विशेष आलेख : ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के संकल्प को आगे बढ़ाता भारत

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुस्लिम राष्ट्र संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के दौरे के दौरान दुबई के ओपेरा हाउस से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अबू धाबी में बनने जा रहे पहले हिंदू मंदिर की आधारशिला रखी और कहा कि यह मंदिर आधुनिक तो होगा ही लेकिन विश्व को वसुधैव कुटुंबकम का अनुभव करने का माध्यम बनेगा। उसी दौरान भारत में अहिंसा विश्व भारती एवं इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्तिपीठ द्वारा आयोजित ‘वसुधैव कुटुंबकम-विश्व एक परिवार’ के अभिनव अभियान का उद्घाटन कांस्टीट्यूशनल क्लब में प्रख्यात जैन आचार्य डा. लोकेश मुनि के सान्निध्य में सम्पन्न हुआ। एक तरफ भारत की सर्वोच्च राजनीतिक ताकत एवं दूसरी और भारत की आध्यात्मिक ताकत- दोनों एक बार पुनः भारत को विश्वगुरु का दर्जा दिलाने के लिये तत्पर दिखाई दिये। 
प्रधानमंत्रीजी ने मंदिर निर्माण के बारे में कहा, हम उस परंपरा में पले बढ़े हैं जहां मंदिर मानवता का माध्यम है। अबू धाबी में सद्भावना सेतु के रूप में मंदिर का निर्माण हो रहा है। वहां यह प्रथम हिंदू मंदिर 55 हजार वर्गमीटर भूमि पर बनेगा। इस मंदिर का निर्माण भारतीय शिल्पकार कर रहे हैं। यह साल 2020 में पूरा होगा। यह मन्दिर विश्व एक परिवार का प्रतीक बनकर प्रस्तुत होगा। यह भी तब जब आतंकवाद और देशों का सिर्फ अपने हितों की चिंता करना, दुनिया के साझा भविष्य के लिए बड़ी चुनौती के रूप में उभर रहा है। ऐसे जटिल दौर में भारत की दो महान् शक्तियां प्राचीन भारतीय दर्शन को मानवता व प्रकृति के अनुकूल बताते हुए जिस अंदाज में इसकी व्याख्या कर रहे हैं उससे दुनिया का प्रभावित होना तय माना जा रहा है। मोदी ने दरारों भरी दुनिया में साझा भविष्य को सार्थक बनाने में भी भारतीय दर्शन को उपयोगी बताया। वही आचार्य लोकेश मुनि ने कहा कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता ने कितने ही परिवर्तनों को स्वीकार किया परन्तु विश्व एक परिवार के दर्शन को आंच नहीं आने दी। वे वसुधैव कुटुंबकम एवं सर्वे भवन्तु सुखिनः के भारत दर्शन को विश्व के कोने-कोने में ले जाना चाहते हैं। इस दर्शन एवं संस्कृति को विश्व कल्याण और विश्व शांति का आधार बनाना चाहते हैं। भारत में वे ‘वसुधैव कुटुंबकम’-विश्व एक परिवार अभियान को लेकर दिल्ली के बाद आगरा, अहमदाबाद एवं अन्य महानगरों में जायेंगे। उनके इस अभियान में पूर्वी लंदन के सांसद एवं आल पार्टी पार्लियामेंटरी ग्रुप के चेयरमैन श्री बॉब ब्लैकमेन, ब्रेंट लंदन के पार्षद भगवानजी चैहान, कवीन के प्रतिनिधि एवं लंदन के पुलिस कमांडर श्री साइमन ओवेन्स के अलावा इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्तिपीठ के संस्थापक श्री राजराजेश्वरजी उनके साथ हंै। भारत में अनादि काल से ही मानवता के साझा भविष्य की चिंता की गई है और मानव को एक दूसरे से जोड़ने के उपाय किये गए। भारतीय चिंतकों ने वसुधैव कुटुम्बकम का सूत्र दिया। वसुधैव कुटुम्बकम यानि पूरा विश्व एक परिवार है। परिवार में आपस के मतभेद संकट के समय मिट जाते हैं और साझा हित के लिए पूरा परिवार एकजुट हो जाता है। ठीक ऐसे ही जब खतरा समूची दुनिया के लिए हो तो अपने संकुचित दायरों से बाहर निकल कर एकजुट होना होगा। भारत सदैव जोड़ने में विश्वास करता रहा है। आज जबकि संरक्षणवाद की ताकतें सिर उठा रही हैं इससे वसुधैव कुटुंबकम का दर्शन सिकुड़ता दिख रहा है। इस धारणा को बदलने के लिये