बोफोर्स: न्यायालय हिंदुजा बंधुओं को आरोप मुक्त करने के फैसले को चुनौती

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नयी दिल्ली, एक सितंबर, उच्चतम न्यायालय भाजपा नेता अजय कुमार अग्रवाल की उस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया है जिसमें बेहद संवेदनशील बोफोर्स रिश्वत मामले में यूरोप स्थित उद्योगपति हिंदुजा बंधुओं को आरोपमुक्त करने के दिल्ली उच्च न्यायालय के 2005 के फैसले को चुनौती दी गई है। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायाधीश एएम खानविल्कर और न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड की पीठ ने कहा कि इसे वर्ष 30 अक्तूबर से प्रारंभ होने वाले सप्ताह में सुनवायी के लिए इस मामले को सूचिबद्ध किया जा रहा है। न्यायालय का यह आदेश 64 करोड़ रूपया के रिश्वत मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अग्रवाल की ओर से दायर अंतरिम याचिका में पहले की याचिका पर शीघ्र सुनवायी और निर्णय लेने की मांग करने के बाद आया है। रिश्वत मामले की जांच करने वाली सीबीआई ने विशेष आरोपी को आरोप मुक्त करने के लिए शीर्ष न्यायालय में आवश्यक 90 दिन के अंदर कोई याचिका नहीं दायर की थी। इस मामले में भाजपा नेता ने व्यक्तिगत तौर पर याचिका दायर की जिसे 18 अक्तूबर 2005 को शीर्ष न्यायालय ने सुनवायी के लिए मंजूर किया था। भारत और स्वीडन की हथियार निर्माता कंपनी एबी बोफोर्स के बीच भारतीय सेना के लिए 400 155 एमएम होविट्जर तोपों की खरीद के लिए 1437 करोड़ रुपए का समझौता 24 मार्च 1986 को हुआ था। स्वीडन रेडियो ने 16 अप्रैल 1987 में अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया था कि कंपनी ने इस समझौते के लिए भारत के दिग्गज नेताओं और रक्षा अधिकारियों को भारी रिश्वत दी है। सीबीआई ने 22 जनवरी 1990 में एबी बोफोर्स कंपनी के तत्कालीन अध्यक्ष मार्टिन आर्डबो, कथित बिचौलिए विन चड्डा और हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टाचार निरोधक कानून की विभिन्न धाराओं के तहत आपराधिक षडयंत्र रचने , धोखाधड़ी, जालसाजी के अरोप में एफआईआर दर्ज की थी। सीबीआई का आरोप था कि भारत और विदेश में अनेक अधिकारियों और व्यक्तियों ने 1982 और 1987 में आपराधिक षडयंत्र रचा और इसके कारण ही घूसखोरी, धोखाधड़ी , भ्रष्टाचार और जालसाजी जैसे अपराध हुए थे। इस मामले में पहला आरोपपत्र 22 अक्तूबर 1999 में चड्डा, ओट्टाविओ क्वात्रोची , तत्कालीन रक्षा सचिव एसके भटनागर, आर्डबो और बोफोर्स कंपनी के खिलाफ दाखिल किया गया था और 9 अक्तूबर 2000 में हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ पूरक आरोप पत्र दाखिल किया गया था। दिल्ली में सीबीआई की विशेष अदालत ने 4 मार्च 2011 को क्वात्रोची को मामले से यह कहते हुए बरी कर दिया था कि उसके प्रत्यार्पण में देश गाढ़ी कमाई खर्च नहीं कर सकता।

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