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खेतिहर किसानों के मसीहा ब्रहमेश्वर मुखिया की गोली मारकर ह्त्या.

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शुक्रवार, 1 जून 2012

जो चाहें, माँगें परमसत्ता से.....


भिखारियों से क्या याचना !!!!


आज हर व्यक्ति कुछ न कुछ पाने के फेर में रोजाना लगा रहता है। दुनिया में चाहने वालों की कभी कोई कमी नहीं रही। कुछ ही लोग ऎसे होते हैं जो ईश्वर को चाहते हैं और उसी को प्राप्त करने की कोशिश में लगे रहते हैं। बहुसंख्य लोग समझदार होने के बाद से ही विभिन्न ऎषणाओं की पूत्रि्त में लगे रहते हैं और इसके लिए सारे जतन करने के साथ ही उन सभी लोेगों के करीब पहुंच कर याचनाओं की श्रृंखला जताते रहते हैं जिनसे उन्हें तनिक भी यह अहसास होता है कि वे उन लोगों में से हैं जो उनकी मांग पूरी करने में समर्थ या सहायक हो सकते हैं। लोक समुदाय में एक-दूसरे के काम आना और काम करना कहीं स्वार्थ और कहीं परोपकार के अर्थ में अनवरत चलता रहता है। यह परम्परा सदियों से हमारी सामाजिक व्यवस्था का अंग रही है।

आदर्शों और स्वाभिमान के साथ फक्कड़ी में जीवनयापन करने वाले लोगों के मुकाबले ऎसे लोगों की संख्या खूब ज्यादा है जो जीवन में हमेशा भिखारियों की तरह कुछ न कुछ माँगने-फिरने के आदी हो गए हैं। ये लोग दिन-रात उसी तलाश में रहते हैं कि कहीं कोई दाता मिल जाए जिससे उन्हें मुफ्त में वह सब कुछ मिल जाए जिसकी उन्हें अभिलाषा है। ऎसे लोग किसी एक-दो अथवा दस-बीस अभिलाषाओं से संतुष्ट नहीं होते बल्कि ज्यों-ज्यों इनकी अभिलाषाएँ बढ़ती जाती हैं, त्यों-त्यों बड़े लोगों की तलाशी और उनके चरणों में लोटने या चरण स्पर्श करने की आदतों में इजाफा होता जाता है।

क्षुद्र ऎषणाओं और जायज-नाजायज मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए चाहे जहाँ देखें, हम सब भिखारियों के रूप में नज़र आने लगे हैं। कोई किसी से मांग रहा है, कोई किसी के। एक-दूसरे से मांगते रहने का यह चक्र पूरे जीवन में चलता रहता है। यहाँ कोई संतुष्ट नज़र नहीं आता, हर कोई मांगता ही नज़र आता है। छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा कहने और बताने वाला भी मांग रहा है। मांगते रहने की गर्वीली परम्परा में लोग कहीं ईश्वर से मांग रहे हैं कहीं उन लोगों से मांग रहे हैं जिन्हें ये ईश्वर समझते हैं। मांगने वालों के लिए ईश्वरों की संख्या भी घटती-बढ़ती रहती है। जहां जिससे कुछ पाने की आशा हो, उसे ईश्वर मान लेते हैं और फिर वे सारे जतन करने लग जाते हैं जिनसे ये बड़े लोग खुश होते हैंंं। मांगने वालों को पता है कि ये देने वाले लोग किससे खुश होते हैं इसलिए उनकी मुराद पूरी करने के लिए वे सारे हथकण्डे इस्तेमाल करते हैं जो कर सकते हैं।

जो कुछ मनुष्य को प्राप्त होता है वह नियति द्वारा निर्धारित होता है लेकिन अज्ञानता या भविष्य को देख पाने की दृष्टि के अभाव में हमें हमेशा जिज्ञासा रहती है आगत को जानने की, और इसी भविष्य को अच्छा बनाने के लिए अपनी सारी हदों को पार कर उस हद तक भी गिर जाते हैं जहाँ होने वाले को पतित कहा गया है। मनुष्यत्व की सारी ऊँचाइयों को छोड़ कर लोग छोटी-मोटी इच्छाओें की पूर्ति के लिए सब कुछ कर देने को आमादा होते जा रहे हैं। ईश्वर की सत्ता से अनजान ऎसे लोग पूरी जिन्दगी इन मानवी ईश्वरों के इर्द-गिर्द परिक्रमा करते रहने में लगा देते हैं। इस पूरी यात्रा में वे यह तक भी भूल जाते हैं कि वे इंसान के रूप में ढाले गए हैं। हालत यह हो गई है कि मरते दम तक ये भिखारी की तरह कहीं न कहीं मांगने के फेर में लगे रहते हैं।

लगता यही है जैसे एक भिखारी दूसरे भिखारी से मांग रहा है। कहीं कोई भीख में जूठन खाने का आदी हो गया है तो कहीं कुछ और। इस मर्म को समझने की जरूरत है कि जो कुछ प्राप्त हो रहा है वह ईश्वरीय सत्ता से। इसलिए कहीं कुछ मांगना ही है तो ईश्वर से खुद उसी को मांगने का प्रयत्न करें। कहीं कुछ भी मांगने की जरूरत पड़े तो ईश्वर से कहें, भिखारियों से नहीं। ईश्वर जो देता है वह शुचितापूर्ण और दिव्य होता है जबकि भिखारियों के चरण पूजने और उनके कीर्तिगान के बाद जो प्राप्त होता है वह बासी व जूठन से कम नहीं होता। ये उच्छिष्ट भीख ज्यादा समय तक टिक भी नहीं पाती। मानव ईश्वर की सर्वोत्तम कृति है और ईश्वर को भी कभी यह स्वीकार्य नहीं होता कि उसका अंश भिखारियों से याचना करे।


---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

बृहस्पतिवार, 31 मई 2012

कर्त्तव्य कर्म हो सर्वोपरि यही संवारेगा व्यक्तित्व


हर आदमी के लिए विधाता ने मनुष्यता का आवरण देकर अपने कर्त्तव्य कर्म को पूर्ण करने के लिए धरा पर भेजा हुआ है। यह कर्म उसके स्वयं के लिए, घर-परिवार के लिए और समाज के लिए निहित हैं और इन्हीं की पूर्णता से उसके समग्र व्यक्तित्व का विकास होता है। इस कर्त्तव्य कर्म को पूरा करने के लिए लोग कहीं सीधे और कहीं उल्टे रास्तों का अवलम्बन करते हैं। कई लोेग जमाने की हवाओं और चकाचौंध से प्रभावित होकर अपने कर्त्तव्य को गौण बना देते हैं और दूसरी गलियों तथा चौराहों एवं सर्कलों पर पूँगी बजाते हुए लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते रहते हैं। कइयों के लिए कर्त्तव्य कर्म सबसे ऊँचा होता है जबकि कई ऐसे महान व्यक्तित्व के धनी लोग होते हैं जिनके लिए कर्त्तव्य गौण हो जाता है या यों कहें कि उनका कद बहुत बड़ा होता है और फ्रेम बहुत छोटी। कइयों के लिए कर्त्तव्य कोई मायने नहीं रखता और ये लोग दुनिया जहान के सारे काम करते हैं सिवाय अपनी ड्यूटी के।

इनका एकमेव मकसद दुनिया की छाती पर छा जाने का होता है और इसके लिए वे सभी सम सामयिक स्टंटों और उखाड़-पछाड़ में माहिर होते हैं। ऐसे लोगों के लिए यह बात कोई मायने नहीं रखती कि उनकी हरकतों या करतूतों से किसे कितना नुकसान हो रहा है या होने वाला है। ये सिर्फ और सिर्फ अपने फायदों की ही सोचते हैं और इसी के लिए डग आगे बढ़ाते हैं। ऐसे लोग अपने कर्त्तव्य कर्म का पूरा लाभ जरूर लेते हैं लेकिन उसे धत्ता दिखाते हुए वे सारे काम करते हैं जो उनके विहित कर्त्तव्य की परिधि में कभी नहीं रहे। ऐसे महान लोग अपनी शौहरत के फेर में हर कहीं मुँह दिखाते या निकालते हुए आसानी से देखे जा सकते हैं। जिन्दगी में एक बार किसी आदमी की गाड़ी कर्त्तव्य की मुख्यधारा से भटक जाती है फिर वह कभी लाईन पर नहीं आ पाती। वह इधर-उधर भटकता ही रहता है। हमारे आस-पास ऐसे लोगों की खूब भीड़ छायी हुई है जिनके लिए अपने कर्त्तव्य से कहीं ज्यादा दूसरे काम हावी हो गए हैं।

इस किस्म के भटके हुए लोग कहीं भी पाए जा सकते हैं। दुर्भाग्य यह है कि ये लोग खुद अपने कर्त्तव्य के प्रति वफादार नहीं हुआ करते लेकिन जहाँ मौका मिलता है वहाँ ड्यूटी और आदर्शों की दुहाई देने लगेंगे, जैसे कि दुनिया में आदर्श फैलाने का इन्होंने की ठेका ले रखा हो। कई लोग ऐसे हैं जिन्हें समाज की सेवा के लिए किसी न किसी एक हुनर में प्रशिक्षित और दीक्षित कर काम-धंधों और नौकरियों पर लगाया हुआ होता है लेकिन इनके मूल हुनर और कर्त्तव्य कहीं पीछे रह जाते हैं और ये निकल पड़ते हैं उन रास्तों पर जिन्हें दुनियाई सफर में शार्ट कट वाला माना जाता है। लोग इन कर्त्तव्यहीन लोगों के बारे में सब कुछ जानते-समझते हुए भी चुप रह जाते हैं क्योंकि इस किस्म के लोग उन सभी प्रकार के समझौतों और जी-हूजूरी में माहिर होते हैं जो एक संस्कारी व्यक्ति पूरी जिन्दगी कभी नहीं कर सकता, चाहे उसके लिए उसे कितना ही खामियाजा उठाना क्यों न पड़े।

जब किसी भी व्यक्ति का नाता मूल कर्त्तव्य से छूट जाता है फिर वह जो कुछ करे उसका अपना कर्त्तव्य हो उठता है। इसमें न कोई वर्जनाएँ हैं न कोई बंदिश। जब सब कुछ उतारकर उतर ही गए हैं नदी में तो आगे किससे लाज। सच तो यह है कि अब ऐसे-ऐसे चेहरे सामने आ रहे हैं जो मौलिक हुनर की बजाय जमाने के अनुरूप अपने नए-नए हुनर विकसित कर रहे हैं। हमेशा चाशनी में तर रहने के आदी ये लोग कभी सूखे नहीं रह सकते। इन्हें जिन्दा रहने के लिए हमेशा आर्द्रता चाहिए। फिर चाहे वह चाशनी की हो या कीचड़ की, इन्हें क्या फर्क पड़ता है। इनकी थूँथन इतनी तीव्र संवेदनशील होती है कि हमेशा इन्हें पूर्वाभास हो ही जाता है कि कहाँ कौनसी गंध पसरने वाली है। फिर ये लोग उसी दिशा में तेजी से लपक पड़ते हैं। ऐसे लोग अपने अनुकूल गंध पाकर कहीं भी लपक सकते हैं। इनके लिए कोई रास्ता वर्ज्य नहीं हुआ करता। जिस रास्ते ये चले जाते हैं वह रास्ता इनका हो जाता है। बीच में कहीं कोई बाधा दिखे तो कभी गुर्रा देते हैं तो कभी एकान्त में धीरे से दुम नीचे दबाकर विनम्रता की मूर्त्ति हो जाते हैं। भिड़ना हो तो कहेंगे साण्ड हैं, और झुक जाना हो तो गाय के जाये कहकर पतली गली निकाल लेते हैं।

कभी-कभी तो इन पथभ्रष्टों को देख कर लगता है कि शायद कहीं उनके बीज और संस्कारों में तो कोई दोष नहीं है। क्योंकि उनके पुरखों में ऐसा कोई लक्षण नहीं देखा गया जो इनमें कूट-कूट कर भरे हुए हैं। फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि ऐसे लोगों के कारण अपने इलाकों में कहीं न कहीं कुछ न कुछ हमेशा घटित होता रहता है। ऐसे लोग हर युग में रहेंगे और उनकी करतूतें भी। फिर ऐसे लोगों की वजह से वे लोग भी जिन्दा बने हुए हैं जिन्हें ऐसे ही लोेगों की जरूरत हुआ करती है जो दिन-रात उनकी परिक्रमा करते हुए जयगान करते रहें। यह जयगान ही उनके लिए विटामिन्स और न्यूट्रीन्स का काम करता है। जहाँ कहीं ऐसे लोग मिलें, उन्हें जीते जी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करने के सिवा हमारे पास और कोई चारा है ही नहींे। क्योंकि कहीं इनकी करतूतों की चर्चा भी होती है तो ये दूसरों की कब्र खोदने की परम्परा का निर्वाह करके ही दम लेते हैं। ऐसे लोगों की वजह से ही यह कहावत बनी है - गंगा गए गंगादास, जमना गए जमनादास।



---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

बुधवार, 30 मई 2012

कमजोर और कायर लोग लेते हैं.....

मक्कारी और झूठ का सहारा !!!



खुद की छवि को साफ-सुथरी बनाए रखने और लोगों को अपना बनाए रखने के भ्रम में आदमी क्या-क्या नहीं कर गुजर रहा, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। आज अपने फर्ज से कहीं ज्यादा चिन्ता आदमी को अपना घर भरने और स्वार्थों को पूरे करने तक ही सीमित हो गई है चाहे उसके लिए उसे कितने ही गलत धंधों और कामों का सहारा क्यों न लेना पड़े। ऐसा करने वाले  लोग सभी जगहों पर पाए जाते हैं। अपने यहाँ भी खूब भरमार है इनकी। यह शाश्वत सिद्धान्त है कि जो लोग कुछ कर गुजरने या लक्ष्य हासिल कर लेने का माद्दा नहीं जुटा पाते अथवा बौद्धिक धरातल पर कहीं न कहीं कमजोर होते हैं अथवा आत्महीनता या अपराध बोध से ग्रस्त होते हैं वे सफलता के शॉर्ट कट तलाशते-तलाशते उन सभी हथकण्डों का सहारा ले लिया करते हैं जिनसे कम समय में अधिक से अधिक प्राप्ति हो जाए।
इन लोगों की पूरी जिन्दगी प्राप्ति और संग्रह में भी गुजर जाती है।  इन लोगों की हर गतिविधि वहीं केन्द्रित होती है जहाँ कुछ न कुछ प्राप्ति की संभावना हो, और वह भी बिना मेहनत किए और खुद का खर्च बचाते हुए।

प्राप्ति और संग्रह की इस यात्रा में ये लोग ज्यों-ज्यों परिपक्व हो जाते हैं त्यों-त्यों बड़े हाथ मारने लगते हैं। एक समय ऐसा आता है जब हाथ मारते-मारते  ये इतने आदतन अभ्यस्त हो जाते हैं कि फिर ये निर्भय होकर चाहे जो कर गुजरते हैं। इसी किस्म के लोग आपस में मिलकर समूह की शक्ल ले लेते हैं और ये समूह अपनी हरकतोें के साथ समाज की छाती पर मूँग दलने लग जाता है। इसे समूह की बजाय गिरोह कहना ज्यादा सटीक होगा। आम तौर पर जो खुद कायर या कमजोर होते हैं वे ही सफलता और लोकप्रियता पाने के लिए हथकण्डों का सहारा लेते रहते हैं। इन लोगों के लिए सीधे रास्ते से सफलता पाना कभी संभव इसलिए नहीं हो पाता है क्योंकि वे जिसे प्राप्त करना चाहते हैं उसकी न इनमें कुव्वत होती है न अपेक्षित योग्यता।

ऐसे में इनके पास दूसरे लोगों की चुगली, शिकायत, निन्दा और आलोचना करते रहने के सिवा और कुछ ऐसा बचता ही नहीं है जिसका इस्तेमाल वे अपना व्यक्तित्व निर्माण करने के लिए कर सकें। ऐसे लोगों के लिए धर्म, सत्य और ईमान-सदाचार उनके शब्दकोष में होता ही नहीं, न उन्हें ऐसे संस्कार मिले हुए होते हैं, न उनमें इन संस्कारों को ग्रहण करने की पात्रता होती है। कई बार ये लोग ऐसे परिवारों से आते हैं जिनका इतिहास ही अपराधों से भरा होता है। इस स्थिति में अधर्म, कुसंस्कारों और झूठ-फरेब ही इनके संगी-साथी हुआ करते हैं जिनके सहारे ये कहीं धौंस जमाकर, कहीं बरगलाकर तो कहीं विनम्रता का अभिनय करके अपने उल्लू सीधे कर लेते हैं। इस किस्म के लोगों का पूरा जीवन झूठ के सहारे ही टिका होता है। अपने उल्टे-सीधे कामों के लिए ये लोग रोजाना सौ से अधिक झूठ बोल ही लेते हैं। कभी इनका झूठ पकड़ा जाता है तो बेशर्म बनकर हँसी में उड़ा देते हैं।

इन लोगों के लिए लाज-शरम कुछ नहीं होती। एक बार नंगे होकर निकल गए फिर काहे की लाज-शर्म, इन्हें तो अपने काम से मतलब है फिर चाहे इनसे कुछ भी करवा लो, बड़े प्रेम से करवा लेंगे, पर शर्त यही है कि इनका काम होना चाहिए। झूठ और मक्कारी इनके जिस्म और जेहन पर इस कदर हावी हो जाती है कि इनके चेहरे और शरीर से यह सब साफ झलकता रहता है। जैसे झूठ के पाँव नहीं होते, इसी तरह इन झूठे लोगों की बातों का कभी कोई वजूद नहीं होता।  इनके परिवार वालों की सहनशीलता की तारीफ करनी होगी कि वे लोग कैसे इन महान लोेगों को झेल रहे हैं। कई बार भोले-भाले लोग पहले पहल इनके झाँसे में आ जाते हैं लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि जमाना इन्हें विदूषक और तमाशे की तरह लेते हुए आनंद भी लेता है। कई बार ऐसे झूठे और मक्कार लोगों को उनके आस-पास महफिल जमा कर बैठने वाले लोग भी तमाशा मानकर मजे लिया करते हैं।

अपने यहाँ भी कई सारे ऐसे लोग हैं जिनका इस्तेमाल विदूषकों और तमाशों के लिए किया जाए तो बिना पैसे का स्वस्थ मनोरंजन संभव है। ऐसे लोगों को पहचानें और भरपूर मनोरंजन करें। यह बात हमेशा ध्यान में रखें कि ऐसे लोगों द्वारा कही गई कोई भी बात सत्य नहीं होती, न सत्य हो सकती है। क्योंकि इनके मुँह भगवान ने झूठ बोलने के लिए ही बनाए हैं और इनके कान षड़यंत्रों की आहट सुनने के लिए ही हैं। इसलिए इनके अभिनय का मजा लें, इनकी बातों पर कोई गौर कभी न करें। ईश्वर का धन्यवाद मानें कि ऐसे लोग हमारे आस-पास नहीं होते तो हमें असामान्य लोगों, पिशाचों और राक्षसों के दर्शनों के लिए व उनके बारे में जानने भर के लिए दूर देशों की यात्रा करनी पड़ती।  और तब हमारा कितना श्रम, समय और पैसा जाया होता।




---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

मंगलवार, 29 मई 2012

जहाँ काँटे वहाँ कलह-कुटिलता...

