
शुक्रवार, 24 दिसम्बर 2010
क्या ये प्रणव रॉय की गुंडागर्दी नहीं है.

बुधवार, 8 दिसम्बर 2010
एन डी टी वी और प्रणव रॉय का घोटाला.

मंगलवार, 7 दिसम्बर 2010
क्रांतिकारियों की वासना कथा!

शनिवार, 4 दिसम्बर 2010
बरखा के बाद वीर और प्रभु को बचाने का नाटक.

बृहस्पतिवार, 2 दिसम्बर 2010
प्रणव रॉय ने नाटक क्यूँ रचा.
टेलीविजन मीडिया की सुपर स्टार बरखा दत्त को बचाने के लिए उनके चैनल एनडीटीवी ने भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में पहली बार अपने ही किसी पत्रकार का अपने ही पर्दे पर कोर्ट मार्शल करवाया और सच यह है कि इस कोशिश से बरखा दत्त को और अधिक अपमान का सामना करना पड़ा।बरखा दत्त किसी भी सवाल का सही जवाब नहीं दे पाई और आखिरकार उन्होने सवाल करने वालों से ही सवाल करने शुरू कर दिए। चैनल उनका था, कार्यक्रम संचालित कर रही देवी जी उनके अधीन काम करती हैं और संपादकों का जो पैनल बरखा से पूछताछ करने बैठा था उसमें वे मनु जोसेफ भी थे जिन्होंने ओपेन मैग्जीन के जरिए नीरा राडिया और बरखा के टेप उजागर किए हैं।
बरखा ने पूछा कि आउटलुक ने जो 104 टेप छापे हैं उनमें तो 40 पत्रकारों के नाम है, सिर्फ मुझे ही क्यों घसीटा गया है? बरखा ने तो वीर सांघवी का नाम लिए बगैर उनके बच जाने पर सवाल किया। सबसे पहले राडिया बहन जी के बरखा बहन जी के साथ टेप छापने वाले मनु जोसेफ भाई साहब के सवालों के सामने बरखा ध्वस्त हो गई और उनसे उनकी पत्रकारिता की नैतिकता पर सवाल करने लगी।
रही बात बाकी संपादकों की तो दिलीप पंडगावकर से ले कर स्वपन दासगुप्ता तक कोई यह मानने को राजी नहीं था कि बरखा ने नीरा राडिया के साथ मिल कर खेल नहीं खेला है। बरखा को कहना पड़ा कि वे तो खबर पाने के लिए नीरा राडिया को बेवकूफ बना रही थी। उनको यह भी मंजूर करना पड़ा कि नीरा राडिया ने ही उनकी रतन टाटा से कई मुलाकाते करवाई थीं।
मनु जोसेफ ने पूछा कि आखिर नीरा राडिया सरकार बनाने में दो पार्टियों के बीच मैनेजर बनी हुई थी और क्या यही असली खबर नहीं थी? पहले तो बरखा दत्त ने माना कि उनसे फैसला करने में गलती हुई मगर मुझे वास्तव में पता नहीं था कि नीरा राडिया कौन है? मेरे पास तो हजारों फोन आते हैं, यह बरखा ने कहा। लेकिन यह मनु जोसेफ के सवाल का जवाब नहीं है।
बरखा ने जानबूझ कर एक घंटे के शो का समय बर्बाद किया। उन्होंने अपने टेप दिखाना जारी रखा, अपनी अपनी रिपोर्टिंग के बुलेटिन फिर दिखाए और यह साबित करने की पूरी कोशिश की कि देश में उनसे बड़ा प्रतिभाशाली और शानदार पत्रकार कोई नहीं है। बरखा दत्त जो शुरू में थोड़ी आत्मरक्षा की बाते कर रही थी आखिरकार इसी बात पर आ कर अटक गई कि यह अगर पत्रकारिता पर नैतिकता की बहस है तो ओपेन मैग्जीन के मनु जोसेफ से भी पूछा जाना चाहिए कि आखिर उन्होंने उनके होर्डिंग क्याें लगाए और उनके निजी एसएमएस को सार्वजनिक क्यों किया?
मनु जोसेफ लाख करते रहे कि आप मेरी निजी दोस्त नहीं हैं और वे एसएमएस आपका पक्ष जानने के लिए एक संपादक के तौर पर भेजे थे लेकिन बरखा दत्त जो टीवी अच्छी तरह जानती है, वक्त गुजारने के लिए उनसे बहस करती रही और कार्यक्रम का ही वक्त खत्म हो गया। मौजूद संपादकों में बिजिनेस स्टैंडर्ड के संपादक और प्रधानमंत्री के प्रेस सलाहकार रहे संजय बारू भी थे और उनके एक सीधे सवाल का जवाब बरखा नहीं दे पाई। बारू ने पूछा था कि क्या आप सिर्फ हमे यह बता दे कि आपको इस्तेमाल किया गया या आप जानबूझ कर इस्तेमाल होने के लिए तैयार थी?
शनिवार, 27 नवम्बर 2010
''अनिल अंबानी ज्यादा हरामी है'' :- प्रभु चावला

बुधवार, 24 नवम्बर 2010
बरखा के बचाव में क्यूँ उतरे प्रणव रॉय ?
