आलेख : मोक्ष दिलायेंगा पितृपक्ष, पूरे होंगे हर अरमान...

जीवन के चार पुरुषार्थ हैं। अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष। इन चार पुरुषार्थो में मोक्ष प्राप्ति के लिए पितृपक्ष सबसे उत्तम माना गया है। भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन अमावस्या तक का समय पितृ पर्व के रुप में मनाया जाता है। इसमें हम पितृ स्मरण करते है, जिसे श्राद्ध पर्व भी कहते हैं। इसमें पिंडदान और तर्पण का विधान सर्वोपरि है। कहते हैं तर्पण के जरिए ही पितृ मोक्ष प्राप्त करते हैं। अगर हर काम में आती है अड़चन। अगर संबंद्धों में होती है अनबन। कर्ज से जिंदगी हो गयी है दूभर। नहीं गूंजती घर-आंगन किलकारी तो इस बार अगर कर लिया श्रद्धा से पित्रों का तर्पण, तो हो जायेगी हर समस्याएं दूर। क्योंकि इस बार है विशेष संयोग। अमृत सिद्धि - सर्वार्थ सिद्धि जैसे संयोग होने से हो जायेंगी हर उलझन दूर 





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श्राद्धकर्म केवल कर्मकांड नहीं है। यह अपने पितरों के लिए हमारे मन की श्रद्धा, प्यार, कृतज्ञता का दरख्वाश है कि उन्होंने हमें जीवन दिया, हर प्रकार की उन्नति दी, धरती पर चलना-बोलना सिखाया। समाज की मुख्यधारा में चलने योग्य बनाया। ऐसे मातृ-पितृ ऋण को हम भला कैसे भूल सकते हैं। अग्नि पुराण के अनुसार, वसु, रुद्र एवं आदित्य श्राद्ध के देवता माने गए हैं इनका आह्वान कर किए गए श्राद्ध से पितर संतुष्ट होते हैं। कहते हैं 8 वसु, 11 रुद्र और 12 आदित्य हैं, इनसे ही सृष्टि की रचना हुई है। वैसे भी मनु स्मृति में मनुष्य के तीन पूर्वजों यथा पिता, पितामह एवं प्रपितामह इन सभी पितृ-देवों को वसुओं, रुद्रो एवं आदित्यों के समान माना गया है। श्राद्ध करते समय इन्हीं देवताओ को पूर्वजों का प्रतिनिधि मानना चाहिए और सच्चे मन से श्राद्ध की संपूर्ण क्रियाएं करना चाहिए। इससे समस्त पितरों को शांति मिलती हैं। 

कहा जा सकता है पितृ पक्ष अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने, उनका स्मरण करने और उनके प्रति श्रद्धा अभिव्यक्ति करने का महापर्व है। इस अवधि में पितृगण अपने परिजनों के समीप विविध रूपों में मंडराते हैं और अपने मोक्ष की कामना करते हैं। परिजनों से संतुष्ट होने पर पूर्वज आशीर्वाद देकर हमें अनिष्ट घटनाओं से बचाते हैं। ज्योतिष मान्यताओं के आधार पर सूर्य देव जब कन्या राशि में गोचर करते हैं, तब हमारे पितर अपने पुत्र-पौत्रों के यहां विचरण करते हैं। विशेष रूप से वे तर्पण की कामना करते हैं। श्राद्ध से पितृगण प्रसन्न होते हैं और श्राद्ध करने वालों को सुख-समृद्धि, सफलता, आरोग्य और संतान रूपी फल देते हैं। पितृ पक्ष के दौरान वैदिक परंपरा के अनुसार ब्रह्मवैवर्तपुराण में यह निर्देश है कि इस संसार में आकर जो सद्गृहस्थ अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक पितृ पक्ष के दौरान पिंडदान, तिलांजलि और ब्राह्मणों को भोजन कराते है, उनको इस जीवन में सभी सांसारिक सुख और भोग प्राप्त होते हैं। वे उच्च शुद्ध कर्मों के कारण अपनी आत्मा के भीतर एक तेज और प्रकाश से आलोकित होते है। मृत्यु के उपरांत भी श्राद्ध करने वाले सदगृहस्थ को स्वर्गलोक, विष्णुलोक और ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। 

