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खेतिहर किसानों के मसीहा ब्रहमेश्वर मुखिया की गोली मारकर ह्त्या.

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शुक्रवार, 24 दिसम्बर 2010

क्या ये प्रणव रॉय की गुंडागर्दी नहीं है.


प्रणव रॉय बड़े ही शरीफ और शालीन पत्रकार के रूप में जाने और पहचाने जाते हैं. कुछ ही लोग हैं जो इनकी हकीकत को जानते हैं और इनके वास्तविक स्वरुप को पहचानते हैं इनमे से एक "आलोक तोमर". आलोक जी ने जब इनकी वास्तविकता को लोगों के सामने रख दिया तो महाशय बिफर गए. भ्रष्टाचार की महा देवी बरखा दत्त के लिए झंडाबरदार होने वाले इस महा भ्रष्ट पत्रकार को ये बात बिलकुल हजम नहीं हुई की कोई इसे किसी से तुलना कर डाले. बस फिर क्या था........

आलोक तोमर के ही शब्दों में.....

डॉक्टर प्रणय रॉय और उनकी धर्म पत्नी राधिका की ओर से उनके एनडीटीवी की एक भारी भरकम कॉरपोरेट कानूनी कंपनी ने कानूनी नोटिस भेज कर कहा है कि कंपनी के शेयरों की हेराफेरी में प्रणय रॉय की तुलना केतन पारिख से करने को ले कर हम माफी मांगे और उस माफी को धूम धड़ाके से प्रकाशित करें। अब जो बरखा दत्त मनमोहन सिंह को भी आदेश दे सकती है कि राजा को मंत्री बना लीजिए और राजा मंत्री बन भी जाते हैं ऐसी बरखा के बादलों यानी बॉस प्रणय रॉय का हम क्या बिगाड़ सकते हैं इसलिए लीजिए धूम धड़ाके से माफी पेश है।

श्री प्रणय रॉय, हमे अफसोस हैं और हम शर्मिंदा हैं कि हमने आपके सिर्फ एक पक्ष के बारे में लिखा। कहानियां तो दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स के जमाने से चलती आ रही है और स्टार की जेम्स मर्डोक से भी सुना है कि एनडीटीवी ने स्टार के ठेके पर बनाए गए हर शो का कॉपीराइट हड़प करने की कैसे कोशिश की थी। लेकिन हमे लगा कि गंदा हैं लेकिन धंधा है। हम आपको रोजी रोटी के मामले में जलील क्यों करे? मगर बात आपने ही छेड़ी है तो जवाब भी सुन लीजिए।

आप कितनी रकम ले कर टीवी की दुनिया में आए थे और आज हजारो करोड़ का जो कारोबार बिखेर रखा है इसके पीछे का सच क्या है? क्या सच यह नहीं हैं कि करोड़ की पहली रकम आपने दूरदर्शन के फुटेज उसी को बेच कर कमाई थी और इस मामले में आपके और दूरदर्शन के कई बड़े अफसरों के खिलाफ बाकायदा सीबीआई मे मुकदमा दर्ज हुआ था। अभी इसी साल यानी 2010 में सीबीआई ने लगभग उसी तरह यह मुकदमा वापस ले लिया जैसे महाठग और पद्मभूषण संत सिंह चटवाल का मुकदमा वापस लिया था। पद्म विभूषण तो आप भी हैं। पद्म सम्मानों और आर्थिक अपराधों का क्या आपस में कोई रिश्ता होता है?

एनडीटीवी पहले सिर्फ दूरदर्शन के लिए साप्ताहिक और बजट समीक्षा के कार्यक्रम बनाती थी। आप श्री प्रणय रॉय उस समय एक कमरे से चलने वाली इस कंपनी के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन थे। आप पर और आपकी कंपनी पर दूरदर्शन को तीन करोड़ बावन लाख रुपए का नुकसान पहुंचाने और सरकारी अफसरों को रिश्वत देने के मामले में साजिश या धारा 120 बी और प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के तहत मामले दर्ज हुए थे।

उस समय दूरदर्शन से निकल कर बाद में स्टार टीवी में चले गए रतिकांत बसु के खिलाफ भी सीबीआई ने जांच शुरू की थी और इस बारे में उस समय के पर्सोनल विभाग के अतिरिक्त सचिव वी लक्ष्मी रतन के हाथ के लिखी फाइल मौजूद हैं। इस मामले में रिश्वत देने वाले प्रणय रॉय थे और लेने वाले बसु। अगर मेरी जानकारी गलत हो तो लुथराओं से कहिए कि एक और नोटिस भेज दे। उसका भी जवाब अपने पास है। हमें मालूम है कि वे क्या लिखेंगे। हमे मालूम है कि आपके दामन में कितने छेद हैं।

सीबीआई ने जांच की शुरूआत के वक्त दो आरोपों पर ध्यान दिया था। रतिकांत बसु ने दूरदर्शन के महानिदेशक की हैसियत से प्रणय रॉय के एनडीटीवी द्वारा बनाए गए समाचार कार्यक्रम ''दी वर्ल्ड स्पीक'' को प्रायोजकों से ज्यादा पैसे वसूलने के लिए ए वर्ग में रखा था। यह पहला और आखिरी समाचार कार्यक्रम था जो इस वर्ग में तब तक रखा गया था। संसद की लोकलेखा समिति तक ने इस घपले की आलोचना की थी। प्रणय बाबू आप किस दुनिया में रहते हैं? कोई आश्चर्य की बात नहीं कि जब एनडीटीवी और स्टार टीवी का गठबंधन हुआ तो रतिकांत बसु को सरकारी नौकरी से रिटायर होने के सिर्फ तीसरे दिन सारे नियम तोड़ कर 15 लाख रुपए प्रति माह के वेतन पर स्टार का सीईओ बना दिया गया। यह रकम बसु को बीस साल पहले मिलती थी। इसीलिए उस समय बसु ने कहा कि लोग मेरी तरक्की से जलते हैं इसलिए मामला बनाया जा रहा है।

स्टार टीवी जब भारत में आया था तो हमारे यहां प्रसारण का लाइसेंस पाने के लिए कई कड़ी शर्ते थीं। तब तक भारत सरकार मनमोहन सिंह के निवेश करो और जूते मारो वाले मंत्र की पूरी तरह भेंट नहीं चढ़ चुकी थी। किसी भी प्रकाशन या प्रसारण संस्था के लिए जरूरी था कि उसमें बहुसंख्यक शेयर्स भारतीय नागरिको के हों। इसीलिए स्टार ने एक फर्जी कंपनी बनाई जो आज भी स्टार न्यूज को चलाती है और उसकी पूंजी कुल मिला कर इतनी नहीं हैं कि अपने किसी बड़े अधिकारी का एक महीने का वेतन भी दे सके। इसके पहले स्टार ने जी न्यूज के साथ मिल कर धंधा शुरू करने की पहल की थी मगर जी न्यूज ने इरादे समझे और रिश्ता तोड़ लिया। स्टार को हेराफेरी के सारे तरीके बसु ने ही सिखाए थे।

जब स्टार का डीटीएच लाइसेंस प्रतिबंधित कर दिया गया था तो रतिकांत बसु, प्रणय रॉय और उस समय बहती गंगा में हाथ धोने की कोशिश कर रहे रजत शर्मा सीधे तत्कालीन प्रधानमंत्री के पास भागे थे और प्रधानमंत्री ने उस समय के कैबिनेट सचिव टी एस आर सुब्रमण्यम, संचार सचिव वी के गोकाक और सूचना और प्रसारण सचिव एन पी नवानी को इस बात के लिए झाड़ा था कि बगैर प्रधानमंत्री कार्यालय को बताए इतना महत्वपूर्ण फैसला कैसे कर लिया गया। पूरी अफसरशाही बसु और प्रणय रॉय के खिलाफ हो गई थी। बसु पर हर तरफ से हमले हो रहे थे। उन्होंने 15 दिन में इस्तीफा देने की घोषणा कर दी थी। रुपर्ट मर्डोक से ज्यादा बड़ा मीडिया नटवरलाल आज तक दुनिया में पैदा नहीं हुआ। मर्डोक ने अपने बड़े अधिकारी गैरी डेवी को एक सप्ताह में दो बार दिल्ली भेजा, खुद हांगकांग में आ कर बैठ गए। रतिकांत बसु और प्रणय रॉय दिन रात सौदा बचाने की कोशिश कर रहे थे।

आखिरकार जब पूरा खेल उजागर हुआ सीबीआई ने प्रणय रॉय, बसु और दूरदर्शन के पांच और बड़े अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया। सीबीआई के विशेष जज अजित भरिहोक की अदालत में जो चार्जशीट दी गई उसमें साफ कहा गया था कि प्रणय रॉय ने आपराधिक षडयंत्र किया है और दूरदर्शन के अधिकारियों ने इसमें मदद की है। खुद प्रणय रॉय ने एनडीटीवी की वार्षिक रपट में 2004 में जा कर इस मामले का वर्णन किया। कुछ लोग कहते हैं कि सुषमा स्वराज ने एनडीए सरकार के दौरान यह मामला दर्ज करवाया था। मगर बात इतनी आसान नहीं है। सुषमा स्वराज मर्डोक से निपटना चाहती थी और एनडीटीवी वगैरह उनके लिए इतने बडे नहीं हुए थे।

श्री प्रणय रॉय ने शायद 20 जनवरी 1998 का इंडियन एक्सप्रेस पढ़ा होगा। एक जमाने में राधिका रॉय इसी अखबार की समाचार संपादक हुआ करती थी। इसी अखबार में लिखा है कि सीबीआई ने आपराधिक साजिश का जो मामला एनडीटीवी के प्रबंध निदेशक प्रणय रॉय और सीईओ रतिकांत बसु के खिलाफ दर्ज किया है उसमें शिव शर्मा, हरीश अवस्थी, अशोक मनुसुखानी, एस कपूर और एस कृष्णा भी शामिल थे। हर छोटे छोटे मामले पर खबरे बनाने वाले और देश में बाघों को बचाने की मुहिम चलाने वाले एनडीटीवी की सीबीआई के एक मामले के प्रति खामोशी समझ में नहीं आई। सीबीआई के रिकॉर्ड में दर्ज है कि एनडीटीवी को विशेष तौर पर माइक्रोवेव और उपग्रह अपलिंकिंग सुविधाएं बिना उचित रिस्क के दी गई थी और मुंबई स्टुडियों में आने वाले दुनिया भर के फुटेज को वे इस्तेमाल भी कर सकते थे। विमला भल्ला नाम की एक अधिकारी मदद करती थी और प्रणय रॉय दिन रात और साप्ताहिक शो में भी इन दृश्यों का इस्तेमाल कर के इनकी कीमत दूरदर्शन से ही वसूल करते थे।

असली खेल तो यह था कि प्रणय रॉय के शो की कीमत दूरदर्शन की कॉस्टिंग कमेटी ने पचास हजार रुपए प्रति एपिसोड तय की थी मगर एनडीटीवी ने 81 हजार रुपए प्रति एपिसोड का बिल दिया था और विमला भल्ला ने ओएसडी न्यूज के नाते इसे फौरन मंजूर कर लिया था। यह मामला काल के शून्य में चला गया। रही बात एनडीटीवी के शेयर घोटाले की तो प्रणय रॉय ने बहुत चतुर रास्ता खोजा। बहुत सारी कंपनियां विदेश में बनाई और भारत में सौ रुपए में भी नहीं बिक रहे शेयर को वहां पांच सौ रुपए के आसपास बेच कर नीदरलैंड और लंदन तक से लगभग एक हजार करोड़ रुपए वसूल लिए। आखिर दिल्ली के ग्रेटर कैलाश में बहुत सारे बंगले और अर्चना सिनेमा जैसे महंगे कॉम्पलेक्स ऐसे ही नहीं खरीद लिए जाते। संपत्ति हड़पने की अलग कहानी है।