एनडीटीवी और उनके मुखिया प्रणय रॉय की क्या मजबूरी है ये तो वे ही जानते होंगे मगर बरखा दत्त को बचाने के मामले में जो बेशर्म बयान एनडीटीवी ने अपनी वेबसाइट पर दिया है वह नहीं ही दिया जाता तो बेहतर होता। इस बयान के पहले तक तो सिर्फ संदेह था मगर अब किसी के दिमाग में शक बाकी नहीं बचा है कि प्रणय रॉय को दलाली से कोई फर्क नहीं पड़ता।भांति भांति की सौंदर्य मुद्राएं बिखेरने वाली और अपने आपको संवेदनशील पत्रकार साबित करने में हर कोशिश करने वाली बरखा दत्त के बारे में एनडीटीवी ने धमकी के अंदाज में लिखा है कि बरखा दत्त सारे पत्रकारों की तरह हर तरह के लोगों से मिलती हैं और बात करती है। इन बातों को संदर्भ से हटा कर देखना अपने आपमें गलत है और अनैतिक है। धमकी में यह भी कहा गया है कि अगर किसी पत्र या पत्रिका ने बरखा दत्त के महान पत्रकारिता के उद्देश्यो पर सवाल उठाए तो उन्हें कानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ेगा। जिन लोगों ने चोरों द्वारा कोतवाल को डांटे जाने का सिर्फ मुहावरा सुना हो वे अब इसे साक्षात देख सकते हैं।
बरखा दत्त और महा दलाल नीरा राडिया हर कीमत पर भारत के इतिहास के सबसे चोर मंत्री साबित होते जा रहे मंत्री ए राजा को केंद्रीय मंत्रिमंडल में लाने और संचार मंत्री बनाने के लिए कितने आतुर थे यह बात कोई हवा में नहीं कहीं गई। इसके टेप अब तो सैकड़ों जगह उपलब्ध हैं और जब नीरा राडिया को उल्टा टांग कर पूछताछ की जाएगी तो उनके मुंह से वीर, सुहेल और बरखा के नाम की बरखा होने लगेगी।
जो टेप रिकॉर्ड भारत सरकार के आयकर विभाग की पहल पर तैयार हुए हैं उनमें बरखा दत्त नीरा राडिया की नौकर की तरह नजर आ रहे हैं। वे इस बात पर दुखी हैं कि राजा के मामले में गतिरोध अब भी बना हुआ है और प्रधानमंत्री भी दुखी हो चुके हैं क्योंकि टी आर बालू ने कांग्रेस को गलत सलत बाते कही है और उन्हें मीडिया के सामने भी दोहराया है। बरखा दत्त आतुर हो कर स्कूली बच्ची की तरह चालीस के आसपास के उम्र में भी राडिया से पूछती हैं कि अब तुम बताओ, मैं उनसे क्या कहूं? मेरी तो हालत खराब हो गई है। यहां जो उनसे हैं वह कौन है या कितने हैं यह तो बरखा ही जानती होगी। उन्होंने अपने आपको राजनैतिक द्रोपदी साबित कर दिया है और आयकर विभाग ने उनका चीर हरण कर डाला है। प्रणय रॉय किसको बचा रहे हैं?
नीरा राडिया का समझ में आता है। उनका तो धंधा ही यह है। वे दलाली का ही खाती है। राडिया कहती है कि बरखा तुम कुछ करो क्योंकि करुणानिधि से बात होनी जरूरी है और उनकी बेटी कनिमोझी से मेरी बात हो चुकी है। करुणानिधि के बेटे अलागिरि को राज्यमंत्री नहीं, पूरा मंत्री बनवाना है। बरखा बहुत आज्ञाकारी भाव से हां हां करती है और फिर पूछती है कि क्या करुणानिधि बालू को छोड़ेंगे? नीरा राडिया बरखा को आज्ञा देती है कि तुम कहो तो छोड़ भी सकते हैं। फिर बरखा किंग मेकर की भूमिका में आ जाती है और कहती है कि फिर मंत्रालयों को ले कर दिक्कत होगी और नीरा राडिया कहती हैं कि वो मैं संभाल लूंगी। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में मतदाता की ऐसी की तैसी। इसे तो बरखा और नीरा जैसे दलाल संभालेंगे।
बरखा को यह भी पता था कि द्रविण मुनेत्र कषगम को परिवहन, उर्जा, संचार, संचार तकनीक, रेलवे और स्वास्थ्य मंत्रालय चाहिए। नीरा और बरखा दोनों दयानिधि मारन को किसी भी कीमत पर मंत्री नहीं बनने देना चाहती थी और इसमें उन्होंने मुकेश अंबानी तक की मदद ली। जब देश के सबसे रईस आदमी से दोस्ती है तो बरखा दत्त पत्रिकारिता में नौकरी क्यों कर रही है? बरखा दत्त ने तो यहां तक कहा कि कांग्रेस को पता नहीं लगना चाहिए कि हम दयानिधि मारन के बारे में क्या बात कर रहे हैं और नीरा राडिया कहती है कि यह तुम तय कर लो।
प्रणय रॉय हिंदी नहीं पढ़ सकते इसलिए किसी से पढ़वा कर सुन ले। उनकी महान पत्रकार बरखा दत्त कह रही हैं कि एक समस्या है और वह यह है कि मैं गुलाम नबी आजाद से बात कर लूंगी मगर अभी मैं रेसकोर्स रोड यानी प्रधानमंत्री के घर में हूं। निकल कर ही बात हो पाएगी। यानी बरखा दत्त इतनी ताकतवर है कि प्रधानमंत्री निवास में जहां केंद्रीय मंत्रियाें के मोबाइल भी नहीं जाते, उनका मोबाइल जाता है और वे दलाली की बाते कर सकती है।
फिर बरखा इस बात पर चकित नजर आती है कि उनके अलावा आखिर और कौन डीएमके और कांग्रेस से बात कर रहा है? यानी दूसरा दलाल कौन है? फिर खुद ही कहती है कि दयानिधि मारन शायद वार्ताकार की भूमिका में हो। बरखा यह भी बताती है कि अभी अभी सोनिया गांधी यहां आ कर गई हैं और जैसे ही प्रधानमंत्री की बैठक खत्म होती है, मैं बात करने की कोशिश करूंगी।
गुलाम नबी आजाद अपने आपको चाहे जितना महान समझते रहे मगर बरखा और नीरा आपसी बातचीत में उन्हें गुलाम कह कर ही संबोधित करती है। वे तो अहमद पटेल को अहमद कहती है और ज्यादातर बड़े नेताओं के बारे में जिन शब्दों में बात करती है उनसे लगता है कि वे उनके बाप के नौकर हो। उन्हें सारे नेताओं के उड़ान नंबर और ठिकाने पता होते है और इस हिसाब से वे राजीव गांधी की हत्यारी धनु से भी ज्यादा बड़ा सुरक्षा खतरा है।
बरखा दत्त के बारे में कभी कभार कहानियां उड़ती रही है मगर सच तो यह है कि अब बात कहानियों से आगे चली गई है। हकीकत के आइने में बरखा दत्त के पास कोई आवरण नहीं हैं और उनके संरक्षक प्रणय रॉय जो मंत्रियो और बड़े अफसरों के रिश्तेदारों को नौकरी देने और दिए रहने मे माहिर है, खुद
रविवार, 21 नवम्बर 2010
बरखा दत्त या दलाल दत्त !!!
