विशेष : देश में ‘मोदी मैजिक‘ का जलवा

‘‘लोगों को नाराजगी है तो भरोसा भी है। भरोसा इस बात का है कि वह शख्स देश नहीं बेचेगा। घपले-घोटालों से देश को लुटने नहीं देगा। भ्रष्टाचार को पनपने नहीं देगा। श्रीराम की जन्मस्थली पर मंदिर वहीं बनायेगा‘‘। जनता का उसके प्रति यही विश्वास उसे न सिर्फ अजेय बनाती है, बल्कि करोड़ों-करोड़ हिन्दुस्तानियों के दिलों पर वह शख्स राज कर रहा है। वह शख्स कोई और नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ही हैं। खासकर गुजरात व हिमाचल की जीत ने साफ कर दिया है कि चुनाव दर चुनाव जीतने वाले मोदी का विजयरथ को अब विपक्ष की एकजुटता भी नहीं रोक पाएगी। मतलब साफ है ये नतीजे बीजेपी के पक्ष में आने से ब्रांड मोदी के प्रति लोगों का भरोसा और भी बढ़ेगा  


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फिरहाल, गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनावों में बीजेपी को बहुमत इस बात का संकेत है कि मोदी का ‘विजयरथ अब यूं ही चलता रहेगा। कांग्रेस मुक्त भारत की ओर बीजेपी ऐसे ही आगे बढ़ती रहेगी। मोदी द्वारा देशहित में लिए जा रहे फैसले जनता को मंजूर हैं।  बता दें, बीते एक साल के दौरान आर्थिक सुधारों की दिशा में लिए गए कड़े कदम को कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष चुनावी मुद्दा बनाएं हुए हैं। यूपी में मिली करारी शिकस्त के बावजूद गुजरात व हिमाचल में भी कांग्रेस ने तो प्रचार के शुरुआत से ही दावा किया कि नोटबंदी से किसान, मजदूर और छोटे कारोबारी परेशान हुए और इससे देश की अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लगा हैं। इसी मुद्दे पर मोदी को घेरने की कोशिश भी की गयी। लेकिन नतीजों ने साफ कर दिया है कि विपक्ष के इस सबसे बड़े दांव की हवा पूरी तरह से निकल चुकी है। जबकि कांग्रेस पार्टी के लिए यह चुनाव खासा निर्णायक था। पार्टी के लिए अब नए अध्यक्ष राहुल गांधी के धुंआधार चुनावी अभियान और मोदी से सीधे टक्कर लेने के क्रम में हार की जिम्मेदारी का ठीकरा राहुल के सिर पर फोड़े जाने से बचा पाना मुश्किल होगा। वह राहुल गांधी जो बचपन में ही हिंसा का अपार दुख झेलते हए अब राजनीति में निडर व मजबूत बनकर कांग्रेस पार्टी के नए कप्तान बनें हैं। उनके सामने अब सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को बचाने की होगी। क्योंकि भाजपा अपनी 18 राज्यों की सूची में दो और नाम जोड़कर 20 राज्यों को कांग्रेस मुक्त करा पाने में सफल हो गयी हैं। भाजपा के लिए यह अपने विजय अभियान में एक कदम और आगे बढ़ने जैसा है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है, क्या मोदी की आंधी में चमक बना पायेंगे राहुल गांधी? पांच राज्यों में सिमटी कांग्रेस पार्टी के क्या अच्छे दिन आयेंगे? उछालभरी पिच पर क्या राहुल का बल्ला चलेगा? क्या कांग्रेस को अब भी राहुल कप्तानी की पारी का इंतजार हैं? क्या राहुल गांधी की कप्तानी में सीरिज दर सीरिज हार का सिलसिला थमेगा? 