जहाँ हरियाली वहाँ प्रेम-सुगंध !!!


परिवेश का व्यक्ति और समुदाय पर खूब फर्क पड़ता है। परिवेश की हवाएँ और स्थितियाँ हर किसी को प्रभावित करती रहती हैं। आस-पास के हालातों से हर कोई किसी न किसी रूप में प्रभावित होता ही है चाहे वह मानव हो या पशु या फिर पेड़-पौधे। जिन क्षेत्रों में घर या प्रतिष्ठान के आस-पास अथवा गाँव-शहर में जहाँ-तहाँ काँटों के पेड़ पसरे हुए होते हैं उन क्षेत्रों में निश्चय ही कलह और कुटिलता का माहौल बना रहता है इसकी बजाय जिन इलाकों में हरे-भरे छायादार और फल-फूलदार पेड़ पौधे हुआ करते हैं वहाँ का परिवेश सुकूनदायी होने के साथ ही लोगों में भी भावनात्मक संवेदनशीलता और सहजता के साथ ही प्रेम से सिक्त भावनाओं की सुगंध के कतरे अपने आप फैले हुए अनुभव किए जा सकते हैं।

हम जहाँ रहते हैं उन्हीं क्षेत्रों को सामने रखकर यह अनुपात देखें और अपने इलाके के लोगों की मनःस्थिति और भावनाओं का अध्ययन करें तो अपने आप हमें यह पता चल जाएगा कि यह बात कितनी सही है। मन और परिवेश की हलचलों का सीधा तथा गहरा संबंध है। जिन  गाँवों में विलायती बबूल और दूसरे कंटीले झाड़ व झाड़ियां खूब ज्यादा मात्रा में होते हैं उन इलाकों में शांति की बजाय अशांति ज्यादा होती है और आए दिन झगड़े-फसाद तथा ईर्ष्या और द्वेष जैसी करतूतें होना आम बात है। इन काँटों वाले पेड़ों की वजह से कई समस्याएं अपने आप पैदा हो जाती हैं। ये काँटें क्षेत्र के वास्तु को प्रभावित करने के साथ ही सकारात्मक ऊर्जा को नकारात्मक ऊर्जा में बदल देते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि हर कहीं बेवजह कलह और कुटिलता का माहौल बना रहता है जिससे कुटुम्ब और समुदाय में तनाव बना रहता हैै।

गीलें काँटों की वजह से नई दुश्मनी पैदा होती रहती है वहीं पुराने और सूखे हुए काँटे पुरानी दुश्मनी की जड़ों को और अधिक गहरी करते रहते हैं। अपने क्षेत्र में घर के आस-पास अथवा गाँव-कस्बे और शहर की कॉलोनियों व मोहल्लों में जिस अनुपात में काँटेदार पेड़ होंगे, उसी अनुपात में कलह का साम्राज्य पसरा हुआ होता है। वानस्पतिक संतुलन बिगड़ जाने की वजह से कलह और कटुता का माहौल हर कहीं पनपने लगा है। परम्परागत प्रजातियों के छायादार, फलदार और फूलदार पेड़ों के मुकाबले जहाँ कहीं काँटेदार पेड़ ज्यादा होंगे, वहाँ कभी भी न तो शांति हो सकती है, न किसी को सुकून की प्राप्ति। इसकी बजाय काँटेदार पेड़-पौधे और कंटीली झाड़ियाँ और घास जहाँ नहीें होगी और दूसरे अच्छी प्रजातियों के पौधे ज्यादा हांेगे वहाँ शांति, आनंद और सुकून स्वतः पसरा हुआ होता है। ऐसे स्थानों पर भावात्मक आत्मीयता ज्यादा होती है तथा कलह की संभावनाएँ बिल्कुल नहीं हुआ करती।

यों भी लोगों के मन में जो होता है वह बाहर अभिव्यक्त हुए बगैर नहीं रह सकता। जिन लोगों के मन में कलह और ईर्ष्या रहती है उन्हें भी वे ही पौधे पसंद होते हैं जो काँटेदार हुआ करते हैं जबकि शांति और आनंद की प्राप्ति के इच्छुक लोग विभिन्न पुष्पों वाले और छायादार पेड़-पौधे पसंद करते हैं। जिन लोगों की वाटिकाओं और बगियाओं में जात-जात के कैक्टस और काँटेदार पेड़-पौधों का बाहुल्य होता है उनकी मानसिकता का अध्ययन किया जाए तो साफ पता चलता है कि या तो उनके मन में ईर्ष्या-द्वेष है अथवा ऐसे किसी माहौल के मारे हुए हैं और मन में खूब प्रतिशोध भरा हुआ है। कुछ लोग इस मामले में अपवाद जरूर हो सकते हैं। यों भी काँटेदार पेड़ों को अपने यहाँ पनपाने को बड़ा वास्तु दोष माना जाता है।

जिन-जिन इलाकों में काँटेदार पेड़ विद्यमान हैं उन्हें साफ किया जाकर इस दोष से मुक्ति पायी जा सकती है। लेकिन इसके लिए काँटेदार पेड़ों को समूल इस प्रकार नष्ट किया जाना जरूरी है कि ये फिर दोबारा पनप न सकें। इसके साथ ही जिस संख्या में काँटेदार पेड़ हों, उन्हें हटाकर उससे अधिक संख्या में फल-फूल और छायादार पेड़ों को लगा देने से पुराने सारे दोष समाप्त हो जाते हैं और वातावरण में शांति व आनंद का संचार हो जाता है। बात सिर्फ अपने घरों और प्रतिष्ठानों तक ही सीमित नहीं है बल्कि अपने कार्यालय, स्कूल तथा विभिन्न सार्वजनिक स्थलों में अथवा आस-पास भी काँटेदार पेड़ों का होना इन क्षेत्रों में रहने वालों तथा इलाके के लोगों के लिए घातक होता है। जहाँ काँटेदार पेड़ होंगे वहाँ का माहौल हमेशा दूषित रहेगा ही। इसलिए काँटों से बचें और काँटेदार पेड़-पौधों और झाड़ियों से भी।


---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

सोमवार, 28 मई 2012

पूँछ ही न हिलाते रहें....

खुद भी कुछ बनकर दिखाएँ !!!


दुनिया में दो ही वर्ग अब दिखाई देने लगे हैं। एक भीड़ है और दूसरी तरह के लोग वे हैं जो भीड़ जमा करने में माहिर हैं। भीड़ ऐसा एक सहज अभिनय है जो अपने आप जुट जाता है और सब कुछ अपने आप होने लगता है। भीड़ कहीं तो अपने आप जुट जाती है और कहीं जुटाने के लिए जतन करने पड़ते हैं। दुनिया का हर शख्स उन लोगों में शामिल हुआ करता है जो कभी न कभी भीड़ का हिस्सा रहा है। भीड़ के अनुपात में भीड़ जमा करने वालों की भीड़ भी बढ़ती रहती है। आजकल हर कहीं सबसे ज्यादा कुछ देखने में आ रहा है तो वह है भीड़। अब दो ही रास्ते बचे हैं या तो भीड़ में शामिल होकर रहो या भीड़ पैदा करने का माद्दा पैदा करो।

हम अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी में देखते हैं कि भीड़ का कोई चरित्र नहीं होता, वो हर जगह जमा हो ही जाती है। इसी प्रकार भीड़ का नेतृत्व करते-करते उन लोगों का भी कोई चरित्र नहीं होता जो भीड़ जमा करने में सिद्ध हो गए हैं। लेकिन इतना जरूर है कि भीड़ और भीड़ जमा करने वाले लोगों के बीच परस्पर जीवन संबंध है। दोनों ऐसे हैं कि एक-दूसरे के बगैर नहीं रह सकते। इस भीड़ में शामिल होने वाले लोगों में बहुत बड़ी संख्या तो ऐसे लोगों की होती है जिन्हें पता ही नहीं चलता कि कहाँ जा रहे हैं और क्यों जा रहे हैं। भेड़ों की रेवड़ की तरह हर किसी जगह जमा हो जाने की आदत हमारी परम्परा में सदियों से रही है। हममें से हर कोई तमाशबीन के रूप में मजे लूटने का अभ्यस्त होता है। फर्क सिर्फ इतना भर है कि कोई छोटा है कोई बड़ा, कोई सरेआम देखता है तो कोई छिपकर।

इस भीड़ में खूब सारे चेहरे ऐसे भी होते हैं जिन्हें सिर्फ कहने भर को आदमी कहा जाता है। इनमें आपको सभी प्रकार के लोग मिल जाएंगे। ज्यादातर संख्या में ऐसे लोग मिल ही जाते हैं जिनके लिए भीड़ का हिस्सा होना पेट के सवाल से जु़ड़ा होता है। फिर जिन लोगों में खाने-कमाने और जीवन निर्वाह का कोई जरिया ही न हो, न हुनर हो न कोई इन्हें पसंद करे। ऐसे में इनके पास सिवाय भीड़ का हिस्सा होने के और कोई चारा ही नहीं बचा रहता। नाकारा लोग इसी प्रकार भीड़ का हिस्सा बनने लगते हैं। यह भीड़ ही है जो उन्हें चारा देती है और उनकी जेबें भरने का जतन करती है। भीड़ की इस अजीब किस्म में एक प्रजाति ऐसी होती है जिनका न कोई स्वाभिमान होता है, न संस्कार और न निज वंश का गौरव।  ऐसे संस्कारहीन लोगों का जमावड़ा हर भीड़ में नज़र आने लगा है।

फिर भीड़ में रहते-रहते ये पूँछ हिलाने में इतने आदतन हो जाते हैं कि पूरी जिन्दगी दुम ही हिलाते रहते हैं। इनकी दुमों की हवाओं से ही भीड़ जमा करने वालों को ठण्ढक मिलती है। अनुचरों या कि अंधानुचरों की संख्या जितनी ज्यादा, उतना ही इन लोगों का मिलता है सुकून। कई बड़े-बड़े लोग हैं जो कहने को बड़े हैं मगर अपना सारा स्वाभिमान भुलाकर पूँछ हिलाते रहते हैं। अपने आस-पास भी ऐसे पूँछ हिलाने वाले लोगों की खूब भरमार है जो थोड़ी सी ब्रेड़, रोटी या हड्डी का टुकड़ा मिल जाते ही इतनी मस्ती से दुम हिलाते हैं जैसे कोई दुम न होकर चाभी का छल्ला हो। पूँछ हिलाने वालों की माया ऐसी कि पूँछ के बूते ही सब कुछ कर गुजरते हैं। कभी ये पूँछ हवा का झोंका देकर थपकी देती लगती है, कभी कोड़े की तरह मार करती है।

मजे की बात तो यह है कि कई लोग अपने स्वार्थों को पूरा करने और पराये माल पर हाथ साफ करने का शौक पाल लेते हुए खुद कुछ भी न करते हुए औरों के टुकड़ों पर इस कदर पलना शुरू कर देते हैं कि उनके भीतर चले आ रहे नेतृत्व और स्वाभिमान के संस्कार तक स्वाहा हो जाते हैं और फिर इनकी पूरी जिन्दगी पूँछ हिलाने के सिवा दूसरा कोई काम नहीं कर पाती। करे भी तो कैसे, पूँछ हिलाते-हिलाते वे ऐसे-ऐसे काम कर चुके होते हैं कि इनकी बुद्धि और मन दोनों भीड़ जमा करने वालों के यहाँ गिरवी रखा होता है जहाँ से तभी मुक्त हो पाते हैं जब दोनों पक्षों में से एकाध की मुक्ति हो जाए। अपने आस-पास रोजाना घूमते रहने वाले ऐसे पूँछ हिलाने वालों को देखें और विश्लेषण करें तो पाएंगे कि अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए ये लोग इतने नीचे गिर गए हैं कि इनका तनिक भी ऊपर उठना असंभव है। ईश्वर को धन्यवाद दें कि उसने इन्हें धरा पर भेजने के बाद पेट की आग बुझाने का बंदोबस्त करने पूँछ हिलाने की कला से नवाज़ दिया है। भीड़ जमा करने और कराने वालों का वजूद नहीं होता तो ये बेचारे पूँछ हिलाने वाले कैसे गुजारा कर पाते।

आज चारों तरफ पूँछ हिलाने वालों की बहार छायी हुई है। जो पूँछ हिलाने के आदी हैं उन्हें यह सोचना चाहिए कि ईश्वर ने उन्हें मनुष्य के रूप में पृथ्वी पर भेजा है और इसके बावजूद वे ऐसे काम कर रहे हैं जो पशुओं के लिए निर्धारित हैं, इससे बड़ा उनका दुर्भाग्य क्या होगा। यही करना था तो पूर्वजन्मों की पशु योनियाँ क्या कम थीं। अनुचरों की तरह बर्ताव करने वाले लोगों को चाहिए कि वे एक बार इस बात का चिंतन करें कि जो वे कर रहे हैं वह काम करना उन्हें शोभा भी देता है क्या।  एक बार पूरी शिद्दत से सोचने पर हमे इसका उत्तर जरूर मिल जाएगा। खुद कुछ करने का माद्दा पैदा करें, दूसरों के सहारे परजीवी बने रहना कहाँ तक ठीक है? कुछ नहीं तो अपने पूर्वजों को याद करें, उनकी बातों का स्मरण करें और उनके कामों का अनुकरण करें। यह सोचें कि हमारी पूँछहिलाऊ मनोवृत्ति अपनी परंपरा और वंश गौरव का अपमान नहीं तो और क्या है?


---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

रविवार, 27 मई 2012

आपके लिए माओवादी है मेरी सिर्फ माँ है.


सिनी सय 

सात मई को मेरे एक पत्रकार मित्र ने सूचना दी कि जाजपुर पुलिस ने एक बुजुर्ग महिला माओवादी को अस्पताल से गिरफ्तार किया है. नाम है उसका सिनी सय. नाम सुनकर मैं चौंकी. मैंने झटपट अपना कैमरा निकाला ओर जाजपुर की ओर निकल पड़ी. पिछले कई सालों से सिनी सय को मैं ढूढ रही थी पर उसका कोई अता-पता नहीं था. रास्ते भर मैं सिनी सय के बारे में सोचती रही. पचपन साल की सिनी सय 1997 में जाजपुर जिले के गोबरघाटी गांव की सरपंच के तौर पर जानी जाती थी. इस तेज-तर्रार आदिवासी महिला सरपंच को लोग उसके व्यवहार कुशलता के कारण जानते थे. लेकिन यह सिनी सय का अधूरा परिचय है.