1965 के भारत पाकिस्तान युद्व के दौरान दिल्ली के हिंदुस्तान टाइम्स के एक युवा रिपोर्टर ने सीमा पर जा कर रिपोर्टिंग करने की अनुमति मांगी। तब तक पत्रकारिता में ऐसे दिन नहीं आए थे कि लड़कियों को खतरनाक या महत्वपूर्ण काम दिए जाएं। रिपोटर प्रभा दत्त जिद पर अड़ी थी। उन्होंने छुट्टी ली, अमृतसर में अपने रिश्तेदारों के घर गई, वहां सैनिक अधिकारियों से अनुरोध कर के सीमा पर चली गई और वहां से अपने आप रिपोर्टिंग कर के खबरे भेजना शुरू कर दी। लौट कर आईं तब तो प्रभा दत्त सितारा बन चुकी थी।
प्रभा दत्त दुनिया से बहुत जल्दी चली गई। ब्रेन हैमरेज से एक दिन अचानक उनकी मृत्यु हो गई। आज कल की युवा पीढ़ी के लिए आदर्श मानी जाने वाली बरखा दत्त जो एनडीटीवी का पर्यायवाची मानी जाती है और कम उम्र में ही पद्म श्री प्राप्त कर चुकी है, इन्हीं प्रभा दत्त की बेटी है। प्रधानमंत्री से ले कर प्रतिपक्ष के नेता तक और देश विदेश के बडे बड़े लोगों तक बरखा दत्त की पहुंच हैं।
मगर बरखा दत्त ने अपने प्रशंसकों और कुल मिला कर भारतीय पत्रकारिता को शर्मिंदा कर दिया है। उन्होंने एक तरह से इस बात की पुष्टि की है कि भारतीय पत्रकारिता में राजनेताओं और कॉरपोरेट घरानों की दलाली करने वाले काफी सफल पत्रकार माने जाते हैं और खुद बरखा दत्त भी उनमें से एक हैं। टीवी और प्रिंट के जाने माने और काफी पढ़े जाने वाले पत्रकार वीर सांघवी का नाम भी इसमें शामिल हैं और सांघवी के बारे में जो टेप मिले हैं उसमें सुपर दलाल नीरा राडिया के कहने पर सांघवी अनिल अंबानी के खिलाफ और मुकेश अंबानी की शान में अपना नियमित कॉलम लिखने के लिए राडिया से नोट्स लेते सुनाई पड़ते है। मगर वीर सांघवी के बारे में पहले भी इस तरह के पाप कथाएं कही जाती रही है।
नीरा राडिया और राजा प्रसंग जब आया था तो पहले भी बरखा दत्त का नाम आया था। लेकिन अब तो हमारे पास वे टेप आ गए हैं जिनमें नीरा राडिया और बरखा दत्त मंत्रिमंडल में कौन कोन शामिल हो और उसके लिए कांग्रेस के किस नेता को पटाया जाए, इस पर विस्तार से बात करते नजर आ रहे है। बरखा दत्त जिस तरह बहुत डराने वाली आत्मीयता से प्रधानमंत्री से ले कर कांग्रेस के बड़े नेताओं के नाम ले रही हैं और यह भी कह रही हैं कि उनसे काम करवाने के लिए उन्हें ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी, उसी से जाहिर होता है कि बरखा और इन नेताओं के रिश्ते पत्रकारिता के लिहाज से संदिग्ध और आपत्तिजनक हैं।
सारा झमेला उस समय का है जब मंत्रिमंडल बन रहा था और खास तौर पर ए राजा और टी आर बालू के बीच में अंदाजे लगाए जा रहे थे कि कौन रहेगा और कौन जाएगा? इन्हीं टेप के अनुसार राडिया ने ही राजा को सूचना दी थी कि आपका मंत्री बनना पक्का हो गया है। बरखा और राडिया इस बातचीत में जम्मू कश्मीर के भूतपूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद को बहुत लाड से या अपनी आत्मीयता दिखाने के लिए गुलाम कहती है और प्रधानमंत्री के साथ कौन सा नेता किस समय मिलने पहुंचा और किस समय निकला, इसकी पल पल की जानकारी उनको होती है, यह चकित नहीं करता बल्कि स्तब्ध करता है। आखिर यह देश और इसका लोकतंत्र क्या वाकई सिर्फ दलाल चला रहे हैं। इन दलालों की कहानी में बरखा जैसे ऐसे लोग भी जुड़ गए हैं जिनका नाम अब भी पत्रकारिता के कोर्स में बड़ी इज्जत से दर्ज है।
चालीस साल की हो चुकी बरखा दत्त ने शादी नहीं की। उनके पास एनडीटीवी में शो करने और करवाने के अलावा बहुत वक्त है जिसमें वे राडियाओं और राजाओं की दलाली कर सकती है। कनिमोझी को बरखा कनि कह सकती है और दयानिधि मारन को दया कह कर बुला सकती हैं तो जाहिर है कि अंतरंगता के स्तर क्या रहे होंगे। प्रधानमंत्री अगर करुणानिधि की मांगों पर नाराज होते हैं तो यह बात बरखा को सबसे पहले पता लगती है।
