विशेष आलेख : भटका हुआ है विकास का माॅडल

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आम आदमी के आर्थिक स्तर को ऊपर उठाने के हमारे आजाद भारत के संकल्प को मंजिल तक पहुंचाने में अब तक की सभी सरकारें नाकाम रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बहुत अपेक्षाएं हैं, लेकिन आर्थिक संतुलन स्थापित करने एवं अमीर एव गरीब की खाई को पाटने की दृष्टि से उनकी एवं उनकी सरकार की नीतियां भी सन्देहास्पद ही कही जायेगी। क्योंकि उन्होंने जो दिशा पकड़ी वह भी ऐसे विकास का प्रारूप है जिसमें अमीर अधिक अमीर ही होता जायेगा? भले गरीबी को कुछ स्तर पर संतुलित कर लिया जाये। मोदी सरकार भी अपनी जिम्मेदारी पर गरीब से गरीब व्यक्ति को आर्थिक स्तर पर ऊपर उठने की कोई पुख्ता योजना प्रस्तुत नहीं कर पाई है। किसी गरीब को गैस सिलैण्डर दे देने से या उनके घर तक सड़क या बिजली पहुंचा देने से एक सन्तुलित आदर्श समाज की रचना नहीं होगी। 

हमने सरकार के भरोसे शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य की बुनियादी व्यवस्था छोड़ी थी, लेकिन अब तक की सभी सरकारें इस मोर्चे पर असफल रही है, और इन दोनों बुनियादी क्षेत्रों का जमकर व्यावसायीकरण हुआ है। निजी क्षेत्र ने इन क्षेत्रों में अपना आतंक फैला रखा है। सरकार के भरोसे सौंपे गये इस दायित्व के पीछे भावना यही थी कि शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य के क्षेत्र में उसकी भागीदारी से आम जनता को उचित शिक्षा मिलेगी और स्वास्थ्य के लिये मूलभूत सुविधाओं से वह महरुम नहीं रहना पडे़गा। गरीब से गरीब आदमी का बच्चा भी अपने व्यक्तित्व का विकास करके अपने भाग्य का विधाता बन सकेगा। आजादी के साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र के माध्यम से देश के विकास की जो आर्थिक-सामाजिक संतुलन की आधारशिला रखी गई, वह सात दशक तक पहुंचते-पहुंचते ही चरमरा गयी। आज सरकारें व्यावसायिक कोरपोरेट घराने बनते जा रहे हैं। उनका मुख्य लक्ष्य जनता की सेवा न होकर लाभ-हानि हो गया है। देश में सेवा एवं बुनियादी जरूरतों की पूर्ति के लक्ष्य को हाशिये पर डाल दिया गया है और येन-केन-प्रकारेण धन कमाना ही सबसे बड़ा लक्ष्य बनता जा रहा है। आखिर ऐसा क्यों हुआ ? क्या इस प्रवृत्ति के बीज हमारी आजादी के लक्ष्य से जुड़े संकल्पों में रहे हैं या यह विश्व बाजार के दबाव का नतीजा है? इस तरह की मानसिकता राष्ट्र को कहां ले जाएगी? ये कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं, जिनपर मंथन जरूरी है। 

आजादी के शुरुआती तीन-चार दशक तक के शीर्ष नेतृत्व एवं नीति निर्माताओं में राष्ट्र के प्रति समर्पण था और भारत की संस्कृति एवं भारतीयता के प्रति वे निष्ठाशील थे। वे भारत को सशक्त बनाने के साथ-साथ संतुलित विकास की आधारशिला रखने  के लियेे तत्पर थे। उन्हें आम साधारण व्यक्ति के जीवन के कष्टकारी माहौल का अच्छी तरह पता था। वे शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य के क्षेत्रों को पवित्र कार्य यानी पुण्य बटोरने का साधन स्वीकारते थे और इसे ही आजाद भारत की सरकारों की प्राथमिकता भी मानते थे। ये दोनों ही क्षेत्र मानवीयता एवं परोपकार के भाव से ओत-प्रोत रहे परन्तु नब्बे के दशक तक पहुंचते-पहुंचते हमने जिस बाजारमूलक अर्थव्यवस्था को अपनाना शुरू किया। उसने विकास की परिभाषा को ही बदल कर रख दिया है। विदेशी निवेश के लुभावने एवं चकाचैंधभरे आह्वान में लगा कि रोजगार बढ़ेगा, गरीबी दूर होगी और सार्वजनिक क्षेत्र की जो कम्पनियां घाटे में चल रही हैं वे निजी भागीदारी से मुनाफा कमाने वाली मशीनों में तब्दील हो जायेंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। घाटे के नाम पर सरकारों ने उन सरकारी मशीनों को बन्द ही कर दिया, जो आम जनता की सेवा के लिये गठित की गयी थी। सरकारों ने विकास के नाम पर जनता पर अनचाहा भार ही नहीं लादा बल्कि अपनी लाभ एवं लोभ की मानसिकता को भी थोपा है। विकास के नाम पर पनप रहा नया नजरिया न केवल घातक है बल्कि मानव अस्तित्व पर खतरे का एक गंभीर संकेत भी है। क्योंकि साम्राज्यवाद की पीठ पर सवार पूंजीवाद ने जहां एक ओर अमीरी को बढ़ाया है तो वहीं दूसरी ओर गरीबी भी बढ़ती गई है। यह अमीरी और गरीबी का फासला कम होने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है जिसके परिणामों के रूप में हम आतंकवाद को, सांप्रदायिकता को, प्रांतीयता? नक्सलवाद को, माओवाद को देख सकते हैं, जिनकी निष्पत्तियां समाज में हिंसा, नफरत, द्वेष, लोभ, गलाकाट प्रतिस्पर्धा, रिश्ते में दरारें आदि के रूप में देख सकते हैं। सर्वाधिक प्रभाव पर्यावरणीय असंतुलन एवं प्रदूषण के रूप में उभरा है। चंद हाथों में सिमटी समृद्धि की वजह से बड़े और तथाकथित संपन्न लोग ही नहीं बल्कि देश का एक बड़ा तबका मानवीयता से शून्य अपसंस्कृति का शिकार हो गया है। 

