भाजपा के लिये मुकुल ‘फूल’ साबित होंगे या ‘भूल’?

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मुकुल राय द्वारा भाजपा का दामन थामने के बाद से राज्य में एक बार फिर जन चर्चाओं का दौर शुरु हो गया है कि हैं। बस हो ट्रेन, ट्राम हो या फिर शेयर की टैक्सी हर जगह भाजपा में जाने वाले मुकुलराय की चर्चा आम है। लोगों के बीच कहा जा रहा कि भाजपा के लिये मुकुल फूल साबित होंगे या भूल। यह तो वक्त बताएगा। लेकिन राजनीति में छोटी सी भूल कभी कभी सिर पीटने का कारण बनसकती है तो जनबूझ कर उठाया गया जोखिम भविष्य का फयदा भी बन जाता है। भाजपा आला कमान की नीति क्या है यह तो वह जाने लेकिन बंगाल की राजनीति में भाजपा का मुकुल राय द्वारा दामनथामना एक कठोर कदम तो कहा ही जा सकता है। भले ही कुछ लोग इस कदम को मजबूरी भी मान सकते हैं। कुल मिला कर फिर वहीं बात की राजनीति में कब क्या हो कुछ कहा नहीं जा सकता है।लेकिन अनुभव और राज्य की राजनीतिक आबोहवा की पहंचान कर उठाई गई कदम का परिणाम दूर तक दिखता है। आम चर्चा के अनुसार मुकुल राय भगवा खेमे में नारदा व सारदा जैसे तमाम मुश्किलों से निजात पाने के लिये आये हैं। इसका फायदा बीजेपी को मिले सकता है और तृणमूल के नेटवर्क और उसकीकार्यशैली की पूरी जानकारी आसानी से मिलने की सम्भवना से इंकार भी नहीं किया जा रहा है। वहीं तृणमूल से लगभग काट दिये गये मुकुल को एक बड़े प्लेटफार्म की जरूरत थी और बीजेपी को बंगालमें एक ऐसे नेता की जरुरत थी जो बंगाल के ग्राम अंचलों से लेकर शहर पर बी अपनी पकड़ रखता हो।  ऐसे में दोनों एक दूसरे के लिए पूरक साबित हो सकते हैं। लेकिन मुकुल राय के इस कदम सेबीजेपी को कितना फायदा होगा और तृणमूल को कितना नुकसान होगा यह सवाल जरुर उठ रहा है। वैसे लोगों में यह भी सवाल उठ रहा है कि असम में भी बीजेपी सरकार इसीलिए बना पायी क्योंकि हिमंता बिस्वा सरमा ने तरुण गोगोई का साथ छोड़ दिया था? क्या यूपी में मायावती को सत्ता में आने सेइसीलिए रोका जा सका क्योंकि स्वामी प्रसाद मौर्य बीजेपी के साथ आ गये थे? क्या उत्तराखंड में बीजेपी सत्ता इसीलिए हथिया सकी क्योंकि विजय बहुगुणा कांग्रेस के बड़े नेताओं को लाकर मैदान खालीकर दिये थे। इन सभी सवालों का एक जवाब क्या हां या नहीं में दिया जाकता है?।  सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या मुकुल राय के भाजपा में आने से कोई बड़ा बैंक पार्टी से जुड़ जाएगा? राज्य कीराजनीति के जानकारों का मानना है कि ऐसे नहीं हो सकता है।कारण राज्य में अबतक ममता बनर्जी के साये में अपना राजनीतिक कद बढ़ाने वाले मुकुल राय के साथ ऐसा कोई चमात्कारिक चेहरा नहींमाने जाते हैं। वह बंगाल में राजनीति का केन्द्र बने अल्प संख्यकों को अपने पाले में ला सकें ऐसी सम्भावना भी क्षीण ही है। राज्य की राजनीति के जानकारों का मानना है सिर्फ मुकुल को भी बीजेपी की जरूरत थी और उन्होंने कुछ नेताओं के जरिये अपना मतलब निकाल लिया।  लेकिन राजधानी दिल्ली में बैठें देश दुनिया कीराजनीति के जानकार बताते हैं कि ऐसा नहीं है। इन लोगों का मानना है कि  मुकुल राय को भाजपा में लाने से पहले काफी चीजों पर ध्यान दिया गया। राजनीति के तमाम जानकारों ने दिन रात एक कियाऔर माना जा रहा है कि बीजेपी के लिए यह बड़ा सौदा है। सच तो यह है कि भाजपा को राज्य में अपनी जड़ें जमानी हैं।  विधानसभा चुनाव से लेकर निकाय चुनाव में बीजेपी तमाम कोशिशें कर चुकी है। नतीजा खास नहीं रहा। कईयों के दावे व सलाह केअनुसार मुस्लिम कैंडिडेट भी मैदान में उतारे लेकिन क्या हुआ सबको पता है। कहा जाता है कि मुकुल राय बंगाल में ममता की जीत को धराताल पर लाने के एक ऐसे नायक हैं जो पर्दे के पीछे रहें। शायदयही कारण भी रहा होग कि  दीदी ने भी उन पर आंख बंद कर भरोसा किया। लेकिन कहते है कि राजनीति में सत्ता की कुर्सी का नशा ऐसा होता है कि हर शासक चहता है कि इस नशे को उनके अपने हीचखे। तो क्या इसी मानसिकता के शिकार मुकुल राय को होना पड़ा।  

जगदीश यादव



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