व्यंग्य : आस्था की दुकान

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भारत के गली-गली में आस्था की दुकान चल रही है। आस्था के नाम पर कोई न कोई किसी न किसी को ठग रहा है। आजकल टेलीविजन पर राधे मां के ढिंचैक डांस की चर्चा परवान पर है। गांव में चौपाल पर बैठे बुजुर्ग जिनके पांव कब्र में लेटे है, वे भी राधे मां के ढिंचैक डांस पर जमकर बहस कर रहे है। क्या नाचती है राधे मां ! उतनी तो मीराबाई भी पग घुंघरू बांघकर नहीं नाची थी, जितनी की राधे मां बिना घुंघरू के नाचती है। ग्लैमर का रूप धारण कर जब राधे मां नाचती है इंसान तो क्या भगवान का मन भी भ्रमित हो जाये। यकीकन ! राधे मां को डांस शो करने चाहिए। वैसे भी राधे मां डांस शो ही तो करती है। तथाकथित भक्तों के साथ राधे मां मंत्रमुग्ध होकर नाचती है और पाखंड व प्रपंच के नाम पर अपनी झोली भरती जाती है। जब जब राधे मां नाचती है, तब तब मीडिया के चैनलों में भूकंप आ जाता है। दिनभर चैनल के खबरिया बाबा राधे मां के डांस को अलग-अलग ऐंगल से दर्शकों के बीच दिखाते है। यह चैनल वाले भी राधे मां से कम नहीं है। एक चैनल तो अभी भी रोज हनीप्रीत पर कार्यक्रम कर रहा है। शायद ! उसके लिए हनीप्रीत हिन्दुस्तान से भी बढकर है। जिस हनीप्रीत की आधी फाइल बंद होने को आयी है, उस पर बेजा बहस करके मीडिया के चैनल क्या बताना चाहते है ? खैर ! इन हनीप्रीतों की वजह से ही तो इन चैनलों का कारोबार चलता है। हनीप्रीत और राधे मां के साथ ये भी हमें कोई कम नहीं बनाते है। वैसे भी भारत तो बाबाओं का देश है। यहां बाबियां भी भरपूर है। एक से बढकर एक गुणवत्ता मिलेंगी। भारत की सडक पर जितने गड्ढे नही है, उससे अधिक तो बाबा है। बाबागिरी का टैलेंट जितना भारत में है उतना तो कई पर भी देखने को नहीं मिलेंगा। बाबागिरी और नेातगिरी ने भारत को सोने की चिडिया से रोड पर लाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। क्योंकि भारत में बेरोजगारी इतनी है कि इन दोनों धंधे से सस्ता और कम निवेश वाला धंधा ओर कोई है नहीं। न मालिक की डांट का डर और न नौकरी जाने का टेंशन। कई पर भी हाथ देख लिया और सौ रूपये सीधे जेब में डाल दिये। जब मन हुआ किसी बाबी के साथ भाग लिये। देश में भगाने का फोग चल रहा है। भागने में हर भारतीय मिल्खा सिंह है। भारत में एक सर्वे हुआ जिसमें यह पता चला कि बाबागिरी की लाइन में ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट लोग बैठे है। यानि की डिग्री के बाद भी बंदे ने बाबा बनने का ही ठाना। क्योंकि इस काम में मेहनत नहीं लगती और न ही बदन से पसीना आता है। भारत में हर पत्थर एक चमकीले पन्ने के बाद आलरेडी भगवान बन जाता है। यानि की हमारी आस्था इतनी है कि हम आस्था के नाम पर अक्ल के अंघे व लंगडे होने को भी तैयार है। वाह ! रे मेरे प्यारे भारत। 



- देवेंद्रराज सुथार
संपर्क  - गांधी चौक, आतमणावास, बागरा, 
जिला-जालोर, राजस्थान। पिन कोड - 343025

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