यक्षिणी बचाओ, पटना संग्रहालय बचाओ आंदोलन

save-patna-museum
पटना 11 सितंबर, पटना संग्रहालय के शताब्दी वर्ष में किसी वैधानिक प्रक्रिया को पूरा किये बिना विश्वविख्यात दीदारगंज यक्षिणी सहित तीन हजार से ज्यादा अमूल्य पुरातात्विक कृतियों को स्थानांतरित कर एक किलोमीटर की दूरी पर नवनिर्मित बिहार संग्रहालय में रखे जाने का कलाकारों, पुरातत्वविदों, रंगकर्मियों और बुद्धिजीवियों ने विरोध शुरू कर दिया है। नीतीश सरकार से अपना निर्णय वापस लेने के लिए दबाव डालने के उद्देश्य से “यक्षिणी बचाओ,पटना संग्रहालय बचाओ” आंदोलन शुरू किया गया है। आंदोलनकारियों का मानना है कि कला एवं शिल्प महाविद्यालय के संस्थापकों ने पटना संग्रहालय के पीछे कला एवं शिल्प महाविद्यालय की स्थापना इसलिए की थी कि मूर्ति कला एवमं चित्रकला प्राकृतिक रूप से प्रयोगशाला के रूप में इस संग्रहालय मौजूद थी। कला एवं शिल्प के छात्र अपने महाविद्यालय में नामांकन के बाद किसी रोकटोक के बिना पटना संग्रहालय जाकर एक-एक पुरातात्विक कृतियों के समक्ष बैठकर उसे अपनी कूचिओं से निर्मित करते हैं। मूर्तिकला के छात्रों के लिए भी संग्रहालय में स्थित कृतियाँ मूर्तिशिल्प के प्रशिक्षण में प्रेरणादायी हैं। गौरतलब है कि आर्ट कॉलेज के छात्रों ने स्वत:स्फूर्त पटना संग्रहालय के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में गत एक अप्रैल अपने कॉलेज के समक्ष भव्य तरीके से “पटना संग्रहालय शताब्दी उत्सव” आयोजित किया था। संग्रहालय ने गत तीन अप्रैल को अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश किया। इस आंदोलन के एक प्रमुख नेता पुष्पराज ने कहा कि उन लोगों को जानकारी मिली है कि पटना संग्रहालय को बंद कर दिया जायेगा औऱ यहाँ से मूर्तिशिल्प की महानतम कृति यक्षिणी सहित तीन हजार से ज्यादा विलुप्त प्रजाति के पुरातात्विक संरचनाओं को बेली रोड स्थित गैर सरकारी (स्वायत्त) बिहार संग्रहालय में रखा जायेगा। कला एवं शिल्प के छात्र और मूर्तिकारों-चित्रकारों के लिए यह असह्य है। कला एवं शिल्प महाविद्यालय के छात्र और पूर्ववर्ती छात्र यह मानते हैं कि पटना संग्रहालय से यक्षिणी सहित हजारों पुरातात्विक मूर्तियों-कृतियों,पेंटिंग्स,सिक्कों को हटाने से एक विश्व स्तरीय संग्रहालय महत्व अचानक समाप्त हो जाएगा।पुष्पराज ने कहा कि पटना संग्रहालय से इस तरह के विस्थापन से कला एवं शिल्प महाविद्यालय के भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा हो सकता है। कलाकार मानते हैं कि आर्ट कॉलेज के साथ पटना संग्रहालय रिश्ता गर्भनाल से जुड़ा है और पटना संग्रहालय के खोखला होने से कला एवं शिल्प महाविद्यालय भी अप्रासंगिक हो जाएगा। बिहार के बुद्धिजीवियों, कलाप्रेमियों और नागरिकों से अनुरोध है कि “यक्षिणी बचाओ,पटना संग्रहालय बचाओ” अभियान में साथ जुटे और सरकार को कला विरोधी संग्रहालय विरोधी फैसले को वापस लेने के लिए मजबूर करें। पुरातात्विक कृतियों का स्थानांतरण रोकने के लिए पटना संग्रहालय बचाओ समिति की ओर से संग्रहालय के द्वार पर शनिवार को धरना आयोजित किया गया। नाट्य रचना “यक्षिणी” के लेखक-सह-निदेशक अरविन्द कुमार ने धरने के मौके पर आयोजित सभा की अध्यक्षता करते हुए कहा कि यक्षिणी विश्व में सौन्दर्य की अद्भुत मिशाल है,उनके सौन्दर्य से प्रभावित होकर हमने “यक्षिणी” को नाट्य रचना में बदला। उन्होंने कहा,“हमारी नायिका यक्षिणी का पटना संग्रहालय से विस्थापन हमारे लिए किसी हादसे से कम नहीं है। हम यक्षिणी के साथ-साथ सभी कृतियों को यहाँ से हटाने की साजिश का विरोध करते हैं।” पत्रकार पुष्पराज ने कहा कि दुनियां में पहली बार ऐसा हो रहा है,जब एक विश्व स्तरीय संग्रहालय की तीन हजार से ज्यादा महत्वपूर्ण पुरातात्विक कृतियों को संग्रहालय से बाहर निकाला जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार संग्रहालय एक ट्रस्ट और स्वायत्त संस्था है, जिसमें पटना संग्रहालय से हजारों वर्ष पुरानी कृतियों को भेजने की साजिश सृजन घोटाला की तरह “म्यूजियम घोटाला” है। पुष्पराज ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव सभ्यता और संस्कृति नष्ट कर रहे हैं। मुख्यमंत्री के पास 2015 में प्रदेश के प्रसिद्ध इतिहासकारों,पुरातत्वविदों और संग्रहालय विशेषज्ञों ने पटना संग्रहालय की पुरातात्विक संपदा को किसी भी हालत में बिहार संग्रहालय में स्थानान्तरित न करने का स्मार पत्र भेजा था,जिसे मुख्यमंत्री ने गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने कहा कि बिहार संग्रहालय के बारे में पटना उच्च न्यायालय ने भी इसके निर्माण को सरकारी राशि की बर्बादी कहा था। पटना संग्रहालय में दिल्ली संग्रहालय से यक्षिणी की वापसी के बाद अब पुनः यक्षिणी सहित महत्त्वपूर्ण कृतियों का यहाँ से हटाया जाना पूर्णतः अवैध और गैर कानूनी है।

Share on Google Plus

About आर्यावर्त डेस्क

एक टिप्पणी भेजें
loading...