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खेतिहर किसानों के मसीहा ब्रहमेश्वर मुखिया की गोली मारकर ह्त्या.

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शुक्रवार, 1 जून 2012

धूम्रपान से कूल्हे के फ्रैक्चर का खतरा.

तंबाकू निषेध दिवस के मौके पर अस्थि विशेषज्ञों ने कहा कि सिगरेट का धुंआ मांसपेशियों एवं हड्डियों की मस्क्युलोस्केलेटन प्रणाली को व्यापक रूप से प्रभावित करता है.  विशेषज्ञों का कहना है कि आजकल युवाओं में कूल्हे की हड्डियों की समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं. 

युवाओं में ‘अवैस्कुलर नेक्रोंसिस ऑफ हिप बोन’ की समस्या बढ़ रही है जिसके कारण कूल्हे बदलने की जरूरत बढ़ जाती है. दिल्ली स्थित फोर्टिस अस्पताल के अस्थि विशेषज्ञ डा. सुभाष जांगिड और डा. विवेक लोगानी के अनुसार तंबाकू में पाया जाने वाला निकोटीन हमारे शरीर में जहरीला प्रभाव छोड़ता है जिसका असर मांसपेशियों, जोड़ों और हड्डियों पर पड़ता है और सिगरेट का धुंआ चोट को ठीक होने की प्रक्रिया को धीमा कर देता है. 

इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के अस्थि शल्य चिकित्सक डा. राजू वैश्य के अनुसार निकोटीन हड्डियों का फ्रैक्चर भरने की प्रक्रिया तथा एस्ट्रोजन हार्मोन के प्रभाव को कम करता है और यह विटामिन सी और ई से मिलने वाले एंटी ऑक्सिडेंट तत्वों को निष्प्रभावी कर देता है, यही वजह है कि धूम्रपान करने वालों को कूल्हे के फ्रैक्चर का खतरा ज्यादा रहता है. 

डा. जांगिड और डा. लोगानी के अनुसार सिगरेट पीने वालों में हडिडयों एवं मांसपेशियों ‘मस्क्युलोस्केलेटल’संबंधी बीमारियों के होने की आशंका बढ़ जाती है और इसके कारण ऑस्टियोपोरोसिस, हड्डियों की मोटाई में कमी, कमर के निचले हिस्से में दर्द और स्पाइनल डिस्क की समस्याएं अधिक होती है. 
अस्थि विशेषज्ञों के अनुसार धूम्रपान करने वाली महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजेन हार्मोन के इस्तेमाल की प्रक्रिया को प्रभावित कर अस्थि रोगों को बढ़ता है. डा. लोगानी बताते हैं कि यह हार्मोन ऑस्टियोपोरोसिस से बचाने में मदद करता है तथा शरीर की सभी कोशिकाओं के एस्ट्रोजन रिसेप्टर को कम करता है.  ऐसे में एस्ट्रोजन का ऊतकों पर असर नहीं हो पाता है. यही नहीं, धूम्रपान महिलाओं की रीढ़ में फ्रैक्चर के खतरे को भी बढ़ा देता है. कई अध्ययनों से पता चलता है कि धूम्रपान से जल्दी मीनोपॉज भी हो सकता है. इसके अलावा बहुत ज्यादा धूम्रपान करने वालों को धूम्रपान नहीं करने वालों की तुलना में डिस्क के कमजोर होने का खतरा अधिक होता है. 

बृहस्पतिवार, 10 मई 2012

लहसुन है दवाओं से ज्यादा असरदार.


वैज्ञानिकों की माने तो लहसुन में एक ख़ास तरह का तत्व होता है जो भोजन को विषाक्त बनाने वाले बैक्टीरिया से लड़ने में कारगर साबित होता है. उनका मानना है कि भोजन में लहसुन ‘एंटी बॉयोटिक’ दवाओं से भी ज्यादा असरदार होता है.

वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया है कि लहसुन में पाया जाने वाला तत्व ‘डाईलिल सल्फाइड’ विषाणु द्वारा बनाई जाने वाली ज़हरीली परत को तोड़ने में मददगार होता है. साथ ही यह तत्व न सिर्फ दवाओं से भी ज्यादा बेहतर काम करता है बल्कि इसका असर भी शीघ्र होता है. लहसुन  से भोजन और मांस को विषाक्त होने से बचाने में मदद मिलेगी. पाया गया है कि  इसके तत्व से भोजन और पर्यावरण में एक विषाणु के ख़तरे को कम किया जा सकता है.’’