करुणानिधि अगर अपने परिवार के तीन सदस्यों को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करवाने के प्रति संकोच में पड़ जाते हैं और टी आर बालू के बयानों पर मनमोहन सिंह करुणानिधि से शिकायत करते है तो यह भी सबसे पहले बरखा को ही पता लगता है। बरखा तो नीरा राडिया को यह भी बता देती है कि किसको कौन सा मंत्रालय मिलने वाला है। अब या तो बरखा महाबली है या हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बहुत ही कायर और रसिया किस्म के आदमी है जो छम्मक छल्लो की तरह इठलाने वाली बरखा को सबसे पहले अपने राजनैतिक रहस्य बताते हैं। बरखा उन रहस्यों को कैश करवा लेती है।
ऐसा नहीं कि भारतीय लोकतंत्र में नेता पत्रकारों का इस्तेमाल नहीं करते रहे। जवाहर लाल नेहरू तक शाम लाल और कुलदीप नायर तक से दूसरों के बारे में सूचनाएं मंगाते थे और दक्षिण भारत की चर्चित पत्रिका तुगलक के संपादक चो रामास्वामी आज भी दक्षिण भारत के लिए चाणक्य से कम नहीं माने जाते। करुणानिधि और जयललिता दोनों उनसे सलाह लेते है।
बरखा दत्त के बारे में जान कर और सुन कर हैरत इसलिए होती हैं और शोक सभा मनाने का मन इसलिए करता है कि बरखा को नई पीढ़ी की आदर्श पत्रकाराेंं में से एक माना जाता रहा है और कारगिल युद्व से ले कर बहुत सारी दुर्घटनाओं को बहुत बहादुरी से कवर किए जाते उन्हें देखा गया है। पद्म श्री देने के लिए बरखा ने सुनामी की त्रासदी का जो कवरेज किया था उसी को आधार बनाया गया।
इतने शानदार सामाजिक सरोकारों से जुड़ी बरखा दत्त अगर सीधे सीधे और सबूतों के आधार पर दलाली करती नजर आएंगी तो वे सिर्फ अपने प्रशंसकों को ही नहीं, बल्कि उस पूरे समाज को आहत करती दिखाई पड़ रही हैं जिसे एक बार फिर अपने नायकों और नायिकाओं पर भरोसा हो चला था। बरखा ने और वीर सांघवी ने यह भरोसा तोड़ा है। नीरा राडिया का क्या, वह तो दलाल थी ही और आज भी है और दलालों का कोई चरित्र होता हो यह कभी नहीं सुना गया। बरखा दत्त की बोलती बंद हो गई है। टेप सरकारी है। अब एक बड़ा तबका राजा और मनमोहन सिंह से निपटने के लिए इन्हे मीडिया तक पहुंचा रहा है। टेप सत्तर घंटे के आस पास के हैं और पता नहीं अभी कितने दलालों के नाम सामने आएंगे।
सोमवार, 18 अक्तूबर 2010
एनडीटीवी के प्रनोय ने किया करोड़ों का गबन.

शनिवार, 16 अक्तूबर 2010
गुलाम खेल का शानदार समापन !
कॉमनवेल्थ- गुलाम खेल समारोह का शानदार समापन हो गया। गुलामों ने पदकों का शतक बनाया और दीवाली के पहले ही जश्न मना कर कॉमनवेल्थ खेलों के सहारे अपनी गुलामी को गर्व से याद किया।अब कॉमनवेल्थ आयोजन समिति और इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी और उनके गिरोह की पड़ताल होने की बारी है। पहले से ही दर्जनों बड़े घपले जांच की कतार में और अचानक कलमाडी का एक और घपला ऐसा मिला जिसमें वे इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन के अध्यक्ष के तौर पर शामिल हैं, अपने बेटे सुमीर कलमाडी को भी रईस बनाना चाहते हैं। इस धोखाधड़ी में उनकी मदद की जेपी इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के प्रबंध निदेशक और जेपी समूह के संस्थापक जयप्रकाश गौर के पुत्र मनोज गौर ने।
जेपी समूह को आम तौर पर टाटा की तरह साफ सुथरी कंपनी माना जाता है। जयप्रकाश गौर ने एक मामूली जूनियर इंजीनियर से आगे बढ़ क़र इसकी शुरूआत मध्य प्रदेश के रीवा जिले से की थी और सीमेंट ढोने का काम शुरू किया था। आज वे भारत के बड़े रईसों की सूची में हैं और कई ऐेसे व्यापारकि सौंदे हैं जहां सुपर रईस टाटा और अंबानी को मात देना चाहते हैं।
सुरेश कलमाडी ने दो साल पहले ऐलान किया था कि फॉर्मूला वन मोटर रेसिंग एफ 1 से समझौता हो गया हैं और भारत में जल्दी ही एफ 1 मोटर चैंपियनशिप दिखाई पड़ेगी। कलमाडी ने यह नहीं बताया था कि उनका बेटा सुमीर कलमाडी, बेटी और दामाद भी यह आयोजन करने वाली भारतीय कंपनी के डायरेक्टर होंगे।
कौन सा भारतीय नेता कारोबार करने में अपनी जेब से पैसा लगाता है? कितने समृध्द व्यापारी और कारोबारी ऐसे होते हैं जो राजनेताओं की कृपा पाने के लिए मोटी रकमें खर्च नहीं करते? अक्टूबर में ही ब्रिटेन की फॉर्मूला वन करवाने वाली एसोसिएशन ने एक भारतीय कंपनी के साथ 1600 करोड़ रुपए का अनुबंध किया। कंपनी का नाम है जेपीएसके स्पोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड।
