विशेष : कालीन उद्योग ही नही, पुश्तैनी काम, परम्परा और संस्कृति भी है

कारपेट एक्स्पों, ऐसा आयोजन है, जिसमें देश के कई राज्यों के निर्यातक एक साथ एक जगह पर रंग-बिरंगी डिजाइनों में देश की छबि झलक रही है। कोई सिल्क वुलेन, तो कोई काॅटन वुलेन तो साड़ी कतरन तो कोई जूट आदि से निर्मित कालीनों व दरी में बुनकरों ने अपनी कला को उकेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। एक छत के नीचे ऐसे कई बुनकरों द्वारा उनकी कला देखने को मिला जिसमें भारतीय जीवन शैली का भी चित्रण देखने को मिला। उनके इन कलाकृतियों ने  सात समुंदर पार से आएं खरीदारों का दिल जीत लिया। इस एक्स्पों का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ लाखों लोगों की कमाई का जरिया बना कारपेट इंडस्ट्री को बढ़ावा देना है 

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देश की पारंपरिक कलाएं जो लुप्त हो जा रही है, जिनकी लोकप्रियता कम होते जा रही है। उन सभी कलाओं को लोकप्रिय बनना, इसके प्रति लोगों को जागरुक करना सरकार की प्राथमिकता तो है ही, इसके जरिए रोजगार सृजन भी एक बड़ा काम हैं। एक्स्पों में बेहतर तरीके से मार्केटिंग होने से निर्यातकों को कई तरह के लाभ मिल सकते हैं। सरकार इनकी मदद के लिए आॅनलाइन मार्केटिंग की मदद लेगी। कालीन मेले में निर्यातकों के विश्वस्तरीय कारपेट स्टाल दिखाई दे रहे हैं। जिन्हे अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर डेवलप किया गया है। कालीन मेले में इस तरह के प्रयोग तेजी से बढ़ रहे हैं, इससे विदेशी आयातक इन स्टालों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। मेले में लगाए गए स्‍टालों में कालीनों के कलर संयोजन की तरह स्टाल में भी बेहतर कलर और डिजाईन का प्रयोग कर निर्यातक अपने प्रोडक्ट की ब्रांडिंग कर रहे हैं साथ ही यह प्रयोग मेले को काफी आकर्षक बना रहा है। यही वजह है कि अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर मार्केटिंग के लिए एक्स्पों एक बड़ा माध्यम साबित हो रहा है। मेले में कई ऐसे निर्यातक हैं जिन्‍होने पहली बार किसी फेयर में अपना स्टाल लगाया है। इससे उन्हे फायदा भी मिल रहा है। मेंले में 274 स्टालों और सात हजार वर्ग मीटर क्षेत्र ने आयातकों को अपनी तरफ आकर्षित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस कारण निर्यातक ऐसे स्टाल बनाने पर जोर दे रहे हैं। जो आयातकों को अपने तरफ आकर्षित कर स्टाल में आने के लिए प्रेरित करें। 

वाराणसी के संपूर्णानंद संस्‍कृत विश्वविद्यालय में वस्त्र मंत्रालय के सहयोग से कालीन निर्यात संवर्धन परिषद द्वारा आयोजित चार दिवसीय 34वें अंतर्राष्ट्रीय कालीन मेले के समापन के दौरान मेले में पहुंचे सांसद वीरेन्द्र सिंह मस्त ने कहा, निर्यातकों व बुनकरों के हाड़तोड़ मेहनत व कारीगरी का नतीजा है कि मेले में अन्तर्राष्ट्रीय मार्केटिंग और ब्राडिंग की छाप स्टालों पर देखने को मिली है। श्री सिंह ने कहा कि कालीन एक कुटीरपरक उद्योग हैं। जो सिर्फ उद्योग ही नहीं पुस्तैनी काम के साथ परम्परा और संस्कृति भी है। लाखों लोगों की कमाई का जरिया है। खास यह है कि इस उद्योग में काम करने वाले लोग खेती के साथ साथ बुनाई का काम करते हैं। यह ऐसा काम है जो गरीब से गरीब को भी स्‍वावलंबी बनाने में मददगार होती है। यह एक ऐसा उद्योग है जिससे जुड़े बुनकरों की कारीगरी से दुनिया भर में भारत की पहचान बनती है। मोदी सरकार इनके लिए कई योजनाएं भी लाई है जिसमें बुनकरों के पेंशन, पुरस्‍कार देकर उन्‍हे उत्‍साहित कर रही है। मुद्रा लोन के माध्‍यम से भी सरकार स्‍वरोजगार को भी बढ़ावा दे रही है। चूकि कालीन भेड़ के बालों से बनता है, इसलिए सरकार ने भेड़ पलकों के लिए खास स्कीम बनाई है। इस स्कीम में नबार्ड के जरिए भेड़पालकों को स्वावलंबी बनाने के लिए 10 भेड़ पर बगैर किसी ब्याज के एक लाख व 100 भेंड़ पर दस लाख रुपये की राशि देंगी। परिणाम यह है कि आज मुद्रा लोन लेकर गरीब बुनकर मजदूर खुद अपना व्‍यसाय कर रहे हैं। 

परिषद के अध्यक्ष महावीर शर्मा का कहना है कि मेले को लेकर निर्यातक नए नए प्रयोग कर रहे हैं वहीं परिषद का यह मेला अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हो चुका है। यही कारण है कि अब नए देशों के आयातक भी मेले में काफी संख्या में आए हैं और भारतीय हस्तनिर्मित कालीनों के प्रति उनका रूझान तेजी से बढ़ा है। ग्लोबल ओवरसीज के निर्यातक संजय गुप्ता ने कहा कि मेले में स्टाल के माध्यम से अगले छह महीने के लिए निर्यात ऑर्डर बुक करने का प्रयास होता है। इस चार दिवसीय मेले में स्टाल लगाने के लिए पूरे वर्ष काम करना पड़ता है। हम प्रयास करते हैं की हमारा स्टाल अधिक से अधिक हमारे प्रोडक्ट को डिस्प्ले कर सके साथ ही स्टाल को सुंदर बना सके। परिषद के प्रथम उपाध्यक्ष सिद्धनाथ सिंह ने बताया कि पहला मेला सिर्फ 250 वर्ग मीटर के साथ शुरू किया गया था। उस दौरान काफी साधारण स्टाल बनाए जाते थे और कुछ निर्यातक ही उसमें शिरकत करते थे लेकिन आज यह मेला विश्‍व स्‍तर पर एक ब्रांड बन चुका है। श्री शर्मा ने बताया कि चार दिनों में 275 आयातक व आयातकों के 304 प्रतिनिधियों ने मेले में अपनी भागीदारी दिखाई। परिषद के प्रयासों से कई प्रमुख देशो के बड़े आयातक भी मेले में पहुंचे और निर्यातकों के साथ व्यापारिक अनुबंध किया। 




(सुरेश गांधी)
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