‘‘ब्रह्म ज्ञान, गया श्राद्धं 
गौगृह मरणं तथा 
कुसांग वासांग कुरुक्षेत्रे 
मुक्ति रेखा चतुर्थ विद्या‘‘

अर्थात मोक्ष प्राप्ति के लिए ये चार विद्याएं इन पंक्तियों में बताई गयी है, जिनमें गया श्राद्ध गृहस्थ जीवन के लिए सबसे सुलभ मार्ग हैं। इससे हम अपने पितरों को श्राद्ध कर्म के माध्यम से तृप्त करने की कामना करते हैं। इसी निमित्त मानव कालांतर से श्राद्ध कर्म करते हुए अपने पितरों को मुक्ति दिलाने का काम करता आया है। इसीलिए इसे श्रद्धा से करना चाहिए। कहते है पितृपक्ष पूर्वजों का ऋण यानी कर्ज उतारने का समय होता है। पितृपक्ष यानी महालया में कर्मकांड की विधियां और विधान अलग-अलग होते हैं। श्रद्धालु एक दिन, तीन दिन, सात दिन, पंद्रह दिन और सत्रह दिन का कर्मकांड करते हैं। शास्त्रों की मान्यता है कि पितृपक्ष में पूर्वजों को याद कर किया जाने वाला पिंडदान सीधे उनतक पहुंचता है और उन्हें सीधे स्वर्ग तक ले जाता है। माता-पिता और पुरखों की मृत्यु के बाद उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले इसी कर्मकांड को ‘पितृ श्राद्ध‘ कहा जाता है। 

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श्राद्ध से श्रेयस्कर कुछ नहीं 
कहते है पितरों के कृत्यों से दीर्घ आयु, स्वर्ग, यश एवं पुष्टिकर्म (समृद्धि) की प्राप्ति होती है। श्राद्ध से यह लोक प्रतिष्ठित है और इससे योग (मोक्ष) का उदय होता है। श्राद्ध से बढ़कर श्रेयस्कर कुछ नहीं है। यदि कोई श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है तो वह ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र एवं अन्य देवों, ऋषियों, पक्षियों, मानवों, पशुओं, रेंगने वाले जीवों एवं पितरों के समुदाय तथा उन सभी को जो जीव कहे जाते हैं, एवं सम्पूर्ण विश्व को प्रसन्न करता है। यम ने कहा है कि पितृपूजन से आयु, पुत्र, यश, कीर्ति, पुष्टि (समृद्धि), बल, श्री, पशु, सौख्य, धन, धान्य की प्राप्ति होती है। विष्णुधर्मोत्तरपुराण में ऐसा कहा गया है कि प्रपितामह को दिया गया पिण्ड स्वयं वासुदेव घोषित है, पितामह को दिया गया पिण्ड संकर्षण तथा पिता को दिया गया पिण्ड प्रद्युम्न घोषित है और पिण्डकर्ता स्वयं अनिरुद्ध कहलाता है। विष्णु को तीनों पिण्डों में अवस्थित समझना चाहिए। अमावस्या के दिन पितर लोग वायव्य रूप धारण कर अपने पुराने निवास के द्वार पर आते हैं और देखते हैं कि उनके कुल के लोगों के द्वारा श्राद्ध किया जाता है कि नहीं। ऐसा वे सूर्यास्त तक देखते हैं। जब सूर्यास्त हो जाता है, वे भूख एवं प्यास से व्याकुल हो निराश हो जाते हैं, चिन्तित हो जाते हैं, बहुत देर तक दीर्घ श्वास छोड़ते हैं और अन्त में अपने वंशजों को कोसते (उनकी भर्त्सना करते हुए) चले जाते हैं। जो लोग अमावस्या को जल या शाक-भाजी से भी श्राद्ध नहीं करते उनके पितर उन्हें अभिशापित कर चले जाते हैं। 