मंगलवार, 28 फरवरी 2012

घर पर ही च्यवनप्राश बनायें.


सर्दी में शरीर स्वस्थ व सुडौल बनाने के लिए पौष्टिक आहार के साथ ही अधिकतर लोग बाजार का बना च्यवनप्राश का भी सेवन करते हैं। लेकिन बाजार के बने च्यवनप्राश में कई तरह के प्रिजर्वेटिव्स होते हैं जो कि शरीर के लिए नुकसानदायक होते हैं। इसीलिए आज हम बताने जा रहे हैं कि किस तरह आप घर पर ही आयुर्वेदिक च्यवनप्राश बना सकते हैं। 

च्यवनप्राश में मुख्य सामग्री आवंला सहित निम्न प्रकार की सामग्री प्रयोग की जाती है। ये अधिकतर इस तरह की दवाएं बेचने वाले पंसारी के पास आराम से मिल जातीं है। च्यवनप्राश को बनाते समय मिलाने वाली जड़ी बूटियों में यदि कुछ न भी मिले तो जो उपलब्ध हैं आप उन्हीं से च्यवनप्राश बना सकते हैं। इनमें निम्न पांच तरह की सामग्री प्रयोग होती है।

 प्रधान सामग्री

आवंला - 5 किलो

 संसाधन सामग्री

(50 ग्राम) प्रत्येक औषधि

पाटला, अरणी,गंभारी,विल्व ,श्योनक(अरलु) (-इनकी छाल)7 गोखरू,शालपर्णी, प्रष्टपर्णी, छोटी कटेली,बड़ी कटेली- इनका पंचांग (अर्थात जड़ समेत पूरा पोधा),पीपल, काकड़ासिंघी, मुनक्का,गिलोय,हरड,खरेंटी,भूमिआवला,अडूसा,जीवन्ती,कचूर,नागरमोथा,पुष्करमुल,कोआठाडी,मुंगपर्णी, माषपर्णी, विदारीकंद,सांठी,कमलगट्टा,छोटीइलायची,अगर,चन्दन,अष्टवर्ग(ॠद्धि, वृधि, मेदा, महामेदा, जीवक, ॠषभक, काकोली, क्षीरकाकोली)  या इनके नहीं मिलने पर प्रतिनिधि द्रव्य (खरेंटी,पंजासालब,शकाकुल छोटी, शकाकुल बड़ी,लम्बासालब,काली मुसली, सफेद मुसली, और सफेद बहमन), (50 ग्राम) प्रत्येक (ये अधिकतर इस तरह की दवायें बेचने वाले पंसारी के पास आराम से मिल जातीं है। च्यवनप्राश को बनाते समय मिलाने वाली जड़ी बूटियों में यदि कुछ न भी मिले तो जो उपलब्ध हैं आप उन्हीं से च्यवनप्राश  बना सकते हैं।

 यमक सामग्री-

घी 250 ग्राम, तिल का तेल-250 ग्राम

 संवाहक सामग्री -

चीनी - तीन किलो

 प्रेक्षप सामग्री पिप्पली - 100 ग्राम, बंशलोचन - 150 ग्राम, दालचीनी - 50 ग्राम, तेजपत्र - 20 ग्राम, नागकेशर - 20 ग्राम, छोटी इलायची - 20 ग्राम, केशर - 2 ग्राम, शहद - 250 ग्राम।

बनाने की विधि -आंवले को धो लीजिए। धुले आंवले को कपड़े की पोटली में बांध लीजिए। किसी बड़े स्टील के भगोने में 12 लीटर पानी भरिए। संसाधन सामग्री की जड़ी बूटियां डालिए और बंधे हुए आंवले की पोटली डाल दीजिए।

 भगोने को तेज आग पर रखिए, उबाल आने के बाद आग धीमी कर दीजिए, आंवले और जड़ी बूटियों को धीमी आग पर एक से डेढ़ घंटे तक उबलने दीजिए, जब आंवले बिल्कुल नरम हो जायें तब आग बन्द कर दीजिए। आंवले और जड़ी बूटियों को उसी तरह भगोने में उसी पानी में रातभर या 10 -12 घंटे ढककर पड़े रहने दीजिए।अब आंवले की पोटली निकाल कर जड़ी बूटियों से अलग कीजिए, आप देखेंगे कि आंवले सांवले हो गये हैं, आंवलों ने जड़ी बूटियों का रस अपने अन्दर तक सोख लिया है।सारे आंवले से गुठली निकाल कर अलग कर लीजिए।जड़ी बूटियां का खादी के कपडे या  वेस्ट छलनी से छान कर अलग कर दीजिए।