प्रणय रॉय आपको याद होगा कि आपके चैनल ने गैर समाचार श्रेणी का जो पहला और आखिरी कार्यक्रम जी मंत्री जी बनाया था और जो स्टार प्लस पर प्रसारित हुआ था, उसे मैंने ही लिखा था। हिंदी न जानने वाली एक ताड़का इसकी प्रोडयूसर थी और उनके सौभाग्य से लंदन में बीबीसी में बैठे परवेज आलम हर पटकथा की जांच कर के अगर जरूरी होता था तो मुझे संशोधन की सलाह देते थे। जब आपकी इतनी खिंचाई कर ली तो थोड़ा बहुत अपनी तारीफ करने का हक भी बनता है। जी मंत्री जी प्रसारित हुआ और काफी चर्चित हुआ। पेंग्विन ने इसकी पटकथा पर किताब भी छापी। लेकिन जी प्रधानमंत्री जी मैंने नहीं लिखा था और उसे स्टार ने प्रसारण लायक भी नहीं समझा। इस कहानी से शिक्षा मिलती है कि सब कुछ हेराफेरी से नहीं हो जाता। थोड़ी बुद्वि, थोड़ी प्रतिभा और थोड़ी ईमानदारी चाहिए होती है।

मैं वाकई आपका प्रशंसक रहा हूं और मुझे यहां जो लिखा गया है वह लिखते हुए प्रसन्नता नहीं हो रही। लेकिन एक मुद्दा था जो उठाया गया था और जिसे आपने वकीलों को मोटी फीस दे कर झूठा करार दिया था और सच को पूरे संदर्भों के साथ सच की तरह देखा जाए इसलिए यह लिखा गया है। अगर बुरा लगे तो माफ कर दीजिएगा और ध्यान रखिएगा कि यह मेरी आखिरी माफी है। अदालत जाना हो तो चलते हैं, वहां भी मिल लेंगे।


---आलोक तोमर---
डेटलाइन इंडिया डाट काम

बुधवार, 8 दिसम्बर 2010

एन डी टी वी और प्रणव रॉय का घोटाला.

यह एक ऐसे घोटाले की खबरे हैं जिसे पढ़ कर आप बरखा दत्त और वीर सांघवी के कर्म भूल जाएंगे। यह घोटाला करने का आरोप भी एनडीटीवी के चेयरमैन प्रणय राय पर है और इसे गंभीरता से लेने पर प्रणय राय हर्षद मेहता और केतन पारिख से ज्यादा अलग नजर नहीं आएंगे।

यह इल्जाम किसी आम आदमी ने नहीं लगाया। देश के सबसे सम्मानित पत्रकारों में से एक, भूतपूर्व सांसद, हेडलाइंस टुडे चैनल के मुखिया और संडे गार्जियन के संपादक एम जे अकबर ने बाकायदा लिख कर लगाया है और प्रणय राय और उनकी राधिका राय को चुनौती दी है कि इसका खंडन करे। यह घोटाला आईसीआईसीआई बैंक के साथ मिल कर किया गया बताया गया है।

घोटाले का तौर तरीका बताता है कि आर आर आर आर होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड के पास एनडीटीवी के अपार शेयर पडे हैं। इन शेयरों की कीमत नकली खरीददारी कर के जुलाई और अक्टूबर 2008 के बीच बढ़ा चढ़ा कर 439 रुपए प्रति शेयर बताई गई। कहा गया कि शेयर बढ़ रहे हैं इसलिए कंपनी अपनी शेयर वापस खरीदना चाहती है मगर उसके पास नकदी नहीं है। ईमानदार एनडीटीवी ने इंडिया बुल्स फाइनेंस सर्विस से 9070297 शेयर गिरवी रख कर 363 करोड़ रुपए ले लिए। यह कर्ज था और जुलाई 2008 में लिया गया था। अगस्त 2008 को शेयर बाजार लुढ़क गया। इंडेक्स 22 हजार से घट कर दस हजार पर आ गया और
एनडीटीवी के शेयर की कीमत 100 रुपए रह गई। इंडिया बुल्स ने एनडीटीवी से कहा कि हमारा पैसा वापस करो।

एनडीटीवी हमेशा की तरह कंगाल था। प्रणय राय ने अपनी साख का सहारा ले कर और शायद बरखा दत्त के टाटाओं, अंबानियों और राडियाओं से रिश्तों को इस्तेमाल कर के आईसीआईसीआई बैंक से अक्टूबर 2008 में 4741721 शेयरों के बदले 375 करोड़ रुपए का कर्ज लिया और ये वे शेयर थे जो आर आर आर आर नाम की अज्ञात कंपनी के पास थे। आईसीआईसीआई की चंदा कोचर जानबूझ कर अंधी हो गई और उन्होंने 100 रुपए का शेयर 439 रुपए का मान कर गिरवी रख लिया। यह पहला बड़ा घोटाला था।

इसके बाद एक और आर्थिक शातिर चाल में शेयर्स का दाम 23 अक्टूबर 2008 को 99 रुपए रह गया और 375 करोड़ के कर्जे के बदले बैंक के पास सिर्फ 47 करोड़ की गारंटी मौजूद रह गई और अब इस शून्य को भरना था। आर आर आर आर कंपनी के बारे में पता चला कि इसके मालिक प्रणय राय और राधिका राय हैं और जुलाई 2008 से पहले इसके पास एनडीटीवी का एक भी शेयर नहीं था और इसकी कुल पूंजी ही मात्र एक लाख रुपए थी। धंधा यह जरूर सैकड़ों का कर रही थी। केतन पारिख ने ये किया तो बेचारा जेल में और प्रणय राय देश को ज्ञान बांटने का पेशा कर रहे हैं।

अभी आघात खत्म नहीं हुए हैं। पैसा का हेर फेर हो जाने के कुछ ही दिन बाद पति पत्नी की चार बार आर नाम वाली कंपनी को चंदा कोचर की बैंक ने लगभग 74 करोड़ का कर्ज फिर दे दिया। यह गैर कानूनी था और अनैतिक भी। कॉरपोरेट मामलों का मंत्रालय भी खामोश रहा।

नवंबर में सीबीआई ने जब जीवन बीमा निगम और अन्य बैंकों के अधिकारियों को कुख्यात कर्ज घोटाले में पकड़ा तो पता चला कि एनडीटीवी विदेशों से भी मोटा कर्जा लेता रहता है और उसके बदले वही शेयर गिरवी रखता रहता है जो भारत में दूसरों के पास गिरवी रखे होते हैं। इसके लिए एनडीटीवी की विदेशों में कुछ फर्जी कंपनियां भी है।

अब बिक चुके एनडीटीवी इमेजिन के दस रुपए के शेयर 776 रुपए में बेचे गए। यह तब हुआ जब चैनल बिक जाने के बावजूद घाटे में हैं। मगर प्रणय राय ने नकली तौर पर बढ़ाए गए दामों का एक पैसा भारतीय शेयर धारकों को नहीं मिला। वैसे एनडीटीवी के शेयर लगातार लुढ़क रहे हैं और अब विदेशों से नाम भुनाने की कोशिश की जा रही है। जो कंपनियां एनडीटीवी के लिए विदेशों में काम कर रही है उनमें से एक का पता 90, हाई हॉल बॉर्न लंदन हैं और यह रैगरपुरा की तरह अपेक्षाकृत गरीब लोगों के रहने की बस्ती शायद इसी झोपड़पट्टी में प्रणय राय को अपना भविष्य नजर आ रहा हो।
---आलोक तोमर---
डेटलाइन इंडिया डाट काम

मंगलवार, 7 दिसम्बर 2010

क्रांतिकारियों की वासना कथा!

जिन्हें यह गलतफहमी है कि माओवादी समाज में बगावत कर के गरीबों और शोषितों को उनका हक दिलवाने निकले हैं उन्हें यह जरूर पढ़ लेना चाहिए। यहां पेश हैं दो नामी माओवादी कमांडरों के कहानी जिन्हेंें अय्याशी से जब फुरसत मिलती हैं और अपने आसपास की रस भरी दुनिया से निकल पाते हैं तभी उन्हें माओ की याद आती है और तभी यह भी याद आता है कि हमारे देश में भूखे नंगों का जम कर शोषण होता है। पहली और छोटी कहानी बंगाल में माओवादियों के राज्य प्रमुख सचिव और हजारों हत्याओं और दूसरे अपराधों के लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जिम्मेदार सुदीप चौंगदर की है।
कोलकाता के पड़ोस में चौंगदर को उसके दो साथियों के साथ पकड़ा गया और मकान मालिक ने बताया कि किराए पर मकान लेते वक्त चौंगदर ने अपना नाम शुभेंदु दास बताया था और कहा था कि वह अपनी पत्नी रूपा के साथ रहेगा और एक मल्टीनेशनल कंपनी में अपने आपको मैनेजर भी बताया था। सच यह है कि रूपा असल में माओवादी राज्य कमेटी की सदस्य कल्पना मैती है और इतना ही नहीं वह माओवादी कॉमरेड असीम मंडल उर्फ आकाश की पत्नी भी है। मतलब माओवादी क्रांति का अर्थ अब यह हो गया है कि अपने जूनियर साथियों की पत्नियों को अपनी पत्नी बता कर खुद कन्हैया बने घूमो। कल्पना उर्फ रूपा और सुदीप दोनों पति पत्नी की तरह ही साथ रह रहे थे।

कहानी यही खत्म नहीं होती। सुदीप चौंगदर की शादी असल में राज्य कमेटी के एक और सदस्य असीत सरकार की बहन रिटा से हुई थी। रिटा भी माओवादियों में से एक थी और कई मुठभेड़ों में उसने आगे बढ़ कर हिस्सा लिया है। मगर कॉमरेड सुदीप बहुत रसिया थे इसलिए उन्होंने पश्चिमी मिदिनापुर की एक सुंदर आदिवासी कन्या निर्मला से शादी कर ली। पुलिस का कहना है कि निर्मला को भी माओवादी बना कर जंगल महल इलाके में तैनात कर दिया गया था। कॉमरेड सुदीप अक्सर वहां अपनी खुफिया हनीमून मनाने आते थे। जय हो कॉमरेड माओ की।
दूसरी कहानी कुंदन पाहन की है और यह भी कम चौकाने वाली नहीं है। झारखंड के सब जोनल कमांडर कुंदन पाहन की सबसे बड़ी कमजोरी हैं लड़कियां। जहां पुलिस उसे जिंदा या मुर्दा पकड़ने की कोशिश कर रही है, वहीं वो कई हसीनाओं के साथ सैर कर रहा है।

पांच लाख का इनामी माओवादी कुंदन पाहन दो साल पहले स्पेशल ब्रांच के अफसर की गला रेत कर हत्या करने के बाद सुर्खियों में आया था। अब उसका एक और चेहरा सामने आया है। कुंदन पाहन की एक प्रेमिका की तस्वीरें पुलिस के हाथ लगी हैं। कुंदन इसके साथ गोवा, हिमाचल प्रदेश की हसीन वादियों में कई दफा घूमने भी गया। रांची पुलिस ने जब उसे गिरफ्तार किया तब ये राज सामने आया। झारखंड के चार जिलों में अपनी हुकूमत चलाने वाला कुंदन पाहन हर समय लड़कियों से घिरा रहता है।
अपनी महिला मित्रों के साथ वो गोवा, कुल्लू, मनाली और नैनीताल रहता है। कहने के लिए उसने जनता के लिए हथियार उठाए हैं, लेकिन उसका असली चेहरा ये है। ये बात अलग है कि मौज मस्ती में डूबा कुंदन पाहन अब भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है।

पांच लाख रुपये के इनामी और खूंखार उग्रवादी कुंदन पाहन और उसके साथियों को पुलिस ने चक्रधरपुर अनुमंडल के सोनुआ-बंदगांव के सीमा क्षेत्र में घेर लिया है। देर रात तक पुलिस के साथ जबर्दस्त मुठभेड़ जारी थी। इस मुठभेड़ में सीआरपीएफ कोबरा बटालियन के तीन जवान घायल हो गए। इनके नाम हिम्मत सिंह, संजीव कुमार एवं रमेश कुमार बताए गए। तीनों को अपोलो अस्पताल, रांची में भर्ती कराया गया है। घायल जवानों को देखने सीआरपीएफ के डीआईजी आलोक राज अपोलो पहुंचे। इधर बताया जा रहा है कि मुठभेड़ के दौरान एक माओवादी को गिरफ्तार किये जाने की सूचना है। इस दौरान दोनों और से दो सौ राउंड गोलियां भी चली हैं। रांची प्रक्षेत्र के आईजी रेजी डुंगडुंग ने बताया कि शनिवार को रांची पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी कि खूंखार माओवादी कुंदन पाहन और उसके दस्ते के कुछ बड़े उग्रवादी बंदगांव थाना क्षेत्र में पनाह लिये हुए हैं।