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हालांकि गुजरात में 22 साल के शासन के बाद भाजपा का प्रदर्शन लगातार सिमटता नजर आ रहा है। वर्ष 2002 में 127 सीटों के आंकड़े के बाद 2007 में यह आंकड़ा 117 पर रुका और 2012 में भाजपा को 115 सीटों पर संतोष करना पड़ा। गुजरात का चुनाव इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी खासा निर्णायक साबित हुआ है। उनके लिए गुजरात जीतना प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था। गुजरात में भाजपा की हार से 2019 का रास्ता खासा कठिन हो जाता। लेकिन जीत ने मोदी को न सिर्फ ताकत दी है, बल्कि देशहित में और कड़े फैसले लेने की जनता ने मंजूरी दे दी हैं। मतलब साफ है प्रधानमंत्री के आर्थिक सुधार या यूं कहे जीएसटी और नोटबंदी पर जनता ने मुहर लगा दी हैं। जनता ने मोदी को देश हित में और कड़े फैसले लेने की आजादी हैं। क्योंकि इस बार का गुजरात विधानसभा का चुनाव महज गुजरात के लिए नहीं लड़ा जा रहा था, बल्कि देश की सियासत के लिए भी एक लिटमस टेस्ट माना जा रहा था। 2019 का सेमीफाइनल के तौर देखा जा रहा था। प्रधानमंत्री मोदी के गुजरात से दिल्ली पहुंचने के बाद गुजरात में यह पहला चुनाव था। यह सीधे प्रधानमंत्री मोदी की प्रतिष्ठा से जुड़ा चुनाव था। इस चुनाव को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के चुनावी गणित की असली परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा था। गुजरात विकास मॉडल पर लगातार सवाल विपक्षी दल उठा रहे थे। गुजरात विधानसभा चुनाव के बिगुल बजने से पहले ही कांग्रेस ने श्‘विकास पागल हो गया का नारा दिया था, जो सीधे-सीधे हमला गुजरात के विकास मॉडल पर था। यही वजह है कि नरेंद्र मोदी ने गुजरात में बीजेपी की सियासी बिसात खुद बुन कर जीत में तब्दील कर दी। कहा जा सकता है इस जीत का असर 2019 के लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा। बीजेपी-कांग्रेस दोनों पार्टियां गुजरात के रास्ते 2019 लोकसभा चुनाव को साधने की कोशिश कर रही है। मोदी ने गुजरात में बीजेपी को कामयाबी दिलाकर 2019 की राह आसान कर दी। खास यह है कि गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजों का प्रभाव अगले साल होने वाले राज्यों के विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा। अगले बरस कई अहम राज्यों में चुनाव होने है। इनमें मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक और ओडिशा जैसे राज्य शामिल हैं। बीजेपी गुजरात विधानसभा चुनाव जीत के नतीजों को इन राज्यों के चुनाव में बीजेपी के लिए फायदा दिलाएगा। पार्टी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का राजनीतिक वर्चस्व में इजाफा होगा। 