जड़ी बूटियों का पानी अपने पास छान कर सभाल कर रख लीजिये यह च्यवनप्राश बनाने के काम आएगा।जड़ी बूटियों के साथ उबाले हुये आंवलों को, जड़ी बूटियों से निकला थोड़ा थोड़ा पानी मिलाकर मिक्सर से एकदम बारीक पीस लीजिए और बड़ी छलनी में डालकर, चम्मचे से दबा दबा कर छान कर रेशे अलग कर लीजिए। सारे आंवले इसी तरह पीस कर छान लीजिए। आंवले के सारे रेशे छलनी के ऊपर रह जाएगे जो वेस्ट है फैंक देंगे। (पहले समय में आंवलों को कपड़े पर घिसकर कपड छन करके छाना जाता था ताकि आंवले से रेशे दूर हो सके। लेकिन इसमें समय और श्रम अधिक लगता था) यदि जड़ी बूटी से छाना हुआ पानी बचा हुआ है तो इसे भी इसी पल्प में मिला दें। जड़ी बूटियों के रस और आवंले के पल्प के मिश्रण को हम च्यवनप्राश बनाने के काम लेंगे।

 मोटे तले की कढ़ाई कलाई वाली पीतल की हो तो ठीक स्टील की कड़ाई में चिपक कर जल जाने का खतरा होता है। जिसमें पल्प आसानी से भूना जा सके, आग पर गरम करने के लिये रखिए।(लोहे का बर्तन च्यवनप्राश को काला कर देता है)कढ़ाई में तिल का तेल डाल कर गरम कीजिए।, गरम तेल में घी डाल कर घी पिघलने तक गरम कीजिए। जब तिल का तेल अच्छी तरह गरम हो जाय तब आंवले का छाना हुआ पल्प डालिए और चमचे से चलाते हुये पकाइए। मिश्रण में उबाल आने के बाद चीनी डालिए और लगातार चमचे से चलाते हुए। मिश्रण को एकदम गाड़ा होने तक घी छोडऩे तक, पका लीजिए। आप कढाई की उपलब्धतानुसार इसे 1 या दो बार में पका सकते हैं।

जब मिश्रण एकदम गाढा हो जाय  तो गैस से उतार इस मिश्रण को 5-6 घंटे तक कढ़ाई में ही ढककर रहने दीजिए(पीतल के बर्तन में अधिक देर न रखे), पांच या 6 घंटे बाद इस मिश्रण को आप स्टील के बर्तन में निकाल कर रख सकते हैं।प्रेक्षप द्रव्य में दी गई लिस्ट में से छोटी इलायची को छील लीजिए। इसके बाद छिली हुई छोटी इलायची के दानो में पिप्पली, बंशलोचन, दालचीनी, तेजपात, नागकेशर को मिक्सी में एकदम बारीक पीस लीजिए।

अब इस पिसी सामग्री को शहद और केसर में मिलाकर आंवले के मिश्रण में अच्छी तरह से मिला दीजिए। आपका च्यवनप्राश तैयार है। इस च्यवनप्राश  को एअर टाइट कांच या प्लास्टिक  के डब्बे में भर कर रख लीजिए और साल भर प्रयोग कीजिए। बाजार के  विज्ञापन में सोने व चाँदी की बात की जाती है। यह मूल च्यवनप्राश में नहीं है। इनकी भस्मे मिली जाती हैं। यदि मिलाना हो तो आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह करके ही मिलाए।

उपयोग मात्रा और विधि - खाली पेट ,10से 15 ग्राम खाकर आधे घंटे बाद दूध पीएं।भोजन के तुरंत बाद नहीं लेना चाहिए,तीन से चार घंटे बाद लिया जा सकता है।यदि च्यवनप्राश अच्छी तरह से पक गया हो तो कभी खराब नहीं होता। फ्रि ज में भी रखा जा सकता है पर उपयोग के पूर्व थोडा गरम करना ठीक रहेगा। एसीडिटी के रोगी न खाए। एसीडिटी बढ़ जाएगी। पहले जुलाब लेकर पेट साफ  करना अधिक लाभ देगा। 

शनिवार, 18 फरवरी 2012

चाय दिल की बीमारियों से सुरक्षित रखता है.


