पुस्तक लोकार्पण : अंगिका/खोरठा पंडित अनूप कुमार वाजपेयी सेँ साक्षात्कार संवाद’ पुस्तक का लोकापर्ण

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दुमका (अमरेन्द्र सुमन)  दिन मंगलवार (30 जनवरी 2018) को सूचना भवन, दुमका में डा. मीरा झा की पुस्तक ‘अंगिका/ खोरठा,  पं0 अनूप कुमार वाजपेयी सेँ साक्षात्कार संवाद’ पुस्तक का समारोह पूर्वक सामुहिक लोकापर्ण किया गया। परिचर्चा को संबोधित करते हुए डा. मीरा झा ने कहा कि उन्होंने अपने शोध में यह पाया है कि मौलिक रूप से अंगिका व खोरठा में कोई फर्क नहीं है। इसके लिए उन्होंने बजाप्ता अंग क्षेत्र का सर्वे किया, जिसका उल्लेख लोकार्पण समारोह के दौरान किया गया। श्री वाजपेयी ने कहा कि दुर्भाग्य से लोग अंगिका व खोरठा को अलग-अलग भाषा मानते हैं। इस पुस्तक में 42 प्रश्नोत्तरी के माध्यम से अंगिका व खोरठा के भ्रम को दूर किया गया है। दुमका के पुरातत्व वेत्ता पं. अनूप कुमार वाजपेयी से साक्षात्कार के आधार पर दो वर्ष की मेहनत के परिणामस्वरुप यह पुस्तक लोगों के सामने है। इससे पूर्व अंगिका को लेकर कई तरह के दावे तो किये गये हैं पर वाजपेयी ने पुरातात्विक, भौगोलीय, भाषायी एवं अन्य आधारों पर सोदाहरण बताया है कि दोनों भाषाएं एक ही है। पुरातत्व वेत्ता पं. अनूप कुमार वाजपेयी ने इस क्षेत्र में उनके द्वारा खोजे गये शिलापट्ट, जीवाश्म, सिक्के, पाषाण हथियार और विभिन्न मानक पुस्तकों के आधार पर दावा किया कि  विश्व की प्रचीनतम सभ्यता का अभ्युदय राजमहल पहाड़ियों में हुआ था जहां से लोग मैदानी क्षेत्र में जाकर बसे हैं। उन्होंने कहा कि जब सबसे प्राचीनतम सभ्यता यहां थी तो स्वभाविक है कि इसी क्षेत्र में पहली भाषा और लिपि का विकास हुआ है जिसके कई प्रमाण इस पुस्तक में दिये गये हैं। उन्होंने कहा कि अंगिका और खोरठा के भेद को दूर करते हुए अब इस भाषा को संविधान के आठवीं अनुसूचि में शामिल किया जाना चाहिये और झारखण्ड के विश्वविद्यालयों में इसकी पढ़ाई शुरू की जानी चाहिये। जिला आपूर्ति पदाधिकारी सह जिला पंचायती राज पदाधिकारी शिवनारायण यादव ने कहा कि अलग-अलग भाषाओं का भ्रम होने के कारण ही अंगिकाध्खोरठा को मान्यता नहीं मिल सकी। लेकिन अब इस विषय पर यह तथ्यपरक पुस्तक आ गयी है तो वह इस दिशा में पहल करेंगे। केकेएम कालेज पाकुड़ के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष डा. मनमोहन मिश्रा ने कहा कि विभिन्न प्रमाणों के आधार पर निःसंदेह अंगिकाध्खोरठा संस्कृत का आदि स्वरूप है। जो भाषा सुसंस्कृत होकर सामने आयी, वही है संस्कृत। उन्होंने यह भी कहा कि जब पाणिनी ने अपने सूत्र में अंगी लिपि का उल्लेख किया है तो ऐसे में अंगिकाध्खोरठा का सबसे प्राचीन भाषा नहीं होने का सवाल ही नहीं उठता है। सेवानिवृत्त एडीएम डा. सी एन मिश्रा ने कहा कि इस पुस्तक में और भी ऐसे संदर्भ हैं जिसपर शोध की संभावना बनती है। खोरठा और अंगिका में कोई भेद नहीं है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रयास फाउण्डेशन फाॅर टोटल डिवेलनमेंट के सचिव मधुर सिंह ने कहा इस प्रकार के शोधपरक पुस्तकों को हमारी संस्था सहयोग करेगी। सेवा निवृत्त सहकारिता पदाधिकारी अरूण सिन्हा अंग क्षेत्र की प्राचीनता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अंगिका और इसकी लिपि पर आगे शोध कार्य किया जाना चाहिये जिसमें यह पुस्तक मानक होगी। प्रो. शिव शंकर पंजियारा ने कहा कि भागलपुर से संबंध रहने के कारण उनकी इस पुस्तक के बारे जिज्ञासा थी। लोगों की जिज्ञासा शांत होगी और खोरठा एवं अंगिका का भ्रम दूर होगा। प्रो. अनुज आर्य ने कहा कि भाषा की उत्पत्ति और विकास को लेकर काफी लिखा। इस पुस्तक से शोध करनेवाले छात्रों को काफी मदद मिलेगी। पत्रकार राजीव रंजन ने कहा कि पं. वाजपेयी ने इस पुस्तक में तथ्यात्मक तरीके से चीजों को प्रमाणित किया है। पत्रकार अमरेन्द्र सुमन ने कहा कि पं. वाजपेयी के पास जो पुरातात्विक धरोहर है उसे सामने लाना चाहिये ताकि भाषा के साथ ही पुरातात्विक चीजों से भी लोग जुड़ सकें। डा. सपन पत्रलेख ने कहा कि आनेवाले समय में खोरठा/अंगिका विषय पर शोध करने वाले शोधार्थियों के लिए यह पुस्तक काफी लाभदायक साबित होगी। परिचर्चा को आचार्य रामजीवन झा, सामाजिक कार्यकर्ता शंकर सिंह पहाड़िया, अधिवक्ता जीवन राय, अशोक सिंह, राजकुमार उपाध्याय आदि ने भी संबोधित किया।
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