काशी में होता है त्रिपिंडी श्राद्ध 
तीनों लोकों में न्यारी यूपी के काशी एवं बिहार के गया में भारत ही नहीं सात समुन्दर पार से लोग अपने-अपने पूर्वजों को ‘श्राद्ध‘ देने के लिए पहुंचते हैं। कहा जाता है कि काशी में प्राण त्यागने वाले हर इन्सान को भगवन शंकर खुद मोक्ष प्रदान करते हैं, मगर जो लोग काशी से बाहर या काशी में अकाल प्राण त्यागते हैं उनके मोक्ष की कामना से काशी के पिशाच मोचन कुण्ड पर त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है। काशी के अति प्राचीन पिशाच मोचन कुण्ड पर होने वाले त्रिपिंडी श्राद्ध की मान्यताएं हैं कि पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद व्याधियों से मुक्ति मिल जाती है। इसीलिए पितृ पक्ष के दिनों तीर्थ स्थली पिशाच मोचन पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है। पितृ पक्ष अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने, उनका स्मरण करने और उनके प्रति श्रद्धा अभिव्यक्ति करने का महापर्व है। इस अवधि में पितृगण अपने परिजनों के समीप विविध रूपों में मंडराते हैं और अपने मोक्ष की कामना करते हैं। परिजनों से संतुष्ट होने पर पूर्वज आशीर्वाद देकर हमें अनिष्ट घटनाओं से बचाते हैं। 


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पितरों तक पहुंचता है अर्पित पिंड 
भाद्र कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावस्या की तिथि तक पिंडदान से संबंधित कर्मकांड गया की पवित्र पिंडवेदियों पर पुरखों के नामित पिंड अर्पित किए जाते हैं, जो उन तक पहुंचने की कामना के साथ किये जाते हैं। पिंड का अर्पण हम ‘स्वथा‘ शब्द के उच्चारण से करते हैं। मान्यता है कि स्वथा अग्नि नारायण की पत्नी है, जो प्रथम रुप में पिंडों को ग्रहण करती हैं। अमावस्या तिथि को सूर्य नारायण के समक्ष देवताओं की एक सभा होती है जिसमें पितरों के देवता वसु, रुद्र और आदित्य उपस्थित होते हैं। स्वथा द्वारा ग्रहण किए गए पिंड को पितरों के देवता को सभा में समर्पित किया जाता हैं। जो भू-लोक में पुत्र द्वारा अर्पित किए गए पिंड उनके पितरों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी लेते हैं।  

गया तीर्थ सबसे उत्तम 
महर्षि व्यास के अनुसार समस्त तीर्थो में गया उत्तम हैं। यह पितृ तीर्थ के साथ-साथ मंगलदायक तीर्थ भी हैं। ‘पितृतीर्थ गयानाम सर्व तीर्थवरं शुभम्। यत्रास्ते देवदेवेशः स्वयमेव पितामः।।‘ हालांकि न सिर्फ गया, बल्कि किसी भूभाग में नदी या तालाब में हम पितरों का तर्पण कर सकते हैं। पितरों के निमित्त अमावस्या तिथि में श्राद्ध व दान का भी महत्व हैं। 

मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने भी की थी श्राद्ध 
इसकी महत्ता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि श्रीराम जैसे आदर्श पुत्र ने भी गया में फल्गु नदी के किनारे अपने पिता व अन्य पितरों का श्राद्ध किया, पिंडदान किया। इसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में है कि वनवास के दौरान भगवान राम, लक्ष्मण और सीता पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध करने के लिए गया धाम पहुंचे। युधिष्ठिर ने महाभारत युद्ध में मारे गये सभी परिजनों का श्राद्ध हरियाणा के कैथल के करीब सरस्वती नदी के किनारे स्थित पृथुदक तीर्थ (अब पेहवा) में किया। मतलब साफ है पितरों की मुक्ति के लिए तो श्राद्ध पक्ष में तर्पण किये जाने का विधान शास्त्रों में है, यह अपने पूर्वजों के प्रति संतति का कृतज्ञता निवेदन भी है। अपने पूर्वजों के सत्कार्यों का स्मरण हमें सदा प्रेरणा देता है न केवल इसके लिए कि हम उसके अनुसार जीवन में आगे आएं बल्कि इसके लिए भी कि हम अपनी आने वाली संतानों के लिए भी कुछ ऐसा जीवनादर्श प्रस्तुत करके जाएं जिसे वह गौरव के साथ याद कर सकें और स्वयं भी वैसा करने को प्रेरित हों।  