इस कंपनी जेपीएसके में जेपी जयप्रकाश का है और एसके सुमीर कलमाडी का। 74 प्रतिशत शेयर्स जयप्रकाश एसोसिएट्स के हैं। पुणे में सुमीर कलमाडी द्वारा चलाई जा रही बिल्डर कंपनी सुल्बा रियल्टी प्राइवेट लिमिटेड के 13 प्रतिशत है और उतने ही शेयर कलमाडी कीे बेटी और दामाद के ट्रैक वर्क इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड के हैं। दिल्ली की एक कागजी कंपनी के नाम भी कुछ शेयर्स रखे गए हैं। यह समझौता 16 नवंबर 2007 को हुआ था। जेपी को मायावती ने जो अपार जमीन दे रखी है उसमें से 2500 एकड़ इस धंधे के लिए रखे गए। इनमें से एक हजार एकड़ में रेसिंग के लिए ट्रैक बनना था और बाकी में जो इमारते बनती उसमें से जेपी, सुल्बा और ट्रैक वर्क को साझेदारी करनी थी। सबसे बड़ा हिस्सा जेपी को मिलना था। वाणिज्य मंत्रालय के रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के रिकॉर्ड बताते हैं कि जेपीएसके कंपनी में बनने के एक साल बाद कलमाडी कीे बेटी पायल और दामाद आदित्य भरतियां निदेशक के तौर पर शामिल हुए और जेपी समूह वाले बहुत गर्व से कहते हैं कि ये नए निदेशक भी बहुत दिलचस्पी ले कर काम कर रहे हैं। सुमीर कलमाडी तो बार बार अपना फोन काटते ही रहे लेकिन पिता जी सुरेश कलमाडी ने फोन उठाने की कृपा की और कहा कि इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन के पास इतना पैसा नहीं था कि इतना बड़ा आयोजन कर सके इसलिए गैर सरकारी भागीदारी लेनी पड़ी। यह भाषा लगभग सात हजार करोड़ का कॉमनवेल्थ करवाने वाले सुरेश कलमाडी की है और वे अपने बेटे सुमीर के अलावा जयप्रकाश गौर के बेटे मनोज गौर को भी बचा रहे हैं। उधर सुमीर कलमाडी ने कहा कि मैं तो आम तौर पर विदेश में रहता हूं और जब लौटूंगा तब बात करूंगा। इतना हराम का पैसा हो तो कोई भी चाहे जितने दिन तक विदेश में रहे।
मनोज गौर को खोजने के लिए सबसे कम मेहनत करनी पड़ी। उन्होंने कहा कि ट्रैक वर्क के सुंदर मूलचंदानी ने उनका परिचय एफ 1 आयोजित करने वाली कंपनी से करवाया था और यही मूलचंदानी सुमीर कलमाडी को ले कर आया था। मनोज गौर का जो बचकाना हिसाब किताब है उसके अनुसार 1600 करोड़ के अलावा जो 2500 एकड़ जमीन जेपी समूह को लगानी है उसका दाम एक करोड़ रुपए प्रति एकड़ है। यहां मनोज गौड़ ने अपने जेपी समूह और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती दोनाें को फंसवा दिया।
हाल में ही अलीगढ़ और मथुरा के पास किसानों ने अपनी जमीन का दाम बहुत कम लगाए जाने को ले कर बहुत हंगामेदार आंदोलन किया था और तब मायावती ने कहा था कि किसानों को उचित कीमत और वार्षिक भुगतान अगले तीस साल तक किया जाएगा। फिर भी किसानों को लूटा गया। जेपी के खजाने और मायावती का पर्स भरा गया। इसमें अब किसी को संदेह नहीं रह गया है।
जय प्रकाश गौर चालाक आदमी है। वे अपने फायदे के लिए किसी को भी आफत में फंसा सकते हैं। बेटे मनोज को भी उन्होंने यही संस्कार दिए हैं। यमुना एक्सप्रेस वे, आने वाले गंगा एक्सप्रेस वे दोनों में उन्हे ठेका देने में धांधली की गई। इस बात की बाकायदा शिकायते आ चुकी है कि गंगा एक्सप्रेस वे का ठेका देने में हालांकि जेपी समूह तीसरे नंबर पर था मगर अंबानी और एक और बड़े उद्योग समूह को किनारे कर के इस कंपनी को उपकार बेचा गया। मध्य प्रदेश के अन्यथा निर्विवाद और झमेलों में नहीं पड़ने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की पत्नी को डंपर घोटाले में फंसवाने वाला भी जेपी समूह ही था। जेपी के दिए इस कलंक को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह सलीब की तरह ढो रहे हैं। मायावती और कलमाडी की पड़ताल होगी तो जयप्रकाश समूह और मनोज गौर दोनों अभियुक्तों की कतार में नजर आएंगे।
बुधवार, 15 सितम्बर 2010
महाबली दैनिक भास्कर के ढेर होने की सत्यकथा!

बृहस्पतिवार, 9 सितम्बर 2010
अपनी विफलता पर इतराते नितीश,इस विफलता से जीत के कितने करीब.
