो लगभग यह भी प्रमाणित हो चुका है कि रोहिंग्या मुसलमानों के आतंकी संगठनों से सीधे संबंध हैं। इनसे उनको दिशा निर्देश भी प्राप्त होते रहे हैं। इस सच को म्यांमार भी खुले रुप से स्वीकार कर चुका है। जब रोहिंग्याई मुसलमानों के बारे में इतना बड़ा सच लगभग प्रमाणित हो चुका हो, तब यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह भारत में रहकर आतंकी गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे। वर्तमान में जो भी रोहिंग्याई मुसलमानों का समर्थन कर रहे हैं, वे जाने अनजाने में एक प्रकार से आतंकवाद का ही समर्थन कर रहे हैं। पिछली सरकारों के समय आतंकवाद को कथित समर्थन मिलने के कारण ही हमारा देश आज भी विकराल समस्याओं का सामना कर रहा है। पिछले तीन सालों में घटित होने वाली आतंकी घटनाओं के लिए देश की मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाले राजनीतिक दल अगर अपने गिरेबान में झांककर देखेंगे तो उनको स्वयं पता चल जाएगा कि आतंकवाद की समस्या उनकी ही देन हैं। हम यह भी जानते हैं कि कांगे्रस के वरिष्ठ नेताओं ने आतंकवादियों के प्रति सम्मानजनक भाषा का प्रयोग किया। इस कारण देश में आतंकवादियों के हौसले तो बढ़े ही, साथ ही उनका समर्थन करने वाले लोग भी बेखौफ हो गए। हालांकि वर्तमान में स्थितियां परिवर्तित हुर्इं हैं। लोगों को भयभीत करने वाले आतंकी आज खुद भयभीत दिखाई दे रहे हैं। उनका समर्थन करने वाले भी सावधान होते जा रहे हैं। इतना सब होने के बाद भी रोहिंग्या मुसलमानों के पक्ष में माहौल बनाना किसी भी रुप से जायज नहीं कहा जा सकता।

घुसपैठ करने वालों रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि म्यांमार में इनको क्यों नहीं रहने दिया जा रहा है। कहा जाता है कि म्यांमार में इन मुसलमानों की संदिग्ध गतिविधियों के चलते ही स्वीकार नहीं किया जा रहा है, इसलिए इन मुसलमानों को जबरदस्ती म्यांमार से बाहर निकालने के लिए मजबूर किया जा रहा है। करीब चालीस हजार रोहिंग्या मुस्लिम भारत आ चुके हैं। इनकी फटेहाल हालत पर भारत का मुस्लिम नेतृत्व हमदर्दी दिखाकर इन्हें यहां रहने देने की पैरवी कर रहा है। भारत के मुस्लिम नेतृत्व की हालत यह है कि विदेश के मुस्लिमों के सरदर्द से इनका सिर फटने लगता है। सवाल यह है कि बाहर के घुसपैठियों की बीमारी जो हमारे देश की जड़ें खोदने की साजिश में शामिल रहते हैं, हम उन्हें बर्दाश्त क्यों करें? इसलिए राष्ट्रहित के लिए आवश्यक है कि इन घुसपैठियों को कड़ाई से बाहर का रास्ता दिखाया जाए।




सुरेश हिन्दुस्थानी
लक्ष्मीगंज, लश्कर ग्वालियर मध्यप्रदेश
मोबाइल-9425101815, 9770015780
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)
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