2006 में कलिंगनगर में टाटा कंपनी के खिलाफ जब आदिवासियों का आंदोलन शुरु हुआ तो इस विस्थापन विरोधी आंदोलन में सिनी सय ने अपनी सक्रिय भूमिका निभाई थी लेकिन इस सक्रियता की कीमत सिनी सय ने जिस रुप में चुकाई वह दहला देने वाला है. टाटा कंपनी की सुरक्षा और आदिवासियों को बेदखल करने की कोशिश ने पुलिस ने जिन चौदह आदिवासियों को गोलियों से भून दिया, उनमें सिनी सय का 25 साल का जवान बेटा भगवान सय भी शामिल था. जिस जवान बेटे को लेकर सिनी सय इस आंदोलन में गई थी, वहां से उनके बेटे की हाथ कटी हुई लाश घर लौटी.  सिनी सय के बारे में सोचते-सोचते मैं करीब साढे पांच बजे जाजपुर अस्पताल पहुंची. जाहिर है, वहां पुलिस का कड़ा पहरा था. आने-जाने वालों पर प्रतिबंध था. खासकर मीडिया पर. किसी तरह पुलिस वालों को मैंने राजी किया और दो मिनट के निर्देश के साथ मैं सिनी सय के कमरे में जा पहुंची.

अस्पताल के बिस्तर पर एक साधारण-सी सूती साड़ी में सिनी सय लेटी हुई थी. मुझे पहचान नहीं पाई. मैंने याद दिलाया तो सबसे पहले मेरा हाल-चाल पूछा. फिर बहुत सुस्त और धीमी आवाज में उसने कहा-‘‘मेरी तबियत आजकल ठीक नहीं रहती, मलेरिया हुआ है, जिसके ईलाज के लिए मैं यहां भर्ती हुई थी और तभी से पुलिस मेरे पीछे पड़ी हुई है.’’ सिनी सय बहुत कमजोर दिख रही थी लेकिन उसकी बातचीत से ऐसा लग रहा था, जैसे मैं उसी पुरानी सिनी सय से मिल रही हूं. उसका बोलना जारी था-’’मुझे जेल जाने का कोई दुख नहीं है. और ना ही मैं इस बात की परवाह करती हूं कि मेरे बारे में कोई क्या सोचता है. मैंने अपने लिए जो रास्ता चुना है, उसमें मुझे इस बात की संतुष्टि है कि अपने मरे हुए बेटे को मैं इंसाफ दिलाने की कोशिश कर रही हूं.’’ मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि उससे इस हालत में क्या सवाल करुं. मेरी चुप्पी को देखकर उसने फिर से कहना शुरु किया- “आप जानती है कि जमीन की लड़ाई, अपने हक की लड़ाई लड़ते हुए मेरे बेटे ने अपने सीने पर पुलिस की गोली खाई. मेरे सामने उसे न सिर्फ बेरहमी से मारा गया बल्कि बाद में उसकी लाश के भी टुकड़े कर दिए गए. एक मां यह कैसे बर्दाश्त करती कि जिस बेटे को मैंने नौ महीने अपनी कोख में रखकर जन्म दिया, उसी बेटे को पुलिस वाले बेरहमी से एक लाश में बदल दें.’’

कमरे की बाहर की ओर बैठी पुलिस की तरफ इशारा करते हुए उसने फिर कहा-’’इन्होंने बड़ी कंपनियों की खातिर हमें अपने घर, अपनी जमीन, यहां तक की हमारी रोजी-रोटी से भी बेदखल कर दिया. इनकी सहायता, इनका पैसा क्या मुझे मेरा बेटा वापस लौटा सकता है? शायद नहीं, हमारे सारे दर्द, सारी तकलीफें और घुटन भरी जिंदगी की जिम्मेवार सरकार है. और मैं उसे कभी माफ नहीं कर सकती. अपने लोगों के हक के लिए लड़ना मैं नहीं छोड़ूंगी.’’ यह सब कुछ कहते हुए उसकी आंखों में मुझे एक अजीब सा आत्मविश्वास दिखाई दिया. मैं उससे कुछ और बात कर पाती कि एक पुलिस वाले ने मुझे बाहर जाने को कहा. बाहर आकर मैं फिर से एक बार उससे मिलने की उम्मीद में बैठी रही. पत्रकार हूं, मन में तरह-तरह के सवाल थे. पर पुलिस ने हमें मिलने की इजाजत नहीं दी. मैं अपने घर भुवनेश्वर के लिए निकल पड़ी.

सिनी सय से मेरी पहली मुलाकात दो जनवरी 2006 को हुई थी. दिन के दो बजे थे और हमें खबर मिली कि कलिंगनगर इलाके में पुलिस और आदिवासियों के बीच मुठभेड़ हो रही है. पुलिस की गोली से कुछ आदिवासियों के मरने की भी खबरें आ रही थी. मेरे साथ-साथ कुछ और पत्रकार साथी अपनी कैमरा टीम के साथ कलिंगनगर की ओर निकल पड़े. लगभग ढाई से तीन घंटे के बाद जब हम घटनास्थल पर पहुंचे तो हमने देखा कि सड़क के एक तरफ अपनी बंदूकें लिए पुलिस खड़ी थी और दूसरी तरफ अपना परंपरागत हथियार लिए आदिवासी. पुलिस वालों ने हमें सड़क पार करके दूसरी तरफ जाने से मना किया. लेकिन हम गांव की ओर बढ़ गए. अंधेरा घिर चुका था और चारों तरफ अलग-अलग गुटों में सैकड़ों की संख्या में आदिवासी जगह-जगह खड़े थे. कुछ आदिवासियों ने हमें घेर लिया और वे हमें वहां से चले जाने को कहने लगे. वो इतने गुस्से में थे कि कुछ कहना-सुनना नहीं चाह रहे थे. आदिवासियों का एक दल गांव में पुलिस को घुसने से रोक रहा था तो कुछ और लोग इधर-उधर मरे पडे़ आदिवसियों की लाशों को इकट्ठा कर रहे थे. कलिंगनगर में टाटा कंपनी अपनी परियोजना के लिए आदिवासियों की जमीन पर कब्जा चाहती थी, जिसका आदिवासी विरोध कर रहे थे. हजारों आदिवासी अपने विस्थापित होने के खिलाफ थे जिसे लेकर यह संघर्ष हुआ था. टाटा कंपनी के साथ एमओयू कर चुकी सरकार का कहना था कि कंपनी के आने से विकास होगा. लेकिन आदिवासी अपने जल, जंगल, जमीन को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे.

अंधेरे में एक लाश की तस्वीर लेने के लिए मेरे कैमरामेन ने जैसे ही कैमरा घुमाया तभी कुछ आदिवासी भड़क उठे और हमें मारने के लिए घेर लिया. हमारा कैमरा उनकी हाथ में था. इससे पहले कि वो सरकार और पुलिस का गुस्सा हम पर उतारते, हाथों में तीर-धनुष लिए हुए एक प्रौढ़ महिला सामने आई और उसने आदिवासियों को रोका. मैंने देखा, वह महिला बड़े आत्मविश्वास के साथ उनका नेतृत्व कर रही थी. उसने आदिवासियों को हमें किसी भी तरह का नुकसान न पहुंचाने की हिदायत दी. पूछने पर पता चला कि उस आदिवासी महिला का नाम सिनी सय है. रात के आठ बज चुके थे. हमें कुछ विजुअल और इंटरव्यू लेकर वापस होना था. जिससे जल्दी से जल्दी खबरें भेजी जा सके. जैसे-तैसे हमने कुछ शूट किया और वापस आ गए. देर रात भुवनेश्वर पहुंचने तक पुलिस की गोली से चौदह आदिवासियों और एक पुलिस वाले की मारे जाने की पुष्टि हो चुकी थी. अपनी खबर फाईल करने के बाद मैं अगले दिन की तैयारी करने लगी. वैसे भी आंखों में नींद कहा थी!

अगले दिन यानी तीन जनवरी 2006 को मैं अपनी टीम के साथ फिर से कलिंगनगर की ओर निकल पड़ी. उस सुबह तक देशी-विदेशी मीडिया के लिए कलिंगनगर हेडलाईन में तब्दील हो चुका था. जब हम कलिंगनगर पहुंचे तो गोबरघाटी गांव से एक किलोमीटर दूर मुख्य सड़क पर आदिवासियों ने लाशों को रखकर रास्ता जाम कर रखा था. हमने अपनी गाड़ी कलिंगनगर थाने के पास छोड़ी और उस ओर निकल पड़े, जहां चौदह लाशों को घेरकर आदिवासी खड़े थे और सरकार और पुलिस के खिलाफ नारा लगा रहे थे. हमें देखकर आदिवासी फिर से तैश में आ गए थे. हमने बड़ी मुश्किल से उन्हें समझाया कि हम पत्रकार हैं और हमारा काम खबरों को देश-दुनिया तक पहुंचाना है. आदिवासियों के गोल घेरे में जाने पर मैंने देखा कि सिनी सय अपने बेटे की लाश पर गिरकर बिलख-बिलखकर रो रही थी. मुझे देखकर उसने हाथ जोड़ा और रोते हुए कहा-’’मैडम पुलिसवालों ने मेरे जवान बेटे को मार डाला.’’ 

सिनी सय का 25 साल का बेटा भगवान सय, जो इस विधवा मां और छोटे-छोटे पांच भाई-बहनों का इकलौता सहारा था, इस आंदोलन की बलि चढ़ चुका था. उसने फिर रोते हुए कहना शुरु किया-’’मेरे बेटे को गोली लगी थी. पुलिस मेरे जख्मी बेटे को बेरहमी से मार रही थी और मैं कुछ नहीं कर पाई. सरकार ने ये अच्छा नहीं किया हमारे साथ. मेरा बेटा हमारा सहारा था. अब मैं और मेरे बच्चे क्या करेंगे?’’ उसकी आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. माहौल भावुक हो रहा था. सब तरफ लाशें पड़ी थी, लोग रो रहे थे. किसी ने अपना बेटा तो किसी ने अपना पति खोया था. हमने कुछ लोगों से बातचीत की और फिर भुवनेश्वर लौट आए. चौदह आदिवासियों के मारे जाने की इस बड़ी खबर के सिलसिले में हमें रोज भुवनेश्वर से कलिंगनगर जाना होता था. चार जनवरी को पुलिस ने लाशों का पोस्टमार्टम किया और फिर उन लाशों को उनके परिजनों को सौंप दिया गया. पांच जनवरी को जब हम गांव में पहुंचे तो आदिवासी सकते में डूबे हुए थे. हमने देखा, सिनी सय के बेटे भगवान सय के दोनों हाथ की कलाई कटी हुई थी. दूसरे आदिवासियों की लाश भी सलामत नहीं थी. मैंने देखा सिनी सय एकटक अपने बेटे की लाश को देखे जा रही थी. उसकी आंखों में आंसू का एक बूंद तक नहीं था. एक औरत होने के नाते मैं उसकी चुप्पी को महसूस कर पा रही थी.

इस घटना के कई दिनों तक कलिंगनगर के इलाके में विभिन्न दलों के राजनेताओं, पत्रकारों और स्वयंसेवी संगठनों का आना-जाना चलता रहा. तीन-चार दिन के बाद आदिवासियों ने लाशों का अंतिम संस्कार किया. माहौल थोड़ा शांत हो रहा था पर तनाव फिर भी था. आदिवासियों का सड़क जाम आंदोलन जारी था. इस दौरान मैंने सिनी सय से कई दफा बातचीत की. बेटे की मौत का दर्द, सरकार के खिलाफ गुस्सा और आने वाली जिंदगी की चिंताएं उसके चेहरे पर हमेशा दिखती थी. लेकिन पहले दिन के बाद मैंने उसकी आंखों में आंसू नहीं देखे. इस घटना के एक साल बाद दो जनवरी 2007 को पुलिस गोली से मारे गए 14 आदिवासियों की पहली बरसी पर आयोजित शहीद दिवस के कार्यक्रम में मेरी मुलाकात सिनी सय से हुई. इस आयोजन में अलग-अलग राज्यों से हजारों की संख्या में आदिवासी पहुंचे थे. इसके अलावा देश भर के पत्रकार, स्वयंसेवी संगठन और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की लंबी-चौड़ी फौज तो थी ही. इसी भीड़ में शामिल सिनी सय ने मुझे देखते ही पहचान लिया. एक बार फिर मैंने सिनी सय से लंबी बातचीत की. इस इंटरव्यू में सिनी सय ने एक बार फिर से अपनी पुरानी बातें दुहराई- “ये हमारे हक की लड़ाई है, अपनी जमीन, अपनी रोजी-रोटी हम किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ सकते. अपने लोगों के हक के लिए मैं एक तो क्या, दस बेटों को भी कुर्बान कर सकती हूं. हम अपने लोगों के शहादत को कैसे जाया कर सकते है ?”

सिनी सय का आत्मविश्वास मुझे हमेशा चौंकाता था. सहमति-असहमति के ढेरों मुद्दे थे लेकिन गांव की एक अनपढ़ आदिवासी महिला होकर भी सिनी सय अपने हक की लड़ाई के लिए जिस तरह सबसे आगे थी, एक औरत होने के नाते उसे देखकर मुझे गर्व होता था. बातचीत के बाद हमने एक-दूसरे से विदाई ली. यह सिनी सय से मेरी आखिरी मुलाकात थी. 2007 के बाद कलिंगनगर में आदिवासियों और टाटा कंपनी के बीच चल रहे संघर्ष को कवर करने के लिए मैं कई बार उस इलाके में गई. लेकिन सिनी सय से मेरी मुलाकात नहीं हो पाई. इस दौरान उस इलाके में छोटी-बड़ी कई घटनाएं हुईं. कुछ आदिवासी अपनी जमीन देने को राजी हो गए थे. मारे गए आदिवासियों के लिए सरकार मुआवजा दे रही थी. टाटा कंपनी और सरकार की तरफ से ढेरों लुभावने नारे हवा में तैर रहे थे. पर कुछ आदिवासी अभी भी अपनी जमीन छोड़ने को राजी नहीं थे. जो अपनी जिद पर अड़े थे, उनके घरों को बुलडोजर से तोड़ दिया गया. उन्हें उनकी जमीन से बेदखल कर दिया गया. पुलिस ने गांव पर कब्जा कर लिया था और डरे-सहमे आदिवासी जंगलों में छुपते फिर रहे थे. बीमार बच्चों और महिलाओं का बुरा हाल था. पुलिस के डर से वे अस्पताल तक नहीं जा रहे थे.

इन आदिवासियों की भूख-गरीबी और उनके डर को मैंने कई बार अपने कैमरे में कैद किया. साल गुजरते गए, इस दौरान मैं कई-कई बार कलिंगनगर हो आई. जब भी मैं वहां गई सिनी सय को मैंने जरुर तलाशा लेकिन उसका कहीं अता-पता नहीं था. अब इतने सालों बाद अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी हुई सिनी सय मुझे मिली. उसे इस हालत में देखकर और उसकी बातें सुनकर मैं ये सोच नहीं पा रही थी कि मैं क्या प्रतिक्रिया दूं. सिनी सय के बारे में कुछ और जानने की इच्छा ने मुझे उसके मंझले बेटे लक्ष्मीधर सय से मिलाया. कलिंगनगर गोली कांड के समय लक्ष्मीधर सय बारहवीं में पढ़ता था. आज वो कलेक्टर के कार्यालय में जूनियर क्लर्क की नौकरी कर रहा है. यह नौकरी उसे भाई की मौत के मुआवजे के तौर पर मिली है. लक्ष्मीधर से ये पता चला कि उसका छोटा भाई, जो उस समय सातवीं कक्षा में पढ़ता था, आज एक इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ रहा है. तीन बहनों की भी शादी हो चुकी है.

सिनी सय को बतौर मुआवजा 11 लाख रुपए भी मिले थे, जो उनके नाम से बैंक में जमा हुए थे. लक्ष्मीधर सरकारी मुलाजिम होने के नाते इन सब मुद्दों पर कोई भी बातचीत नहीं करना चाहता था. मैंने कैमरा बंद किया, फिर उसने बातचीत शुरु की. बातचीत में उसने वही पुराना मंजर उसने मेरी आंखों के सामने रख दिया-‘‘ उस घटना के वक्त मैं सोलह-सत्रह साल का था और मेरे भैया की मौत के साथ ही मेरा परिवार पूरी तरह बिखर गया था. मेरी पढ़ाई छूट गई. पिता का साया तो बचपन में ही उठ गया था लेकिन इस घटना ने मां को भी बुरी तरह से तोड़ दिया. मां हमसे भी कटी-कटी रहने लगी.’’ ‘‘ इस घटना के बाद मैंने कभी भी मां को मुस्कुराते नहीं देखा. भाई की कटी हुई कलाई वाली लाश देखने के बाद तो मां मानो पत्थर की बन गई थी. उसकी आंखों में मैंने कभी आंसू भी नहीं देखे थे. घटना के एक साल के बाद मुझे यह नौकरी मिली और मैं यहां जाजपुर चला आया.’’