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कलाम ने भी कहा, श्राद्ध है सबसे श्रेष्ठ कर्म 
पूर्व राष्ट्रपति डॉ अब्दुल कलाम ने अपनी पुस्तक ‘इंडिया विजन 2020‘ में इस बात का उल्लेख किया है कि ‘हम अपने बच्चों के लिए कैसी दुनिया छोड़ कर जाना चाहते हैं, इसका विचार करें।‘ इसलिए केवल पितरों का श्राद्ध ही श्रद्धापूर्वक न करें, बल्कि जीवित तीर्थ माता-पिता और बुजुर्गों की प्यार और आदर के साथ सेवा भी करें ताकि हमारे बच्चे भी उससे सीख लें और हमें अपने बुढ़ापे में उनकी बेरुखी व उपेक्षा का शिकार न होना पड़े। क्योकि माता-पिता और बुजुर्ग जीवित तीर्थ होते हैं। उनका प्रेमपूर्ण भाव से दर्शन, उनकी सेवा, उनका सम्मान, प्यार व अपनत्व से उनकी देखभाल करना, उन्हें संभालना इससे बड़ा तीर्थाटन और क्या हो सकता है? इस भाव को कितने सुंदर तरीके से इन पंक्तियों में पिरोया गया है-‘जिन माता-पिता की सेवा की, उन तीरथ स्नान कियो न कियो।‘ माता-पिता के प्रति हमारे शास्त्रकारों ने आदर, प्रेम और अपनत्व बनाये रखने के लिए ही उन्हें ‘मातृ देवो भव, पितृ देवो भव‘ कहा ताकि हम उनमें देवत्व के दर्शन कर सकें और उनकी सेवा कर स्वयं को धन्य व कृतज्ञ बना सकें। श्रवण कुमार की कथा इस सेवा भाव का आदर्श है। इस कृतज्ञता को व्यक्त करते हुए माता-पिता से आशीर्वाद मांगने का उल्लेख करते हुए वेद मंत्र है-‘ऊं अर्यमा न त्रिप्त्याम् इदंतिलोदकं तस्मै नमरू, ऊं मृत्योर्मा अमृतं गमय।‘ पितरों के देव अर्यमा को प्रणाम-पिता, पितामह,  पितामह और माता, प्रपितामही आपको बारंबार प्रणाम। आप हमें मृत्यु से अमरता की ओर ले चलें। 

बदलाव का असर बुजुर्गो पर 
आधुनिकता के इस दौर में बदलाव का सबसे घातक असर रिश्तों पर पड़ा है। बुजुर्ग माता-पिता या दादा-दादी एकदम अकेले से पड़ते जा रहे हैं। हाल यह है कि धरती-आकाश एक कर देने की तमन्ना रखने वाले कुछ कलयुगी बच्चों को अपने बुजुर्गो की ओर प्यार भरी निगाह डालने की मोहलत भी नहीं है। जिंदगी का शिखर छूने की चाह उन्हें देश के महानगरों के रास्ते विदेश तक ले जाती है। बुजुर्ग कहीं पीछे छूट जाते हैं, इतने पीछे कि जिन्हें कभी बड़े चाव से एक-एक शब्द बोलना सिखाया, आज वे उनका एक बोल सुनने के लिए तैयार नहीं है। आखिर धरती पर पहला कदम रखना और चलना तो उन्होंने ही सिखाया था हमें। शायद किसी कवि ने ठीक ही कहा है, ‘तमन्नाओं से भरी इस जिंदगी में-हम सिर्फ भाग रहे हैं‘ कुछ रफ्तार धीमी कर मेरे दोस्त और इस जिंदगी को जियो, खूब जियो मेरे दोस्त।‘ जबकि सच तो यह है कि ये बुजुर्ग हमसे ही आस लगाये हुए होते हैं। यह एहसास तब होता है जब हम बुजुर्ग हो जाते हैं। 

