विशेष आलेख : विकास की विसात पर भाजपा ने जीता हिमाचल और गुजरात

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दिसंबर के उत्तरार्द्ध ने भारतीय जनता पार्टी को दोहरी खुशी दी है। हिमाचल की हुकूमत जहां कांग्रेस के हाथ से फिसलकर भाजपा के हाथ में आई है, वहीं गुजरात में भाजपा ने लगातार छठवीं बात विजय दर्ज की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात की जीत को बड़ी राजनीतिक घटना कह रहे हैं तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। 2018 में भाजपा को राजस्थान का मोर्चा फतह करना है। उसे उन राज्यों में भी अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज करानी है, जहां वह चुनाव लड़ने के बारे में सोचती ही नहीं थी। 2019 में लोकसभा चुनाव फतह करने का बड़ा लक्ष्य भी उसके सामने है, जिसे विकास के औजार से ही जीता जा सकता है। भाजपा ने भी विकास की विसात बिछाई है जिस पर विपक्ष के मोहरे निरंतर पिट रहे हैं।  
  
पांच साल बाद किसी राज्य में किसी पार्टी का दोबारा जीतना ही अपने आप में विश्लेषण का विषय है। चिंतन का विषय है। भाजपा ने 22साल सत्ता में रहने के बाद गुजरात में पुनः स्पष्ट बहुमत से जीत हासिल कर यह साबित कर दिया है कि उसकी विकास नीति ने जनता के हृदय पर अपने लिए खास जगह बनाई है। गुजरात का चुनाव विकास के नाम पर लड़ा गया, लेकिन इसे जातिवादी रंग देने के भी प्रयास कुछ कम नहीं हुए। कांग्रेस ने जिन तीन साथियों को अपने साथ लिया था, उनका आधार भी पूरी तरह जातीय संतुलन को बनाए रखना ही था। भाजपा का उन पर हमला स्वाभाविक लगता है लेकिन गुजरात और हिमाचल प्रदेश ही नहीं, देश के सभी चुनाव वाले राज्यों में जातिगत आधार पर समीकरण बैठाने में कोई भी राजनीतिक दल कमतर नहीं है। विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ा जाना स्वाभाविक है। इसका सर्वत्र स्वागत है लेकिन जाति के आधार पर चुनाव नहीं लड़े जाएं, यह वक्त की जरूरत भी है। देश की इस बड़ी जरूरत को राजनीतिक दल आखिर कब पूरा करेंगे? इसमें संदेह नहीं कि भाजपा विकास की राजनीति करना चाहती है लेकिन इसी देश में विकास को पागल कहने वाले लोग भी हैं। अगर राजनीतिक पार्टियां प्रत्याशियों का चयन जाति और मजहब के आधार पर करेगी तो भाजपा इस खेल से अपने को कैसे अलग करेगी, यह भी तो तय होना चाहिए। क्या भाजपा को इतना बड़ा जोखिम लेना चाहिए। कदाचित नहीं तो जातिवाद का जहर कैसे दूर होगा,इस पर अगर सभी राजनीतिक दल मिल बैठकर मंथन करें तभी बात बनेगी। भाजपा सत्ता में नहीं रहेगी तो विकास की बात कौन करेगा, यह भी अपने आप में एक बड़ा सवाल है। 

प्रधानमंत्री ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि गुजरात की जीत से उन्हें दूसरी खुशी मिली है। उनकी जगह कोई भी होता और उसकी पार्टी दो राज्यों में चुनावी फतह करती तो उसका सीने का आयतन  पूर्वापेक्षा और बढ़ जाता। यह जीत प्रधानमंत्री के लिए इसलिए भी मायने रखती है कि उनके बाद तीन साल तक उनके उत्तराधिकारियों ने, गुजरात भाजपा के कार्यकर्ताओं ने गुजरात को बखूबी संभाला। गुजरात में छठीं बार भाजपा को विजयश्री मिली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मानते हैं कि यह सामान्य जीत नहीं है। यह देश की विकास यात्रा की जीत है। जातिवाद के जहर से मुक्ति पाने की सोच की जीत है। विकास का मजाक बनाकर जनता का स्नेह नहीं पाया जा सकता। विपक्ष को यह बात सोचनी होगी। प्रगति मजाक की वस्तु कभी नहीं रही। विरोध के लिए किसी को कुछ भी कहा जाना न तो व्यावहारिक है और न ही नीति सम्मत।

 चुनाव में जीत-हार होती रहती है। एक पक्ष जीतता है, दूसरा हारता है। हारना और जीतना चुनाव की नियति है। यह एक तरह का लोकतांत्रिक युद्ध है जिसमें पार्टियां नहीं, उनकी नीतियां जीतती हैं। उनकी विकास संबंधी सोच और निष्ठा जीतती है। भाजपा के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। उसका विजयरथ विकास के राजपथ पर सरपट दौड़ रहा है। इसके पीछे देश की विकास कामना ही महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव-दर-चुनाव जीत का रिकाॅर्ड स्थापित कर यह साबित कर दिया है कि विकास की चाभी से हर उपलब्धियों के ताले खोले जा सकते हैं। देश की जनता का दिल जीता जा सकता है। नरेंद्र मोदी ने जनता के मन का विज्ञान पढ़ लिया है। वह जनता की आशा, अपेक्षा की बात कर रहे हैं। लोगों के सपनों को पूरा करने की बात करते हैं। इसका लाभ उन्हें होता है। मतदाता उन पर विश्वास करते हैं। विपक्ष को भी यह बात समझनी होगी। प्रधानमंत्री आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर देश को प्रगति के सर्वोच्च सोपान पर ले जाना चाहते हैं और इसके लिए वे निरंतर प्रयास भी कर रहे हैं। इसमें शक नहीं कि वर्ष 1990 से गुजरात में भाजपा का एक छत्र राज्य है। आगे भी रहेगा, इसकी कल्पना बेमानी नहीं है। 