मुआवजे के बतौर जो पैसे मिले थे, वो सिनी के नाम से बैंक में जमा थे. उनमें से सिर्फ ढाई लाख रुपए उसने छोटे भाई की इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए खर्च किए थे. इस दौरान घर में लोगों का आना-जाना लगा रहता था. कोई इंटरव्यू के लिए आता था तो कोई शोक जताने, कोई सहानुभूति के शब्द कहने तो कोई अपना ही दुखड़ा रोने. फिर 2008 के आसपास एक दिन सिनी सय घर से चली गई. कहां, इसकी खबर तो घरवालों को भी नहीं थी. लक्ष्मीधर के अनुसार अपनी मां से उनकी एक-दो बार बातचीत हुई. मां ने अपने इस तरह गायब होने को लेकर कोई बात नहीं बताई. लेकिन मां के जाने के बाद से ही घर में पुलिस वालों के आने का सिलसिला शुरु हो गया. पूछताछ के बहाने पुलिस कभी भी घर में आ धमकती. परिवार के लोग परेशान हो गए. फिर एक दिन सिनी ने लक्ष्मीधर को यह खबर भिजवाया कि वो उन लोगों से दूर ही रहेंगी क्योंकि वो नहीं चाहती थीं कि उनकी वजह से उनके परिवार को कोई परेशानी हो. पुलिस रिकार्ड में सिनी सय का नाम एक माओवादी के तौर पर दर्ज हो चुका था.

लक्ष्मीधर से विदा होते हुए मैंने पूछा-’’ तुम्हारी मां को पुलिस ने माओवादी के रुप में गिरफ्तार किया है. क्या सोचते हो ?’’ लक्ष्मीधर ने बिना एक पल गंवाए जवाब दिया- “पुलिस के लिए, आपके लिए मेरी मां एक माओवादी हो सकती है पर मेरे लिए वो सिर्फ एक मां है. एक ऐसी मां, जो अपने बच्चों के लिए कुछ भी कर सकती है. एक ऐसी मां, जो अपनी ममता सिर्फ अपने बच्चों पर नहीं बल्कि दूसरों के बच्चों पर लुटाने और उनकी जिंदगी संवारने से पीछे नहीं हटती. ऐसी मां पर मुझे गर्व था, है और रहेगा.’’ सिनी सय और लक्ष्मीधर से मिलने के बाद मैं इन दिनों उहापोह में हूं. एक औरत होने के नाते सिनी के दर्द को मैं महसूस कर सकती हूं. एक आदिवासी महिला के संघर्ष और उसकी जीजिविषा को लेकर भी कई-कई सवाल मन में उमड़ते-घुमड़ते हैं. एक गणतांत्रिक देश की नागरिक और पत्रकार होने के नाते मेरे लिए सिनी सय के किसी भी हिंसात्मक रास्ते का समर्थन करने का तो सवाल ही नहीं उठता लेकिन इस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं है कि सिनी सय सही थी या गलत. आप अगर इस सवाल का जवाब ढूंढ़ पाएं तो मुझे जरुर बताइएगा.



सारदा लहांगीर
साभार-रविवार.कॉम.

सतर्क रहें कच्चे कान वालों से.....

ये चापलुसों की ही सुन पाते हैं


अपने यहाँ कई तरह के आदमी होते हैं जो कच्चे और पक्के नामों से जाने जाते हैं। कोई किसी का कच्चा होता है, कोई किसी का पक्का। कई अधकच्चे और अधपके भी होते हैं। जो कच्चे हैं वे पक्का होने की तमन्ना संजोये बरसों गुजार देते हैं। इसी तरह जो पक्के हैं वे और ज्यादा पक्के होने की जिद में परिपक्व हुए जा रहे हैं। कई कितनी ही तरह से कच्चे हैं मगर पक्के की खाल ओढ़े हैं और कई पक्के बेचारे ऐसे हो गए हैं जिनका कोई नामलेवा नहीं है। कच्चे लोगों मेें कई ऐसे होते हैं जिन्हें लंगोट का कच्चा, दिमाग का कच्चा, बात का कच्चा आदि कहा जाता है और कई ऐसे हैं जिन्हें कहीं और मामलों में कच्चा होने की उपाधि प्राप्त है। लेकिन आदमियों की एक किस्म ऐसी है जो न और कहीं से कच्चे हो न हों, कानों से जरूर कच्चे होते हैं।

ये लोग अपने भाषणों और अनर्गल बकवास में इतने प्रवीण होते हैं कि सामने वालों के कान पका देने तक की महारथ जरूर रखते हैं मगर खुद कानों के इतने कच्चे हुआ करते हैं कि कुछ नहीं कहा जा सकता। इन पर तरस आनी स्वाभाविक है। कानों का कच्चा होने की बीमारी बड़े लोगों में ज्यादा होती है। इनमें बड़े लोग उन्हें कहा जाता है जिनका कद बड़ा होता नहीं है पर उन्हें भ्रम होता है कि ये बड़े हैं। और यों भी आजकल लोगों को फलों से कहीं ज्यादा स्वाद आता है आलूबड़ों, मिर्चीबड़ों, दहीबड़ों में और दालबड़ों में। फिर ये लोग तो ऐसे हैं जो सदाबहार बड़े हैं। बड़े लोगों को बड़े कान का होना चाहिए। जो गणेश बनता है उसके कान गणेश की तरह ही होने चाहिए। मगर ऐसा हो कहाँ पाता है। आजकल तो जो जितना बड़ा, उतने ही छोटे उसके कान। कान छोटे हों तब भी कोई बात नहीं। हैरत की बात तो यह है कि छोटे कानों के बावजूद कान के ये इतने कच्चे होते हैं कि कोई भी कान फूंक जाता है और वे भी उसी के कहे अनुसार सर हिलाते हुए आगे बढ़ चलते हैं। 

आजकल हर तरफ कच्चे कान वालों की तादाद बढ़ रही है। जिस बेतहाशा ढंग से कानों के कच्चे लोगों की संख्या बढ़ रही है उसी अनुपात में उन लोगों की भी भीड़ बढ़ने लगी है जो कान फूँकने में माहिर हैं। इनकी फूँक में इतनी ताकत आ गई है कि जिसका कान फूूँकें वो दुम हिलाता हुआ सब कुछ करने के लिए हाजिर हो उठता है। जितने उनके कान कच्चे, उतनी ही इनकी फूँक में ताकत का जोर। कच्चे कान वालों के इर्द-गिर्द जमा भीड़ भी ऐसी कि कई मामलों में कच्ची ही होती है। ये किस हिसाब से कच्चे हैं उसके बारे में किसी को कुछ बताने की आवश्यकता नहीं है। कुछ लोग अन्तःवस्त्रों के कच्चे हैं तो कुछ ऊर्ध्व अंगों के, कुछ जेब के तो कुछ थैलियों या अटैचियों के। इन कच्चों और कच्चे कान वालों ने सारे समाज का और देश का कबाड़ा कर रखा है, फिर  देश कैसे पक्का हो? कच्चे कान वाले लोग कितने ही बड़े हों लेकिन इस मामले में कच्चे ही होते हैं। भगवान ने इन लोगों मेें इतना बड़ा डिफेक्ट छोड़ दिया है कि इनके कान और दिमाग में कहीं कोई संतुलन नहीं बैठ पाता। जो बात कानांे में फूँक दी जाती है वह गले उतर जाती है चाहे वह कितनी ही भ्रामक या झूठी क्यों न हो।

हर गली-चौराहे से लेकर जयपुर-दिल्ली तक के गलियारों तक फैले हुए हैं डेरे कच्चे कान वालों के। इन्हीं के आस-पास छायी होती है उन कारिन्दों की जमातें जो इन कानों के लिए टॉनिक देते हुए कान फूँकती रहती हैं। कच्चे कानों और कारिन्दों का यह रिश्ता उस हर आदमी इर्द-गिर्द साये की तरह लगा रहता है जो पॉवर में होते हैं या पॉवर में होने वालों की बुहारी या चम्पी में लगे रहते हैं। कान भरने वाले लोगों के सामने अपना वजूद साबित करने के लिए इसके सिवा और कोई दूसरा रास्ता होता ही नहीं है जिसे शार्टकट के रूप में ये अपना सकें। कान भरना और कान फूंकना इन दोनों कामों के बूते ही इनकी चवन्नियाँ धड़ल्ले से चल निकलती हैं, फिर अपनों पे करम और गैरों पे सितम का हर खेल इनके हाथ में होता है। एक बहुत बड़ा सवाल हमारे सामने यह है कि बड़े लोग ही बहुधा कच्चे कानों के क्यों होते हैं। इसका सीधा सा उत्तर यही होगा कि ज्यों-ज्यों ये लोग बड़े होते जाते हैं सच्चाई और संवेदनाओं से इनका रिश्ता खत्म होता जाता है और जहाँ सारी इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं वहाँ कान ही काम आते हैं।

जीवन की सच्चाई से दूर होते चले जाने वाले बड़े लोगों की हरकतों और अहंकार की वजह से सज्जनों का कुनबा इनसे धीरे-धीरे किनारा करने लगता है ऐसे में इनके पास कोई ऐसा नहीं होता जो इनके कान खिंचने का साहस कर पाए। फिर बड़े कहे जाने वाले ये लोग भी सच सुनना भुला बैठते हैं। इनके पास सारे के सारे वे ही होते हैं जो इनका मिथ्या जयगान करते हुए इनके कान भरते और फूँकते रहते हैं। जब कोई कान खिंचने वाला नहीं होता तब कान कच्चे रहने की स्थितियाँ आ ही जाती हैं।  इन कच्चे कानों वालों की कोई दवाई नहीं है, और न ही उन लोगों की कोई दवाई है जो कान भरने के आदी होते हैं। एक-दूसरे की जिन्दगी को टॉनिक देते रहने के लिए इन दोनों ही किस्मों के लोग जरूरी हैं। अकेले कान अपने आप कच्चे नहीं होते, दूसरे कई मामलों में आने वाली कच्चाई से ही कान कच्चे होने लगते हैं। ऐसे में जरूरी यह हो चला है कि कच्चे कान वालों से दूर रहें और उन लोगों से भी उचित दूरी बनाये रखें जो कान भरने में सिद्ध हैं। ये महामारी तभी दूर होगी जब कच्चे कान वाले हवा से उतर कर जमीन पर पाँव रखने लग जाएं। लेकिन तब भी इनकी संख्या उतनी ही बनी रहेगी क्योंकि तब दूसरे लोग जमीन से ऊपर उठ कर हवा से बातें करने लग जाएंगे। उन चापलुसों की तो हमेशा मौज रहेगी क्योंकि हर कोई अपने कानों में वो ही संगीत सुनने का आदी होता है जिसमें उनका जयगान हो।



---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

शनिवार, 26 मई 2012

दूर रहें कँधे तलाशने वालों से घातक हैं ये !!


अपने आस-पास बहुत सारे विचित्र लोग हैं जिनकी किस्मों की संख्या भी इतनी कि याद भी न रखी जा सके। इन अजीब किस्मों के लोगों की जिन्दगी भी इनकी ही तरह अजीब होती है। इनके व्यक्तित्व से लेकर इनकी हरकतें भी ऐसी ही हुआ करती हैं। इन सभी में आदमियों की एक विलक्षण जात होती है जिसे कँधे तलाशने वाले, आग लगाने वाले या तोपची कहा जाता है। रसायन शास्त्र के उत्प्रेरक या केटेलिस्ट की तरह ही ये दुनिया की किसी भी घटना या क्रिया की गति को धीमी या तेज कर सकते हैं लेकिन खुद अपरिवर्तित रहते हैं। आदमियों की यह किस्म इससे भी सौ गुना बढ़कर है। इस किस्म के लोग हर प्रकार की दुर्घटनाओं को अंजाम देने के आदी होते हैं और  दूर से तमाशा देखकर अपने सामर्थ्य का आकलन करते रहते और तालियां बजाकर आनंदित होते हैं। इसके साथ ही एक और बात इनके साथ होती है और वह ये कि इनकी करतूतों का जो परिणाम सामने आता है उसके बारे में कहीं कोई सुराग नहीं छोड़ते कि यह किनका किया धरा है।

दूसरों के कंधों पर हथियार रखकर चलाने के आदी ये लोग जो भी काम करना चाहते हैं उसके लिए खुद कभी कुछ भी नहीं करते बल्कि इन्हें हर काम के लिए माध्यमों की तलाश बनी रहती है। माध्यमों को प्रलोभन देने से लेकर भ्रमित करने या भयभीत करते हुए भी ये अपने कामों को अंजाम देते रहते हैं। याने कि सारे काम और सोच इनकी, और आकार पाएं दूसरों के सहारे। अपने इलाके में भी ऐसे लोगों की खूब भरमार है जो खुद अपनी छवि को बगुले के वस्त्रों से भी ज्यादा साफ-सुथरी और उज्ज्वल रखते हैं और कीचड़ या कालिख ऐसी उछालते हैं कि बरसों तक उसका रंग मिटे नहीं। कीचड़ उछालने की कलाबाजियों में माहिर ऐसे लोगों में ज्यादातर वे लोग हुआ करते हैं जो अपने आपको समाज का ठेकेदार, समाज सुधारक कहते हैं या चुराई हुई अथवा षड़यंत्रपूर्वक हथियायी हुई बौद्धिक संपदा के बूते अपने आपको विद्वान और बुद्धिजीवी के रूप में प्रस्तुत करने के आदी होते हैं।

यह जरूरी नहीं कि इनमें छुटभैये लोग और उठाईगिरे न हों। इन्हें भी हक है तोप चलाने का और दूसरे के कंधों पर बंदूक रखकर दागने का। ऐसे कई लोगों के समूह बने होते हैं जो मामूली नाश्ता, चाय-कचौड़ी और हराम की चीजों को पाने के लिए एक दूसरे से जुड़ जाते हैं और पूरे तालाब को गंदा करने का ठेका उठा लेते हैं। ऐसे बदबूदार हरामखोर लोगों के समूहों को देखकर कीचड़ से सने सूअरों का झुण्ड भी शरमाने लगता है। कहने को आदमी, जिस्म आदमी का और सारी करतूतें जानवरों की। इन लोगों में हर प्रकार के जानवरों के लक्षण समय-समय पर मुखर होते रहते हैं। ऐसे में समझदार लोगों को इनकी पशुता भरी जिन्दगी को देख बीते जमाने की बातें याद आ जाती हैं जब नाखून वाले, सिंग वाले और कैंचीदार दाँत वाले हिंसक पशुओं की वजह से गुरुकुलों और बस्तियों में कितना भय व्याप्त रहा करता होगा।

किसी आदमी के पास कमाने-खाने का कोई हुनर भले न हो, कोई न कोई उस्तरा कबाड़ कर ये अपने धंधे में लग ही जाते हैं। आदमी के पास आदमियत न हो और हिंसक वृत्ति हो या किसी भी एक जानवर का कोई लक्षण हो तो उसके लिए जिन्दगी भर के लिए कमा खाने का जरिया निकल ही आता है। आजकल कई लोगों के साथ ऐसा ही हो रहा है। इन लोगों में इंसानियत नाम की कोई चीज नहीं है, न संस्कारी हैं, न पढ़े-लिखे हैं, न कोई धंधा कर सकते हैं मगर किसी न किसी हिंसक जानवर की तरह बर्ताव करते हुए कुछ भी कर गुजरते हैं। इन लोगों के पास खाने-कमाने का कोई माद्दा भले न हो, एक विलक्षण बुराई इतनी भरी हुई रहती है कि चाहे जिस तरह ये लूट-खसोट कर या कि दूसरों को गुमराह करके भी अपने सिक्के चला लेते हैं। अपने गांव-कस्बे और शहर से लेकर महानगरों तक में इस किस्म के लोगों की भारी भरमार होती है जो अपने किसी न किसी ठिकाने पर अपने उस्ताद या चेलों के साथ आसानी से दिख ही जाती है।

ये लोग अपने हर काम के लिए औरों के कंधे तलाशते हैं और दूसरों को हथियार बना कर कभी लक्ष्य भेद देते हैं, कभी अपने स्वार्थ पूरे कर लेते हैं। लोगों को यह पता भी नहीं चल पाता कि उनके कंधों का इस्तेमाल कौन कर रहा है या कर चुका है। इसकी भनक बाद में कहीं जाकर लग पाती है जब कहीं कुछ जलने की गंध आने लगती है। जमाना बड़ा खराब है। हमारे आस-पास ऐसे खूब तोपची हैं जिनके पास तरह-तरह की घातक मार करने वाले बारूद का भण्डार है, कई हथियार हैं जिन्हें आपके कंधों की तलाश है। पैनी निगाह रखें और सतर्क रहें, वरना इनमें यह कला तो है ही वे आपका कभी भी तरकीब से इस्तेमाल कर सकते हैं, अगर जरा कहीं लापरवाह हुए।

