बिहार : पंचायती राज व्‍यवस्‍था में 'भूअरा' का दबदबा

भूअरा यानी भूमिहार, अहीर, राजपूत
  • काराकाट लोकसभा क्षेत्र की पंचायतों का जातिवार अध्‍ययन, भूमिहारों पर भारी पड़ रहे पासवान

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पंचायती राज व्‍यवस्‍था ने सामाजिक ढांचे को पूरी तरह प्रभावित किया है। अतिपिछड़ी जातियों के आरक्षण के कारण इन जातियों में नयी तरह की सामाजिक चेतना आयी है। वे अपने अधिकारों को लेकर अधिक मुखर हुए हैं। इसमें अलग-अगल जातियों का दखल दिख रहा है। अनुसूचित जाति में पासवान सब पर भारी पड़ रहा है। पंचायती राज व्‍यवस्‍था की जातीय संरचना को समझने के लिए हमने काराकाट लोकसभा क्षेत्र को नमूना के आधार पर लिया। इसके तहत आने वाली सभी ग्राम पंचायतों के मुखिया की जाति एकत्रित की और उसका विश्‍लेषण किया। काराकाट लोकसभा क्षेत्र में कुल 15 प्रखंडों के 201 पंचायतें शामिल हैं। कुछ नगर निकाय भी शामिल हैं, जिसे हमने अपने अध्‍ययन शामिल नहीं किया है। इस अध्‍ययन में एक बात उभर कर सामने आयी कि विधान सभा और पंचायती राज संस्‍थाओं के प्रतिनिधियों की सामाजिक संरचना काफी कुछ बदल जाती है। इस पर स्‍थानीय समीकरण, आरक्षण के स्‍वरूप और उम्‍मीदवार की जाति का असर भी दिखता है। हमारे प्रारंभिक अध्‍ययन में यह बात साफ तौर पर दिखी कि पंचायती राज में यादव और राजपूत बराबर के मुकाबले में हैं। भूमिहारों की तुलना में पासवानों का प्रतिनिधित्‍व ज्‍यादा है। सुरक्षित सीट के अलावा सामान्‍य सीट से भी पासवान जीते हैं। अतिपिछड़ी जातियों को लेकर खासकर बनिया सुमदाय की जातियों को लेकर व्‍यापक दुविधा की स्थिति दिखी। हलवाई, तेली और कानू के अंतर को समझना मुश्किल होता है। इसके बावजूद हमने अधिकाधिक सदस्‍यों की वर्गीय पहचान के बजाये जातीय पहचान को स्‍पष्‍ट करने का प्रयास किया है। कुल मिलाकर काराकाट के बहाने एक नयी बहस की शुरुआत कर रहे हैं ताकि पंचातयों का जातीय और सामाजिक संरचना को समझने का नया प्रयास तेज हो सके। (बिरेन्द्र यादव न्यूज़)
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