भारत की संत शक्ति एवं राजनीतिक शक्ति जुटी हैं, यह सम्पूर्ण मानवता के हित का चिन्तन है। प्राचीन काल से ही भारतीय दर्शन में दुनिया के भविष्य को लेकर उपाय होते रहे हैं। इसी हेतु यहां से सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया मंत्र गुंजायमान हुआ और इसे मानवता को लेकर भारतीयों के दृष्टिकोण का परिचायक बताया। आज विश्व एक परिवार की अवधारणा को साकार करने के लिये भारतीय दर्शन को समझने और उसके अनुसार भविष्य के लिए अपनी नीतियां तय करने की आवश्यकता है। 
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आज का मानव व्रत की संस्कृति को भूलकर बम की संस्कृति में जी रहा है। आदमी कहीं भी सुरक्षित नहीं है। समाज की धरती पर मनुष्य ने जब-जब विषमता के बीज बोये, तब-तब हिंसा, आतंक और घृणा के विषफलों ने मानवता की कमनीय काया को विद्रूप बनाया, विकृत किया और निष्प्राण किया है। मनुष्यता को इस महाविनाश से उभारने के लिए, उसे अहिंसा प्रेम और सहअस्तित्व का प्रशिक्षण देने के लिए भारतीय संत परम्परा में संतों, ऋषियों, मनीषियों ने उल्लेखनीय उपक्रम किये हैं। इसी संत परम्परा में आचार्य लोकेश मुनि का एक विशिष्ट स्थान है। भगवान महावीर के सिद्धांतों को जीवन दर्शन की भूमिका पर जीने वाले इस संत चेतना ने संपूर्ण मानवजाति के कल्याण और जीवन-निर्माण में स्वयं को समर्पित कर समय, शक्ति, श्रम और सोच को एक सार्थक पहचान दी है। वे आध्यात्मिक राजदूत हैं, राष्ट्रसंत हैं, प्रखर प्रवक्ता हैं, समाज सुधारक हैं, विचारक हैं, मनीषी हैं और धर्म के प्रवर्तक हैं। आपके निर्बंध कर्तृत्व ने राष्ट्रीय एकता, सद्भावना एवं परोपकार की दिशा में संपूर्ण राष्ट्र को सही दिशाबोध दिया है। निश्चित ही उनका वसुधैव कुटुंबकम अभियान दुनिया के लिये एक उजाला बनकर प्रस्तुत होगा। उन्होंने भारत की आध्यात्मिक परम्परा को समृद्ध किया है, वे ईश्वर के सच्चे दूत हंै, महावीर की अहिंसा को विश्व में स्थापित करने को तत्पर हैं, सेवा-परोपकार, जीवनमूल्यों से प्रतिबद्ध एक महान् विभूति हैं, ऊर्जा का एक पुंज हंै, प्रतिभा एवं पुरुषार्थ का पर्याय हंै। इन सब विशेषताओं और विलक्षणताओं के बावजूद उनमें तनिक भी अहंकार नहीं है। पश्चिमी विचारक जी. के चस्र्टटन लिखते हैं-‘देवदूत इसलिए आकाश में उड़ पाते हैं कि वे अपनी महानता को लादे नहीं फिरते।’ आज के तनाव भरे जीवन में मानव मात्र शान्ति की खोज में व्याकुल है। वह विचार जो हमारे अन्तर्मन को शुकून और आत्मीयता का अनुभव कराते हैं, हमारे लिये शान्ति के कारक बनते हैं। इसी बात को आचार्य लोकेश मुनिजी दुनिया में पहुंचा रहे है। वे बड़ी से बड़ी बात को भी इतनी सहजता से परिभाषित कर देते हैं कि सामान्य व्यक्ति को भी वह अपने काम की लगती हैं और छोटी से छोटी बात को इतनी आत्मीयता से वर्णित करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी बात लगती है और वह उनसे हृदय से जुड़ जाता है। जब व्यक्तियों के हृदय आपस में जुड़ जाते हैं तो प्रेम और सद्भाव के विचार तेजी से फैलते हैं। हिन्दु, मुस्लिम, सिंख, ईसाई, जैन आदि सभी धर्मों को मानने वाले लोग आपके कार्यक्रमों में सम्मिलित होकर आपके विचारों से शक्ति प्राप्त करते हैं। उन्होंने देश के अलावा विदेशों में भी भारतीय संस्कृति और महावीर के अहिंसा दर्शन को महिमामंडित किया हैं। उनकी कीर्ति देश और विदेश में फैल गयी। उन्होंने अमरीका, ब्रिटेन, हांगकांग, स्वीडन, डेनमार्क, नार्वे, हालैंड जैसे देशों में धर्म और अध्यात्म की अलख जगाई। वे इंसान से इंसान को जोड़ने का काम कर रहे हैं, वे आत्मबल को मजबूत बना रहे हैं। 