इस सूचना पर पुलिस उस ओर कूच कर गई। एसपी अखिलेश कुमार झा के नेतृत्व में स्थानीय पुलिस व सीआरपीएफ के जवान जैसे ही बंदगांव थाना क्षेत्र के ममाइल पहाड़ के नजदीक पहुंचे, पुलिस पर गोलियां चलनी शुरू हो गई। जवाब में पुलिस ने भी मोर्चा संभाल लिया और फायरिंग शुरू कर दी। दोनों ओर से ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू हो गई। इस मुठभेड़ में सीआरपीएफ के कोबरा बटालियन के तीन जवान जख्मी हो गए। इसमें एक जवान की हालत गंभीर है।

खूंटी से भी तीन कंपनी सीआरपीएफ के जवान मौके पर भेज दिये गये हैं। इधर, सीआरपीएफ के डीआईजी आलोक राज ने बताया कि जख्मी जवान हिम्मत सिंह के पैर में गोलियां लगी है। वहीं संजीव और रमेश को भी गोलियां लगी है। जख्मी तीनों जवानों को हैलीकाप्टर से रांची लाया गया। तीनों को अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया है। डीआईजी आलोक राज ने बताया कि जो प्राथमिक जानकारी मिली है, उसके अनुसार मुठभेड़ में कुंदन पाहन के अलावा कुछ और बड़े उग्रवादी नेता शामिल हैं। वहीं दस्ते में लगभग 50-60 उग्रवादी हैं। उग्रवादी अत्याधुनिक हथियारों से लैस हैं।
इस बीच सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार रांची में ग्रीन हंट आपरेशन शुरू करने के बाद कुंदन पाहन अपने दस्ते के साथ चक्रधरपुर के सोनुवा व बंदगांव इलाके में शरण ले रखी थी। इस बात की खबर रांची पुलिस को भी मिली थी। इसके बाद से उन इलाकों में पुलिस की दबिश बढ़ गई थी। शनिवार को जैसे ही पुलिस को उनके छुपने के ठिकाने के बारे में पता चला, पुलिस उस ओर कूच कर गई। उग्रवादी जिस पहाड़ पर छुपे हैं, उस इलाके को चारों तरफ से घेर लिया गया है। खबर लिखे जाने तक उग्रवादियों व पुलिस में मुठभेड़ जारी थी। यहां याद दिला दें कि खूंखार कुंदन पाहन दस्ते पर आईसीसीआई बैंक के पांच करोड़ रुपये लूटने, डीएसपी प्रमोद कुमार और एमएलए रमेश सिंह मुंडा की हत्या सहित कई अन्य मामले दर्ज है। कुंदन पाहन को रांची पुलिस द्वारा मोस्ट वांटेड उग्रवादी घोषित किया गया है। कुंदन के सिर पर पांच लाख रुपये का ईनाम रखा गया है।

कुंदन दस्ते के आर्म्ड दल की सक्रिय महिला माओवादी सुनीता ने आत्मसमर्पण के पश्चात पुलिस के सामने कई अहम राज उगले हैं। सुनीता ने बताया कि कुंदन ही नहीं, उसके अतिथियों को भी शारीरिक सुख देना पड़ता था। बॉस के आदेश के बाद नहीं का कोई सवाल ही नहीं था। अक्सर दुष्कर्म की शिकार होती हैं महिला माओवादी । पार्टी के साथी माओवादी व वरिष्ठ माओवादी नेताओं के लिए भोग की वस्तु हैं महिला माओवादी ।

वर्ष 2002-03 में पिता बंगाली मुंडा कुंदन पाहन के दस्ते से जुड़ गए थे। इसी क्रम में वे राजेश मुंडा के दस्ते के सदस्य बने और गौतमधारा एरिया कमेटी के सक्रिय सदस्य बन गए थे। नामकुम थाना क्षेत्र के गरुड़पीड़ी स्थित घर में मैं अकेली रहती थी। पांचवी तक पढ़ाई के बाद स्कूल छूट गई। इसी बीच घर में माओवादियों का आना-जाना लगा रहा।
नवंबर 2008 में 16 वर्ष की उम्र में मुझे कुंदन पाहन के दस्ते में ले जाया गया, तब के बाद मैं पिता से नहीं मिल पाई। कुंदन मुझे अपने पास रखा और पत्नी की तरह रखने लगा था। उसके साथ सुशीला उर्फ अंजू , उर्मिला, प्रमिला, मिनी, अंकिता भी रहती थी। मुझे राइफल चलाने का प्रशिक्षण दिया गया। महिला साथियों से माओवादी खाना बनवाते थे और जो भी बाहर से नेता आता था, उसके सामने भेज दिया जाता था जो यौन शोषण करता था। कमांडर के आदेश को कोई टालने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। मैं शादी करना चाहती थी, लेकिन माओवादी दूसरी जगह शादी को राजी नहीं थे। टीम में ही शादी करनी है।

इस अवधि में वह किशन जी, अनल दा, मनीष दा, अनमोल दा से भी मिल चुकी है, जो मेरा शोषण कर चुके हैं। करीब दो माह पहले मेरे पिता बंगाली मुंडा को पुलिस जब पकड़ ली तो मैं कुंदन पाहन के पास गई और बोली कि पिता को छोड़वा दे। कुंदन ने साफ कहा कि वह उसकी कोई मदद नहीं कर सकता। इसके बाद मुझे माओवादियों से उम्मीद टूट गई और एक महीने पहले मैं अड़की के मारांगबुरू गांव से बुंडू स्थित अपने चाचा के घर आ गई। चाचा के घर से ही मैं पुलिस से संपर्क की और पुलिस के सामने समर्पण कर दी। मैं इस वर्ष अक्टूबर माह तक कुंदन दस्ते में रही और तमाड़ के रांबो, ममाइल मुठभेड़ में भी दस्ते के साथ रही।


---आलोक तोमर---
डेटलाइन इंडिया डाट काम

शनिवार, 4 दिसम्बर 2010

बरखा के बाद वीर और प्रभु को बचाने का नाटक.

एनडीटीवी पर बरखा दत्त के प्रायोजित, फर्जी और घमंड से भरे कोर्ट मार्शल के बाद कलंकित पत्रकारों की सूची में शामिल प्रभु चावला और वीर सांघवी ने आज तक के हेडलाइंस टुडे चैनल का सहारा लिया। टीवी टुडे समूह की यह चाल समझ में आती है। उन्हें अगर प्रभु चावला की इज्जत बचानी थी तो यह शो आज तक पर होना चाहिए था जहां प्रभु चावला सीधी बात कार्यक्रम करते हैं।

मगर चलिए हेडलाइंस टुडे ही सहीं। अब पाक दामन दिखने की रश्मे निभाई जा रही है। हेडलाइंस टुडे ने अपने समूह में पहले ही बदहाल हो कर भाषायी प्रकाशनों के संपादक रह गए प्रभु चावला और हिंदुस्तान टाइम्स के सलाहकार समाचार निदेशक वीर सांघवी को एम जे अकबर और हिंदू के संपादक एन राम के अलावा ओपेन पत्रिका के हरितोष सिंह बल और नीरा राडिया की तरह ही जनसंपर्क कंपनी चलाने वाले दिलीप चेरियन के सामने पेश किया गया था।

मजेदार बात यह थी कि यह खबर पूरे पन्ने पर इंडिया टुडे समूह के ही दैनिक अखबार मेल टुडे ने छापी है। इसी अखबार ने प्रभु चावला का साप्ताहिक स्तंभ भी छपता है। पता नहीं वह भी कब बंद हो जाए। प्रभु चावला आखिर उसी समूह में काम करते हैं इसलिए उनके प्रति थोड़ा नर्म रवैया जरूर रखा गया। वीर सांघवी को तो बाकायदा दोषी करार दे दिया गया।

हरतोष सिंह बल ने चावला से पूछा कि आपने जो सफाई दी है उसमें राडियो टेपों में एक शब्द गायब कर दिया है। चावला ने इनकार किया तो उनके सामने उनका बयान और टेप रिकॉर्ड की बातचीत रख दी गई। बयान में चावला कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के पहले मैं उन लोगों पर जांच चाहता हूं। उन लोगों से मतलब मुकेश अंबानी हैं मगर वास्तव में टेप में जो दर्ज है और जो आप पढ़ और सुन चुके हैं उसमें प्रभु चावला नीरा राडिया के सामने बाकायदा गिड़गिड़ा रहे हैं कि फैसला आने के पहले भी मैं उन्हें सावधान करना चाहता था।

पता नहीं क्यों एन राम जैसे साफ सुथरे पत्रकार ने भी सुप्रीम कोर्ट को मैनेज करने के सवाल पर प्रभु चावला की साफ साफ टिप्पणी पर सवाल नहीं किया। चावला ने कहा था कि लंदन के जिस चैनल से अंबानी काम करवाना चाहते हैं वो ठीक नहीं है। मतलब चावला दलाली के लिए खुद को पेश कर रहे हैं। वह भी उस अंदाज में कि सामने वाली दुकान से हमारी जलेबी ज्यादा मिट्ठी है। चावला का आचरण वैसे भी पटरी के दुकानदारों वाला ही है। प्रभु चावला ने मुकेश अंबानी को भेजे हुए संदेश के बारे में झूठ बोला कि यह तो उन्होने एक खबर या किसी और वजह से भेजा था।

मुकेश अंबानी कोई चंगु मंगु नहीं हैं जिन्हें आप एसएमएस करें, उसका जवाब नहीं आने पर नीरा राडिया के सामने रोए और फिर भूल जाएं कि आखिर यह संदेश भेजा क्यों गया था? चावला के पास इसका भी कोई जवाब नहीं हैं कि अपने अभियुक्त बेटे अंकुर चावला की कानूनी कंपनी को अनिल अंबानी का गैस वाला मामला नहीं मिला, इसकी शिकायत उन्होंने नीरा राडिया से क्यों की? क्या अमर उजाला की तरफ से रिश्वत देने के मामले में हुई प्रभु चावला अपने अंकुर का साथ देंगे? चावला ने एन राम से कहा कि आप भी तो श्रीलंका सरकार को सलाह देते है। जज साहब खुद फंस गए तो चावला को बरी कर के चले गए।

एन राम, बरखा दत्त के मामले में काफी ताव में थे। उन्होंने कहा कि बरखा रुखा बोल रही थी, हमला कर रही थी और उन्हें अपने किए पर कोई पछतावा नहीं हैं। मुफ्तखोरी को ललित कला बना चुके वीर सांघवी बैंकॉक में अपने होटल की बालकनी से बोल रहे थे। सांघवी को पहले उनका टेप सुनाया गया और फिर पूछा गया कि हिंदुस्तान टाइम्स में लिखने के पहले आखिर उन्होंने नीरा राडिया से सारी सूचनाएं और आदेश क्यों लिए? सांघवी ने कहा कि समाचार के सूत्र आपसे तभी बात करते हैं जब वे आपसे कुछ चाहते हैं। मैंने तो इधर उधर चल रही गप्पों के बारे में नीरा राडिया को बेवकूफ बना दिया था और अपना काम निकाल लिया था।

वीर सांघवी बाकायदा झूठ बोल रहे थे। जिन्होंने भी उनकी बातचीत सुनी है उसमें साफ जाहिर है कि वीर सांघवी राहुल गांधी और सोनिया गांधी के अलावा अहमद पटेल तक से बात करने को न सिर्फ तैयार थे बल्कि बात कर चुके थे। गुलाम नबी आजाद के उनके पास उन्हीं के अनुसार लगातार फोन आ रहे थे। यह सब वीर सांघवी ने कहा है और अगर झूठ कहा है तो उनके लिखे पर क्यों भरोसा किया जाए? वे पथनीय कॉलम लिखते थे और वह कॉलम बंद हो गया है


---आलोक तोमर---
डेट लाइन इंडिया डोट कोम

बृहस्पतिवार, 2 दिसम्बर 2010

प्रणव रॉय ने नाटक क्यूँ रचा.