 मोदी और शाह की जोड़ी भारत में जिस तरह जीत पर जीत दर्ज कर रही है, उसने विपक्ष की पेशानियों पर बल ला दिया है। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भाजपा की शानदार जीत नए-नए कांग्रेस अध्यक्ष बने राहुल गांधी को एक बड़ा झटका है। वैसे भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में हुए चुनावों में यह राहुल गांधी की 17वीं बड़ी हार है। भाजपा इसे जातिवाद, परिवारवाद और तुष्टिकरण की राजनीति पर विकास की जीत मान रही है। गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जहां 99 सीटों पर कब्जा किया है, वहीं कांग्रेस 80 सीटों पर ही सिमट गई है। वहीं हिमाचल की 68 विधानसभा सीटों में से भाजपा ने 44 पर जीत दर्ज की है। कांग्रेस को 21 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा है जबकि तीन सीटें निर्दलीय उम्मीदवारों के पक्ष में गई हैं। गुजरात की 182 विधानसभा सीटों के लिए 9 और 14 दिसंबर को दो चरणों में मतदान हुए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भाजपा की जीत को सुशासन और विकास का नतीजा बताया है। भाजपा के प्रति प्रेम और भरोसा दिखाने के लिए उन्होंने दोनों राज्यों के मतदाताओं के प्रति आभार भी जताया है।  गुजरात में जीत के आंकड़ों पर रोशनी डालना होगा और इस पर भी भाजपा को विमर्श करना होगा। उसे शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जीत के अंतर को भी कम करना होगा। विपक्ष की सक्रियता आगे और बढ़ेगी, इसकी उम्मीद तो की ही जा सकती है।

1995 में भाजपा को 121, कांग्रेस को 45 सीटें मिली थी। 1998 में भाजपा ने 117 सीटें जीती थीं। 53 सीटें ही कांग्रेस के पाले में आ सकी थीं। 2002 में भाजपा ने 127 और कांग्रेस ने 51 विधानसभा क्षेत्रों में अपनी-अपनी विजय पताका लहराई। 2007 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के 117 उम्मीदवार विजयी रहे जबकि कांग्रेस अपने 59 प्रत्याशी ही जिता पाई। 2012 में भाजपा ने 115 सीटें जीती थी जबकि कांग्रेस 61 सीटों पर ही सिमट गई। भाजपा ने 2002 में पहली बार सबसे ज्यादा 127 सीटें जीती थीं। 2012 के विधान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को महज 61 सीटें मिली थीं। इस लिहाज से कांग्रेस अपनी प्रगति गिनाकर अपनी पीठ थपथपा सकती है और अपने अध्यक्ष राहुल गांधी का बचाव कर सकती है। हिमाचल प्रदेश में अलबत्ते उसके पास कहने के लिए कुछ भी नहीं है। उसके गढ़ छिन गया है।

  गुजरात में तो भाजपा पिछले 22 साल से दूसरे नंबर पर थी। गुजरात में अभी भी वह नंबर वन नहीं बन पाई है लेकिन उसके मत प्रतिशत और सीटों का बढ़ना उसके आंसू पोंछने के लिए काफी है। गुजरात और हिमाचल प्रदेश की चुनावी जीत ने भाजपा के 2019 की विजय यात्रा की राह आसान कर दी है। भारत के अधिकांश राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं। कर्नाटक, त्रिपुरा में भी वह सरकार बनाने के लिए प्रयासरत है। गुजरात का विकास माॅडल ही नरेंद्र मोदी की अब तक की विजय यात्रा का माध्यम बना है लेकिन अब भाजपा को हर राज्य में शहरी और ग्रामीण दोनों ही स्तर पर विकास की गंगा बहानी है। हर हाथ को काम देना है। भाजपा के रणनीतिकार इस बात को समझते भी हैं। इसलिए वे हर चुनाव को प्रतिष्ठा से जोड़कर देखते हैं। उनका मानना है कि एक भी राज्य छूटा, विकास चक्र टूटा। भाजपा की लगातार जीत विपक्ष को एकजुटता की राह दिखा सकती है। भाजपा भविष्य की इन चुनौतियों को लेकर भी गंभीर है। इसलिए वह विकास कार्यों में तेजी लाना चाहती है। काम होगा तो बोलेगा ही। नरेंद्र मोदी के प्रति जनता का विश्वास सिर चढ़कर बोल रहा है। अमित शाह और नरेंद्र मोदी की रणनीति का ही नतीजा है कि वे अपनी विजय यात्रा को निरंतर आगे बढ़ा रहा है। मोदी और शाह ने विजय का श्रेय एक दूसरे को देकर यह स्पष्ट कर दिया है कि उनके मध्य गजब का वैचारिक तालमेल है। दोनों नेता जानते हैं कि स्नेह बोकर ही स्नेह की फसल काटी जा सकती है। विपक्ष को भी लग रहा है कि इस जोड़ी को हरा पाना अब मुमकिन नहीं है। जो काम करेगा, वही मजबूत होगा, देश में हो रहे चुनाव इस बात का संकेत तो दे ही रहे हैं। सबका साथ-सबका विकास के मंत्र को मूर्त रूप देने, हर शहर में औद्योगिक संजाल स्थापित करने का प्रयास भाजपा को बहुत दूर तक ले जाएगा, इसकी आशा-अपेक्षा तो की ही जा सकती है।  







--सियाराम पांडेय ‘शांत’--
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