मिथलांचल का लोकपर्व कोजागरा को लेकर बाजारों में हलचल

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 दरभंगा 05 अक्टूबर, शारदीय नवरात्र की समाप्ति के बाद मिथिलांचल के नवविवाहितों के लिए खासा महत्व रखने वाले लोकपर्व कोजागरा को लेकर बाजारों में हलचल देखी जा रही है। ऐसी मान्यता है कि कोजागरा (को-जागृति) की रात्रि में जगने वाले व्यक्ति अमृत पान के भागी होते हैं। इस पर्व की तैयारियों के लिए मिथिलांचल के बाजारों में पान, मखान, मिठाई और मछली की खरीद को लेकर काफी हलचल देखी जा रही है। मिथक के अनुसार, आश्विन पूर्णिमा की रात्रि में पूनम की चांद से अमृत की वर्षा होती है और जो जागता है वही अमृत का पान भी करता है। खासकर नवविवाहित वर अपने विवाह के पहले वर्ष में इस अमृत का पान करें तो उनका दाम्पत्य जीवन सुखद बना रहता है। इसी कामना को लेकर यह लोक पर्व मिथिला में पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। लोक संस्कृति विशेषज्ञ शंकर देव झा के अनुसार मिथिला में नवविवाहित वरों के यहां आश्विन पूर्णिमा को कोजागरा का विशेष उत्सव मनाने की परम्परा रही है मिथिलांचल में ब्राह्मण, कर्ण कायस्थ, गंधवरिया राजपूत, पोद्दार वैश्य, धानुक, केवट, सोनार आदि विभिन्न जातियों में इस पर्व को मनाने की परम्परा है। मिथिला में किंवदंती है कि चन्द्रमा से टपकने वाली अमृत की बूंदों ने ही मखाना का रूप ले लिया है। यहां तक कहा जाता है कि स्वर्ग में भी पान और मखान दुर्लभ हैं इसलिए कोजागरा के दिन कम से कम एक पफोका मखान और एक खिल्ली पान खाना आवश्यक माना जाता है। उन्होंने बताया कि कोजागरा के दिन मिथिलांचल के प्रत्येक घर में लक्ष्मी पूजा की भी परिपाटी है। मान्यता के अनुसार, इस दिन घर में रखी तिजोरी की पूजा भी की जाती है। लोग चांदी और सोने के सिक्के को लक्ष्मी मानकर पूजा करते हैं और उसका स्पर्श घर के सभी सदस्य महालक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। प्रसाद के रूप में पान, मखाना, बतासा, मिठाई का वितरण किया जाता है। कोजागरा के अवसर पर वर पक्ष के यहां आये अतिथियों के बीच जहां पान, मखाना, बतासा, मिठाई का वितरण किया जाता है। वधू पक्ष की ओर से वर पक्ष के यहां मखाना, दही, चूड़ा, मिठाई, पान भार के रूप में भेजा जाता है। वहीं वर के लिये नये कपड़े, जूते, घड़ी, छाता और अन्य साजो-सामान सहित पूरे परिवार के लिये वस्त्र एवं अन्य सामग्रियां भी भेजी जाती है। मिथिला में कोजागरा के भार की बड़ी प्रसिद्धि है। यह भार देखने-दिखाने के लिये होता है। कोजागरा के दिन नवविवाहित वर का अपने यहां चुमावन होता है। वह अपने साले (पत्नी के भाई) के साथ पचीसी खेलता है। इस चुमावन के लिये डाला, पीढ़ी, दुर्वाक्षत सहित चांदी की बनी कौड़ी और थाल भी ससुराल से ही भेजे जाते हैं। कोजागरा की रात्रि में मिथिलांचल के घरों में महिलाओं द्वारा खीर बनाकर खुले आसमान के नीचे रात भर रखा जाता है और सुबह उसे घर के सभी लोग खाते हैं। मान्यता है कि आश्विन पूर्णिमा की रात्रि में जो ओस की बूंदे खीर में गिरती हैं वह अमृत होता है। कोजागरा के रात जागने के उद्देश्य से पहले राजा-महाराजाओं, जमींदारों द्वारा कौमुदी महोत्सव का आयोजन किया जाता था। आज भी मिथिलांचल के गांवों में लोगों के सहयोग से गीत-संगीत एवं नाटक का आयोजन किया जाता है ताकि लोग रात भर जाग कर इसका आनन्द तो ले ही साथ ही चन्द्रमा से मिलने वाले अमृत का भी पान कर सकें। मिथिलांचल के नवविवाहित वरों के घर के आंगन में अरिपन बनाने की भी परम्परा है। लोक मान्यता अनुसार कोजागरा में यह अरिपन बनाना घर में लक्ष्मी के आगमन के स्वागत का प्रतीक है। शाम में लोकगीतों के साथ मां लक्ष्मी के आगमन में प्रतीक्षा की जाती है। शारदीय नवरात्र समाप्त होते ही वधु पक्ष कोजागरा की तैयारियों में जुट जाते हैं। लोग मखाना, कपड़े, बरतन, डाला पर देने के लिये धातु के रंग-बिरंगे बरतनों और कौड़ी खरीदी जाती है। दरभंगा और लहेरियासराय के बाजारों में कोजागरा की जमकर खरीद हो रही है। वर पक्ष के यहां भी कोजागरा को लेकर साफ-सफाई, रंग-रोगन किया जा रहा है। संबंधियों को आमंत्रण भेजे जा रहे है तथा भोज-भात की अभी से ही तैयारी चल रही है।

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