युवाओं की बदलती मानसिकता 
बदलते दौर में एक तरफ जहां ‘श्राद्ध‘ का नाम सुनते ही कुछ लोग फट पड़ते है। कहते है, ‘जीते जी मां-बाप को तो एक गिलास पानी पिला न सके, अब चले है उन्हें पानी पिलाने, जो इस दुनिया जहां में हैं ही नहीं। ये सब पुराने जमाने का है, उससे कब तक चिपके रहेंगे। हद तो तब हो जाता है जब माता-पिता, बुजुर्गों के प्रति सेवा-सत्कार की भावना, उनको सुख देने वाला आचरण जिस भारतीय अध्यात्म दर्शन और संस्कृति की पहचान है, वहां वृद्धाश्रमों का चलन तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन खुशी है कि कुछ लोग ऐसे भी है जो ‘श्राद्ध‘ आते ही अपने-अपने बुजुर्गो व माता-पिता को तर्पण-अर्पण करने की तैयारी में पूरे अकीदत से जुट जाते है। चाहे वह धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी हो या गया पितृ पक्ष शुरु होते ही श्राद्ध करने वाला जमघट दिखता है। वैसे भी श्राद्धकर्म केवल कर्मकांड नहीं है, यह अपने पितरों के लिए हमारे मन की श्रद्धा, प्यार, कृतज्ञता का निवेदन है कि उन्होंने हमें जीवन दिया, सब प्रकार की उन्नति कर सुखोपभोग करने योग्य बनाया, उनके प्यार और आशीर्वाद से हम फूले-फलें। ‘श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम‘ अर्थात पितरों की तृप्ति के लिए सनातन विधि से श्रद्धापूर्वक जो कर्म किये जाते हैं, उन्हें श्राद्ध कहते हैं।  

विभिन्न स्थानों पर होता है श्राद्ध 
देश में श्राद्ध के लिए गया, बद्रीनाथ, हरिद्वार, गंगासागर, त्रयंबकेश्वर, प्रयाग, काशी, जगन्नाथपुरी, कुरुक्षेत्र, पुष्कर सहित 55 स्थानों को महत्वपूर्ण माना गया है। कहते है इन स्थलों पर भगवान पितरों को श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध से मोक्ष प्रदान कर देते हैं, लेकिन गया में किए गए श्राद्ध की महिमा का गुणगान तो भगवान राम ने भी किया है। कहा जाता है कि भगवान राम और सीताजी ने भी राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए गया में ही पिंडदान किया था।

चैदह दिन का होगा श्राद्ध 
सनातन धर्म में आश्विन माह का पहला पखवारा पूर्वजों को समर्पित है। इसे पितृपक्ष कहते हैं। यह आश्विन कृष्ण प्रतिपदा उदया से अमावस्या तक होता है। इस बार इसकी शुरुवात सात सितंबर से हो रही है। लेकिन इस दिन मध्याह्न में प्रतिपदा न मिलने से इस तिथि का श्राद्ध छह सितंबर को ही किया जाएगा। इस पक्ष में षष्ठी की हानि है। त्रयोदशी व चतुर्दशी का श्राद्ध एक ही दिन 18 सितंबर को किया जाएगा। इसके अलावा अमावस्या दो दिन पड़ रही है। इसमें 19 सितंबर को श्राद्ध अमावस्या (सर्वपैत्री अमावस्या) यानी पितृ विसर्जन किया जाएगा। जबकि  20 सितम्बर को स्नान-दान की अमावस्या मनाई जाएगी। अमावस्या तिथि 19 सितंबर को दिन में 11.16 बजे लग रही है, जो 20 को प्रातः 10.22 बजे तक रहेगी। इस लिहाज से इस बार पितृपक्ष 14 दिन का होगा। शास्त्रों में मनुष्यों के लिए तीन ऋण बताए गए हैं। ये हैं-देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। जिसमें माता-पिता के प्रति श्रद्धा का समावेश किया गया है। उनके ऋण से मुक्त न होने पर जन्म निर्थक बताया गया है, इसीलिए सनातन धर्म में पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने को पितृपक्ष महालया की व्यवस्था की गई। पितृ-ऋण से पार पाने के लिए पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म ही एकमात्र पद्धति है। विष्णु पुराण में कहा गया है कि श्राद्ध से तृप्त होकर पितृ ऋण सभी कामनाओं को तृप्त करते हैं। 

