दरभंगा : उर्दू ने भारतीय भाषाई शब्दकोश को अभूतपूर्व सुदृढ़ता दी : कुलपति

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दरभंगा 06 जनवरी, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 एस0 के सिंह ने उर्दू भाषा को पूर्णतः भारतीय भाषा बताया और कहा कि उर्दू ने भारतीय भाषाओं के शब्दकोश में अभूतपूर्व सुदृढ़ता प्रदान की है। प्रो0 सिंह ने आज यहां महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह स्मारक महाविद्यालय में ‘उर्दू भाषा एवं साहित्य’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि उर्दू भाषा के विकास में भारतीय संस्कृति की अहम भूमिका है। इस भाषा ने भारतीय भाषाओं के शब्दकोश में अभूतपूर्व सुदृढ़ता प्रदान की है और उर्दू भाषा की उन्नति में इस क्षेत्र के लोगों ने बिना भेदभाव किए अपनी भूमिका निभायी है। इसी का परिणाम है कि अब उर्दू केवल शेर एवं शायरी की भाषा नहीं बल्कि संवाद की भाषा बन गयी है। कुलपति ने कहा कि भारतीय भाषाओं के इतिहास में उर्दू भाषा की स्थिति सर्वमान्य है और इस भाषा ने भारतीय संस्कृति को पूरी दुनिया में फैलाया है। उर्दू भाषा पूर्णतः भारतीय भाषा है, इसका जन्म गंगा जमनि संस्कृति का द्योतक है। उन्होंने कहा कि किसी भी क्षेत्र के इतिहास लेखन में भाषा एवं साहित्य का इतिहास बुनियादी सामग्री मुहैया करते है। वहीं, उर्दू के साहित्यकार, आलोचक एवं बिहार राज्य उर्दू परामर्शदात्री समिति के उपाध्यक्ष डा0 मुश्ताक अहमद ने कहा कि भारतीय साहित्य के इतिहास में दिल्ली और लखनऊ के बाद अजिमाबाद स्कूल आफ थॉट का उल्लेख करना अनिवार्य हो जाता है। अजीमाबाद स्कूल आफ थॉट (दबिस्तान) का चर्चा दरभंगा के शैक्षिक और साहित्यिक कारनामों के बगैर पूरा नहीं हो सकता। क्योंकि सदी से दरभंगा के साहित्यकारों ने दबिस्तान ए अजीमाबाद को सुदृढ़ता प्रदान करने में अपना खून ए जिगर लगाया हैं। 18वीं शताब्दी में अयोध्या प्रसाद बिहारी जैसे नामचीन लेखक ने ‘रियाज-ए-तिरहुत“ और फिर “आईन ए तिरहुत“ जैसी क्षेत्रीय इतिहास उर्दू भाषा में लिखकर ये साबित कर दिया कि उर्दू का संबंध किसी जाति विशेष से नहीं है। कनाडा से आये अतिथि साहित्यकार एवं रंगमंच के जाने माने लेखक जावेद दानिश ने कहा कि मिथिलांचल का दिल कहलाने वाला दरभंगा प्राचीन समय से साहित्य के क्षितिज पर चमकता रहा है। आज भी यहां के साहित्यिकारों की उपस्थिति साहित्य जगत में गौरवमय है। 
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