टेलीविजन मीडिया की सुपर स्टार बरखा दत्त को बचाने के लिए उनके चैनल एनडीटीवी ने भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में पहली बार अपने ही किसी पत्रकार का अपने ही पर्दे पर कोर्ट मार्शल करवाया और सच यह है कि इस कोशिश से बरखा दत्त को और अधिक अपमान का सामना करना पड़ा।

बरखा दत्त किसी भी सवाल का सही जवाब नहीं दे पाई और आखिरकार उन्होने सवाल करने वालों से ही सवाल करने शुरू कर दिए। चैनल उनका था, कार्यक्रम संचालित कर रही देवी जी उनके अधीन काम करती हैं और संपादकों का जो पैनल बरखा से पूछताछ करने बैठा था उसमें वे मनु जोसेफ भी थे जिन्होंने ओपेन मैग्जीन के जरिए नीरा राडिया और बरखा के टेप उजागर किए हैं।

बरखा ने पूछा कि आउटलुक ने जो 104 टेप छापे हैं उनमें तो 40 पत्रकारों के नाम है, सिर्फ मुझे ही क्यों घसीटा गया है? बरखा ने तो वीर सांघवी का नाम लिए बगैर उनके बच जाने पर सवाल किया। सबसे पहले राडिया बहन जी के बरखा बहन जी के साथ टेप छापने वाले मनु जोसेफ भाई साहब के सवालों के सामने बरखा ध्वस्त हो गई और उनसे उनकी पत्रकारिता की नैतिकता पर सवाल करने लगी।

रही बात बाकी संपादकों की तो दिलीप पंडगावकर से ले कर स्वपन दासगुप्ता तक कोई यह मानने को राजी नहीं था कि बरखा ने नीरा राडिया के साथ मिल कर खेल नहीं खेला है। बरखा को कहना पड़ा कि वे तो खबर पाने के लिए नीरा राडिया को बेवकूफ बना रही थी। उनको यह भी मंजूर करना पड़ा कि नीरा राडिया ने ही उनकी रतन टाटा से कई मुलाकाते करवाई थीं।

मनु जोसेफ ने पूछा कि आखिर नीरा राडिया सरकार बनाने में दो पार्टियों के बीच मैनेजर बनी हुई थी और क्या यही असली खबर नहीं थी? पहले तो बरखा दत्त ने माना कि उनसे फैसला करने में गलती हुई मगर मुझे वास्तव में पता नहीं था कि नीरा राडिया कौन है? मेरे पास तो हजारों फोन आते हैं, यह बरखा ने कहा। लेकिन यह मनु जोसेफ के सवाल का जवाब नहीं है।

बरखा ने जानबूझ कर एक घंटे के शो का समय बर्बाद किया। उन्होंने अपने टेप दिखाना जारी रखा, अपनी अपनी रिपोर्टिंग के बुलेटिन फिर दिखाए और यह साबित करने की पूरी कोशिश की कि देश में उनसे बड़ा प्रतिभाशाली और शानदार पत्रकार कोई नहीं है। बरखा दत्त जो शुरू में थोड़ी आत्मरक्षा की बाते कर रही थी आखिरकार इसी बात पर आ कर अटक गई कि यह अगर पत्रकारिता पर नैतिकता की बहस है तो ओपेन मैग्जीन के मनु जोसेफ से भी पूछा जाना चाहिए कि आखिर उन्होंने उनके होर्डिंग क्याें लगाए और उनके निजी एसएमएस को सार्वजनिक क्यों किया?

मनु जोसेफ लाख करते रहे कि आप मेरी निजी दोस्त नहीं हैं और वे एसएमएस आपका पक्ष जानने के लिए एक संपादक के तौर पर भेजे थे लेकिन बरखा दत्त जो टीवी अच्छी तरह जानती है, वक्त गुजारने के लिए उनसे बहस करती रही और कार्यक्रम का ही वक्त खत्म हो गया। मौजूद संपादकों में बिजिनेस स्टैंडर्ड के संपादक और प्रधानमंत्री के प्रेस सलाहकार रहे संजय बारू भी थे और उनके एक सीधे सवाल का जवाब बरखा नहीं दे पाई। बारू ने पूछा था कि क्या आप सिर्फ हमे यह बता दे कि आपको इस्तेमाल किया गया या आप जानबूझ कर इस्तेमाल होने के लिए तैयार थी?



---आलोक तोमर---
डेट लाइन इंडिया डाट काम

शनिवार, 27 नवम्बर 2010

''अनिल अंबानी ज्यादा हरामी है'' :- प्रभु चावला

पूरा देश जानता था कि प्रभु चावला दलाल हैं, उन्हें प्राथमिक कक्षा के बराबर अंग्रेजी आती हैं, पत्रकारिता के नाम पर वे पचास धंधे करते हैं मगर इंडिया टुडे के चेयरमैन अरुण पुरी को यह कहानी देर मे समझ में आई। सुपर दलाल नीरा राडिया और सफल दलाल प्रभु चावला के बीच बातचीत का एक टेप हमारे पास है जिसकी अंग्रेजी तो दुर्भाग्य से हम आपको नहीं सुनवा सकते मगर दलाली की पूरी कहानी आपके सामने पेश है। बातचीत सुनिए-

नीरा- कुछ खास बात नहीं, मैं तो तुम्हारे विचार जानना चाहती थी क्योंकि तुम काफी समझदार आदमी हो।

प्रभु चावला- हैं हैं हैं ऐसा तो कुछ नहीं, बस लोगों को जानता हूं, दोस्ती निभाता हूं और काम चलाता हूं।

नीरा- अभी तो मैं जानना चाहती हूं कि अंबानी बंधुओं के बीच झगड़े में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया और देश के हित से ऊपर दो भाइयों का हित रखा इस पर तुम्हारी क्या राय है? तुम क्या सोचते हो?

प्रभु- जब ये दो भाई किसी चीज में शामिल हो तो देश तो अपने आप ही शामिल हो जाता है। समस्या यह है कि दोनों भाई आपस में बात नहीं करते और कोई ऐसा नहीं हैं जो उनमें बात करा सके। मैंने भी कोशिश की थी मगर कुछ हुआ नहीं। कभी अनिल पकड़ में नहीं आता तो कभी मुकेश लापता हो जाते। वैसे गलती मुकेश की ज्यादा है।

नीरा- मेरी आज ही सुबह मुकेश से बात हुई थी और वह कह रहा था कि अनिल को लगता है कि मीडिया खरीद कर और दैनिक भास्कर या जागरण या बिजिनेस स्टैंडर्ड में लेख छपवा कर कंपनी चला लेगा तो मुझे अफशोस होता है।

प्रभु- असल में मुकेश अपनी बीबी के कहने पर चलता है। अनिल से मेरी अच्छी दोस्ती है और उसकी बीबी कहीं टांग नहीं अड़ाती। अनिल तो राजनीति मीडिया नेता सबका इस्तेमाल कर लेता है और ये जो छोटा वाला हैं ना, वो ज्यादा हरामी है मगर हरामी बनना पड़ता है। मुकेश कहीं बाहर गए थे, वापस आ गए क्या?

नीरा- वो तो एक हप्ते से भारत में ही हैं और दिल्ली में ही हैं। कभी कभी शाम को बॉम्बे चले जाते है। तुम्हारी बात नहीं हो पा रही?

प्रभु- मैं दो तीन बार बॉम्बे गया। मुकेश ने मुझे खाने पर बुलाया था मगर अचानक गायब हो गया। कल भी बॉम्बे जा रहा हूं। कोशिश करूंगा। मैं तो दोनों का भला चाहता है। मुकेश की दिक्कत यह है कि धीरूभाई ने जो चमचे पाले थे वे अब किसी काम के नहीं रहे। जमाना बदल गया है मगर मुकेश ने अपने लोग नहीं बदले।

नीरा- मुकेश को तो तुम्हारे जैसे लोग चाहिए।

प्रभु- मैं तो सेवा करने को हमेशा तैयार हूं मगर मुकेश पूरा विश्वास किसी पर नहीं करता। मैंने दो तीन एसएमएस डाले उनका भी जवाब नहीं आया। मैंने तो उसे यह बताना चाहा था कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला उसके खिलाफ आ रहा है मगर वो तो इतना घमंडी है कि मैं क्या कहूं। अब भुगतेगा। इस देश में सब कुछ फिक्स होता है और सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट फिक्स करना कोई कठिन काम नहीं है। अनिल घूमता ज्यादा है, पैसे खर्च कम करता है। मुकेश तो धीरूभाई के जमाने से आगे बढ़ना ही नहीं चाहता। तुम समझ रही हो ना, मैं क्या कह रहा हूं? बेचारे मुकेश को तो सही जानकारी तक नहीं मिल पाती। मुझे पता है कि मुकेश सुप्रीम कोर्ट के लिए क्या कर रहा था और जो कर रहा था वो गलत कर रहा था। सबको पता था। आज कल तो सब फिक्स होता है। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इसे खत्म कर दिया न।

नीरा- अभी तो सुप्रीम कोर्ट का फाइनलाइज नहीं हुआ है।

प्रभु- अब तो और बड़ी गड़बड़ होने वाली है। प्राइम मिनिस्टर मुरली देवड़ा के पीछे पड़े है। दुनिया में गैस के दाम बढ़ने वाले हैं। अगर भारत सरकार अपनी ही गैस नहीं खरीद सकती तो उसे अदालत जाना ही पड़ेगा। देश का हित पहले है, देश का नुकसान नहीं होना चाहिए।

नीरा- यही तो मुकेश ने अनिल से कहा कि तेरा जितना बनता है, तू ले ले, एनटीपीसी अगर नहीं लेता तो वो भी तू ले ले मगर फैसला तो सरकार को करना है। 328 पेज का एमओयू है और उसमें सब कुछ साफ लिखा है। मुझे तो लगता है कि इसी एमओयू को पेनड्राइव में डाल कर सुप्रीम कोर्ट के कंप्यूटर में लगा दिया गया होगा क्योंकि दोनों की भाषा भी एक जैसी है। एटॉर्नी जनरल गुलाम वाहनवती ने भी खेल किया है।

प्रभु- जब मैं इंडियन एक्सप्रेस में था तो वाहनवती हमारा वकील होता था। नुस्ली वाडिया उसे ले कर आया था। मेरा अच्छा दोस्त है मगर आज की तारीख में अनिल अंबानी का आदमी है। यह बात मुकेश को बता देना और कह देना कि मैंने बताई है। हंसराज भारद्वाज ने तो उसे कभी पसंद नहीं किया। जब अनिल का पावर प्लांट ही शुरू नहीं हुआ तो उसे गैस का क्या करना है? मगर मुकेश भी क्या करेगा? मुकेश भी किसी और को गैस नहीं बेच सकता। आनंद जैन था उसे हटा दिया गया। मनोज मोदी प्रोफेशनल हैं।

नीरा- प्रभु आनंद जैन आज भी वहीं हैं मगर आज भी इस मामले में मनोज मोदी ज्यादा काम कर रहा है।

प्रभु- अनिल ने फिर से सुप्रीम कोर्ट में रिट डाली है और उसे यह करना भी चाहिए। मगर मुकेश से कहना कि जो हो रहा है वह गलत हो रहा है। जो तरीके वो अपना रहा है वो गलत है। जिन पर भरोसा कर रहा है वे गड़बड़ हैं। लंदन मैं बैठ कर दिल्ली की दलाली होती है। वैसे दिल्ली में राजनैतिक सिस्टम भी बदल गया है। कमलनाथ फैसला करता है तो प्रणब मुखर्जी और जयराम रमेश या मोंटेक उसे टाल देते है। अनिल अंबानी डीएमके के जरिए चीफ जस्टिस को पटा रहे हैं, मुझे पता है कि मुकेश को किसको पटाना चाहिए मगर वो मुझसे बात तो करे।

नीरा- ये लंदन वाला चक्कर क्या है, तुम्हे ये कहां से पता लगता है?