नीतिश कुमार घुटनों के बल आ
गए मगर माओवादियों ने तीन
पुलिस वालों
को छोड़ने का अपना वायदा पूरा करने के पहले उन्हें काफी जलील किया। अब राज्य के कई भूतर्पूव पुलिस महानिदेशक याद दिला रहे हैं कि जब पुलिस में राजनीति की जाती है तो इस तरह की शर्मिंदगी झेलनी ही पड़ती है।
एक भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि पुलिस वालों के लगातार तबादले, पुलिस बल की कमी, थानाेंं में सुविधाओं की कमी, फाइलें निपटाने में देरी और माओवाद पर किसी स्पष्ट नीति का अभाव ही पहले नक्सलवाद और अब माओवाद को बढ़ावा दे रहा है।
एक और भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक ध्रुव प्रसाद ओझा ने कहा कि 2003 में जब वे डीजीपी बने थे तब राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थी। उनकी सुविधा के लिए मैने हिंदी और अफसरों के लिए अंग्रेजी में रिपोर्ट तैयार कर के दी थी और बताया था कि इस समस्या से कैसे निपटा जा सकता है। यह रिपोर्ट कभी राबड़ी देवी कीे मेज तक पहुंची ही नहीं। उन्होंने खुद मुख्यमंत्री स्टाफ से इसकी पुष्टि की थी। ओझा का दावा है कि इसमें जो रास्ते सुझाए गए थे, उनके हिसाब से माओवादियों को बिहार में जड़े जमाने का मौका ही नहीं मिलता।
बिहार में जहानाबाद और गया के इलाके नक्सलवाद और बाद में माओवाद के असली गढ़ रहे है। नक्सलवाद का पतन होने के बाद और चारू मजूमदार की मौत के बाद भी यहां माक्र्सवादी लेनिनवादी पार्टी कई संगठनों के जरिए चलती रही। इन संगठनों में पीपुल्स वॉर ग्रुप था जो आंध्र प्रदेश के संगठन से सीधे जुड़ा हुआ था। इसके अलावा एक मजदूर किसान संघर्ष समिति बनी थी और इस समिति की कहानी एक दम अलग थी।
जयप्रकाश आंदोलन में भाग लेने आगरा से बिहार पहुंचे डॉक्टर विनयन शर्मा आंदोलन के बाद भी वहीं रह गए और उन्हें लगा कि जो राजनैतिक परिवर्तन आया है वह समाज में तीसरी क्रांति ले कर नहीं आ पाया है। इसीलिए उन्होंने मजदूर किसान संघर्ष समिति बनाई और मजदूरों और किसानों को हथियार उठाने के लिए भी प्रेरित किया।
यह वह दौर था जब बिहार में जातीय सेनाए पनप रही थी। राजपूतों की रणबीर सेना कई बड़े हत्याकांड कर चुकी थी। इसके अलावा एक कुर्मी सेना भी बनी थी जो नीतिश कुमार की जाति वालों की थी। उस समय नीतिश और लालू साथ साथ थे इसलिए नीतिश कुर्मी सेना के समर्थक नहीं बने। डॉक्टर विनयन की एक आम सभा पर जहानाबाद के अरवल गांव में पुलिस ने गोलियां चलाई और पचास से ज्यादा लोग मारे गए। बदले में संगठन ने भी हमले किए और डॉक्टर विनयन पर 1990 में एक लाख रुपए का इनाम घोषित कर दिया गया।
उस दौरान डॉक्टर विनयन दिल्ली में मेरे साथ ही ठहरते थे और उनसे मिलने जुलने वालों में जो लोग थे उनमें कई बड़े पुलिस अधिकारी, बिहार के कई नेता और दूसरे वाम संगठनों के लोग भी होते थे। जेपी आंदोलन के साथी भी आते थे जो दक्षिणपंथी भी थे और मध्य मार्गी भी। उसी समय पीपुल्स वॉर ग्रुप गिरोह बनने में लगा हुआ था और माओवाद का उदय वहीं से हुआ है। विनयन इस खतरे से आगाह थे और इसे रोकना चाहते थे मगर बिहार में तो उनके सिर पर लाख रुपए का इनाम था। उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र से संपर्क किया और कुछ मित्रों की मदद से आत्म समर्पण कर के पीपुल्स वॉर ग्रुप के खिलाफ काम करना चाहते थे। मगर जल्दी ही दिल के दौरे से उनकी मौत हो गई।
भूतपूर्व डीजीपी ओझा याद दिलाते हैं कि उन्हें सिर्फ इसलिए रिटायर होने के लिए कह दिया गया था क्योंकि उन्होने राष्ट्रीय जनता दल के एक गुंडे सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन को दौड़ा लिया था। उन्होंने कहा कि उस समय नीतिश कुमार भी मेरे पक्ष में बोलने आए थे क्योंकि यह उनकी राजनीति के लिए ठीक था मगर अब माओवाद के मामले में तो वे मेरी भी सुनने को राजी नहीं है। एक और भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक डी एन गौतम माओवादियों द्वारा एक सहायक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या से बहुत दुखी है और याद दिलाते है कि उन्होंने माओवाद प्रभावित जिले जमुई में पुलिस फायरिंग रेंज बनाने का प्रस्ताव दिया था मगर इलाके के विकास के नाम पर इसे मंजूर नहीं किया गया और आज इसी इलाके में सबसे ज्यादा माओवादियों का असर है।
एक जमाने में अपराधियों के बीच आतंक का नाम बन चुके डीएन गौतम कहते हैं कि बिहार पुलिस के आधुनिकीकरण की जब भी कोशिश की गई तो अफसरों ने इसमें टांग अड़ा दी। उनका कहना है कि पुलिस का आधुनिकीकरण्ा तो सीधे मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक के बीच का मामला होना चाहिए और कोई आईएएस बीच में नहीं आना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि आंध्र प्रदेश में यहीं होता है। गौतम तो यहां तक कहते हैं कि पुलिस महानिदेशक द्वारा तैयार की गई सीधे मुख्यमंत्री के हाथ में पहुंचनी चाहिए और उस पर गृह सचिव की टिप्पणी भी नहीं होनी चाहिए। इस मामले में वे फिर आंध्र प्रदेश का उदाहरण देते हैं और कहते हैं कि इसी वजह से आंध्र प्रदेश में माओवादी सबसे कम असर दिखा सके हैं।
श्री गौतम, अरुंधती राय, गौतम नवलखा और ऐसे ही उन तथाकथित बुध्दिजीवियों से खासे नाराज हैं जो माओवाद के हक में तो बहुत बोलते हैं मगर माओवादियों द्वारा निर्दोषों की हत्याएं उन्हें नजर नहीं आती। वे याद दिलाते हैं कि आज तक देश में माओवादियों ने सुरक्षा बलों के अलावा जिन निर्दोषों की हत्या की है उनमें से नब्बे प्रतिशत से ज्यादा आदिवासी है। आदिवासियों के हत्यारों को आप कैसे समाज के पिछड़े हुए लोगों का रक्षक कहेंगे?