ऐसे लोगों को पहचानें और इनसे दूरी बनाए रखियें वरना पॉवर ब्रेक वाली ये गाड़ियाँ कहीं भी अपना काम तमाम कर सकती हैं। इन कंधातलाशी लोगों के चोंचले इतने कि भोले लोग बेचारे भ्रमित हुए बगैर नहीं रह सकते। बकौल कंधा तलाशों के - ‘‘हम यकीन करते हैं कंधे से कंधा मिलाकर चलने में, ये दिगर बात है कि हम चलते हुए होते हैं और लोग हमारे कंधों पर लेटे हुए।’’ हालांकि इन तोपचियों और कंधे तलाशने वालों की दुर्गति भी ऐसी होती है कि उन्हें अंतिम यात्रा पूरी करने तक के लिए कंधे तक नहीं मिल पाते। सब कुछ होने के बावजूद ऐसे लोगों से दूरी बनाये रखें और ईश्वर से दुआ करें कि इन लोगों को सद्बुद्धि दे अथवा अगले जनम में इन्हें अफ्रीका के जंगलों में विचरण करने का सुख प्रदान करे।



---डॉ. दीपक आचार्य---
9413360077

शुक्रवार, 25 मई 2012

टाईमपास न जीयें हर क्षण करें शक्ति संचय


व्यक्ति की पूरी जिन्दगी में पचास फीसदी से ज्यादा वह समय होता है जिसको वह फालतू के कामों और बेकार की सोच में गँवा देता है। जो व्यक्ति जीने का अर्थ समझते हैं वे हर क्षण को कीमती मानकर उसका पूरा उपयोग करने की कला में पारंगत हो जाते हैं और जीवन में सफलता के झण्डे गाड़ते हुए मार्गदर्शी और प्रेरणा पुंज बन जाते हैं। दूसरी ओर ऐसे लोगों की संख्या नब्बे फीसदी से अधिक है जिनका ज्यादातर समय अनुपलब्धिमूलक और निरर्थक गुजर जाता है। इनमें से भी अधिकांश समय सोने, बेवजह बोलने अर्थात बकवास करने और सुनने में गुजर जाता है। हम इतना अधिक बोलते और सुनते हैं जिसकी हमें आवश्यकता ही नहीं होती मगर बोलना और सुनना तथा फालतू के कामों में रमे रहना आदमी की फितरत में सर्वोपरि होता है और ऐसे में उसे वे सारे काम बेकार लगते हैं जो इनके सिवा हैं। ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के बेजा इस्तेमाल से इनकी कार्यक्षमता का ह्रास होता है तथा जीवन की पूर्णायु तक पहुँचते-पहुँचते ये जवाब देने लग जाती हैं जबकि इनका सही और युक्तिपूर्वक इस्तेमाल किया जाए तो आजीवन इनकी क्षमता बनी रहती है।

हर व्यक्ति के जीवन में 70 फीसदी समय ऐसा होता है जिसके बारे में यदि वह जान ले तो निहाल हो जाए, मगर अधिकतर लोगों में न जानने की जिज्ञासा होती है न कुछ कर पाने की ललक। जीवन में जो समय हमारे सामने है उसके बारे में जानकर पूरा-पूरा उपयोग कर लिया जाए तो हमारी जिन्दगी सुनहरी रश्मियों से भरी-पूरी रह सकती है और इसका लाभ न सिर्फ हमें, बल्कि उन सभी को प्राप्त होता है जो हमारे सम्पर्क में एक बार भी आ जाते हैं। जीवन में आने वाले ऐसे तमाम अवसरों के प्रति सजग रहें और इन अवसरों को शक्ति संचय का माध्यम बनाएं। बात चाहे सफर की हो, कहीं प्रतीक्षा की हो या उन क्षणों की जब हमारे पास कोई दूसरा काम न हो। इन अवसरों पर आत्मचिन्तन करें और उनका रचनात्मक प्रवृत्तियों के लिए उपयोग करें। कई बार बैठकों, सभाओं और समारोहों का देरी से शुरू होना, बस या रेल विलम्ब से आना, कहीं काम के लिए जाने पर लम्बे समय तक प्रतीक्षा करने रहने की विवशता या और कोई ऐसा समय, जिसके बारे में हमें यह कहना पड़ता है कि समय काट रहे हैं या प्रतीक्षा कर रहे हैं, इसका उपयोग अपने हक में शक्ति संचय के लिए अवश्य हो सकता है।

जीवन में सफर के अवसर हों या कहीं भी किसी काम के लिए प्रतीक्षा की विवशता, इन क्षणों में कुढ़े नहीं, न ही रंज या खीज निकालें। इन अवसरों का महत्त्व समझें और इनका दोहन करें। कुछ नहीं तो इन क्षणों को साधना का माध्यम बनाएँ और जिस किसी भगवान या ईष्ट में रुचि हो, उनके किसी छोटे से मंत्र का मन ही मन लगातार जप करते रहें। यों तो आम आदमी घर-गृहस्थी के फण्डों में घनचक्कर होने की वजह से साधना या ईश्वर स्मरण के लिए समय नहीं निकाल पाता है लेकिन सफर और प्रतीक्षा ये दो ऐसे सुअवसर पर हैं जिनका सदुपयोग किया जाना संभव है। इन क्षणों में हरि स्मरण का फायदा यह होगा कि हम फालतू की चर्चाओं, निन्दा और आलोचनाओं आदि से दूर रह पाएंगे और दूसरा ईश्वरीय ऊर्जा लगातार संग्रहित होनी शुरू हो जाएगी जिसका लाभ हमें पूरी जिन्दगी अपने आप प्राप्त होता रहता है। केवल इन्हीं क्षणों का ईमानदारी के साथ ईश्वर स्मरण मात्र में ही उपयेाग कर लिया जाए तो सिद्धि और सफलता में ये खूब मददगार हो सकते हैं, यह कई साधकों का अनुभव है। इसी प्रकार स्वाध्याय, स्वास्थ्य लाभ की मुद्राएं और विद्वजनों से सत्संग या चर्चा भी की जा सकती है। 

कुछ नहीं तो इन क्षणों में उद्विग्न हुए बिना निर्विचार की स्थिति लाने का प्रयास करें। यदि कोई भी व्यक्ति मात्र पाँच-दस मिनट के लिए भी निर्विचार हो जाए तो उसे असीम मानसिक शांति का अहसास होगा। यह भी अनुभूत है। ये भी न कर पाएँ तो अपनी रुचि के कामों का चिन्तन करें और इनसे संबंधित गतिविधियों के बारे में चर्चा करें या व्यवहार में लाएं। इससे भी बौद्धिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक बल बढ़ने लगता है। इससे शरीर ऊब और थकान से भी दूर रहता है। बड़े-बड़े लोग जिनका अधिकांश समय सफर में गुजरता है वे इसी प्रकार साधना से सिद्धि प्राप्त करने का मार्ग खोज लेते हैं। जबकि ऐसा नहीं करने वाले लोग प्रतीक्षा करते-करते इतना थक जाते हैं कि उन्हें हर थोड़ी-थोड़ी देर में उबासियाँ आनी शुरू हो जाती है, बार-बार झल्ला उठते हैं और प्रतीक्षा के अंत न होने की बात कहते हुए खिसियाते रहते हैं। ये स्थितियां मनुष्य को कमजोर ही करती हैं और इससे चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है जो अन्ततोगत्वा किसी न किसी तनाव और बीमारी को जन्म देता है।

इन सारी स्थितियों से बचने का एकमात्र यही उपाय है कि जहाँ कहीं प्रतीक्षा करनी पड़े, लम्बा सफर हो तथा हमारे पास कोई काम नहीं हो तब इसी प्रकार की साधना करें। छोटे-छोटे समय का दोहन करते हुए शक्ति संचय की आदत पड़ जाने पर हम किसी भी परिस्थिति में कहीं भी रहें, न कभी तनाव होगा, न खीज या गुस्से की स्थिति आएगी। बल्कि ऐसे मौके जब भी आएंगे, आनंद देंगे। समय का अपने हक़ में इस्तेमाल कर लेने की कला सीख जाने पर जीवन के कई सारे आनंद बहुगुणित हो जाते हैं और इसी से व्यक्तित्व की सफलता को मिलने लगती हैं ऊँचाइयाँ।



---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

बृहस्पतिवार, 24 मई 2012

धार्मिकता का ढोंग न पालें ये सबसे बड़ा अधर्म

धार्मिक होना अच्छी बात है लेकिन धार्मिकता का ढोंग पाल कर जमाने को भ्रमित करते रहना अपने आप में सबसे बड़ा अधर्म है। धर्म वही कहलाता है जिसे धारण करने पर वह धारणकर्त्ता की रक्षा करता है। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि जो धर्म के अनुरूप आचरण करता है उसकी रक्षा अपने आप होती रहती है। धर्म का मतलब बाहरी दिखावों और आडम्बर से नहीं है बल्कि उन सभी बुनियादी सिद्धान्तों और करणीय तथा आचरणीय गतिविधियों से है जो किसी भी व्यक्ति के लिए नितान्त अवलम्बन योग्य हैं। इनमें वे सारे नैतिक और मानवीय मूल्य समाहित हैं जिन पर धर्म टिका होता है। चारों तरफ धर्म का जिस बड़े पैमाने पर व्यापक शोर फैल रहा है और आए दिन जिस प्रकार की धार्मिक गतिविधियों का आयोजन हो रहा है उसे देख हर कोई सहसा भ्रमित हो ही जाता है कि कलियुग में इतना बड़ा बदलाव आ रहा है।

जिधर नज़र दौड़ाएँ उधर हर कोई धर्म के नाम पर कुछ न कुछ कर रहा है। कई बड़े लोग हैं जिनके साथ चेले-चपाटियों का लाव-लश्कर है, कई छोटे-छोटे महारथी हैं जिनके पीछे अनुयायियों की रेवड़ें चल रही हैं और कई-कई समूह ऐसे बन गए हैं जो धर्म के नाम पर बिजनैस को भी पछाड़ने के फण्डों में दिन-रात रमे हुए है।  दसों दिशाओं और कोनांे में धर्म और धर्म का ही बोलबाला है। धर्म के नाम पर कहीं लोग बन रहे हैं तो कहीं एक तरह के लोग दूसरी तरह के लोगों को बना रहे हैं। जब से धर्म का असली चेहरा विलुप्त हो गया और छद्म चेहरा सामने आ चला है तभी से लोगों की बेतहाशा भीड़ अचानक धार्मिक होने लगी है। धर्म के नाम पर वे सारे काम हो रहे हैं जो दूसरे धंधों में होते हैं। कहीं गिरोहबंदी, कहीं समूहों का दल-दल, कहीं और कुछ। धर्म के नाम पर और धर्म की आड़ में हर खेल खेला जा रहा है बिना किसी भय के। यह धर्म ही है जिसका चौगा धारण कर कोई कुछ भी करने को स्वच्छन्द हो जाता है।

इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि आज धर्म नहीं रहा। दुनिया अगर टिकी ही हुई है तो ऐसे लोगों के दम पर जो वाकई धर्म पर चल रहे हैं और धर्मपालन की उन सभी कसौटियों पर खरे उतर रहे हैं लेकिन ऐसे लोगों का प्रचार कम है, या यों कहें कि जो वाकई धर्म को मानने वाले हैं वे प्रचार से कोसों दूर रहते हैं और उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जमाना क्या सोच रहा है। ऐसे धर्मियों का सीधा संबंध ईश्वर से है, लोगों की भीड़ से नहीं। इसलिए भीड़ और जमाने की सोच से ये लोग पूरी तरह बेपरवाह रहते हैं। जबकि धर्म के नाम पर बहुत कुछ करने वाले लोगों की भीड़ चारों ओर छितरायी हुई है जो रोजाना नए फण्डों को लेकर हमारे सामने आती है। टीवी से लेकर जमीन तक और आसमाँ से लेकर दुनिया के क्षितिज तक धर्म के नाम पर सब कुछ बेरोकटोक हो रहा है। यह धर्म ही है जो निहाल कर रहा है अनगिनत धार्मिकों को। धर्म के नाम पर हम जो कुछ कर रहे हैं उसे कभी धर्म की असली कसौटी पर कसकर देखें तो हमारे नीचे से जमीन ही खिसक जाएगी जब हमें भान होगा कि जो हम कर रहे हैं वह सब कुछ धर्म के नाम पर अधार्मिकता है और इससे न धर्म का भला होने वाला है न हमारा।

ये अलग बात है कि धर्म की आड़ में ये लोग पर अयोग्यता के बावजूद पूजे जाते रहें, धनसंग्रह का शौक पूरा कर लें और अपने जमाने के महानतम लोकप्रियों में शुमार हो जाएं। लेकिन ये सारी स्थितियाँ कभी स्थायी रहने वाली नहीं हैं, इस बात को हमें आज नहीं तो कल स्वीकारना ही पड़ेगा।आज सर्वाधिक सुरक्षित और अभेद्य कवच हो गया है धर्म का चौला। इसे पहन कर चाहे जो कर गुजरें, कोई पूछने वाला नहीं है। हमारे अपने इलाकों में ऐसे कई लोग विद्यमान हैं जो धर्म के नाम पर क्या कुछ नहीं कर रहे हैं, यह किसी से छिपा हुआ भी नहीं है। लेकिन इनका सुरक्षा कवच और चेले-चपाटियों और दिन-रात जयगान करने वालों का घेरा इतना मजबूत है कि न बाहर का सच भीतर आ पा रहा है, न भीतर का बाहर। सच तो यह है कि  सारे के सारे अपने किसी न किसी स्वार्थ में बँधे हुए हैं, सच जानने और समझने या धर्म को गले उतारना कोई नहीं चाहता, ये सारे तो धर्म के तख्त पर बैठकर गिनने और गिनवाने के धंधों में रमे हुए हैं।

ऐसे लोगों की जिन्दगी में झाँकने का थोड़ा प्रयास करें तो साफ-साफ दिखने लगेगा कि धर्म से इनका दूर-दूर का रिश्ता नहीं है मगर कहलाते हैं धार्मिक। कई लोग ऐसे भी हैं जो अपनी मलीनता, बुराइयों और व्यसनी जीवन को ढंकने के लिए धर्म के नाम पर ऐसे कई रूपों मेें अपने अलग-अलग किरदार निभा रहे हैं जो बड़े ही विचित्र और मायावी हैं। धर्म को अपनाना चाहें तो इसे सच्चे मन से इस प्रकार धारण करें कि जीवन और चरित्र के तमाम पहलुओं में धर्म का वास्तविक स्वरूप नज़र आए। धर्म के नाम पर पाखण्डों के जरिये लोगों को भ्रमित करने वाले अधर्मियों का जीवन कुछ काल तक के लिए ही दैदीप्यमान रहता है, फिर इनका शेष जीवन अँधेरों का संगी-साथी बना रहता है।



---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

बुधवार, 23 मई 2012

बेवजह शत्रुता का मतलब पूर्वजन्म का प्रतिशोध

दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जिसके कोई मित्र या शत्रु न हों। व्यक्ति के जन्म के साथ ही राग-द्वेष के बीज अंकुरित होना शुरू हो जाते हैं जो कालान्तर में उम्र के बढ़ने के साथ ही अपना असर दिखाना शुरू कर देते हैं और उम्र ढलने तक पीछा नहीं छोड़ते। जीवनयात्रा के विभिन्न पड़ावों और मार्गों पर विभिन्न कर्म क्षेत्रों में कार्य संपादन करते-करते हम संसार के बीच रमण करते रहते हैं। इस पूरी यात्रा में चाहे-अनचाहे कई लोग हमारे करीब आते हैं जिनमें कई मित्र और कई शत्रु तथा कई उदासीन स्वरूप में हमारे इर्द-गिर्द छाए रहते हैं।

इन्हीं लोगों का हमारे जीवन पर काफी प्रभाव पड़ता है। कभी हमें सकारात्मक और कभी नकारात्मक माहौल मिलता है और उसी के अनुरूप हम हमारे आचरण को ढालते और अभिव्यक्त करने लगते हैं। स्वार्थों और क्षुद्र ऐषणाओं से भरे-पूरे संसार में अधिकांश लोग ऐसे होते हैं जो कभी दो या दस दस नंबरी के रूप में सामने आते हैं। ऐसे लोग ताजिन्दगी कभी निन्यानवे और कभी चार सौ बीस के फेर में रमे रहते हैं। हमारे घर-परिवार और जीवन से लेकर परिवेश और कर्म स्थलों तक में हम रोजाना कई लोगों के सम्पर्क में आते हैं। इनमें अच्छे-बुरे और सभी प्रकार के लोग हुआ करते हैं। प्रकृति का नियम है कि पूर्वजन्म के शत्रु और मित्र साथ-साथ पैदा होते हैं और जीवन तथा मरण का चक्र लेन-देन से सीधा बँधा होता है।

संसार में चार तरह के लोग पैदा होते हैं। पूर्व जन्म का ऋण चुकाने आने वाले, ऋण लेने आने वाले, उदासीन और संसार के लिए कुछ करने ईश्वर द्वारा भेजे हुए। पूरी जीवन यात्रा में हम अपने सारे परिजनों और परिचितों को इन चार श्रेणियों में विभाजित कर देखें तो साफ पता चल जाएगा। इन्हीं के आधार पर हमें लाभालाभ की प्राप्ति होती है और सहयोग-असहयोग के साथ ही मित्रता और शत्रुता का व्यवहार सामने आता है। मित्रों और शत्रुओं दोनों में दो प्रकार के लोग होते हैं। कई लोग बेवजह मित्रता रखते हैं कई विभिन्न कारणों से।