प्रभु- लीगल सोर्सेज से। अनिल ने तो मेरे बेटे अंकुर चावला को यानी उसकी कंपनी को रिटेनर रखा है मगर इस मामले में मेरा बेटा नहीं हैं। अब दोनों भाइयों से मेरी दोस्ती होने का नुकसान मेरे बेटे को भुगतना पड़ रहा है।

(यही अंकुर चावला पिता से प्रेरणा ले कर अमर उजाला के लिए लॉ बोर्ड रिश्वत कांड में अभियुक्त हैं)


---आलोक तोमर---
डेट लाइन इंडिया डाट कॉम

बुधवार, 24 नवम्बर 2010

बरखा के बचाव में क्यूँ उतरे प्रणव रॉय ?

एनडीटीवी और उनके मुखिया प्रणय रॉय की क्या मजबूरी है ये तो वे ही जानते होंगे मगर बरखा दत्त को बचाने के मामले में जो बेशर्म बयान एनडीटीवी ने अपनी वेबसाइट पर दिया है वह नहीं ही दिया जाता तो बेहतर होता। इस बयान के पहले तक तो सिर्फ संदेह था मगर अब किसी के दिमाग में शक बाकी नहीं बचा है कि प्रणय रॉय को दलाली से कोई फर्क नहीं पड़ता।
भांति भांति की सौंदर्य मुद्राएं बिखेरने वाली और अपने आपको संवेदनशील पत्रकार साबित करने में हर कोशिश करने वाली बरखा दत्त के बारे में एनडीटीवी ने धमकी के अंदाज में लिखा है कि बरखा दत्त सारे पत्रकारों की तरह हर तरह के लोगों से मिलती हैं और बात करती है। इन बातों को संदर्भ से हटा कर देखना अपने आपमें गलत है और अनैतिक है। धमकी में यह भी कहा गया है कि अगर किसी पत्र या पत्रिका ने बरखा दत्त के महान पत्रकारिता के उद्देश्यो पर सवाल उठाए तो उन्हें कानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ेगा। जिन लोगों ने चोरों द्वारा कोतवाल को डांटे जाने का सिर्फ मुहावरा सुना हो वे अब इसे साक्षात देख सकते हैं।
बरखा दत्त और महा दलाल नीरा राडिया हर कीमत पर भारत के इतिहास के सबसे चोर मंत्री साबित होते जा रहे मंत्री ए राजा को केंद्रीय मंत्रिमंडल में लाने और संचार मंत्री बनाने के लिए कितने आतुर थे यह बात कोई हवा में नहीं कहीं गई। इसके टेप अब तो सैकड़ों जगह उपलब्ध हैं और जब नीरा राडिया को उल्टा टांग कर पूछताछ की जाएगी तो उनके मुंह से वीर, सुहेल और बरखा के नाम की बरखा होने लगेगी।
जो टेप रिकॉर्ड भारत सरकार के आयकर विभाग की पहल पर तैयार हुए हैं उनमें बरखा दत्त नीरा राडिया की नौकर की तरह नजर आ रहे हैं। वे इस बात पर दुखी हैं कि राजा के मामले में गतिरोध अब भी बना हुआ है और प्रधानमंत्री भी दुखी हो चुके हैं क्योंकि टी आर बालू ने कांग्रेस को गलत सलत बाते कही है और उन्हें मीडिया के सामने भी दोहराया है। बरखा दत्त आतुर हो कर स्कूली बच्ची की तरह चालीस के आसपास के उम्र में भी राडिया से पूछती हैं कि अब तुम बताओ, मैं उनसे क्या कहूं? मेरी तो हालत खराब हो गई है। यहां जो उनसे हैं वह कौन है या कितने हैं यह तो बरखा ही जानती होगी। उन्होंने अपने आपको राजनैतिक द्रोपदी साबित कर दिया है और आयकर विभाग ने उनका चीर हरण कर डाला है। प्रणय रॉय किसको बचा रहे हैं?
नीरा राडिया का समझ में आता है। उनका तो धंधा ही यह है। वे दलाली का ही खाती है। राडिया कहती है कि बरखा तुम कुछ करो क्योंकि करुणानिधि से बात होनी जरूरी है और उनकी बेटी कनिमोझी से मेरी बात हो चुकी है। करुणानिधि के बेटे अलागिरि को राज्यमंत्री नहीं, पूरा मंत्री बनवाना है। बरखा बहुत आज्ञाकारी भाव से हां हां करती है और फिर पूछती है कि क्या करुणानिधि बालू को छोड़ेंगे? नीरा राडिया बरखा को आज्ञा देती है कि तुम कहो तो छोड़ भी सकते हैं। फिर बरखा किंग मेकर की भूमिका में आ जाती है और कहती है कि फिर मंत्रालयों को ले कर दिक्कत होगी और नीरा राडिया कहती हैं कि वो मैं संभाल लूंगी। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में मतदाता की ऐसी की तैसी। इसे तो बरखा और नीरा जैसे दलाल संभालेंगे।
बरखा को यह भी पता था कि द्रविण मुनेत्र कषगम को परिवहन, उर्जा, संचार, संचार तकनीक, रेलवे और स्वास्थ्य मंत्रालय चाहिए। नीरा और बरखा दोनों दयानिधि मारन को किसी भी कीमत पर मंत्री नहीं बनने देना चाहती थी और इसमें उन्होंने मुकेश अंबानी तक की मदद ली। जब देश के सबसे रईस आदमी से दोस्ती है तो बरखा दत्त पत्रिकारिता में नौकरी क्यों कर रही है? बरखा दत्त ने तो यहां तक कहा कि कांग्रेस को पता नहीं लगना चाहिए कि हम दयानिधि मारन के बारे में क्या बात कर रहे हैं और नीरा राडिया कहती है कि यह तुम तय कर लो।
प्रणय रॉय हिंदी नहीं पढ़ सकते इसलिए किसी से पढ़वा कर सुन ले। उनकी महान पत्रकार बरखा दत्त कह रही हैं कि एक समस्या है और वह यह है कि मैं गुलाम नबी आजाद से बात कर लूंगी मगर अभी मैं रेसकोर्स रोड यानी प्रधानमंत्री के घर में हूं। निकल कर ही बात हो पाएगी। यानी बरखा दत्त इतनी ताकतवर है कि प्रधानमंत्री निवास में जहां केंद्रीय मंत्रियाें के मोबाइल भी नहीं जाते, उनका मोबाइल जाता है और वे दलाली की बाते कर सकती है।
फिर बरखा इस बात पर चकित नजर आती है कि उनके अलावा आखिर और कौन डीएमके और कांग्रेस से बात कर रहा है? यानी दूसरा दलाल कौन है? फिर खुद ही कहती है कि दयानिधि मारन शायद वार्ताकार की भूमिका में हो। बरखा यह भी बताती है कि अभी अभी सोनिया गांधी यहां आ कर गई हैं और जैसे ही प्रधानमंत्री की बैठक खत्म होती है, मैं बात करने की कोशिश करूंगी।
गुलाम नबी आजाद अपने आपको चाहे जितना महान समझते रहे मगर बरखा और नीरा आपसी बातचीत में उन्हें गुलाम कह कर ही संबोधित करती है। वे तो अहमद पटेल को अहमद कहती है और ज्यादातर बड़े नेताओं के बारे में जिन शब्दों में बात करती है उनसे लगता है कि वे उनके बाप के नौकर हो। उन्हें सारे नेताओं के उड़ान नंबर और ठिकाने पता होते है और इस हिसाब से वे राजीव गांधी की हत्यारी धनु से भी ज्यादा बड़ा सुरक्षा खतरा है।
बरखा दत्त के बारे में कभी कभार कहानियां उड़ती रही है मगर सच तो यह है कि अब बात कहानियों से आगे चली गई है। हकीकत के आइने में बरखा दत्त के पास कोई आवरण नहीं हैं और उनके संरक्षक प्रणय रॉय जो मंत्रियो और बड़े अफसरों के रिश्तेदारों को नौकरी देने और दिए रहने मे माहिर है, खुद
दूरदर्शन से करोड़ो रुपए के घोटालों के चक्कर में सीबीआई के अभियुक्त रह चुके है।


---अलोक तोमर---
डेट लाइन इंडिया डाट कॉम

रविवार, 21 नवम्बर 2010

बरखा दत्त या दलाल दत्त !!!

1965 के भारत पाकिस्तान युद्व के दौरान दिल्ली के हिंदुस्तान टाइम्स के एक युवा रिपोर्टर ने सीमा पर जा कर रिपोर्टिंग करने की अनुमति मांगी। तब तक पत्रकारिता में ऐसे दिन नहीं आए थे कि लड़कियों को खतरनाक या महत्वपूर्ण काम दिए जाएं। रिपोटर प्रभा दत्त जिद पर अड़ी थी। उन्होंने छुट्टी ली, अमृतसर में अपने रिश्तेदारों के घर गई, वहां सैनिक अधिकारियों से अनुरोध कर के सीमा पर चली गई और वहां से अपने आप रिपोर्टिंग कर के खबरे भेजना शुरू कर दी। लौट कर आईं तब तो प्रभा दत्त सितारा बन चुकी थी।


प्रभा दत्त दुनिया से बहुत जल्दी चली गई। ब्रेन हैमरेज से एक दिन अचानक उनकी मृत्यु हो गई। आज कल की युवा पीढ़ी के लिए आदर्श मानी जाने वाली बरखा दत्त जो एनडीटीवी का पर्यायवाची मानी जाती है और कम उम्र में ही पद्म श्री प्राप्त कर चुकी है, इन्हीं प्रभा दत्त की बेटी है। प्रधानमंत्री से ले कर प्रतिपक्ष के नेता तक और देश विदेश के बडे बड़े लोगों तक बरखा दत्त की पहुंच हैं।


मगर बरखा दत्त ने अपने प्रशंसकों और कुल मिला कर भारतीय पत्रकारिता को शर्मिंदा कर दिया है। उन्होंने एक तरह से इस बात की पुष्टि की है कि भारतीय पत्रकारिता में राजनेताओं और कॉरपोरेट घरानों की दलाली करने वाले काफी सफल पत्रकार माने जाते हैं और खुद बरखा दत्त भी उनमें से एक हैं। टीवी और प्रिंट के जाने माने और काफी पढ़े जाने वाले पत्रकार वीर सांघवी का नाम भी इसमें शामिल हैं और सांघवी के बारे में जो टेप मिले हैं उसमें सुपर दलाल नीरा राडिया के कहने पर सांघवी अनिल अंबानी के खिलाफ और मुकेश अंबानी की शान में अपना नियमित कॉलम लिखने के लिए राडिया से नोट्स लेते सुनाई पड़ते है। मगर वीर सांघवी के बारे में पहले भी इस तरह के पाप कथाएं कही जाती रही है।


नीरा राडिया और राजा प्रसंग जब आया था तो पहले भी बरखा दत्त का नाम आया था। लेकिन अब तो हमारे पास वे टेप आ गए हैं जिनमें नीरा राडिया और बरखा दत्त मंत्रिमंडल में कौन कोन शामिल हो और उसके लिए कांग्रेस के किस नेता को पटाया जाए, इस पर विस्तार से बात करते नजर आ रहे है। बरखा दत्त जिस तरह बहुत डराने वाली आत्मीयता से प्रधानमंत्री से ले कर कांग्रेस के बड़े नेताओं के नाम ले रही हैं और यह भी कह रही हैं कि उनसे काम करवाने के लिए उन्हें ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी, उसी से जाहिर होता है कि बरखा और इन नेताओं के रिश्ते पत्रकारिता के लिहाज से संदिग्ध और आपत्तिजनक हैं।