दिक्कत यह भी है कि जब बिहार सरकार सही रास्ते पर चल रही होती है तो दूसरे राज्यों की तरह अधिकारी पिछड़े रास्तों पर ही रहना पसंद करते है। बिहार में एक और डीजीपी रहे आनंद शंकर ने कहा कि माओवादियों के खिलाफ बिहार पुलिस को विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। अभी तक कई बार यह प्रस्ताव दिया जा चुका है मगर इस पर कोई अमल नहीं हुआ है। नीतिश कुमार ने सुशासन का जो आडंबर पिछले पांच साल में खड़ा किया था और माओवादियों ने दो सप्ताह में तोड़ दिया है और इसके सबसे ज्यादा खुद जिम्मेदार नीतिश कुमार हैं।
--आलोक तोमर--
बुधवार, 8 सितम्बर 2010
आउटलुक की लुटिया विनोद मेहता ने डुबोई, मामला सहारा और आउटलुक की लड़ाई का.
भारत के दो सबसे बड़े व्यापारिक घरानों में जो मीडिया में भी सक्रिय हैं, जंग छिड़ गई है। सहारा समूह ने आउटलुक बिजनेस पत्रिका निकालने वाले रहेजा समूह पर इल्जाम लगाया है कि उसने झूठ प्रकाशित कर के सहारा का नुकसान किया है और मानहानि का दो सौ करोड़ रुपए का मुकदमा भी कायम कर दिया गया है।
रहेजा मुंबई का जाना माना बिल्डर समूह है। लेकिन पत्रिकाओं के मामले में उसकी किस्मत अच्छी नहीं रही। हिंदी और अंग्रेजी में रहेजा समूह ने आउटलुक पत्रिकाएं निकाली थी। इनमें से हिंदी की आउटलुक साप्ताहिक अब पाक्षिक होते हुए मासिक हो गई है और जल्दी ही अदृश्य होने की तैयारी में है। इसके अलावा अंग्रेजी पत्रिका विनोद मेहता चला रहे हैं और वह भी बाजार में ज्यादा जगह नहीं पकड़ पाई। आउटलुक बिजनेस थोड़ी बहुत चल रही है।
इसी आउटलुक बिनजेस को ले कर रहेजा और सहारा में दो अरब रुपए की जंग छिड़ी है। आउटलुक बिजनेस ने सहारा पर बहुत सारे आर्थिक घोटालों का इल्जाम लगाते हुए मध्यस्त के अपने अंत में एक रिपोर्ट छापी थी जबकि जो भी आरोप इस रिपोर्ट में लिखे थे उनकी जांच सहारा समूह के अनुसार स्टॉक एक्सचेंज बोर्ड और कई आर्थिक संस्थाएं कर रही है। ऐसे में सहारा से तथ्यों की पुष्टि किए बगैर यह रिपोर्ट छाप दी गई। सहारा ने इसी पर ऐतराज जताया है कि और अदालत ने सहारा का साथ देते हुए रहेजा की कंपनियाें को कह दिया है कि जब तक फैसला नहीं हो जाता तब तक सहारा के खिलाफ कोई रिपोर्ट नहीं छपेगी।
आउटलुक की रिपोर्ट के अनुसार सहारा समूह अपने ग्राहकों को धोखा देता है और उनका पैसा हजम कर जाता है। शेयर बाजार में भी उसने निवेशकों को ठगा है। इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सहारा अखबारों में पैसा दे कर खबरे छपवाता है ताकि उसकी छवि ठीक नहीं रहे। इस रिपोर्ट में सीधे सहारा के चेयरमैन सुब्रत राय पर आरोप लगाया गया है कि वे अपनी सफलताओं की झूठी कहानियां प्रचारित कर रहे है। यह भी कहा गया है कि पचास हजार करोड़ के कारोबार और नौ लाख से ज्यादा कर्मचारियों का सहारा का दावा भी गलत है। यह भी कहा गया है कि सहारा के ज्यादातर धंधे घाटे में चल रहे हैं।
घाटे वाली बात पर तो शायद ही कोई विचार करे क्योंकि सहारा समूह जिस तरह से अपार पैसे लगा कर भारतीय क्रिकेट टीम को प्रायोजित कर रहा है और आईपीएल की एक पूरी टीम खरीद लेता है यह कोई घाटे में चलने वाला समूह नहीं कर सकता। वैसे भी आउटलुक बिजनेस की रिपोर्ट की एक एक पक्ति से प्रतिशोध की गंध आती है। इसमें सहारा की देशभक्ति से ले कर सामाजिक परिवर्तन में भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं और विश्व का सबसे बड़ा परिवार कहने का मजाक उड़ाया गया है।
पत्रिका ने सहारा समूह के चेयरमैन सुब्रत राय के साथ अटल बिहारी वाजपेयी, बाल ठाकरे, दलाई लामा, बाबा रामदेव, प्रतिभा पाटिल, एपी जे अब्दुल कलाम, मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, धीरूभाई अंबानी, स्वराज पॉल, रतन टाटा, बिल क्लिंटन और आदि गोदरेज के साथ खिंचवाए गए फोटोग्राफ्स का भी मजाक उड़ाया गया है। जाहिर है कि यह व्यापार की रिपोर्टिंग कम और सहारा को जलील करने की कोशिश ज्यादा है। सहारा के आर्थिक कारोबार यानी सहारा इंडिया फाइनेंशियल कॉरपोरेशन को नॉन बैकिंग कंपनी कहते हुए पत्रिका आरोप लगाती है यह म्यूचुअल मंड और जीवन बीमा में भी काम कर रही है। मगर पत्रिका का आरोप है कि यह जानकारी सिर्फ सहारा की वेबसाइट पर ही उपलब्ध है और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कई बार सहारा के खिलाफ जांच की है मगर सहारा के खिलाफ कभी कुछ साबित नहीं हुआ।
