केरल में जन्म भूमि और बिहार में कर्म भूमि बनाने वाली हैं सुधा वर्गीज

  • साइकिल चलाने वाली 'दीदी' से हैं विख्यात, केरल के सीएम के हाथों मिलेगा अवार्ड

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पटना। बिहार में श्रेष्ठतम कार्य कर रही हैं सिस्टर सुधा वर्गीज। सिस्टर को साइकिल चलाने वाली 'दीदी' भी कहा जाता हैं। इनके सामाजिक कार्यों को देखते हुए सरकार ने 2006 में इन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। इसके अलावा ये मौलाना अबुल कलाम सम्मान 2013, बिहार अस्मिता अवार्ड 2012 और बिहार आईकन 2016 के पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी हैं। केरल के सीएम पिनाराई विजयन के हाथों पद्मश्री सुधा वर्गीज को फर्स्ट मार जोसेफ कुन्डुकुलम बर्थ सेंटेनरी अवार्ड केरल में शनिवार 23 सितंबर 2017 को दिया जाएगा। केरल से आयीं हैं पद्मश्री सुधा वर्गीज। कोट्टयम जिले में रहती हैं सिस्टर सुधा। बिहार में आकर समाज सेवा को बनाया धर्म और कर्म।पद्मश्री सुधा वर्गीज। जन्म भूमि केरल। कर्म भूमि बिहार। अब ये बिहार की चर्चित समाज सेविका हैं। इन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया है गरीबों के नाम । सुधा वर्गीज के पिता किसान थे और मां हाउसवाइफ थीं। तीन बहनों में सबसे बड़ी सुधा बचपन से ही प्रतिभाशाली थीं। स्कूली पढ़ाई केरल में हुई। मैसूर यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन और बेंगलुरु यूनिवर्सिटी से लॉ की पढ़ाई की। 1965 में वे बिहार आ गयीं। वे सिस्टर ऑफ नोट्रेडम संस्था के जरिए बिहार में आयीं। वे नोटेडम एकेडमी कॉन्वेंट स्कूल शिक्षिका थीं। वे गरीबों के उत्थान के लिए कुछ करना चाहती थीं। शिक्षक के रुप में उनका बिहार के कई जिलों में तबादला हुआ। इससे उन्हें लोगों को करीब से जानने का मौका मिला। जब वे रोहतास में पढ़ा रहीं थीं तब उन्होंने हफ्ते के दो दिन गांव के लोगों के साथ बिताना शुरू किया। पांच दिन स्कूल में पढ़ाती और दो दिन गांव के लोगों का दुख दर्द बांटती।


कुष्ट रोगियों से हुई समाज सेवा की शुरूआत। सिस्टर सुधा ने महसूस किया गांव की अनुसूचित जातियों में बहुत गरीबी है। उनका जीवन स्तर बहुत खराब है। फिर उन्होंने समाजसेवा का संकल्प लिया। इसके बाद जरुरतमंद लोगों की मदद करने लगीं। एक कार्यक्रम के दौरान उन्हें कुष्ट रोगियों से मिलने का मौका मिला। वे उनकी भी सेवा करने लगीं। लेकिन समाजसेवा का काम बहुत आसान नहीं था। असमाजिक तत्व परेशान करने लगे । वे सुधा वर्गीज को गांव आने से रोकने लगे। कुछ समय के बाद वे मुंगेर आ गयीं। वहां मुसहर समुदाय के बीच उन्हें काम करने का मौका मिला। महिलाओं को किया शोषण के विरूद्ध जागरूक। इन लोगों से जुड़ने के लिए उन्होंने हिन्दी सीखी। मुसहर समुदाय समाज का सबसे वंचित तबका था। अशिक्षा, गरीबी और शोषण का शिकार था। ऐसे महादलित लोगों के हक के लिए आवाज उठाने का फैसला किया। उन्होंने मुसहर समुदाय में जागरुकता पैदा करने के लिए मुहिम शुरू की।जमसौत मुसहरी में रहती भी थीं। वे उनके साथ बैठक करतीं, नियम और कानून की जानकारी देंतीं। उनके शोषण के खिलाफ जब शिकायत होती तब कई बार पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करती। ऐसे में थाना का घेराव भी करना पड़ता। दबंग इस काम में रोड़ा अटकाने लगे। वे धमकी भी देते। लेकिन सुधा वर्गीज पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। वे अपने काम मुस्तैदी से लगीं रहीं।

रोजगार से मिला महिलाओं को सहारा।
मुसहर समुदाय को जागरुक करने के लिए उन्हें रोजगार से जोड़ा। इसके लिए उन्होंने सरकार से मदद ली। जीविका ने महिलाओं को मुर्गी पालन के लिए पूंजी दी। सामूहिक खेती का प्रयोग किया गया। सत्तू तैयार करने का रोजगार शुरू किया गया। पूरे देश में गूंजा नारी गूंजन बैड। सुधा वर्गीज ने 'नारी गूंजन' के नाम से दलित महिलाओं का एक बैंड बनाया। यह बैंड अभी बिहार ही नहीं दूसरे राज्यों में भी अपनी छाप छोड़ चुका है। लेकिन इस बैंड को बनाने में भी कई तरह की समस्यां आईं। पहले अधिकतर महिलाओं ने इस काम को नकार दिया। जब महिलाएं घर से बाहर नहीं निकल सकती तो वे बैण्ड बाजा कैसे बजा सकती थीं। लेकिन सुधा वर्गीज धीरे धीरे महिलाओं का विश्वास जीता और उन्हें बैंड पार्टी में शामिल होने पर राजी कर लिया। प्रोफेशनल ट्रेनर से बैंड की ट्रेनिंग दी। शुरू शुरू में लोग इन महिलाओं पर टिका टिप्पणी करते। इसकी अनदेखी कर सब लोग अपना काम करते रहे। महिला बैंड ने पहली बार बिहारशरीफ में अपने हुनर का प्रदर्शन किया। इसके बाद इनहें हर जगह से बुलाया जाने लगा। बिहार दिवस , 26 जनवरी आदि मौके पर इस बैंड का प्रदर्शन होने लगा। अब नारी गूंजन बैंड बिहार को रिप्रजेंट करता है। सुधा वर्गीज अभी 'वायलेंस अगेंस्ट वीमेन' के लिए काम कर रहीं हैं। इसके अलावा बच्चों के लिए बिहटा, नौबतपुर में शिक्षा कार्यक्रम चलाती है। ऐसे कुल 42 सेंटर हैं। दानापुर,नौबतपुर, पटना सदर प्रखंड में संचालित है। प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए पांच कोचिंग सेँटर भी हैं। लड़कियों के लिए होम फोर गर्ल्स और अडॉपशन सेंटर भी चलाया जा रहा है। अब समाज सेवा ही इनका धर्म और कर्म बन चुका है।
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