सारा झमेला उस समय का है जब मंत्रिमंडल बन रहा था और खास तौर पर ए राजा और टी आर बालू के बीच में अंदाजे लगाए जा रहे थे कि कौन रहेगा और कौन जाएगा? इन्हीं टेप के अनुसार राडिया ने ही राजा को सूचना दी थी कि आपका मंत्री बनना पक्का हो गया है। बरखा और राडिया इस बातचीत में जम्मू कश्मीर के भूतपूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद को बहुत लाड से या अपनी आत्मीयता दिखाने के लिए गुलाम कहती है और प्रधानमंत्री के साथ कौन सा नेता किस समय मिलने पहुंचा और किस समय निकला, इसकी पल पल की जानकारी उनको होती है, यह चकित नहीं करता बल्कि स्तब्ध करता है। आखिर यह देश और इसका लोकतंत्र क्या वाकई सिर्फ दलाल चला रहे हैं। इन दलालों की कहानी में बरखा जैसे ऐसे लोग भी जुड़ गए हैं जिनका नाम अब भी पत्रकारिता के कोर्स में बड़ी इज्जत से दर्ज है।


चालीस साल की हो चुकी बरखा दत्त ने शादी नहीं की। उनके पास एनडीटीवी में शो करने और करवाने के अलावा बहुत वक्त है जिसमें वे राडियाओं और राजाओं की दलाली कर सकती है। कनिमोझी को बरखा कनि कह सकती है और दयानिधि मारन को दया कह कर बुला सकती हैं तो जाहिर है कि अंतरंगता के स्तर क्या रहे होंगे। प्रधानमंत्री अगर करुणानिधि की मांगों पर नाराज होते हैं तो यह बात बरखा को सबसे पहले पता लगती है।


करुणानिधि अगर अपने परिवार के तीन सदस्यों को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करवाने के प्रति संकोच में पड़ जाते हैं और टी आर बालू के बयानों पर मनमोहन सिंह करुणानिधि से शिकायत करते है तो यह भी सबसे पहले बरखा को ही पता लगता है। बरखा तो नीरा राडिया को यह भी बता देती है कि किसको कौन सा मंत्रालय मिलने वाला है। अब या तो बरखा महाबली है या हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बहुत ही कायर और रसिया किस्म के आदमी है जो छम्मक छल्लो की तरह इठलाने वाली बरखा को सबसे पहले अपने राजनैतिक रहस्य बताते हैं। बरखा उन रहस्यों को कैश करवा लेती है।


ऐसा नहीं कि भारतीय लोकतंत्र में नेता पत्रकारों का इस्तेमाल नहीं करते रहे। जवाहर लाल नेहरू तक शाम लाल और कुलदीप नायर तक से दूसरों के बारे में सूचनाएं मंगाते थे और दक्षिण भारत की चर्चित पत्रिका तुगलक के संपादक चो रामास्वामी आज भी दक्षिण भारत के लिए चाणक्य से कम नहीं माने जाते। करुणानिधि और जयललिता दोनों उनसे सलाह लेते है।


बरखा दत्त के बारे में जान कर और सुन कर हैरत इसलिए होती हैं और शोक सभा मनाने का मन इसलिए करता है कि बरखा को नई पीढ़ी की आदर्श पत्रकाराेंं में से एक माना जाता रहा है और कारगिल युद्व से ले कर बहुत सारी दुर्घटनाओं को बहुत बहादुरी से कवर किए जाते उन्हें देखा गया है। पद्म श्री देने के लिए बरखा ने सुनामी की त्रासदी का जो कवरेज किया था उसी को आधार बनाया गया।


इतने शानदार सामाजिक सरोकारों से जुड़ी बरखा दत्त अगर सीधे सीधे और सबूतों के आधार पर दलाली करती नजर आएंगी तो वे सिर्फ अपने प्रशंसकों को ही नहीं, बल्कि उस पूरे समाज को आहत करती दिखाई पड़ रही हैं जिसे एक बार फिर अपने नायकों और नायिकाओं पर भरोसा हो चला था। बरखा ने और वीर सांघवी ने यह भरोसा तोड़ा है। नीरा राडिया का क्या, वह तो दलाल थी ही और आज भी है और दलालों का कोई चरित्र होता हो यह कभी नहीं सुना गया। बरखा दत्त की बोलती बंद हो गई है। टेप सरकारी है। अब एक बड़ा तबका राजा और मनमोहन सिंह से निपटने के लिए इन्हे मीडिया तक पहुंचा रहा है। टेप सत्तर घंटे के आस पास के हैं और पता नहीं अभी कितने दलालों के नाम सामने आएंगे।



---आलोक तोमर---
डेट लाइन इंडिया

सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

एनडीटीवी के प्रनोय ने किया करोड़ों का गबन.

भारतीय टीवी चैनलों के मालिकों में प्रणय रॉय की छवि सबसे अलग और सबसे चमकदार मानी जाती है। उनका नई दिल्ली टेलीविजन यानी एनडीटीवी साख और कर्मचारियों के हित के लिए लगातार उदहारण बताया जाता है। मगर सीबीआई के रिकॉर्ड में प्रणय रॉय भारतीय दूरदर्शन के करोड़ों खा चुके हैं और और उनका असर इतना है कि वर्षों से जांच कर रही सीबीआई अब विशेष अदालत से कहने जा रही है कि उनके पास कहने को कुछ नहीं हैं इसलिए मामला बंद कर दिया जाए।

प्रणय रॉय इस मामले में अकेले शामिल नहीं है। दूरदर्शन के भूतपूर्व महानिदेशक और बाद में स्टार टीवी के भारत के मुखिया रहे रतिकांत वासु और दूरदर्शन के पांच सबसे वरिष्ठ अधिकारी भी सीबीआई की चार्जशीट में शामिल हैं। इस मामले में दर्ज एफआईआर के अनुसार प्रणय रॉय को दूरदर्शन के साधन, रिकॉर्ड, स्टूडियो और अधिकारियों का इस्तेमाल करने दिया गया और इसके बाद जो कार्यक्रम बने उन्हें जरूरत से ज्यादा दरों पर विज्ञापन दिए गए। प्रणय रॉय भारत में टीवी का चेहरा बदलने वाले लोगों में से गिने जाते हैं लेकिन सच यह भी है कि एक मामूली प्रोडक्शन हाउस से हजारों करोड़ का जो कारोबार खड़ा हुआ है उसकी नींव दूरदर्शन के पैसे पर रखी हुई है।

एफआईआर के अनुसार प्रणय रॉय को रईस बनाने में दूरदर्शन के उप महानिदेशक हरीश अवस्थी, अशोक मनसुखानी के अलावा दूसरे महानिदेशकों शिव शर्मा, श्याम कपूर और एस कृष्णन के नाम भी हैं और ये सब वसु की तरह बंगाली नहीं हैं इसलिए मानना पड़ेगा कि लोगों को प्रभावित कर के पैसा कमाना अर्थशास्त्र में विद्वान प्रणय रॉय को आता है। साढ़े तीन करोड़ रुपए से ज्यादा घाटा तो उन्होंने अपने साप्ताहिक कार्यक्रम द वर्ल्ड दीस वीक से दूरदर्शन को दे दिया जिसे भुगतान के लिए कई श्रेणी ऊपर चढ़ा दिया गया। दोनों श्रेणियों के भुगतान में दो गुने का अंतर हैं।

लोक लेखा समिति ने सबसे पहले यह घपला पकड़ा था और फिर पाया गया था कि एनडीटीवी को न्यूज टुनाइट, न्यूज ऑवर, सुर्खिया, न्यूज हेडलाइसं, गूड मॉर्निंग इंडिया और साउथ ईस्ट एशिया कैप्सूल नाम के कार्यक्रम दिए गए जिनमें फूटेज भी दूरदर्शन का होता था और पैसा भी वहीं देते थे। प्रणय रॉय इस मामले से भी बच जाएंगे क्योंकि उनके संपर्क बहुत गजब के हैं। माक्र्सवादी पोलित ब्यूरो की सदस्य बृंदा करात बहन है, प्रकाश करात जीजा जी हैं, अरुंधती राय और नफीसा अली करीबी रिश्तेदार हैं। इसी वजह से तो सीबीआई के अभियुक्त होने के बावजूद पद्म विभूषण का सम्मान बहुत पहले पा चुके हैं। उनके चक्कर में फंसे रतिकांत बसु ने बाद में स्टार टीवी के मुखिया के तौर पर काम किया और कई मोटे निवेश किए जिनकी जांच तक नहीं की गई।

रतिकांत बसु के बारे में यह तो मानना पड़ेगा कि उन्होंने सिर्फ प्रणय रॉय का भला नहीं किया। श्रीलंका में हो रहे चार देशों के क्रिकेट टूर्नामेंट के प्रसारण अधिकार वर्ल्डटेल नाम की संस्था से पांच लाख डॉलर में खरीदे गए और यह सौदेबाजी बसु और वर्ल्डटेल के बीच सीधे हुई थी। दूरदर्शन ने श्री बसु की कृपा से इस टूर्नामेंट के प्रसारण के लिए विज्ञापन लाने का काम निंबस कम्युनिकेशन को सौंप दिया और दूरदर्शन के रिकॉर्ड में लिखा है कि सवा चार करोड़ रुपए की आमदनी विज्ञापनो से हुई। महालेखाकार की रिपोर्ट के सामने दस करोड़ होने की बात करती है। इन मामलों में सीबीआई के अनुसार फैसले बसु ने ही किए थे।

एनडीटीवी और दूरदर्शन वाले मामले में दूरदर्शन केंद्र मुंबई को मिलने वाले फूटेज का इस्तेमाल सबसे पहले प्रणय रॉय करते थे और उन्हे इसके लिए दूरदर्शन में माइक्रोवेव और अपलिंकिंग की सुविधाए दी थी। संसदीय समिति तक ने कहा है कि एनडीटीवी और दूरदर्शन के बीच कमाने खाने की मिली भगत थी। सीबीआई हमेशा कहती रही है कि उनके पास साजिश कर के दूरदर्शन को घाटा कराने का धारा 120बी का मामला है और वह पक्का है। मगर यह पक्का मामला अब कच्चा साबित होता जा रहा है और सीबीआई की विशेष अदालत में तीस हजारी के परिसर में जो फैसला वी के माहेश्वरी की अदालत में आने वाला है उसमें सीबीआई ने हमारे सूत्रों के अनुसार तय कर लिया है कि इस मामले को खत्म करने की अपील की जाए। इस मामले में कश्मीर सिंह नाम के एक समाज सेवी के पास सारे सबूत और दस्तावेज हैं और वे फैसले के वक्त वहीं रहेंगे। फैसला 23 अक्टूबर को होना हैं और सीबीआई सूत्रों के अनुसार इस मामले को खत्म करने की पूरी तैयारी हो चुकी है। कश्मीर सिंह अड़े हुए हैं। उनका कहना है कि उनके पास एनडीटीवी से लालच और धमकियां आती रही है लेकिन उनके पास इतने दस्तावेज हैं कि वे इस मामले को बंद नहीं होने देंगे।

---सुपिया रॉय---
डेटलाइन इंडिया

शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

गुलाम खेल का शानदार समापन !