जहां तक आउटलुक्स समूह यानी रहेजा बंधुआें की पत्रकारिता में असफलता का कारण है तो इसके बारे में खुद आउटलुक समूह के लोग स्वीकार करते है कि आउटलुक हिंदी तो कभी ठीक से चल ही नहीं पाई क्योंकि इसके संपादक की दिलचस्पी पत्रिका से ज्यादा सरकार में अपने काम करवाने में थी। अंग्रेजी की पत्रिका भी इसलिए नहीं चल पा रही क्योंकि इसके संपादक विनोद मेहता अपने ऑफिस से ज्यादा टीवी के स्टूडियो में बैठ कर ज्ञान बांटते हुए नजर आते हैं।
आलोक तोमरसाभार : - डेट लाइन इंडिया
रहेजा मुंबई का जाना माना बिल्डर समूह है। लेकिन पत्रिकाओं के मामले में उसकी किस्मत अच्छी नहीं रही। हिंदी और अंग्रेजी में रहेजा समूह ने आउटलुक पत्रिकाएं निकाली थी। इनमें से हिंदी की आउटलुक साप्ताहिक अब पाक्षिक होते हुए मासिक हो गई है और जल्दी ही अदृश्य होने की तैयारी में है। इसके अलावा अंग्रेजी पत्रिका विनोद मेहता चला रहे हैं और वह भी बाजार में ज्यादा जगह नहीं पकड़ पाई। आउटलुक बिजनेस थोड़ी बहुत चल रही है।
इसी आउटलुक बिनजेस को ले कर रहेजा और सहारा में दो अरब रुपए की जंग छिड़ी है। आउटलुक बिजनेस ने सहारा पर बहुत सारे आर्थिक घोटालों का इल्जाम लगाते हुए मध्यस्त के अपने अंत में एक रिपोर्ट छापी थी जबकि जो भी आरोप इस रिपोर्ट में लिखे थे उनकी जांच सहारा समूह के अनुसार स्टॉक एक्सचेंज बोर्ड और कई आर्थिक संस्थाएं कर रही है। ऐसे में सहारा से तथ्यों की पुष्टि किए बगैर यह रिपोर्ट छाप दी गई। सहारा ने इसी पर ऐतराज जताया है कि और अदालत ने सहारा का साथ देते हुए रहेजा की कंपनियाें को कह दिया है कि जब तक फैसला नहीं हो जाता तब तक सहारा के खिलाफ कोई रिपोर्ट नहीं छपेगी।
आउटलुक की रिपोर्ट के अनुसार सहारा समूह अपने ग्राहकों को धोखा देता है और उनका पैसा हजम कर जाता है। शेयर बाजार में भी उसने निवेशकों को ठगा है। इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सहारा अखबारों में पैसा दे कर खबरे छपवाता है ताकि उसकी छवि ठीक नहीं रहे। इस रिपोर्ट में सीधे सहारा के चेयरमैन सुब्रत राय पर आरोप लगाया गया है कि वे अपनी सफलताओं की झूठी कहानियां प्रचारित कर रहे है। यह भी कहा गया है कि पचास हजार करोड़ के कारोबार और नौ लाख से ज्यादा कर्मचारियों का सहारा का दावा भी गलत है। यह भी कहा गया है कि सहारा के ज्यादातर धंधे घाटे में चल रहे हैं।
घाटे वाली बात पर तो शायद ही कोई विचार करे क्योंकि सहारा समूह जिस तरह से अपार पैसे लगा कर भारतीय क्रिकेट टीम को प्रायोजित कर रहा है और आईपीएल की एक पूरी टीम खरीद लेता है यह कोई घाटे में चलने वाला समूह नहीं कर सकता। वैसे भी आउटलुक बिजनेस की रिपोर्ट की एक एक पक्ति से प्रतिशोध की गंध आती है। इसमें सहारा की देशभक्ति से ले कर सामाजिक परिवर्तन में भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं और विश्व का सबसे बड़ा परिवार कहने का मजाक उड़ाया गया है।
पत्रिका ने सहारा समूह के चेयरमैन सुब्रत राय के साथ अटल बिहारी वाजपेयी, बाल ठाकरे, दलाई लामा, बाबा रामदेव, प्रतिभा पाटिल, एपी जे अब्दुल कलाम, मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, धीरूभाई अंबानी, स्वराज पॉल, रतन टाटा, बिल क्लिंटन और आदि गोदरेज के साथ खिंचवाए गए फोटोग्राफ्स का भी मजाक उड़ाया गया है। जाहिर है कि यह व्यापार की रिपोर्टिंग कम और सहारा को जलील करने की कोशिश ज्यादा है। सहारा के आर्थिक कारोबार यानी सहारा इंडिया फाइनेंशियल कॉरपोरेशन को नॉन बैकिंग कंपनी कहते हुए पत्रिका आरोप लगाती है यह म्यूचुअल मंड और जीवन बीमा में भी काम कर रही है। मगर पत्रिका का आरोप है कि यह जानकारी सिर्फ सहारा की वेबसाइट पर ही उपलब्ध है और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कई बार सहारा के खिलाफ जांच की है मगर सहारा के खिलाफ कभी कुछ साबित नहीं हुआ।
जहां तक आउटलुक्स समूह यानी रहेजा बंधुआें की पत्रकारिता में असफलता का कारण है तो इसके बारे में खुद आउटलुक समूह के लोग स्वीकार करते है कि आउटलुक हिंदी तो कभी ठीक से चल ही नहीं पाई क्योंकि इसके संपादक की दिलचस्पी पत्रिका से ज्यादा सरकार में अपने काम करवाने में थी। अंग्रेजी की पत्रिका भी इसलिए नहीं चल पा रही क्योंकि इसके संपादक विनोद मेहता अपने ऑफिस से ज्यादा टीवी के स्टूडियो में बैठ कर ज्ञान बांटते हुए नजर आते हैं।