इसी प्रकार कई कारणों से लोग हमारे शत्रु हो जाते हैं और कई सारे ऐसे लोग होते हैं जो बेवजह हमारे शत्रु बन जाते हैं। इन दोनों ही तरह के शत्रुओं और मित्रों के व्यवहार का विश्लेषण करने पर हम अच्छी तरह समझ पाएंगे कि कौन क्यों मित्र या शत्रु है। यह बात हमें साफ तौर पर समझ लेनी चाहिए कि जो लोग बिना किसी कारण से हमारे शत्रु हो जाते हैं वे हमारे पूर्व जन्म के शत्रु होते हैं जो हमसे कुछ पाने के लिए ही अवतरित हुए हैं या पूर्वजन्म का कोई बदला चुकाने के लिए ही हमारे समय में पैदा हुए हैं। अन्यथा कोई कारण ऐसा नहीं है कि वे लोग हमसे शत्रुता रखें। ऐसी शत्रुता रखने वाले लोग हमारे घर-परिवार, कुटुम्ब से लेकर दफ्तरों, स्कूलों और सभी सरकारी या गैर सरकारी या अर्द्ध सरकारी गलियारों, समाजों, समुदायों, पंथ-सम्प्रदायों और सभी जगह पाए जाते हैं जिनसे हमें हमेशा किसी न किसी प्रकार का नुकसान उठाना पड़ता है।

इनकी शत्रुता के कारण तलाशने पर कोई ठोस वजह कभी सामने नहीं आती बल्कि जो हमसे शत्रुता करते हैं उन्हें भी नहीं पता कि आखिर उनकी पावन देह में यह मलीनता क्यों, कैसे और कब आ गई है। यह तय मानियें कि जो लोग आपसे बिना किसी कारण से शत्रुता का बर्ताव रखते हैं वे आपके पूर्वजन्म के शत्रु ही हैं जो बदला लेने या चुकाने फिर पैदा हो गए हैं। ऐसे पूर्व जन्म के शत्रुओं की गतिविधियों का कोई प्रतिकार नहीं करते हुए अपने हाल में मस्त रहें तो उनके भीतर जमा पूर्वजन्मी शत्रुता के बीज और प्रहार व्योम में अपने आप नष्ट हो जाएंगे। इन लोगों को मौका दें कि वे अपनी भरपूर शत्रुता आप पर निकालते रहें ताकि कभी न कभी वो समय भी आ जाए जब उनके भीतर का सारा वैर बाहर निकल आए और इस विरेचन के बाद वे पूरी तरह खाली हो जाएं। उनमें यह स्थिति आने की प्रतीक्षा हमें करनी चाहिए। इसी प्रकार पूर्व जन्म का बदला चुक जाने पर उनकी सारी शत्रुता स्वतः ही समाप्त हो जाती है और हमें उनकी वजह से कोई भी नुकसान नहीं होता।

इस अवस्था में हम भी यदि शत्रुता का प्रतिकार करें और शत्रुता का भाव रखते हुए उनका विरोध करना या उन्हें प्रताड़ित करना शुरू कर दें तो इससे उनकी शत्रुता समाप्त नहीं होगी बल्कि शत्रुता की नई श्रृंखला जन्म ले लेगी और हम अपने मूल उद्देश्यों से भटक जाएंगे तथा जन्म-मरण के चक्करों में कई जन्म गँवा देंगे। कुछ लोग ऐसे भी हुआ करते हैं जो दो-चार लोगों से नहीं बल्कि कई सारे लोगों से शत्रुता पाल लेते हैं। निरूद्देश्य शत्रुता रखने वाले लोगों पर दया करनी चाहिए। ऐसे लोगों पर यह मानकर तरस खाएँ कि इन बेचारों का कोई दोष नहीं है बल्कि इनमें संस्कारों की कमी, मलीनता और पशुता के जो बीज पड़े हुए हैं उन्हीं का तो पल्लवन और पुष्पन होगा। ऐसे उन्मादी लोगों की पूरी जिन्दगी शत्रुता के हथकण्डों में ही गुजर जाती है। इसलिए इन लोगों को पूरा मौका दें कि वे जिन-जिन से शत्रुता निकालना चाहते हैं पूरे मन से निकालें, अन्यथा ऐसे लोगों की गति-मुक्ति नहीं हो पाएगी और कहीं न कहीं इसका दोष हमें भी लग सकता है।


---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

मंगलवार, 22 मई 2012

अब गायब हो जाती है खुशी, मेहमानों के आने पर

एक जमाना था जब मेहमानों के आगमन की सूचना भर से मन मयूर नाच उठता था और बड़े ही उत्साह व उल्लास से आवभगत की तैयारियाँ होती थीं। मेहमानों के आने पर घर-परिवार में किसी आनंद-उत्सव का माहौल पसर जाया करता था। जीवन के कई रंगों और उत्सवों में मेहमानवाजी भी किसी आत्मीय उत्सव से कम नहीं हुआ करती थी। मेहमानों की बड़ी ही मनुहार हुआ करती थी हर काम में। यह संगम काल ऐसा अद्भुत आनंद देता था कि मेजबान और मेहमान दोनों ही खुशियों से सरोबार रहा करते थे। वैयक्तिक और कौटुम्बिक संवेदनाओं और हृदयस्पर्शी भावों का अतिरेक शाश्वत माधुर्य का ज्वार ही उमड़ा देता था। वह भी समय था जब गर्मी की छुट्टियों में बच्चे अपने नाना-मामा और दूसरे रिश्तेदारों के घर जाते थे और महीने-महीने भर तक रहकर मजे लूटते थे। इसके बावजूद कहीं किसी के माथे कोई झुर्रियाँ नहीं पड़ती थीं और बाल गोपाल की क्रीड़ाओं से सभी आनंदित होते थे। साल भर में कई बार लोग भी अपने नाते-रिश्तेदारों के यहाँ मेहमान बनते थे और सभी आनंद पाते थे।

यों भी भारतीय संस्कृति में ‘अतिथि देवो भव’ को हर युग में विशेष महत्त्व दिया गया था। इसी प्रकार सभी प्रकार के नित्य कर्मों में यज्ञ के रूप में अतिथि यज्ञ की भूमिका को स्वीकारा गया है और इसे प्रत्येक गृहस्थ के लिए अनुकरणीय परंपरा के रूप में स्वीकारा गया है। इतना सब होने के बावजूद कालान्तर में हमारी संवेदनाओं ने आत्मीयता का रंग छोड़कर ऐसा चौला धारण कर लिया कि हमें न कुटुम्ब दिखता है, न परिजन और न समाज या पड़ोसी। हम अपने ‘ मैं ’ और ‘ मेरा ’ की काली चादर में इस कदर लिपट गए हैं कि बाहर की कोई हवा हमें अच्छी लगती ही नहीं। हम हर कहीं हमें ही देखना चाहते हैं और इसके लिए हमने अपनी संकीर्ण परिधियां और फ्रेम गढ़ ली हैं।

हमारी संवेदनाएँ पलायन करती जा रही हैं और सामुदायिक सह अस्तित्व की भावना खत्म होने लगी है। अपने घर की चहारदीवारी में ही सिमटने लगा है अपना संसार। हम चाहते तो हैं सभी लोग हमारे काम आएं, मगर उन लोगों के लिए कुछ सोचना या करना कभी नहीं चाहते। जो कुछ है मेरा अपना है, यह भावना हर आदमी के मन में घर करती जा रही है। अब तो मेहमानों के आगमन की बात सुनकर ही चेहरा फक्क होने लगता है और भगवान से मिन्नतें की जाती हैं कि वे न आएँ तो अच्छा है। पिछले कुछ दशक में अचानक आए ये बदलाव सामाजिक मूल्यों के ह्रास, समरसता में कमी और संवेदनाशून्यता को अभिव्यक्त करते ही हैं, हमारी खुदगर्जी और संकीर्णताओं को भी अच्छी तरह प्रकट करते हैं। अब हम मेहमानों को हमारे यहाँ बर्दाश्त नहीं कर पाते और भगवान से रोजाना की जाने वाली प्रार्थना में अधिकांश लोग यह कहते हैं कि मेहमान उनके वहाँ न आ टपके। आजकल मेहमानों का आगमन निरस्त होने का समाचार पाकर ही प्रसन्नता हो उठती है। सामाजिक मेहमानों के मामले में ही यह हो, ऐसा नहीं है।

हमारे यहाँ कर्ह मेहमान दूसरे प्रकारों के हुआ करते हैं जिनकी मेजबानी हमें विवश होकर करनी पड़ती है। हमें उनके आगमन से एक फीसदी भी प्रसन्नता नहीं होती मगर परायी विवशताओं में ऐसा करने को हम मजबूर रहते ही हैं। ऐसे मेहमान वे लोग होते हैं जो बड़े लोग कहे जाते हैं और उनके जीवन का मकसद ही जबरिया मेहमान बनना होता है। हमारे आस-पास अक्सर होने वाली गतिविधियों में ऐसे ढेरों मेहमानों का बोलबाला रहता है जिन्हें कोई भी व्यक्ति भी पसंद नहीं करता मगर मेहमान बन कर जब-तब आ ही धमकते हैं। ऐसी कृत्रिम और भयग्रस्त मेहमानवाजी से त्रस्त लोग ही अपना दुखड़ा बयाँ कर सकते हैं जिनका अक्सर ऐसे मेहमानों से पाला पड़ता रहता है। कई बार बड़े-बड़े आयोजनों या बड़े लोगों के आगमन के लिए होने वाली तैयारियों के बीच कहीं से जैसे ही उनका दौरा निरस्त हो जाने की खबर आ जाती है, तब कुछेक लोगों को छोड़कर और सभी को जितनी प्रसन्नता हो उठती है, उसे शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता।

बहुसंख्य लोगोें की इस मानसिकता को समझ कर यह अच्छी तरह जाना जा सकता है कि ऐसे मेहमानों के प्रति हमारे दिल में कहीं कोई जगह बची ही नहीं है। इसमें कसूर मेजबानी करने वालों से कहीं ज्यादा उनका है जो भावनाओं को नहीं समझते हुए मेहमान की तरह आ धमकते हैं और लोगों की सामान्य जिन्दगी में खलल पैदा कर देते हैं। लोग इनके बारे में अक्सर कहते सुने जाते हैं कि भगवान बचाये ऐसे मेहमानों से। लेकिन ऐसे निर्लज्ज मेहमानों को क्या, संवेदनहीनता से भरे इन लोगों को हर कहीं चाहिए जबरिया मेहमानवाजी का सुख। इन सारी स्थितियों का सार यही है कि लोग चाहे कैसे भी हो जाएं, हमारी मानवीय संवेदनाओं को हमेशा जीवंत बनाये रखना चाहिए। इसके साथ ही उन लोगों को भी समझना होगा जो कभी हमारे मेहमान बनने लायक हो भी नहीं सकते।



---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

सोमवार, 21 मई 2012

अनायास जो विचार आए लिख लें !!!

दुबारा कभी पास नहीं फटकते ये !!!


दिव्य तरंगों का बहुत ही व्यापक संसार हमारे इर्द-गिर्द दिन-रात परिभ्रमण करता रहता है। इन तरंगों का सीधा संबंध उन सभी विषयों से होता है जो इतिहास में घट चुके हैं, घट रहे हैं और आने वाले समय में घटने वाले हुआ करते हैं। इनका संबंध हमारे स्वयं से, अपने परिवार से और परिवेश से लेकर उन सभी से हो सकता है जिनके साथ हमारे संपर्क हैं अथवा होने वाले हैं। व्यक्ति के जीवन की हर घटना के बारे में पूर्व संकेत काफी अर्से पहले जारी हो जाते हैं। इन्हें अपने सामने होने वाली अप्रत्याशित एवं आकस्मिक घटनाओं के माध्यम से जाना जाता है।इसके अलावा हममें अथवा प्रकृति में जो भी परिवर्तन होने वाले होते हैं उनके बारे में हर व्यक्ति तक एक बार पूर्व संकेत पहुँचते ही हैं लेकिन बहुत थोड़े लोग ऐसे होते हैं जो इन संकेतों को समझ पाते हैं और उसी के अनुरूप निर्णय लेते हैं अथवा बिना व्याकुलता अथवा प्रसन्नता के द्रष्टा भाव से सब कुछ सहज भाव से देखते रहते हैं।

इन संकेतों के आगमन एवं इनकी प्राप्ति को समझने के लिए थोड़ी सी सतर्कता होनी जरूरी है।  ये संकेत बहुत ही आकस्मिक होते हैं और धीमे स्वर में अपने तक पहुंचते हैं। ऐसे में हम जीवन में हर क्षण इतने शोरगुल से भरे रहते हैं कि हमें ऊपर से आने वाले किसी भी संदेश या विचार की भनक तक नहीं पड़ पाती।  इन स्थितियों में हमारी ग्राह्यता क्षमता का ह्रास होने की वजह से हमारे लिए जारी किए जाने वाले संदेशों को हम पकड़ नहीं पाते। इसी प्रकार ईश्वर और प्रकृति संसार के विभिन्न देशों में जिन लोगों से काम कराना चाहती है उन तक अपने दिव्य विचारों का प्रवाह करती रहती है। ये विचार हमारे जेहन में तभी पहुंच पाते हैं जब हम कभी न कभी कुछ क्षण के लिए ही सही, सारे कामों को त्यागकर शून्यावस्था का अहसास करें।

इस अवस्था में हमें खाली पात्र पाकर ये विचार हमारे आभामण्डल से टकराकर लौटते नहीं बल्कि हमारे में मन-मस्तिष्क में मूर्त्त रूप ले लेते हैं। ये विचार हमारे जीवन, कर्म और परिवेश से लेकर किसी भी प्रकार के हो सकते हैं। दिन-रात में कई मौके हमारे सामने ऐसे आते हैं जब हमारे मन में कोई न कोई ऐसे विचार आ ही जाते हैं जिन्हें पहले कभी सुना नहीं होता है। ये हमारे काम के भी हो सकते हैं और हमारे माध्यम से औरों के काम के भी। जो विचार व्यक्ति के मानसपटल पर अनायास आ जाते हैं वे ईश्वरीय सत्ता से प्रेरित होते हैं और उन्हें पकड़ कर इन पर आगे बढ़ा जाए या काम किया जाए तो वे कार्य श्रेष्ठतम परिणाम और कीर्ति प्रदान करते हैं और इनका वजूद कालजयी होता है।

हममें से बहुत से लोगों के जीवन में ऐसे मौके कई-कई बार आते हैं जब हमारे मन-मस्तिष्क में अचानक कोई विचार आ जाता है और हम उसके प्रति बेपरवाह रहते हैं। ऐसे में यह विचार समानधर्मा किन्हीं और लोगों के जेहन तक पहुंचने का प्रयास करता है। यह विचार तब तक परिभ्रमण करता रहता है जब तक कि इसका आदर करने वाला कोई न मिल जाए। कई बार हम जब नए विचारों और कामों की चर्चा सुनते हैं तब हमें यह पता चलता है कि यही विचार उन तक भी पहुंचा था लेकिन उन्होंने अनसुना कर दिया। इसी विचार पर वे भी काम करना चाहते थे लेकिन अपने आलस्य की वजह से नहीं कर पाए। इन स्थितियों में आत्मग्लानि होना स्वाभाविक ही है। ऊपर से प्र्राप्त होने वाले ये दिव्य विचार एक बार अवज्ञा कर देने पर फिर कभी याद नहीं आ पाते, चाहे जितना सर खपाया जाए।

जो लोग इन दिव्य और आकस्मिक विचारों के प्रति गंभीर और सजग होते हैं वे इन विचारों के आते ही इन्हें अपनी डायरी या और कहीं लिख लेते हैं, वहीं ये दिव्य विचार या ऊपर से प्राप्त संदेश टिक जाते हैं और फिर आगे नहींे बढ़ पाते। इन अनायास प्राप्त विचारों को पकड़ कर आगे बढ़ा जाए तो हमे आशातीत सफलता और यश प्राप्त होने लगता है। और यह गौरव लम्बे समय तक बरकरार रहता है। पहले जमाने में ऋषियों को करीब-करीब इसी प्रकार से दिव्य विचारों व संदेशों की सहज प्राप्ति होती थी जिन्हें बाद में मंत्र की संज्ञा दी जाती थी। कुछ-कुछ ऐसा ही इन दिव्य विचारों के बारे में भी है।

हमें चाहिए कि जिस क्षण जो विचार आए, उसे लिख डालें और फिर जब समय मिले उस विचार पर काम करें। दिव्य विचारों की प्राप्ति उन लोगों को ज्यादा और स्पष्ट होती है जिनका जीवन सात्त्विक होता है, मलीनता नहीं होती और नैतिक चरित्र से भरे-पूरे होते हैं। दुष्ट और भ्रष्ट लोगों तक इन विचारों की पहुँच कभी संभव नहीं हो पाती क्योंकि ये लोग षड़यंत्रों और निन्यानवे के फेर में ऐसे उलझे रहते हैं कि इनका चित्त कभी शांत हो ही नहीं पाती।


---डॉ. दीपक आचार्य---
9413305077

रविवार, 20 मई 2012

एरिस्ट्रोक्रेट के हवाले चैथे स्तंभ से संवाद!