कॉमनवेल्थ- गुलाम खेल समारोह का शानदार समापन हो गया। गुलामों ने पदकों का शतक बनाया और दीवाली के पहले ही जश्न मना कर कॉमनवेल्थ खेलों के सहारे अपनी गुलामी को गर्व से याद किया।

अब कॉमनवेल्थ आयोजन समिति और इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी और उनके गिरोह की पड़ताल होने की बारी है। पहले से ही दर्जनों बड़े घपले जांच की कतार में और अचानक कलमाडी का एक और घपला ऐसा मिला जिसमें वे इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन के अध्यक्ष के तौर पर शामिल हैं, अपने बेटे सुमीर कलमाडी को भी रईस बनाना चाहते हैं। इस धोखाधड़ी में उनकी मदद की जेपी इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के प्रबंध निदेशक और जेपी समूह के संस्थापक जयप्रकाश गौर के पुत्र मनोज गौर ने।

जेपी समूह को आम तौर पर टाटा की तरह साफ सुथरी कंपनी माना जाता है। जयप्रकाश गौर ने एक मामूली जूनियर इंजीनियर से आगे बढ़ क़र इसकी शुरूआत मध्य प्रदेश के रीवा जिले से की थी और सीमेंट ढोने का काम शुरू किया था। आज वे भारत के बड़े रईसों की सूची में हैं और कई ऐेसे व्यापारकि सौंदे हैं जहां सुपर रईस टाटा और अंबानी को मात देना चाहते हैं।

सुरेश कलमाडी ने दो साल पहले ऐलान किया था कि फॉर्मूला वन मोटर रेसिंग एफ 1 से समझौता हो गया हैं और भारत में जल्दी ही एफ 1 मोटर चैंपियनशिप दिखाई पड़ेगी। कलमाडी ने यह नहीं बताया था कि उनका बेटा सुमीर कलमाडी, बेटी और दामाद भी यह आयोजन करने वाली भारतीय कंपनी के डायरेक्टर होंगे।

कौन सा भारतीय नेता कारोबार करने में अपनी जेब से पैसा लगाता है? कितने समृध्द व्यापारी और कारोबारी ऐसे होते हैं जो राजनेताओं की कृपा पाने के लिए मोटी रकमें खर्च नहीं करते? अक्टूबर में ही ब्रिटेन की फॉर्मूला वन करवाने वाली एसोसिएशन ने एक भारतीय कंपनी के साथ 1600 करोड़ रुपए का अनुबंध किया। कंपनी का नाम है जेपीएसके स्पोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड।

इस कंपनी जेपीएसके में जेपी जयप्रकाश का है और एसके सुमीर कलमाडी का। 74 प्रतिशत शेयर्स जयप्रकाश एसोसिएट्स के हैं। पुणे में सुमीर कलमाडी द्वारा चलाई जा रही बिल्डर कंपनी सुल्बा रियल्टी प्राइवेट लिमिटेड के 13 प्रतिशत है और उतने ही शेयर कलमाडी कीे बेटी और दामाद के ट्रैक वर्क इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड के हैं। दिल्ली की एक कागजी कंपनी के नाम भी कुछ शेयर्स रखे गए हैं। यह समझौता 16 नवंबर 2007 को हुआ था। जेपी को मायावती ने जो अपार जमीन दे रखी है उसमें से 2500 एकड़ इस धंधे के लिए रखे गए। इनमें से एक हजार एकड़ में रेसिंग के लिए ट्रैक बनना था और बाकी में जो इमारते बनती उसमें से जेपी, सुल्बा और ट्रैक वर्क को साझेदारी करनी थी। सबसे बड़ा हिस्सा जेपी को मिलना था। वाणिज्य मंत्रालय के रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के रिकॉर्ड बताते हैं कि जेपीएसके कंपनी में बनने के एक साल बाद कलमाडी कीे बेटी पायल और दामाद आदित्य भरतियां निदेशक के तौर पर शामिल हुए और जेपी समूह वाले बहुत गर्व से कहते हैं कि ये नए निदेशक भी बहुत दिलचस्पी ले कर काम कर रहे हैं। सुमीर कलमाडी तो बार बार अपना फोन काटते ही रहे लेकिन पिता जी सुरेश कलमाडी ने फोन उठाने की कृपा की और कहा कि इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन के पास इतना पैसा नहीं था कि इतना बड़ा आयोजन कर सके इसलिए गैर सरकारी भागीदारी लेनी पड़ी। यह भाषा लगभग सात हजार करोड़ का कॉमनवेल्थ करवाने वाले सुरेश कलमाडी की है और वे अपने बेटे सुमीर के अलावा जयप्रकाश गौर के बेटे मनोज गौर को भी बचा रहे हैं। उधर सुमीर कलमाडी ने कहा कि मैं तो आम तौर पर विदेश में रहता हूं और जब लौटूंगा तब बात करूंगा। इतना हराम का पैसा हो तो कोई भी चाहे जितने दिन तक विदेश में रहे।

मनोज गौर को खोजने के लिए सबसे कम मेहनत करनी पड़ी। उन्होंने कहा कि ट्रैक वर्क के सुंदर मूलचंदानी ने उनका परिचय एफ 1 आयोजित करने वाली कंपनी से करवाया था और यही मूलचंदानी सुमीर कलमाडी को ले कर आया था। मनोज गौर का जो बचकाना हिसाब किताब है उसके अनुसार 1600 करोड़ के अलावा जो 2500 एकड़ जमीन जेपी समूह को लगानी है उसका दाम एक करोड़ रुपए प्रति एकड़ है। यहां मनोज गौड़ ने अपने जेपी समूह और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती दोनाें को फंसवा दिया।

हाल में ही अलीगढ़ और मथुरा के पास किसानों ने अपनी जमीन का दाम बहुत कम लगाए जाने को ले कर बहुत हंगामेदार आंदोलन किया था और तब मायावती ने कहा था कि किसानों को उचित कीमत और वार्षिक भुगतान अगले तीस साल तक किया जाएगा। फिर भी किसानों को लूटा गया। जेपी के खजाने और मायावती का पर्स भरा गया। इसमें अब किसी को संदेह नहीं रह गया है।

जय प्रकाश गौर चालाक आदमी है। वे अपने फायदे के लिए किसी को भी आफत में फंसा सकते हैं। बेटे मनोज को भी उन्होंने यही संस्कार दिए हैं। यमुना एक्सप्रेस वे, आने वाले गंगा एक्सप्रेस वे दोनों में उन्हे ठेका देने में धांधली की गई। इस बात की बाकायदा शिकायते आ चुकी है कि गंगा एक्सप्रेस वे का ठेका देने में हालांकि जेपी समूह तीसरे नंबर पर था मगर अंबानी और एक और बड़े उद्योग समूह को किनारे कर के इस कंपनी को उपकार बेचा गया। मध्य प्रदेश के अन्यथा निर्विवाद और झमेलों में नहीं पड़ने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की पत्नी को डंपर घोटाले में फंसवाने वाला भी जेपी समूह ही था। जेपी के दिए इस कलंक को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह सलीब की तरह ढो रहे हैं। मायावती और कलमाडी की पड़ताल होगी तो जयप्रकाश समूह और मनोज गौर दोनों अभियुक्तों की कतार में नजर आएंगे।

--आलोक तोमर--
डेट लाइन इंडिया डाट कॉम

बुधवार, 15 सितम्बर 2010

महाबली दैनिक भास्कर के ढेर होने की सत्यकथा!

देश में सबसे तेजी से बढ़ रहे दैनिक भास्कर समाचार पत्र समूह का झारखंड में अभियान अशुभ निकला। दिल्ली उच्च न्यायालय ने न सिर्फ भास्कर से निकल कर डीबी कार्प्स के नाम से बनी कंपनी को झारखंड से अखबार छापने से रोक दिया बल्कि हो सकता है कि जालसाजी, तथ्यों को छिपाने और सरकारी नियमों का गलत इस्तेमाल करने के मामले में भास्कर के मालिकों और झारखंड के कई बड़े अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा भी चले।

दिल्ली उच्च न्यायालय पहले ही कह चुका है कि अधिकारियों ने भास्कर के प्रकाशन का डिक्लेरेशन मंजूर करते वक्त अदालत की अवमानना की है और पीआरबी कानून का उल्लंघन किया है। यह फैसला शुक्रवार को दोपहर बाद आया और शनिवार और तथा रविवार को अदालतें बंद रहती है इसलिए अपील भी नहीं हो सकती थी। झारखंड में करोड़ो लगाने वाले महाबली भास्कर समूह की कमर एक अदालती फैसले ने तोड़ दी।

भास्कर समूह की स्थापना स्वर्गीय द्वारिका प्रसाद अग्रवाल ने की थी और इसके उत्तराधिकार को ले कर उनके बेटे रमेश अग्रवाल और बेटी हेमलता के बीच तनातनी चलती रही। इतनी मेहनत से दैनिक भास्कर स्थापित करने वाले द्वारका प्रसाद अग्रवाल को अपने ही बेटे और पोते के खिलाफ अदालत में अपील करनी पड़ी थी उनसे धोखा किया गया है और उनकी संपत्ति छीनी गई है। भास्कर समूह का दावा रहा है कि जल्दी ही विश्व के दस सबसे बड़े प्रकाशन समूहों में से उसका नाम होगा। मगर अदालत ने इस महाबली को इसकी हैसियत बता दी।

मामला सिर्फ इतना सा है कि दैनिक भास्कर नाम के कई मालिक है। वह भी स्वर्गीय अग्रवाल की बेटी हेमलता ने अगर मुकदमा नहीं किया होता तो ये स्थिति भी नहीं आती। एक फर्जी
कंपनी ने यह असली नाम हड़प लिया था। गुजरात में यह अखबार दिव्य भास्कर के नाम से निकलता है और एक बार बीच में तो मध्य प्रदेश में भी जब इन्हें लगा था कि दैनिक भास्कर नाम हाथ से छिनने वाला है तो नव भास्कर के नाम से नया नाम लेने की उन्होंने कोशिश की जिसे मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया।

नमक, तेल और वनस्पति से ले कर ईट जमीन और सीमेंट तक का धंधा करने वाले और ब्रांड को जान से भी ज्यादा समेट कर रखने वाले दैनिक भास्कर के साथ ऐसा होगा और इतना बड़ा झटका लगेगा इतनी बड़ी आशंका कम लोगों को थी। यह भी तब जब अखबार निकालने की स्वीकृति मिलने के पहले ही नाम से दूसरे मालिक संजय अग्रवाल ने इस प्रकाशन पर आपत्ति जाहिर की थी और अदालत ने फैसला दिया था कि जब तक दूसरे पक्ष को नहीं सुन लिया जाता तब तक अखबार के प्रकाशन की अनुमति डीबी कर्ॉप्स को नहीं दी जाए।

पहले तो दैनिक भास्कर ने अपने दायरे को बढ़ाने के लिए झारखंड का चुनाव किया और वहां प्रचार का युद्व छेड़ दिया और फिर दूसरे अखबारों से लोगों को तोड़ना शुरू किया गया। ये सब कारोबारी युद्व है। इनमें सब चलता है। मगर भोपाल में रहने वाले भास्कर के मालिक झारखंड की जिला कचहरियों में जब हाजिरियां लगाएंगे तब शायद उन्हें कानून का सही और असली मतलब पता लगेगा।

--आलोक तोमर--
डेट लाइन इंडिया

बृहस्पतिवार, 9 सितम्बर 2010

अपनी विफलता पर इतराते नितीश,इस विफलता से जीत के कितने करीब.

राजनीति पुलिस को बेबस बना देती है. :- भूतर्पूव पुलिस महानिदेशक, बिहार.