राष्ट्र में दो रूप सामने आए-एक ओर अमीरों की ऊंची अट्टालिकाएं, दूसरी ओर फुटपाथों पर रेंगती गरीबी। एक ओर वैभव ने व्यक्ति को विलासिता दी और विलासिता ने व्यक्ति के भीतर क्रूरता जगाई, तो दूसरी ओर गरीबी तथा अभावों की त्रासदी ने उसके भीतर विद्रोह की आग जला दी। वह प्रतिशोध में तपने लगा, अनेक बुराइयां बिन बुलाए घर आ गईं। दलित हो या आदिवासी आज भी उनके साथ होने वाले हिंसक भेदभाव को हम देखते हैं तो यही लगता है कि आदमी-आदमी से असुरक्षित हो गया। चेहरे ही नहीं चरित्र तक अपनी पहचान खोने लगे हैं। नीति और निष्ठा के केंद्र बदलने लगे हैं। हमारा शीर्ष नेतृत्व एवं नीतियां सरकार को एक कम्पनी या कोरपोरेट हाउस की तरह चला रही है यही कारण है कि सरकारी कार्यालयों से लेकर विभिन्न सरकारी संस्थानों में ठेके पर काम कराने की बाढ़ आ चुकी है। इसमें कर्मचारियों की सेवा सुरक्षा और भविष्य की गारंटी को समाप्त कर दिया गया है। शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं  का बाजारीकरण हो गया है। बाजारमूलक अर्थव्यवस्था का यह सिद्धान्त कि प्रतियोगिता मूलक व्यवस्था में जो सबसे ज्यादा स्वस्थ या योग्य होगा वही टिक पायेगा, जंगल के कानून की तरह वह इस प्रकार फैला है कि पूरा मध्यम व लघु दर्जे का उद्योग लगभग चैपट होने के कगार पर पहुंच गया है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने अपने उत्पादों की पहुंच छोटे कस्बों से लेकर गांवों तक के बाजार में इस तरह बना ली है कि घरेलू उद्योग उनके सामने टिक ही नहीं पा रहा है। सरकारी विभागों में लाखों की संख्या में नौकरियांे के पद रिक्त है सरकार इन्हें भरने से इसलिए घबरा रही है कि उस पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा। सरकार अपनी घबराहट को छिपाने लिये कभी स्टार्टअप तो कभी मैंकिंग इंडिया का नारा उछालती है। लेकिन देश में बढ़ रही बेरोजगारी एवं छोटे व्यवसासियों की खस्ता हालात पर यदि ध्यान नहीं दिया गया तो आराजक स्थिति बन सकती है। 

रेेल्वे को हमने मुनाफा कमाने का जरिया बना दिया है। तत्काल और प्रिमियम के नाम पर खुला मुनाफा कमाया जा रहा है। आने वाले समय में सड़क, बिजली, पानी की भी यही दशा हो सकती है। वहां भी तत्काल एवं प्रिमियम सेवाएं शुरु हो सकती है। अच्छी सड़क का अमूक अमूक नाम से शुल्क होगा। बिजली-पानी भी इसी तरह की तत्काल एवं प्रिमियम शुल्क के साथ मिलने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं। अमीर लोगों के जीवन को और सुगम बनाने के तरीके। यह वह तथाकथित सरकारी व्यवस्था है जो सामूहिक विकास को नकार कर वर्ग-विशेष, व्यक्ति-विशेष या सम्प्रदायगत लाभों को विकास का पर्याय मानती है । ऐसे दौर में ंभारत को बहुराष्ट्रीय कम्पनियां एक बार फिर पराधीन बना दे तो कोई आश्चर्य नहीं। कोई भी भारत का युवक यानी स्टार्टअप इन विदेशी कम्पनियों के सामने कैसे टिकेगा? जिनके लिये भारत के व्यापार को हथियाने एवं भोली-भली जनता को प्रलोभन देने के लिये पांच-दस हजार करोड का नुकसान उठाना साधारण बात है। विदेशी कम्पनियों से पहले तो उसका सामना किसी रिलायंस, टाटा या अडानी से ही है जिन्होंने हर छोटे-मोटे व्यापार पर अपना कब्जा कर रखा है और वे गांवों-कस्बों तक पहुंच गये हैं। कैसे घर-घर में व्यापार या उद्योग स्थापित होंगे, कैसे बेरोजगारी दूर होगी और कैसे सरकारी निर्भरता को कम किया जायेगा- यह अहम मुद्दा कब राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बनेगा? हर नागरिक को अपने अस्तित्व एवं अस्मिता के लिये जागना होगा। भले हमारे पास कार, कोठी और कुर्सी न हो लेकिन चारित्रिक गुणों की काबिलियत अवश्य हो क्योंकि इसी काबिलियत के बल पर हम अपने आपको महाशक्तिशाली बना सकेगे अन्यथा हमारे देश के शासक जिस रास्ते पर हमें ले जा रहे हैं वह आगे चलकर अंधी खाई की ओर मुड़ने वाली हैं। 

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(ललित गर्ग)
60, मौसम विहार, तीसरा माला, 
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