महात्मा गांधी ने भी इसी आत्मबल को मजबूत बनाने की आवश्यकता व्यक्त करते हुए कहा था कि मैं नहीं चाहता कि भारत दूसरे राष्ट्रों की चिता-भस्म पर खड़ा हो। मैं चाहता हूं कि भारत आत्मबल प्राप्त करे और दूसरे राष्ट्रों को बलवान बनावे। राष्ट्रपति विल्सन ने अपने चैदह सिद्धांतों की रचना की और उस पर कलश चढ़ाते हुए कहा, ‘यदि हम इसमें सफल न हों तो हथियार तो हैं हीं।’’ गांधी ने इसे उलट कर कहा कि ‘‘हमारे सब पार्थिव शस्त्र बेकार हुए हैं, किसी नये शस्त्र को खोजें। चलो, अब प्रेम का शस्त्र-सत्य का शस्त्र-लें। यह शस्त्र जब हमें मिल जायेगा, तब हमें दूसरे किसी शस्त्र की जरूरत न रहेगी।’’ प्रधानमंत्री मोदी  गांधी के सपनों को साकार करते हुए प्रेम के शस्त्र को उपयोग में ला रहे हैं, यह राष्ट्र के लिये गौरव की बात है। आज दुनिया में खुदगर्जी, ईष्र्या, अभिमान, शोषण और तज्जनित संघर्ष छाया हुआ है, तभी सब कुछ बिगड़ता हुआ लग रहा है। दुनिया में ये असामाजिक दोष जोरों से बढ़ रहे हैं, इसलिए किसी न किसी कारण को आगे करके लोग लड़ने लगते हैं, एक दूसरे से नाजायज लाभ उठाना चाहते हैं और जीवन को विषमय बना देते हैं। ऐसे लोग बातचीत में जीवन को भी जीवन-कलह कहते हैं। उसका प्रतिरोध करने के लिए इस आशय के ग्रंथ लिखने पड़े कि जीवन में अगर कलह है तो उससे बढ़कर परस्पर सहयोग भी है, जिसके बिना जीवन का विकास हो ही नहीं सकता।
दुनिया में सृष्टि के व्यापार में-संघर्ष और सहयोग दोनों तत्व पाये जाते हैं। लेकिन जहां मानवता आयी, वहां मनुष्य संघर्ष के तत्व को, जैसे भी हो सके, कम करने की कोशिश करता है और सहयोग तथा परस्पर उपकारिता को बढ़ाता जाता है। इसी में मानव की मानवता चरितार्थ होती है और दुनिया प्रगति करती है। तत्वज्ञ कहते हैं कि दुनिया में हिंसा और अहिंसा दोनों हैं। इनमें हिंसा का तत्व यथासंभव उत्तरोत्तर कम करते जाना और अहिंसा को बढ़ाते जाना, यही है उन्नत जीवन की साधना। ऐसे उन्नत जीवन को ही अध्यात्म जीवन कहते हैं, क्योंकि उसमें आत्मशक्ति का परिचय और आनंद बढ़ता जाता है। प्रेम, करुणा सेवा, स्वार्थ, आत्म-बलिदान आदि सद्गुणों का विकास आत्म-साधना के बिना नहीं हो सकता। जहां सर्वस्व की होड़ चलती है, वहां बड़े-बड़े राष्ट्र और बड़े-बड़े धनी लोग ‘टाॅस’ का न्याय अथवा निर्णय कैसे मान सकते हैं? झगड़ा किसी न किसी रूप में चलता ही है और बढ़ाता भी है। इसलिए जहां कहीं मतभेद आया, वहां समन्वय को काम में लाने की वृत्ति जगाने की आवश्यकता महसूस हुई और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ अभियान उसी आवश्यकता की पूर्ति का सशक्त माध्यम बन रहा है। मोदी भी ऐसे ही मिशन को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका मानना है कि अपने हृदय के आंगन में मेहमानों को आने दो। उनका आदर-सत्कार करो। कवि के यह उद्गार सदा याद रखो ‘‘प्रेम करना चाहो तो मुझसे करो, और धिक्कारना चाहो तो मुझे धिक्कारो, लेकिन मेरी एक ही विनय है-मेरी उपेक्षा न करो।’’ तुम्हारे जीवन में जैसे-जैसे दूसरों को स्थान मिलेगा, वैसे-वैसे तुम्हारा अपना महत्व बनेगा। सारी वसुधा को अपना कुटुम्ब बनाना है, उसके लिये व्यापक प्रेम की वृत्ति, अहिंसा की जीवनशैली एवं हृदय की विशालता आवश्यक हैं। अब कोई भी अकेला सुखी नहीं रह सकता, उसे विशाल परिवार की कल्पना और रचना करनी होगी, तभी अशांति दूर होगी, तभी युद्धों का अंत होगा और तभी आतंकवादमुक्त विश्व निर्मित हो सकेगा। 




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(ललित गर्ग)
60, मौसम विहार, तीसरा माला, 
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