नीतिश कुमार घुटनों के बल आ

गए मगर माओवादियों ने तीन

पुलिस वालों

को छोड़ने का अपना वायदा पूरा करने के पहले उन्हें काफी जलील किया। अब राज्य के कई भूतर्पूव पुलिस महानिदेशक याद दिला रहे हैं कि जब पुलिस में राजनीति की जाती है तो इस तरह की शर्मिंदगी झेलनी ही पड़ती है।

एक भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि पुलिस वालों के लगातार तबादले, पुलिस बल की कमी, थानाेंं में सुविधाओं की कमी, फाइलें निपटाने में देरी और माओवाद पर किसी स्पष्ट नीति का अभाव ही पहले नक्सलवाद और अब माओवाद को बढ़ावा दे रहा है।

एक और भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक ध्रुव प्रसाद ओझा ने कहा कि 2003 में जब वे डीजीपी बने थे तब राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थी। उनकी सुविधा के लिए मैने हिंदी और अफसरों के लिए अंग्रेजी में रिपोर्ट तैयार कर के दी थी और बताया था कि इस समस्या से कैसे निपटा जा सकता है। यह रिपोर्ट कभी राबड़ी देवी कीे मेज तक पहुंची ही नहीं। उन्होंने खुद मुख्यमंत्री स्टाफ से इसकी पुष्टि की थी। ओझा का दावा है कि इसमें जो रास्ते सुझाए गए थे, उनके हिसाब से माओवादियों को बिहार में जड़े जमाने का मौका ही नहीं मिलता।

बिहार में जहानाबाद और गया के इलाके नक्सलवाद और बाद में माओवाद के असली गढ़ रहे है। नक्सलवाद का पतन होने के बाद और चारू मजूमदार की मौत के बाद भी यहां माक्र्सवादी लेनिनवादी पार्टी कई संगठनों के जरिए चलती रही। इन संगठनों में पीपुल्स वॉर ग्रुप था जो आंध्र प्रदेश के संगठन से सीधे जुड़ा हुआ था। इसके अलावा एक मजदूर किसान संघर्ष समिति बनी थी और इस समिति की कहानी एक दम अलग थी।

जयप्रकाश आंदोलन में भाग लेने आगरा से बिहार पहुंचे डॉक्टर विनयन शर्मा आंदोलन के बाद भी वहीं रह गए और उन्हें लगा कि जो राजनैतिक परिवर्तन आया है वह समाज में तीसरी क्रांति ले कर नहीं आ पाया है। इसीलिए उन्होंने मजदूर किसान संघर्ष समिति बनाई और मजदूरों और किसानों को हथियार उठाने के लिए भी प्रेरित किया।

यह वह दौर था जब बिहार में जातीय सेनाए पनप रही थी। राजपूतों की रणबीर सेना कई बड़े हत्याकांड कर चुकी थी। इसके अलावा एक कुर्मी सेना भी बनी थी जो नीतिश कुमार की जाति वालों की थी। उस समय नीतिश और लालू साथ साथ थे इसलिए नीतिश कुर्मी सेना के समर्थक नहीं बने। डॉक्टर विनयन की एक आम सभा पर जहानाबाद के अरवल गांव में पुलिस ने गोलियां चलाई और पचास से ज्यादा लोग मारे गए। बदले में संगठन ने भी हमले किए और डॉक्टर विनयन पर 1990 में एक लाख रुपए का इनाम घोषित कर दिया गया।

उस दौरान डॉक्टर विनयन दिल्ली में मेरे साथ ही ठहरते थे और उनसे मिलने जुलने वालों में जो लोग थे उनमें कई बड़े पुलिस अधिकारी, बिहार के कई नेता और दूसरे वाम संगठनों के लोग भी होते थे। जेपी आंदोलन के साथी भी आते थे जो दक्षिणपंथी भी थे और मध्य मार्गी भी। उसी समय पीपुल्स वॉर ग्रुप गिरोह बनने में लगा हुआ था और माओवाद का उदय वहीं से हुआ है। विनयन इस खतरे से आगाह थे और इसे रोकना चाहते थे मगर बिहार में तो उनके सिर पर लाख रुपए का इनाम था। उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र से संपर्क किया और कुछ मित्रों की मदद से आत्म समर्पण कर के पीपुल्स वॉर ग्रुप के खिलाफ काम करना चाहते थे। मगर जल्दी ही दिल के दौरे से उनकी मौत हो गई।

भूतपूर्व डीजीपी ओझा याद दिलाते हैं कि उन्हें सिर्फ इसलिए रिटायर होने के लिए कह दिया गया था क्योंकि उन्होने राष्ट्रीय जनता दल के एक गुंडे सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन को दौड़ा लिया था। उन्होंने कहा कि उस समय नीतिश कुमार भी मेरे पक्ष में बोलने आए थे क्योंकि यह उनकी राजनीति के लिए ठीक था मगर अब माओवाद के मामले में तो वे मेरी भी सुनने को राजी नहीं है। एक और भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक डी एन गौतम माओवादियों द्वारा एक सहायक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या से बहुत दुखी है और याद दिलाते है कि उन्होंने माओवाद प्रभावित जिले जमुई में पुलिस फायरिंग रेंज बनाने का प्रस्ताव दिया था मगर इलाके के विकास के नाम पर इसे मंजूर नहीं किया गया और आज इसी इलाके में सबसे ज्यादा माओवादियों का असर है।

एक जमाने में अपराधियों के बीच आतंक का नाम बन चुके डीएन गौतम कहते हैं कि बिहार पुलिस के आधुनिकीकरण की जब भी कोशिश की गई तो अफसरों ने इसमें टांग अड़ा दी। उनका कहना है कि पुलिस का आधुनिकीकरण्ा तो सीधे मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक के बीच का मामला होना चाहिए और कोई आईएएस बीच में नहीं आना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि आंध्र प्रदेश में यहीं होता है। गौतम तो यहां तक कहते हैं कि पुलिस महानिदेशक द्वारा तैयार की गई सीधे मुख्यमंत्री के हाथ में पहुंचनी चाहिए और उस पर गृह सचिव की टिप्पणी भी नहीं होनी चाहिए। इस मामले में वे फिर आंध्र प्रदेश का उदाहरण देते हैं और कहते हैं कि इसी वजह से आंध्र प्रदेश में माओवादी सबसे कम असर दिखा सके हैं।

श्री गौतम, अरुंधती राय, गौतम नवलखा और ऐसे ही उन तथाकथित बुध्दिजीवियों से खासे नाराज हैं जो माओवाद के हक में तो बहुत बोलते हैं मगर माओवादियों द्वारा निर्दोषों की हत्याएं उन्हें नजर नहीं आती। वे याद दिलाते हैं कि आज तक देश में माओवादियों ने सुरक्षा बलों के अलावा जिन निर्दोषों की हत्या की है उनमें से नब्बे प्रतिशत से ज्यादा आदिवासी है। आदिवासियों के हत्यारों को आप कैसे समाज के पिछड़े हुए लोगों का रक्षक कहेंगे?
दिक्कत यह भी है कि जब बिहार सरकार सही रास्ते पर चल रही होती है तो दूसरे राज्यों की तरह अधिकारी पिछड़े रास्तों पर ही रहना पसंद करते है। बिहार में एक और डीजीपी रहे आनंद शंकर ने कहा कि माओवादियों के खिलाफ बिहार पुलिस को विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। अभी तक कई बार यह प्रस्ताव दिया जा चुका है मगर इस पर कोई अमल नहीं हुआ है। नीतिश कुमार ने सुशासन का जो आडंबर पिछले पांच साल में खड़ा किया था और माओवादियों ने दो सप्ताह में तोड़ दिया है और इसके सबसे ज्यादा खुद जिम्मेदार नीतिश कुमार हैं।


--आलोक तोमर--

बुधवार, 8 सितम्बर 2010

आउटलुक की लुटिया विनोद मेहता ने डुबोई, मामला सहारा और आउटलुक की लड़ाई का.


भारत के दो सबसे बड़े व्यापारिक घरानों में जो मीडिया में भी सक्रिय हैं, जंग छिड़ गई है। सहारा समूह ने आउटलुक बिजनेस पत्रिका निकालने वाले रहेजा समूह पर इल्जाम लगाया है कि उसने झूठ प्रकाशित कर के सहारा का नुकसान किया है और मानहानि का दो सौ करोड़ रुपए का मुकदमा भी कायम कर दिया गया है।

रहेजा मुंबई का जाना माना बिल्डर समूह है। लेकिन पत्रिकाओं के मामले में उसकी किस्मत अच्छी नहीं रही। हिंदी और अंग्रेजी में रहेजा समूह ने आउटलुक पत्रिकाएं निकाली थी। इनमें से हिंदी की आउटलुक साप्ताहिक अब पाक्षिक होते हुए मासिक हो गई है और जल्दी ही अदृश्य होने की तैयारी में है। इसके अलावा अंग्रेजी पत्रिका विनोद मेहता चला रहे हैं और वह भी बाजार में ज्यादा जगह नहीं पकड़ पाई। आउटलुक बिजनेस थोड़ी बहुत चल रही है।

इसी आउटलुक बिनजेस को ले कर रहेजा और सहारा में दो अरब रुपए की जंग छिड़ी है। आउटलुक बिजनेस ने सहारा पर बहुत सारे आर्थिक घोटालों का इल्जाम लगाते हुए मध्यस्त के अपने अंत में एक रिपोर्ट छापी थी जबकि जो भी आरोप इस रिपोर्ट में लिखे थे उनकी जांच सहारा समूह के अनुसार स्टॉक एक्सचेंज बोर्ड और कई आर्थिक संस्थाएं कर रही है। ऐसे में सहारा से तथ्यों की पुष्टि किए बगैर यह रिपोर्ट छाप दी गई। सहारा ने इसी पर ऐतराज जताया है कि और अदालत ने सहारा का साथ देते हुए रहेजा की कंपनियाें को कह दिया है कि जब तक फैसला नहीं हो जाता तब तक सहारा के खिलाफ कोई रिपोर्ट नहीं छपेगी।

आउटलुक की रिपोर्ट के अनुसार सहारा समूह अपने ग्राहकों को धोखा देता है और उनका पैसा हजम कर जाता है। शेयर बाजार में भी उसने निवेशकों को ठगा है। इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सहारा अखबारों में पैसा दे कर खबरे छपवाता है ताकि उसकी छवि ठीक नहीं रहे। इस रिपोर्ट में सीधे सहारा के चेयरमैन सुब्रत राय पर आरोप लगाया गया है कि वे अपनी सफलताओं की झूठी कहानियां प्रचारित कर रहे है। यह भी कहा गया है कि पचास हजार करोड़ के कारोबार और नौ लाख से ज्यादा कर्मचारियों का सहारा का दावा भी गलत है। यह भी कहा गया है कि सहारा के ज्यादातर धंधे घाटे में चल रहे हैं।

घाटे वाली बात पर तो शायद ही कोई विचार करे क्योंकि सहारा समूह जिस तरह से अपार पैसे लगा कर भारतीय क्रिकेट टीम को प्रायोजित कर रहा है और आईपीएल की एक पूरी टीम खरीद लेता है यह कोई घाटे में चलने वाला समूह नहीं कर सकता। वैसे भी आउटलुक बिजनेस की रिपोर्ट की एक एक पक्ति से प्रतिशोध की गंध आती है। इसमें सहारा की देशभक्ति से ले कर सामाजिक परिवर्तन में भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं और विश्व का सबसे बड़ा परिवार कहने का मजाक उड़ाया गया है।

पत्रिका ने सहारा समूह के चेयरमैन सुब्रत राय के साथ अटल बिहारी वाजपेयी, बाल ठाकरे, दलाई लामा, बाबा रामदेव, प्रतिभा पाटिल, एपी जे अब्दुल कलाम, मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, धीरूभाई अंबानी, स्वराज पॉल, रतन टाटा, बिल क्लिंटन और आदि गोदरेज के साथ खिंचवाए गए फोटोग्राफ्स का भी मजाक उड़ाया गया है। जाहिर है कि यह व्यापार की रिपोर्टिंग कम और सहारा को जलील करने की कोशिश ज्यादा है। सहारा के आर्थिक कारोबार यानी सहारा इंडिया फाइनेंशियल कॉरपोरेशन को नॉन बैकिंग कंपनी कहते हुए पत्रिका आरोप लगाती है यह म्यूचुअल मंड और जीवन बीमा में भी काम कर रही है। मगर पत्रिका का आरोप है कि यह जानकारी सिर्फ सहारा की वेबसाइट पर ही उपलब्ध है और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कई बार सहारा के खिलाफ जांच की है मगर सहारा के खिलाफ कभी कुछ साबित नहीं हुआ।

जहां तक आउटलुक्स समूह यानी रहेजा बंधुआें की पत्रकारिता में असफलता का कारण है तो इसके बारे में खुद आउटलुक समूह के लोग स्वीकार करते है कि आउटलुक हिंदी तो कभी ठीक से चल ही नहीं पाई क्योंकि इसके संपादक की दिलचस्पी पत्रिका से ज्यादा सरकार में अपने काम करवाने में थी। अंग्रेजी की पत्रिका भी इसलिए नहीं चल पा रही क्योंकि इसके संपादक विनोद मेहता अपने ऑफिस से ज्यादा टीवी के स्टूडियो में बैठ कर ज्ञान बांटते हुए नजर आते हैं।

आलोक तोमर