जब सेतु ही बन जाये खाई, तो कैसे बजेगी "शहनाई"


जिनके पास मुख्यमंत्री तथा सरकार की छवि सुधारने का जिम्मा है वही सरकार की छवि को पलीता लगा रहा है। मीडिया से दूरी और नेताओं से नजदीकियों के कारण मुख्यमंत्री दरबार में तैनात अपर सचिव स्तर का यह अधिकारी आजकल खासी चर्चाओं में है।  जिस डाल पर बैठता है उसी को काटने में इसको महारत हासिल बतायी जाती है तभी तो तीन -चार महीने से ज्यादा यह एक कुर्सी पर नहीं बैठ पाया है।

प्रदेश सरकार ने काफी मशक्कत व सरकार बनने के बाद सूचना निदेशालय में महानिदेशक की कुर्सी पर देहरादून के तत्कालीन जिलाधिकारी दलीप जावलकर  व मुख्यमंत्री के अपर सचिव को बैठाया गया है। कहने को तो सरकार तथा मुख्यमंत्री की छवि को आमजन में निखारने का जिम्मा भी इस अधिकारी को सौंपा गया है, लेकिन मीडिया कर्मियों को दोयम दर्जे का नागरिक समझने वाले इस अधिकारी ने कुर्सी पर बैठते ही मीडिया से दूरी बनानी शुरू कर दी है। परिणामस्वरूप मुख्यमंत्री सहित मंत्रिमंडल के सदस्यों के कार्यक्रमों की जानकारी मीडिया तक नही पहुंच पा रही है और उनके कार्यक्रमों के समाचारों को उचित स्थान नहीं मिल पा रहा है। 

चर्चाओं के अनुसार मीडिया से दूरी बनाने वाले इस अधिकारी की नेताओं से नजदीकियों के किस्से आजकल सरेआम है। इतना ही नहीं चचाओं के अनुसार आबकारी विभाग के तमाम चर्चित अधिकारियों के भी इससे काफी घनि’ठ सम्बन्ध बताये जाते हैं जो कई बार सार्वजनिक भी हो चुके हैं। ऐसे में प्रदेश के विकास को लेकर दिन रात एक कर रहे मुख्यमंत्री को जो समाचार पत्रों में स्थान मिलना चाहिए था वह नहीं मिल पा रहा है। वहीं कई समाचार पत्रों व इलेक्ट्रानिक मीडिया तक के वरि’ठ पत्रकारों ने इस अधिकारी की मीडिया से बेरूखी की जानकारी मुख्यमंत्री तक को दे देने की जानकारी भी प्राप्त हुई है। इतना ही नहीं एक जानकारी के अनुसार इस अधिकारी की कार्यप्रणाली से विभागीय अधिकारी व कर्मचारी भी खासे नाराज बताये जा रहे है और उन्होने इसके साथ असहयोंगात्मक रवैया भी अख्तियार कर लिया है। वहीं मुख्यमंत्री कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री सचिवालय इसके स्थान पर किसी अन्य अधिकारी की खोज में जुट गया
है क्योंकि मुख्यमंत्री को आगामी महीनों में विधानसभा चुनाव लड़ना है और राज्य में एक लोकसभा का उपचुनाव भी होना है, ऐसे में मुख्यमंत्री के नजदीकी लोग नहीं चाहते कि चुनाव के दौरान मीडिया इस अधिकारी के कारण मुख्यमंत्री को ही कहीं निशाना न बना डालें और उनकी भी खंण्डूरी की तरह वह दुर्गति न हो जो उनकी कोटद्वार विधानसभा चुनाव में हुई थी।

चर्चाओं के अनुसार राजधानी से निकलने वाले तमाम साप्ताहिक समाचार पत्रों के संपादक तथा उनके संवाददाता भी सूचना महानिदेशक के कार्यो से काफी खफा बताये गये हैं उन्होने भी इनके विरूद्ध आन्दोलन का बिगुल बजा दिया है। इतना ही नहीं विज्ञापनों में भी बड़ा मतभेद सामने आया है स्थानीय समाचार पत्रों तथा राष्ट्रिय समाचार पत्रों को विज्ञापन देने में बरती जा रही असमानता को लेकर भी समाचार पत्रों के प्रकाशकों में रोष व्याप्त हो गया है उनका कहना है महानिदेशकों के तुगलकी फरमान के चलते राजधानी से निकलने वाले मात्र चार समाचार पत्रों को ही वरियता देना स्थानीय व रा’ट्रीय समाचार पत्रों के साथ अन्याय है। इनका कहना है कि इन चारों समाचार पत्रों को बीते महीने उतने विज्ञापन दिये गये जितने विज्ञापन राजधानी व राज्य से प्रकाशित  होने वाले समाचार पत्रों को एक वर्ष में भी नहीं मिले।

जर्नलिस्ट यूनियन आफ उत्तराखण्ड के प्रदेश उपाध्यक्ष सहित तमाम पत्रकार संगठनों ने बताया कि यदि महानिदेशक  सूचना का यही रवैया रहा तो वह दिन दूर नहीं जब समाचार पत्र सरकार के पक्ष में खड़ा होना बन्द कर देंगे। इससे सरकार की जो किरकिरी होगी उसका जिम्मेदार महानिदेशक सूचना ही होगें। 

(राजेन्द्र जोशी)

कमजोर लोग रचते हैं कॉकस !!!

वे नहीं कर सकते अकेले कुछ भी !!!


मनुष्य मात्र में ईश्वर ने अपनी सारी अनुकंपा लुटायी है और उसे अंश के रूप में प्रकटाया है लेकिन ऐसे लोगों की संख्या नगण्य हुआ करती है जो इस परम सत्य और शाश्वत स्थिति को समझ पाते हैं। बहुसंख्य लोग न केवल अपनी प्रतिभाओं और ऊर्जाओं से अनभिज्ञ होते हैं बल्कि उन्हें न अपने अवतरण के उद्देश्य का पता रहता है, न जीवन के लक्ष्य का। ऐसे लोग जो प्राप्त करते हैं वह अपने भाग्य या चालाकियों से, समझौतों से अथवा किसी न किसी की दया और कृपा पर निर्भर रहकर। फिर चाहे वे छोटी कुर्सी वाले हों या बड़े आसनों या सिंहासनों वाले।

ऐसे आत्महीन और कामचलाऊ तथा कामटालू लोग कहीं भी हो सकते हैं। लेकिन इन सभी में एक ख़ासियत जरूर हुआ करती है और वह है कॉकस बनाना। ये लोग जहाँ कहीं रहेंगे अकेले कुछ कर पाने का माद्दा या साहस नहीं बटोर पाते। अकेले इनके भरोसे कोई काम सफल हो नहीं सकता, न ही अकेले रहकर ये लोग कोई उपलब्धि हासिल कर पाते हैं। इन्हें हमेशा कोई न कोई समानधर्मा या उनकी बातों में हाँ में हाँ करने वाले कुछ न कुछ लोग जरूर चाहिएं और इसीलिए ये लोग हमेशा बिना किसी वजह के भी किसी न किसी कॉकस को बनाए हुए टाईमपास करने को विवश होते हैं।

बिना किसी कॉकस के इनका व्यक्तित्व धुंधला ही बना रहता है और जैसे ही इनकी तरह के लोग जुड़ जाते हैं इनका आभा मण्डल निखर उठता है। बिना कॉकस के ये लोग अधमरे पड़े रहते हैं और कॉकस जुड़ जाने पर इनमें लोगों को मसल देने और मार डालने तक की ताकत आ जाती है। आम तौर पर समय की नब्ज़ को पहचानने वाले और क्षणभंगुर जीवन के मर्म को समझने वाले लोग अकेले हों तब भी समाज के लिए कुछ न कुछ अच्छे कार्य करते ही रहते हैं, मगर कॉकस पसन्द लोगों के सामने वर्तमान के सारे आनंद पा लेने के सिवा कोई लक्ष्य सामने होता ही नहीं।

इसलिए ऐसे लोग सभी जगह मिल ही जाते हैं जिनका स्वभाव एक जैसा होता है। यह जरूरी नहीं कि कॉकस में शामिल सारे लोगों का मानसिक धरातल एक जैसे स्तर का ही हो। कॉकस का अर्थ ही यह है कि अपनी मनमानी करने वाले लोगों का वह समूह जो उन सभी हरकतों को करने में स्वच्छंद है जो उन्हें आनंदित करती हैं। इस स्वच्छन्दता में न कहीं गरिमा या शालीनता होती है, न इसका कोई परिणाम, सिर्फ तात्कालिक मनोरंजन भर से ज्यादा यह कुछ नहीं हुआ करता। समाज-जीवन और कर्मधाराओं के हर क्षेत्र में आज कॉकस चल रहे हैं, चलाएं और दौड़ाए जा रहे हैं, और अनगिनत लोग अपने-अपने कॉकस को अपना संसार मानकर बैठे हुए आनंद ले रहे हैं।

इस कॉकस का मकसद ही यह होता है कि चाहे किसी भी सीमा तक जाकर भी, संसार के किसी भी विषय की चर्चा करते हुए आलोचना या निन्दा करते हुए ये रसपान करते रहते हैं। यही रस इनका जीवन बनाता है और जिन्दा रहने तक की ऊर्जा देता रहता है। इस कॉकस को देख कर हमें याद आने लगता है गायों और भैंसों का झुण्ड जो बीच रास्ते या जंगल में कहीं भी पास-पास बैठा रहकर जुगाली करता रहता है, भेड़ों की रेवड़ का किसी खेत में ठहराव हो या निठल्लों की कहीं भी जम जाने वाली जमात। अन्तर सिर्फ इतना है कि भगवान ने उन्हें मूक बना रखा है और इन्हें वाणी दे डाली है।

वे बिरले ही होते हैं जिनका व्यक्तित्व और कद इतना ऊँचा होता है कि वे अकेले अपने दम पर बहुत कुछ ऐसा कर गुजरते हैं कि सदियाँ याद रखती हैं। वरना आज अकेले ही कुछ कर पाने का माद्दा इने-गिने लोगों में ही देखने को मिलता है। बहुसंख्य लोग सामान्य कामकाज के लिए भी समूह के रूप में जहाँ-तहाँ नज़र आते हैं। यही उनका कॉकस होता है। यह कॉकस की ही ताकत होती है कि एक-दूसरे के कामों के लिए समूह के रूप में इधर-उधर भटकते या दौड़ लगाते दिखने लगते हैं। कई तरह के बाड़ों में अलग-अलग रंगों और रसों के कॉकस विद्यमान होते हैं जिनका एकमेव उद्देश्य एक-दूसरे की भावनाओं और विचारों को पुष्ट करते रहना होता है। यह जरूरी नहीं कि ये विचार सकारात्मक या पावन ही हों, इनका स्वरूप किसी भी प्रकार का हो सकता है।

किसी भी तरह के कॉकस को हम यदि विभाजित करके देखें तो इनमें से एक की भी क्षमता इतनी नहीं होती कि दूसरों को प्रभावित कर दे। बिना कॉकस के इनके जीवन का कोई काम संभव है ही नहीं। यों भी अच्छे कामों के लिए किसी भी प्रकार का कॉकस न भी हो तो ये काम अपने आप होते चले जाते हैं लेकिन बुरे और आलोचना भरे या दो नम्बरी अर्थात अवैध कामों के लिए कॉकस की ताकत जरूरी होती है। यह तय मानकर चलें कि कॉकस के रूप में शामिल लोग मिल-जुल कर भले ही कुछ कर लें मगर अकेले इनका कोई वजूद नहीं होता। ईश्वर ने तो उन्हें अपार शक्तियाँ दी होती हैं मगर मलीन मन वाले लोगों के लिए आत्महीनता की वजह से ये शक्तियाँ आजीवन विस्मृत ही रहती हैं।

जहाँ कॉकस बने होते हैं वहाँ इसकी हर इकाई कमजोर कड़ी ही हुआ करती है। यह कॉकस अपने व्यक्तित्व की जड़ों को कमजोर करता है और इसका पता तब चलता है जब कॉकस में शामिल लोगों का मन, शरीर और बुद्धि जवाब दे जाते हैं और वह समय आ जाता है जब सभी को वापस लौट जाने की अनमनी तैयारी करनी होती है।


---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

शनिवार, 19 मई 2012

खोखले होते हैं ज्यादा बोलने वाले....

मितभाषी बनें, प्रभावी बोलें !!!


लोगों की कई किस्मे हैं। कुछ लोग खूब बोलते हैं, कुछ बोलने की जरूरत पड़ने पर भी गूँगे बने रहते हैं और कुछ उतना ही बोलते हैं जितना बोलना होता है। बोलने वाले और अबोले लोगों के बीच मध्यम मार्गी लोग होते हैं जो कहाँ क्या बोलना है उसमें माहिर होते हैं। इन सभी का साफ-सुथरा अध्ययन किया जाए तो हमेशा यह निष्कर्ष सामने आएगा कि निम्न और संकीर्ण सोच वाले लोग खूब बोलते हैं, बोलते ही रहते हैं और बड़े ही जोर-जोर से बोलते रहते हैं।

इन लोगों का बोलना भी ऐसा लगता है जैसे ये चिल्ला रहे हों या लड़ाई ही करने पर ही आमादा हों। दूसरी ओर धीर-गंभीर और शांत लोग धीरे बोलते हैं और उनकी वाणी से स्पष्ट ही पता लग जाता है कि ये भारी लोग हैं और इनके भीतर उदारता और संतोष भरा हुआ है। हमेशा कमजोर और नीच आदमी जोर-जोर से बोलता है और इतना सारा बोल देता है कि सुनने वाले को अजीर्ण होने लगता है। ऐसे लोग दस-पाँच फीट पर खड़े व्यक्ति को भी सुनाने के लिए ऐसे बोलेंगे जैसे वह सौ मीटर दूर खड़ा हो।

आम तौर पर हमारे आस-पास की बात करें या कहीं दूर की, हर जगह कौअे काले ही होते हैं और गधे धूल में लोटने के आदी, सूअर कीचड़ ही सूँघते मिलेंगे और दुनिया में हर कहीं पागलों का वजूद बना हुआ है। सर्वत्र मनुष्यों की ये सभी प्रकार की प्रजातियाँ विद्यमान हैं जिनकी वाणी से ही हम पता लगा सकते हैं कि कौन कितना हल्का है, और कौन कितना भारी। हल्के और खोखले आदमी सदैव जोरों से बोलते हैं। तनिक सी बाहरी हलचल इनके कानों में पड़ जाने पर ये डिब्बे बोलने लगते हैं और फिर बोलते ही चले जाते हैं जब तक कि थक नहीं जाएँ। ज्यादा और तेज बोलने वालों के जीवन में कहीं कोई उपलब्धि देखने नहीं मिलती, अपवादस्वरूप कहीं कुछ देखने मिल जाए वो अलग बात है।

जो लोग ज्ञान और अनुभवा की ऊर्जाओं से भरे होते हैं वे भारी होते हैं, शांत, नम्र और गंभीर होते हैं तथा जो भी बात कहनी होती है बड़ी ही तसल्ली और धीरे से कहने के आदी होते हैं। आवाज के माध्यम से दुनिया में किसी भी आदमी का आकलन करना हो तो उसकी वाणी और बोलने की तीव्रता के अनुसार किया जाना ज्यादा सटीक और खरा-खरा होता है। अपने आस-पास के लोगों को देखियें और उन्हें परखियें इस कसौटी पर, फिर देखियें आप कितने सही ठहरते हैं।

व्यक्ति का मन-मस्तिष्क और उसकी वाणी का सीधा संबंध होता है। इसी प्रकार वाणी का माधुर्य भी व्यक्तित्व का परिचायक है। कहा जाता है कि चित्त और मस्तिष्क की शुद्धि रहने पर वाणी शुद्ध रहती है और उच्चारण दोष नहीं रहता। इसके साथ ही ऐसे लोगों की वाणी का माधुर्य अपने आप झलकने लगता है। दूसरी ओर शारीरिक कारणों को छोड़ दिया जाए तो कुटिल तथा भ्रष्ट लोगों की वाणी दूषित रहती है तथा उच्चारण दोष बना रहता है। यह देखने में आता है कि जो जितना ज्यादा भ्रष्ट होता है उसकी वाणी उतनी अधिक दूषित रहती है। इनमें उन लोगों को अपवाद ही माना जाना चाहिए जिनके लिए बोलना एक धंधा बना हुआ है तथा जिनका जन्म ही भाषणों के लिए हुआ है।

वाणी का सीधा संबंध सम्प्रेषण कौशल से है। जो लोग ज्यादा बोलने वाले होते हैं वे किसी विषय को हजारों शब्दों के माध्यम से भी स्पष्ट और सहज तरीके से समझा नहीं सकते, जबकि कम बोलने वाले लोग उसी बात को चन्द शब्दों में सामने वाले के जेहन तक में उतार देने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। इसका मूल कारण यह है कि खूब बोलते रहने वाले लोगों के शब्दों में ताकत का अभाव रहता है और कम बोलने वाले लोग अपने शब्दों के पीछे छिपी शक्ति को सहेज कर रखते हैं। जीवन में फालतू बोलने और बकवास से बाज आएँ और जहाँ जरूरी हो वहीं अपनी वाणी का इस्तेमाल करेंे, फिर देखें आपकी वाणी भी चन्द शब्दों में ऐसा प्रभाव छोड़ देगी कि आपकी हर सोच ओर बात सामने वाले के दिमाग में घर कर जाएगी और अच्छे प्रभाव छोडे़गी।

पर याद रखियें कि जो कुछ बोलें वह उनके सामने ही बोलें जिनके लिए आपके बोलने का अर्थ हो या उनमें आपको समझने की क्षमता हो। ऐसे वज्र मूर्ख लोगों के सामने कभी न बोलें जिन्हें न आपके शब्द समझ में आते हैं न भाव।  अपनी वाणी का मोल पहचानें और वहीं अभिव्यक्ति करें जहाँ आपके बोलने का अर्थ सामने आए।



---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

शुक्रवार, 18 मई 2012

शुद्ध आचरण के बिना अर्थहीन हैं !!!