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इन सब के बीच गुजरात में बीजेपी की जीत, गुजरात के विकास मॉडल पर सवाल उठाने वालों के लिए करारा जवाब है। गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत से विपक्ष को करारा झटका लगा है। गुजरात की हार से कांग्रेस ही नहीं बल्कि बीजेपी विरोधी दलों में हताशा पैदा होगी। इतना ही नहीं गुजरात में हार से विपछी दलों की एकजुटता में बिखराव बढ़ने की संभावना है। गुजरात में कांग्रेस की हार से उसके कई सहयोगी दल साथ छोड़ भी सकते हैं। इससे जहां कांग्रेस का कुनबा कमजोर होगा तो वहीं बीजेपी खेमा मजबूत होगा। जहां तक राहुल गांधी का सवाल है, वे कांग्रेस के नए अध्यक्ष चुन लिए गए हैं। या यू कहें देश की इस सबसे पुरानी पार्टी में औपचारिक रूप से राहुल युग शुरू हो चुका है...लेकिन इस नई शुरुआत के साथ राहुल को कई चुनौतियां भी विरासत में मिली है...कांग्रेस के नए अध्यक्ष के सिर पर कांटों का ताज है। उनके सामने खड़ी चुनौतियां वास्तव में उनकी असली परीक्षा लेंगी। क्योंकि राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष ऐसे वक्त बने हैं जब ‘कांग्रेस मुक्त भारत‘ का वीणा मोदी ने जोरशोर से उठा रखी हैं। एक-एक कर कांग्रेस के हाथ से सत्ता छिनती चली जा रही हैं। स्थिति यह है कि वर्तमान में 27 में से 5 राज्य ही उसके पास हैं। माना 132 साल पुरानी कांगे्रस का इतिहास परिवारवाद से ही घिरा रहा। नेहरु से लेकर सोनिया तक अध्यक्ष पद को हथियाएं रही, लेकिन उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि पद से ज्यादा विचारधारा को मजबूत बनाएं रखना होता हैं। धर्म निरपेक्षता का दामन छोड़ भगवा चोल ओढ़ मंदिर मंदिर घूमने से कांग्रेस के साख पर बट्टा लगता नजर आ रहा हैं। ऐसा नहीं है कि नेहरु, इंदिरा, सोनिया हिन्दू विरोधी थी, उनमें भी धर्म के प्रति आस्था थी, लेकिन वोटबैंक को बचाएं रखने की खातिर सड़क पर उसका दिखावा नहीं करती थी। हो जो भी अगर ऐसा वे आगे भी करते रहे तो मुझे नहीं लगता कि वो कभी भी भाजपा के संगठनात्मक और मोदी की लोकप्रियता को चुनौती दे पायेंगे। क्योंकि कांग्रेस का चाहे वोट खिसका भी हो, लोगों के दिमाग में हमेशा कांग्रेस एक विकल्प के तौर पर रही है। कांग्रेस का पुराना वोट बैंक रहा है। अब राहुल चाहें तो उस वोट को अपनी ओर खींच रख सकते हैं - विचारों और उपलब्धियों दोनों के आधार पर.। मनमोहन सिंह ने सूचना के अधिकार में बदलाव पर काम किया हो, लेकिन उसे भुनाने की बजाए भ्रष्टाचार के कारण उनकी छवि प्रभावित रही। मोदी कहते है 2022 में जब हम 75 साल के होंगे तब उनके परिणाम दिखाई देंगे। इसका मतलब है कि वो 2019 में उपलब्धियों के न होने के खतरों को पहचानते हैं। उस कमजोरी का फायदा राहुल गांधी उठा सकते हैं। उनके पास संगठन को जोड़ने का मौका है - लेकिन ऐसा वह कर पायेंगे, इसकी संभावना दूर दूर तक नहीं दिखती। लेकिन कांग्रेस की उम्मीद है कि राहुल गांधी के आने से युवा पीढ़ी उनसे जुड़ेगी और वो खुद देखेंगे कि राहुल कैसे संगठन चला रहे हैं। फिरहाल, राहुल को पहला झटका गुजरात में लगा हैं। लोग कहेंगे कि राहुल गांधी के आते ही क्या हो गया, और फिर सारे तीर्थों की यात्री, ब्राह्मण जनेऊ पर जो बहस हुई है, उसकी बात होगी। शायद तीर्थयात्रा में भी यही कामना की गई थी कि अगर अपने बल पर नहीं तो भगवान के बल पर पार्टी आगे बढ़ जाए।  

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19 साल पहले अप्रैल 1998 में जब सोनिया गांधी ने जब कांग्रेस की कमान संभाली, तब भी पार्टी की सियासी हालत कमजोर थी। मई 1991 में राजीव गांधी की हत्या होने के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने सोनिया से पूछे बिना उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाए जाने की घोषणा कर दी, परंतु सोनिया ने इसे स्वीकार नहीं किया और कभी भी राजनीति में नहीं आने की कसम खाई थी। सोनिया ने राजीव गांधी फाउंडेशन की स्थापना के साथ खुद राजनीति से दूर रखने की कोशिश की। इसके बाद 1996 में नरिसम्हा राव की सरकार जाने के बाद पार्टी की चिंता और बढ़ गई। इस चुनाव में बीजेपी और जनता दल ने भारी बढ़ी हासिल की और बीजेपी ने गठबंधन सरकार बनाई। कांग्रेस की हालत दिन-ब-दिन बुरी होती देख सोनिया गांधी ने कांग्रेस नेताओं के दबाव में 1997 में कोलकाता के प्लेनरी सेशन में कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण की। जिसके बाद अप्रैल 1998 में वो कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। इस तरह नेहरू-गांधी परिवार की पांचवी पीढ़ी के रूप में सोनिया गांधी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली। अब जबकि राहुल गांधी को पार्टी की कमान सौंपी गई है, तब भी कांग्रेस की हालत खस्ता है। 2004 और 2009 में सरकार बनाने के बावजूद 2014 में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई। इसके बाद महाराष्ट्र, हरियाणा, यूपी, उत्तराखंड, गोवा, असम समेत कई सूबों में पार्टी ने अपने दम पर सरकार बनाई। जबकि दूसरी तरफ कांग्रेस एक के बाद चुनाव हारती गई। यहां तक कि निकाय चुनावों में भी कांग्रेस अपनी साख नहीं बचा पा रही है। गुजरात में राहुल कार्ड नहीं चला, हिमांचल हाथ से चला गया। अब सवाल ये है क्या राहुल गांधी अपनी मां सोनिया गांधी की तरह कांग्रेस को 2004 और 2009 जैसी जीत दिलाने में कामयाब हो पाएंगे?

राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद पर आसीन होने के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश में पार्टी को फिर से खड़ा करने की होगी। उत्तर प्रदेश में नेहरू-गांधी परिवार की सामाजिक और राजनीतिक धरोहर है, जो पांच पीढ़ियों तक फैली और गहरी है। उनकी भी सियासी जमीन यहीं पर हैं और भविष्य के सवाल भी यहीं से वाबस्ता हैं, लिहाजा मिशन उत्तर प्रदेश की उनके लिये बड़ी अहमियत होगी। राजनीतिक प्रेक्षकों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में राहुल के लिये चुनौती कांग्रेस को फिर से खड़ा करने की होगी। इसके साथ ही उन राज्यों में भी पार्टी को मजबूत करना होगा, जहां इस वक्त वह हाशिये पर है। कांग्रेस की अगली चुनौती विकास का नया विमर्श खड़ा करने की है। वह समाजवाद, मिश्रित अर्थव्यवस्था और वैश्वीकरण तीनों पद्धतियों की प्रणेता रही है। कांग्रेस को नीतिगत स्तर पर इस उलझन से निकलने का नया रास्ता बनाना है ताकि समता आधारित भ्रष्टाचार विहीन विकास हो सके। एक चुनौती मंडल और आम्बेडकरवादी ताकतों से संवाद करने की भी है। कांग्रेस को अगर अपने से दूर छिटकी दलित, पिछड़ी और आदिवासी जातियों को साथ लाना है तो उसके नेताओं से अंग्रेजी में नहीं जनता की जुबान में बात करनी होगी और उनकी राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। 

अमित शाह का जलवा 
अमित शाहन ने जब से बीजेपी की कमान संभाली है, तभी से उनके नेतृत्व में बीजेपी लगातार जीत हासिल करती आ रही है। 09 जुलाई, 2014 वे राजनाथ सिंह के बाद बीजेपी के अध्यक्ष बने थे। उनके नेतृत्व में 12 राज्यों में हुए चुनावों में पार्टी ने जीत हासिल की है। खुद अमित शाह निजी स्तर पर अजेय रहे हैं। 1989 से 2014 के बीच शाह गुजरात राज्य विधानसभा और विभिन्न स्थानीय निकायों के लिए 42 छोटे-बड़े चुनाव लड़े, लेकिन वे एक भी चुनाव में पराजित नहीं हुए। 

कांग्रेस की 29वीं हार 
पिछले कई सालों से कांग्रेस लगातार हार का सामना करती आ रही है। पिछले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ा था। कांग्रेस सिमट कर 44 सीटों पर आ गई। कांग्रेस को इतनी भी सीट नहीं मिलीं, जिससे वह विपक्ष की भूमिका निभा सके। हिमाचल और गुजरात में मिली हार कांग्रेस की लगातार 29वीं हार है। लगातार हार से कांग्रेस चार राज्यों में सिमट कर रह गई है। 

त्रिमूर्ति फैक्‍टर का असर नहीं 
कांग्रेस ने इस बार के गुजरात चुनाव में दलित नेता जिग्‍नेश मेवाणी, ओबीसी नेता अल्‍पेश ठाकोर और पाटीदार नेता हार्दिक पटेल पर दांव लगाया था। इन नेताओं ने भी प्रत्‍यक्ष या परोक्ष रूप से कांग्रेस को समर्थन दिया था। कांग्रेस ने इन नेताओं के दम पर चुनाव लड़ा। यानी क्षत्रिय-ओबीसी, दलित, आदिवासी और पाटीदार जातियों के आधार पर कांग्रेस ने समीकरण बनाया, लेकिन इसका फायदा इतना नहीं हुआ कि कांग्रेस की चुनावी वैतरणी को पार लगा सके। 