हाल ही में शोधकर्ताओं ने नए अध्ययन में दावा किया है कि रोजाना तीन कप चाय हमें दिल के दौरे और टाइप-2 मधुमेह जैसी बीमारियों से सुरक्षित रख सकती है। 

एक अध्ययन से पता चला है कि नियमित रूप से चाय पीना रक्त शर्करा और खराब कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम कर दिल की बीमारियों के जोखिम को घटाता है। यह बात दूध वाली और दूध रहित चाय दोनों पर लागू होती है।

विशेषज्ञों के अनुसार चाय के इतने बड़े पैमाने पर लाभ उसके फ्लेवोनोइड तत्च (हृदय रोगों से बचाने वाला एंटीऑक्सीडेंट तत्व) की वजह से है। चाय का एक प्याला आपको 150 से 200 एमजी फ्लेवोनोइड तत्च प्रदान करता है और यह हमारे आहार में एंटीऑक्सीडेंट्स का सर्वश्रेष्ठ स्त्रोत है।

दिन में दूध रहित चाय के तीन या उससे अधिक कप आपको दिल की बीमारियों से बचाते हैं, जबकि दो या उससे अधिक कप टाइप-2 मधुमेह से बचाते हैं। अध्ययन के सह लेखक और 'टी एडवाइजरी पैनल' (टीएपी) के सदस्य पोषण विशेषज्ञ कैरी रूक्सटोन के अनुसार इस लोकप्रिय पेय के जितने लाभ हमें मालूम हैं, वास्तव में चाय के उससे कहीं ज्यादा फायदे हैं। बारह सप्ताहों तक चले इस अध्ययन में 87 प्रतिभागियों को शामिल किया गया। इसके साथ ही शोध से पता चला कि रोजना तीन कप चाय पीने से प्रतिभागियों में हृदय सम्बंधी बीमारियों के जोखिम में सुधार आया। चाय मे पाया जाने वाला फ्लेवोनोइड तत्व सूजन को नियंत्रित करने और रक्त के अधिक थक्के जमने के जोखिम को कम करने जैसी बहुत सी चीजों में सहायक है। 

शनिवार, 4 फरवरी 2012

डायट साफ्ट ड्रिंक्स से फायदे से ज्यादा नुकसान.


कम कैलोरी वाले ‘डायट साफ्ट ड्रिंक्स’ से फायदे से ज्यादा नुकसान हो सकता है.एक नये अध्ययन में दावा किया गया है कि इस तरह के शीतल पेय का दिन में एक बार सेवन करने से व्यक्ति में दिल के दौरे का खतरा काफी बढ़ सकता है.

मियामी मिलर स्कूल आफ मेडिसिन यूनीवर्सिटी और कोलंबिया यूनीवर्सिटी मेडिकल सेंटर के नेतृत्व में एक अंतरराष्ट्रीय दल ने कहा कि उनके शोध के निष्कर्ष ने इस भावना को खारिज किया है कि ये डायट ड्रिंक्स स्वास्थ्यकर होती हैं और इनके सेवन से पतले होने में मदद मिलती है. अखबार की खबर के अनुसार, जो लोग प्रतिदिन डायट ड्रिंक्स पीते हैं उनमें दिल के दौरे या नाड़ी संबंधी रोग होने की आशंका 43 प्रतिशत ज्यादा होती है. इस अध्ययन में डायट और सामान्य दोनों तरह के शीतल पेय के सेवन और दिल के दौरे तथा नाड़ी संबंधी रोगों के खतरे को शामिल किया गया. 

शोधकर्ताओं ने एक खास समूह पर अध्यययन किया.पाया गया कि जो लोग प्रतिदिन डायट ड्रिंक्स पीते हैं उनमें दिल के दौरे या नाड़ी संबंधी रोग होने की आशंका 43 प्रतिशत ज्यादा होती है. एक महीने में एक बार से सप्ताह में छह बार हल्की डायट ड्रिंक्स पीने वालों और सामान्य शीतल पेय लेने वालों में इस तरह के रोगों के खतरे की संभावना बहुत कम होती है. इस दल का नेतृत्व करने वाले हाना गार्डनर ने कहा कि हमारे नतीजों में संकेत मिले हैं कि प्रतिदिन डायट शीतल पेय के सेवन और नाड़ी संबंधी रोगों के बीच गहरा संबंध है.

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

स्टेम कोशिकाओं से नेत्रहीनो में सुधार के संकेत.