सकारात्मकता अपनाने के उपदेश


उपदेशों की हर जगह भरमार है। अपने यहाँ से लेकर सभी जगह जनसंख्या का सर्वाधिक प्रतिशत उन्हीं लोगों का है जो अच्छे उपदेश देने में माहिर हैं। भले ही उनकी कथनी और करनी में कहीं कोई मेल नहीं हो, पर उपदेश देने का उनका अधिकार ताजिन्दगी बरकरार रहता है। उपदेशकोें के लिए न जात-पाँत का कोई बंधन है, न अमीर-गरीब का और न ही छोटे-बड़े का। ये लोग कहीं के भी हो सकते हैं और कोई भी। उपदेशक सारी सीमाओं और परिधियों से परे रहा करते हैं। इनके लिए यह जरूरी भी नहीं कि इनकी राय ली जाए या नहीं, इनकी नॉन स्टॉप उपदेश धारा का वॉल्व कहीं भी शुरू हो सकता है।

इन उपदेशकों का उनके व्यक्तित्व और आचरण से दूर-दूर तक का कोई रिश्ता नहीं होता। डींगे हाँक कर खुद को ऊँचा दिखाने के आदी ये लोग हर किसी विषय पर बेबाक उपदेशों का श्रवण करा सकते हैं। इन उपदेशकों के जीवन का सबसे बड़ा धर्म ही है चाहे-अनचाहे उपदेशों की सहस्रधारा से नहलाते रहना। बहुत सारे व्यक्ति ऐसे मिल जाते हैं जो आदर्श और सकारात्मक जीवनयापन के लिए हर मंच पर और हर मुलाकात या बैठकों और सभाओं में सकारात्मक व्यक्तित्व पर जोर देते रहते हैं।

बुद्धिजीवियों के लिए अपने जीवन का सबसे बड़ा आडम्बर यही है कि जो काम वे नहीं करना चाहते या जिनमें उनकी रुचि नहीं होती उसे बड़े ही माधुर्य से मार्गान्तरित कर दिया करते हैं और नसीहत देते हैं सकारात्मक होने की, दुहाई देते हैं आदर्शों की। वरना पूरे जीवन में ये लोग जमाने की नज़रंे चुराकर सैकड़ों काम ऐसे कर डालते हैं जिनका न सकारात्मकता से कोई संबंध है और न किसी आदर्श से। अपनी छवि को बचाये और बनाए रखने के लिए सकारात्मक होने और आदर्शों को अपनाने के उपदेश देने वालों में सभी तरह के लोग शामिल हैं। इनमें सरकारी जँवाइयों से लेकर हाकिम, मुलाजिम, हुजूर, अर्दली और वे तमाम नुमाइन्दे भी शामिल हैं जो साठ बरस तक जौंक के हुनर को लिए किसम-किसम के बाड़ों में विचरण कर रहे हैं। ये लोग अपने किलों को मजबूत रखने और अपनी छवि का बाह्य सौन्दर्य बनाए रखने के फेर में सभी को नसीहत देते हैं सकारात्मक व्यक्तित्व अपनाने की।

जो लोग सामाजिक बदलाव लाने में सक्षम हैं और जिनकी कलम और कर्म की ताकत ही इतनी है कि वे जनता के हित में चाहे जो निर्णय ले सकते हैं लेकिन ऐसे लोगों में से अधिकांश लोग ऐसे ही हैं जो सहज और सरल कामों में कोई रुचि नहीं लेते हैं बल्कि इनकी रुचि उन्हीं कामों में होती है जहाँ कोई मलाई या मावा दिखता है। जहाँ कुछ नहीं मिल पाता, वहाँ ये लोग बड़ी ही बौद्धिक चतुराई से कभी सकारात्मक होने की बात कहेंगे, कभी ईश्वर की इच्छा की दुहाई देंगे तो कभी टालू वृत्ति का पूरा-पूरा परिचय देते हुए समय गुजार देते हैं।

बात कहीं की भी हो, जहाँ राज धर्म और राजदण्ड का उपयोग करना होता है वहाँ भी ऐसे सकारात्मक उपदेशी लोगों की वजह से व्यवस्थाएं गड़बड़ा जाती हैं मगर इनके निकम्मेपन की वजह से कुछ बदलाव नहीं हो पाता। हम ऐसे कई लोगों को देख चुके होते हैं जो किसी भी समस्या या संकट के समय कुछ हल ढूंढ़ने की बजाय सकारात्मक बने रहने की नसीहत देते हैं और खुद द्रष्टा होकर रहना ज्यादा पसन्द करते हैं ताकि उनकी छवि निरापद और स्वच्छ बनी रहे। उन्हें औरों की छवि या मानवीय संवेदनाओं से कोई लेना-देना नहीं होता।

इन लोगों को यह अच्छी तरह पता होता है कि समस्याओं का अंत या समाधान सिर्फ सकारात्मक सोच के साथ कभी नहीं हो सकता, अनुशासन और दण्डात्मक विधान इससे कहीं ज्यादा जरूरी है। आजकल हो यह गया है कि बुरे और निकम्मे लोग बिना कुछ मेहनत किए हराम की खा रहे हैं, ऐसे लोगों का न काम में विश्वास है, न समाज और देश या राष्ट्रीय चरित्र से कोई लेना-देना। इन लोगों के जीवन का एक सूत्री कार्यक्रम होता है जहाँ हैं वहाँ बिना कुछ काम किए धराए, टाईमपास करते हुए जितना अधिक बटोर सकें, बटोर लें और अपने में वो क्षमता विकसित कर लेें कि हर मनचाहे काम के लिए चाहे उसे खरीद लें और काम करवा लेने का सामर्थ्य विकसित कर लें।

फिर ऐसे लोगों की हर कहीं तूती भी बोलने लगती है। बोले भी क्यों नहीं, उल्टे-सीधे काम करते हुए इनमें हर किसी को खरीद लेने की क्षमता अपने आप आ ही जाती है। जो पाएगा वही तो दे पाएगा। अपने यहाँ टिकाऊ से ज्यादा संख्या ऐसे लोगों की है जो मनमाने दाम पर कहीं भी बिक जाते हैं। जहाँ बिकाऊओं की भरमार है वहाँ खरीदारों को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती। इस संसार में लेन-देन को ही सर्वाधिक महत्त्व दिया होता है। संबंधों का आधार जब लेन-देन ही है तो फिर बिकने और बेचने वाले लोग कुछ भी करें तो इसका बुरा किसी को नहीं मानना चाहिए। 

अपने यहाँ ऐसे-ऐसे लोग भी हैं जो ईमान तक बेच देते हैं, वहीं ऐसे भी हैं जिन्हें कोई खरीद तक नहीं सकता। दोनों ही किस्मों का अंतर आम आदमी अच्छी तरह समझता है। इसी तरह वे लोग भी समाज के लिए नाकारा ही रहते हैं जो सकारात्मक होने के उपदेश झाड़ते हुए समय गुजारने के आदी हो चले हैं। सकारात्मक होने का आजकल जो अर्थ सामने आ रहा है उसमें कायरता और नपुंसकता की गंध आती है। कोई कुछ भी करे, करता रहे, उसे अधिकार है, और हम कुछ न करें क्योंकि हमें सकारात्मक रहने की घुट्टी पिलायी हुई है।

कोई उन लोगों से कुछ नहीं कहता जो अपनी पैशाचिक वृत्तियों के उदाहरण जब-तब देते हुए अच्छे और भले लोगों को प्रताड़ित करते रहे हैं, मुश्किल यह है कि ऐसे उपदेशकों को लगता है कि बुरे लोगों को नसीहत देने का मतलब है उनकी अपनी शांति भंग होना और इसीलिये वे दूसरे पक्ष के लिए सकारात्मक होने की राय देते हैं। बुरे लोगों को यह अधिकार किसने दिया है कि वे अच्छे लोगों के बारे में अनर्गल टिप्पणियां करें, नापाक समझौते करते रहें और पूरी जिन्दगी हराम की कमाई, लूट-खसोट की वृत्ति में रमे रहें। खुद भी जमकर खायें और दूसरों को भी खिलाते रहें। 

एक-दूसरे मानव शरीरी पिशाचों की परस्पर खुश करने और रखने की इसी प्रवृत्ति का ही परिणाम है आज हर इलाके में नर पिशाचों के कई-कई समूह बन गए हैं जिनका एक ही काम रह गया है सामाजिक और नैतिक व्यवस्था को चाहे जैसे भी हो छिन्न-भिन्न करना और चतुर्दिक यही उद्घोष करना - अँधेरा कायम रहे...।


---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

बृहस्पतिवार, 17 मई 2012

आलोचना ही न करें, कभी माधुर्य भी प्रकटाएँ

हर आदमी का अपना-अपना मौलिक स्वभाव होता है। स्वभाव कई रूपों में सामने आता है। कभी मौलिकता लिए हुए होता है, कोई आडम्बरी और कोई दोहरा-तिहरा भाव प्रकटाने वाला। कुछ लोग शैशव से ही एक जैसे होते हैं, कुछ जमाने की हवा पाकर बिगड़ जाते हैं, कुछ दुष्टों की संगति पाकर, और कुछ किन्हीं और कारणों से। अलग-अलग स्वभाव वाले लोगों के कारण ही जमाना सतरंगी बना रहता है। फिर भी व्यक्ति का स्वभाव संस्कारों के बीजारोपण से लेकर पल्लवन की स्थितियों पर ही निर्भर करता है। स्वभाव की दो स्थितियां मुख्य रूप से उभर कर सामने आती हैं। नकारात्मक और सकारात्मक। जहाँ स्वभाव में नकारात्मकता घर कर लेती है वहाँ व्यक्ति मूल्यांकन के सारे गुण-धर्म गँवा बैठता है। वह सही को सही नहीं कह सकता, और गलत को गलत नही। बल्कि सही को गलत ठहराना ऐसे लोगों के लिए आसान होता है और असत्य तथा अहंकार इतना हावी होने लगता है कि संसार की हर घटना की आलोचना करने के सिवा उन्हें चैन नहीं आता। इनका पूरा आभा मण्डल आलोचनाओं के कई-कई घेरों से इस कदर घिर जाता है कि उन्हें हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा नज़र आता है।

अपने यहाँ ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जिन्हें हर काम में आलोचना और निन्दा ही सूझती है जैसे कि वे अपने क्षेत्र के एक्सपर्ट ही हों। दुनिया का अच्छे से अच्छा काम या आदमी इन्हें खराब ही लगता है और उसकी आलोचना इनका जन्मसिद्ध अधिकार। जैसे कि इनका जन्म ही इस पावन धरा पर आलोचना और निन्दा के लिए हुआ है। जहां कहीं इनकी पावन देह विराजमान रहेगी या भ्रमणशील होगी, चार लोग ऐसे मिल ही जाते हैं जो दुम हिलाते नज़र आते हैं और इनकी हाँ में हाँ करने लगते हैं। इनमें कई पिल्ले तो इनके पाले हुए होते हैं और कई झूठन चाटने के फेर में इनके इर्द-गिर्द यों ही मण्डराते रहते हैं। फिर बड़ा भौंकता है तो नैतिकता के आधार पर छोटों को तो जोर-जोर से  भौंकना ही पड़ता हैै। कोई इलाका ऐसा नहीं बचा है जहाँ इनका अस्तित्व सहज ही न दिख जाए। इनकी हर अदा और हर वाक्य में आलोचना और निन्दा के सिवा कुछ होता ही नहीं। सवेरे नींद से जगेंगे तब भी सूरज को देख खामी निकालने में माहिर इन लोगों को जहाँ जो कुछ दिखता है उसकी खामियां निकालनी शुरू कर देते हैं। जो काम इन्होंने जीवन भर नहीं किये हों अथवा किए हों, अपने अनुभवों से लाभान्वित करने में इन्हें उतनी रुचि नहीं होती जितनी रुचि नुख्स निकालने में हुआ करती है।

जीवन में व्यवहार माधुर्य का सबसे अच्छा तरीका यह है कि किसी भी प्रकार की कमी दिखाई देने पर अकेले में संबंधितों को इसके बारे में बताएं और अपने अनुभवों का लाभ देकर बेहतर बनाने के लिए सुझाव भी दें। पर आजकल ऐसे भारी लोग रहे ही नहीं, वो जमाना बीत गया। आजकल चारों ओर खाली ड्रम और पीपे खूब हैं जो सिर्फ बजना जानते हैं, सुकून देना नहीं। हमारे आस-पास ऐसे खूब लोग हैं जो किसी की बुराई या निन्दा करने के लिए मौके की तलाश में रहते हैं और जहाँ कोई सार्वजनिक मंच इन्हें मिल जाता है या ये हथिया लेते हैं, वहाँ सारी भड़ास निकालते हुए आलोचनाओं के अग्निबाण छोड़ देते हैं। कई बार तो बेचारे उन आयोजकों की आफत ही आ जाती है जो उन्हें विद्वत्ता या लोकप्रियता के भरम में आमंत्रित कर लाते हैं। 

समाज में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जिनका एकमेव उद्देश्य आलोचना करना, सुनना और आलोचनाओं  में जीना ही रह गया है। लगातार ऐसी प्रवृत्तियां अपनाते रहने से क्षेत्र के लोग भी इनसे इस कदर उकता जाते हैं कि बस। इन लोगों को लगता है कि आलोचना के अस्त्र चलाकर ही वे लोकप्रियता का रण जीत सकते हैं, और इसीलिए जहाँ मौका मिलता है वहाँ आलोचना का दामन थाम लेते हैं। जो लोग अपने जीवन में आलोचना को हथियार मानकर चलने के आदी हो गए हैं उन्हें गंभीरता से यह चिंतन करना होगा कि आलोचना को अपनाने के बाद लगातार लोग उनसे छिटकने लगे हैं और दूरियां बढ़ती जा रही हैं। मजबूरी को छोड़ दें तो कोई भी आदमी उनकी छाया तक के पास फटकना नहीं चाहता। आलोचना करें लेकिन इसके लिए सार्वजनिक मंच या समूहों को माध्यम न बनाएं बल्कि संबंधित व्यक्तियों के समक्ष अपनी आलोचना का इज़हार करें, हर अवसर को आलोचना का मंच न बनाएं। सदैव आलोचना करने वाले लोग कालान्तर में हास्यास्पद विदूषक की लोकपदवी पर प्रतिष्ठित हो जाते हैं। समझदार लोग इन्हें खर-दूषण की संज्ञा देने में भी कभी नहीं चूकते।

आलोचना में ही रमे रहने वाले लोग एक बार समय निकाल कर आत्मचिन्तन करें तो उनकी अन्तर आत्मा स्पष्ट संकेत कर ही देगी कि अब तक गुजारे हुए क्षणों में उनका कितना पतन हो चला है। इसलिए आलोचना करें मगर समय और मंच देखकर।  अपने स्वभाव को बदल नहीं पाएं तो धीरे-धीरे प्रयास करें और व्यक्तित्व में माधुर्य लाएं। ऐसा हो जाने पर जीवन की कई धाराएं अपने आप करवट लेने लगती हैं और नई जिन्दगी का अहसास होता है। इससे कई बदलाव अपने आप शुरू हो जाते हैं। जीवन में यदि सच बोलने का साहस ही अपना लिया जाए तो कई मामलों में माधुर्य अपने आप आ ही जाता है क्योंकि सच हमेशा पारदर्शी होता है। सब कुछ जानते बूझते हुए भी बदलाव लाने को कोई तैयार नहीं है तो यह निश्चित मानियें कि इस जन्म में वह कभी नहीं सुधर सकता है और ये बुराई उसके शरीर के साथ ही जाने वाली है। भगवान करे ऐसे सारे लोगों को उनकी उमर रहते सद्बुद्धि आ जाए जो आलोचनाओं और निन्दाओं को ही जीवन का आधार मानकर कमा खा रहे हैं। विश्वास किया जाना चाहिए कि कभी तो अच्छी हवाएँ आएंगी और यह प्रदूषण खत्म होगा।


---डॉ. दीपक आचार्य---
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