कांग्रेस का मुस्लिम से किनारा 
कांग्रेस ने अगर गुजरात में भाजपा के 22 साल पुराने किले में सेंध लगाने में कुछ हद तक सफल रहते हुए पिछली बार के मुकाबले जो सुधार किया है तो उसके पीछे कई कारण रहे हैं। कांग्रेस ने राहुल गांधी के नेतृत्व में जिस तरह से इस बार गुजरात में जनसंपर्क किया वो कहीं न कहीं कांग्रेस की छवि के विपरीत रहा। राहुल गांधी ज्यादा आक्रामक नजर आए। उनके भाषण में ज्यादा परिपक्वता दिखाई दी। अहम बात ये है कि कांग्रेस ने इस बार जो सबसे अलग हटकर काम किया वो था मुस्लिम से किनारा। कांग्रेस ने इस बार हिंदू कार्ड खेला। राहुल गांधी कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष छवि के उलट जनेऊ धारण करते, मंदिर के चक्कर लगाते और मुस्लिम वोटर्स से किनारा करते हुए नजर आए। हालांकि उनके गैर हिंदू रजिस्टर में नाम जुड़ने और जनेऊ धारण करने को लेकर काफी चर्चा रही जिसने उन्हें गुजरात में एक अलग छवि दी है। हालांकि इसे लेकर कांग्रेस से जुड़े मुस्लिम नेताओं का मानना था कि वह हमेशा से कांग्रेस के साथ रहे हैं और ये चुनाव धार्मिक आधार पर नहीं लड़े जा रहे हैं ऐसें में कांग्रेस का मुस्लिम की बात नहीं करना कोई बड़ी बात नहीं है। 

देश के 19 राज्यों में बीजेपी की सरकार
गुजरात-हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी जीत गयी। इसी के साथ बीजेपी लगातार देश की सबसे बड़ी पार्टी बनती जा रही है। बीजेपी ने गुजरात-हिमाचल प्रदेश की सत्ता में वापसी करके एक और बढ़त बनाई है। हिमाचल की सत्ता कांग्रेस को हाथों से छीनकर 19 राज्यों में अपनी सत्ता को बरकरार रखा है। जबकि सिर्फ 4 राज्यों में कांग्रेस की सरकार है। मतलब साफ है ‘कांग्रेस मुक्त भारत‘ के नारे के साथ आगे बढ़ रही है। 

फीका रहा बीजेपी का प्रदर्शन 
हालांकि गुजरात में 22 साल के शासन के बाद भाजपा का प्रदर्शन लगातार सिमटता नजर आ रहा है। वर्ष 2002 में 127 सीटों के आंकड़े के बाद 2007 में यह आंकड़ा 117 पर रुका और 2012 में भाजपा को 115 सीटों पर संतोष करना पड़ा। यह अलग बात है कि 

हार कर भी राहुल का कद बढ़ा 
कांग्रेस पार्टी ने जिस तरह से इस चुनाव में प्रचार किया है, उससे राहुल गांधी के लिए यह हार इतनी बुरी नहीं हैं। वो अपने आपको एक टक्कर देने वाले नेता और विपक्ष के चेहरे के तौर पर इस चुनाव में स्थापित कर चुके हैं। कांग्रेस पार्टी की वर्तमान स्थिति को देखें तो यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। क्योंकि गुजरात के जिन हिस्सों को भाजपा अपना अभेद्य दुर्ग मानती थी, वहां पर सेंध लगा पाने में कांग्रेस सफल रही है। इससे राज्य में कांग्रेस अपनी नई जमीन तैयार कर पाने की स्थिति में और भाजपा को आने वाले चुनावों में टक्कर देती नजर आ सकती है। 

कांग्रेस की 29वीं हार
चुनाव नतीजों से ठीक दो दिन पहले शनिवार को राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे। अध्यक्ष बनते ही राहुल को दो राज्यो में कांग्रेस की बड़ी हार का सामना करना पड़ा। हालांकि जब राहुल अध्यक्ष पद का ताज पहन रहे थे, कांग्रेस तो खासे उत्साह में थी ही, बीजेपी के कुछ नेताओं ने भी उनकी शान में कसीदे पढ़ते हुए राहुल को देश का प्रधानमंत्री होने तक के दावे कर डाले थे।  
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