शुभ मुहूर्त 
सोलह श्राद्ध इस साल 15 दिन के होंगे। अब 16 दिन के श्राद्ध का संजोग वर्ष 2020 में बनेगा। वर्ष 2016 में भी श्राद्ध 15 दिन थे। लगातार दूसरे वर्ष तिथि घटने से पितृ पक्ष इस बार भी एक दिन कम हो गया। श्राद्ध 6 सितंबर को पूर्णिमा से शुरू होंगे। इसी दिन दोपहर में प्रतिपदा का श्राद्ध भी होगा। 15 दिन बाद 20 सितंबर को सर्व पितृ अमावस्या पर श्राद्ध समापन होगा। पूर्णिमा से अमावस्या तक यह 16 दिन का होने से इसे सोलह श्राद्ध कहते हैं। लेकिन तिथियां घटने बढ़ने के साथ इसके दिन कम ज्यादा होते हैं। 2016 के बाद इस वर्ष 2017 में भी सोलह श्राद्ध 15 दिन के होंगे। 6 सितंबर को सूर्योदय से पूर्णिमा होने से सुबह पूर्णिमा का श्राद्ध होगा। इस दिन 12.32 बजे प्रतिपदा का श्राद्ध भी करेंगे। क्योंकि श्राद्ध पूजन व ब्राह्मण भोज का समय दिन का बताया है। पितृ पक्ष का दिन एक दिन कम होगा। वहीं कुछ पंडित बीच में पंचमी तिथि का क्षय होना भी बता रहे हैं। इस तरह पितृ पक्ष का पूरा एक दिन घटने से श्राद्ध पूरे 16 दिन नहीं होंगे। अमृत सिद्धि - सर्वार्थ सिद्धि जैसे संयोग भी रहेंगे। कहते है श्राद्ध में पितृ प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते है। इसमें खरीदी से कोई नुकसान नहीं होता है। हालांकि कई लोग इस खरीदी को अशुभ भी मानते है। इस दौरान 8 सितंबर को दोपहर 12.31 बजे अमृत सिद्धि योग, 11 सितंबर को सुबह 9.21 से रवि योग, 12 सितंबर को सुबह 6.16से सर्वार्थ सिद्धि योग, 14 सितंबर को रात 2 बजे सर्वार्थ सिद्धि योग लगेगा, जो 15 सितंबर तक रहेगा। 17 सितंबर को भी मंगल उदय हो रहा है। इन योग में पूजा, दान खरीददारी आदि कर सकते हैं। सीधे उन तक पहुंचता है और उन्हें सीधे स्वर्ग तक ले जाता है। माता-पिता और पुरखों की मृत्यु के बाद उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले इसी कर्मकांड को कहा जाता है पितृ श्राद्ध। 
श्राद्ध तिथियां इस प्रकार है 
06 सितंबर - प्रतिपदा का श्राद्ध 
07 सितंबर - द्वितीया का श्राद्ध 
08 सितंबर - तृतीया का श्राद्ध 
09 सितंबर - चतुर्थी का श्राद्ध 
10 सितंबर - पंचमी (भरणी) का श्राद्ध 
11 सितंबर - अनुदया षष्ठी का श्राद्ध 
12 सितंबर - सप्तमी का श्राद्ध 
13 सितंबर - अष्टमी का श्राद्ध 
14 सितंबर - नवमी (सौभाग्यवती स्त्रियों) का श्राद्ध 
15 सितंबर - दशमी का श्राद्ध 
16 सितंबर - एकादशी (इंद्रा एकादशी)
17 सितंबर - द्वादशी (संन्यासी, वैष्णव, यति का श्राद्ध) 
18 सितंबर - त्रयोदशी व चतुर्दशी का श्राद्ध (शस्त्रदि से मृत व्यक्तियों का श्राद्ध) 
19 सितंबर -अमावस्या श्राद्ध (सर्वपैत्री) व पितृ विसर्जन विशेष तिथियां 

प्रतिपदा का श्राद्ध छह सितंबर 
मातृ नवमी 14 सितंबर (माता की मृत्यु 1 तिथि ज्ञात न होने पर श्राद्ध का विधान) 
आश्विन कृष्ण चतुर्दशी (किसी दुर्घटना 1 में मृत व्यक्तियों का श्राद्ध) सर्वपैत्री अमावस्या 19 सितंबर (मृतक 1 की तिथि ज्ञात न हो या अन्यान्य कारणों 1 से नियत तिथि पर श्रद्ध न होने पर इस 1 दिन श्राद्ध का विधान) 

पिंड से प्रारंभ मानव जीवन 
मानव जीवन का आकार पिंड से ही प्रारंभ होता है। मां के गर्भ में हम सूक्ष्म रुप के बाद पिंड रुप में आते हैं। यह पिंड पांच तत्वों से बना होता है। क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर से तैयार यह शरीर भी अंत में पिंड रुप में ही विलीन हो जाता है। इसी पिंड को व्यक्ति शहद, तिल, घी, शक्कर और जौ पांच तत्वों के साथ अपने पितरों को अर्पित करते हैं। मान्यता है कि जो देवताओं का प्रिय होता है, तिल बुरी शक्तियों को दूर करता है। कुश की जड़ में ब्रह्मा जी का वास होता है, उसके मध्य में नारायण और अग्र भाग में शंकर विराजमान रहते हैं। इसलिए पिंडदान में इन पांच तत्वों के साथ कुश का शामिल होना विशेष महत्व रखता हैं। 

अपनों से नहीं रुठते पितृ 
कहते हैं कुंडली में ‘पितृदोष‘ आया है वास्तविक रुप से ग्रहों की स्थिति के अनुसार यह बात सच भी होती है। मगर क्या हमनें इसके पीछे छिपे कारण को कभी ढूढ़ा हैं। जवाब में हर किसी के जिह्वा पर ‘ना‘ ही आएगा। वह इसलिए क्योंकि हम अपने बुजुर्गो को जीते ज ीवह मान नहीं दे पाएं जो उन्हें देना चाहिए था। इसके बावजूद भी वे अपनों से हमेसा प्रेम की इच्छा रखते रहे। हमारे लाख अपमान के बाद भी वे हमसे स्नेह रखते रहे लेकिन हम वैसा नहीं कर पाएं। चूकि वह तो बाद में भी यह स्नेह नहीं छोड़ते हैं लेकिन आपके द्वारा किए गए इस तरह के कर्मो की वजह से कुंडली में इस तरह के योग आते हैं। 

जीवितों की सेवा ही पितरों की संतुष्टि है 
केवल पितरों को श्राद्ध ही श्रद्धापूर्वक न करें बल्कि जीवित तीर्थ माता-पिता और बुजुर्गो की प्यार और आदर के साथ सेवा भी करें। ताकि हमारे बच्चे भी उससे सीख लें और हमें अपने बुढ़ापे में उनकी बेरुखी व अपेक्षा का शिकार न होना पड़े। जब जीवितों की सेवा करेंगे तभी तो हमारे पितर हमेसा से संतुष्ट होंगे। आज के समय में हर किसी के लिए महत्वपूर्ण है कि जीते जी माता-पिता की सेवा करना, उनका सम्मान करना, प्यार व अपनत्व से उनकी देखभाल करना, उन्हें संभालना, इससे बड़ा तीर्थाटन और क्या हो सकता है भला? आप भले ही तमाम तीर्थ कर लो, लेकिन जिसे अपने बड़ों का दिल दुखाया है उसके लिए इन तीर्थो के दर्शन से भी कुछ नहीं सकता और पितृ भी उनसे प्रसंन नहीं होते। यह बात सोचने की है कि जिन लोगों को आप जीते - जी दो रोटी नहीं दे सकते उनके लिए बाद में मात्र दिखावे के लिए कर्मकांड करते हुए खूब खाना बंटवाओगें तो क्या फायदा मिलेगा? जब आपके बुजुर्ग इस दुनिया में ही आपके व्यवहार से प्रसंन न हो सके तो फिर वे मृत्यु पश्चात आपका यह भोज कैसे स्वीकार करेंगे। इसलिए यह ध्यान रखने योग्य बात हैं कि श्राद्ध केवल कर्मकांड नहीं हैं। यह अपने पितरों के लिए हमारे मन की श्रद्धा, प्यार, कृतज्ञता का प्रतीक हैं। उन्होंने हमें जीवन दिया। धरती पर पहला कदम रखना, बोलना और चलना तो उन्होंने ही सिखाया था हमें। हर प्रकार की उन्नति दी। समाज की मुख्यधारा में चलने योग्य बनाया। शायद किसी कवि ने ठीक ही कहा है, ‘तमन्नाओं से भरी इस जिंदगी में-हम सिर्फ भाग रहे हैं‘ कुछ रफ्तार धीमी कर मेरे दोस्त और इस जिंदगी को जियो, खूब जियो मेरे दोस्त।‘ जबकि सच तो यह है कि ये बुजुर्ग हमसे ही आस लगाये हुए होते हैं। यह एहसास तब होता है जब हम बुजुर्ग हो जाते हैं। ऐसे में हम मातृ-पितृ ऋण को भला कैसे भूल सकते हैं? वैसे भी इस ऋण से आज तक कोई उत्र्तीण नहीं हो सका है।  




(सुरेश  गांधी)
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