वैज्ञानिकों का दावा है कि भ्रूणीय स्टेम कोशिकाओं का इस्तेमाल कर किए गए प्रायोगिक इलाज के बाद, दो नेत्रहीन महिलाएं अब थोड़ा बहुत देख सकती हैं। एक ओर जहां भ्रूणीय स्टेम कोशिकाएं सबसे पहले करीब एक दशक पूर्व अलग की गई थीं वहीं ज्यादातर अनुसंधान प्रयोगशाला में पशुओं पर किया गया।  
    
नए परिणाम मनुष्यों में दृष्टि संबंधी समस्या के लिए पहले परीक्षणों से मिले हैं। अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि यह काम अब तक शुरुआती अवस्था में ही है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में स्टेम कोशिकाओं के विशेषज्ञ पॉल नोफलर ने बताया कि इस शोध से काफी प्रोत्साहन मिल सकता है पर इस तरह के उपचार की योजना के बारे में अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
    
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में, पिछले साल गर्मियों में, दोनों नेत्रहीन महिलाओं की एक एक आंख में भ्रूणीय स्टेम कोशिकाओं से तैयार की गई कोशिकाएं इंजेक्शन के जरिये प्रविष्ट कराई गईं। एक मरीज में नेत्रहीनता का कारण आम था यानी उम्र संबंधी मैक्युलर क्षरण। दूसरी मरीज स्टारगैर्ड बीमारी से प्रभावित थी जिसमें आंखों की रोशनी चली जाती है। दोनों की ही बीमारियों का कोई इलाज नहीं है।
    
भ्रूणीय स्टेम कोशिका से इलाज के चार माह बाद दोनों की रोशनी में सुधार के संकेत मिले। स्टारगैर्ड बीमारी की मरीज जहां कोई भी अक्षर नहीं पढ़ पाती थी, वह इलाज के बाद कम से कम पांच बड़े अक्षर पढ़ने में सक्षम हो गई। बहरहाल, कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि मैक्युलर क्षरण प्रभावित मरीज की आंख की रोशनी में सुधार का कारण मनोवैज्ञानिक हो सकता है क्योंकि उसकी जिस आंख का इलाज नहीं किया गया था, उसकी रोशनी में भी सुधार प्रतीत हुआ। अध्ययन से अलग कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि दष्टि में सुधार के दावे के बावजूद दोनों महिलाएं कानूनी तौर पर नेत्रहीन ही हैं। 

शनिवार, 31 दिसम्बर 2011

बर्ड फ़्लू वायरस के शोध पर गहरी चिंता.


विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बर्ड फ़्लू के एच-5-एन-1 वायरस पर हाल में ही हुए एक शोध पर गहरी चिंता जताई है जिसके दौरान ये पाया गया है कि इस विषाणु की एक ऐसी क़िस्म विकसित की जा सकती है जो ज़्यादा आसानी से फैल सकता है. 

जेनेवा स्थित विश्व स्वास्थ्य संगठन मुख्यालय से जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि इस तरह के शोध काफ़ी ख़तरनाक हैं और इनपर कड़ी निगरानी रखी जानी चाहिए.पिछले सप्ताह ज़ुकाम (इन्फ़्लुएन्ज़ा) पर शोध कर रही दो टीमों ने घोषणा की थी कि उन्हें ऐसे तरीक़ों का पता चला है जिससे बर्ड फ़्लू वायरस अधिक तेज़ी से फ़ैल सकता है.

अमरीका के स्वास्थ्य अधिकारियों ने शोधकर्ताओं से कहा था कि वो इस रिसर्च के विवरण प्रकाशित न करें.
स्वास्थ्य अधिकारियों को ये डर था कि शोधपत्र की जानकारियों का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों में किया जा सकता है. डब्ल्यूएचओ का बयान एक ऐसे समय आया है जब चीन में बर्ड फ़्लू का एक संदिग्ध मामला सामने आया है.

 हॉंग कॉंग में सरकार ने अलर्ट घोषित किया था. वहाँ एक मृत मुर्गी में बर्ड फ़्लू पाया गया था. बर्ड फ़्लू, इन्फ़्लुएन्ज़ा की सबसे ख़तरनाक क़िस्मों में से एक है जिसकी चपेट में आने वाले मानवों में से साठ प्रतिशत की मौत हो जाती है. लेकिन इसने अबतक महामारी की शक्ल अख़्तियार नहीं की है क्योंकि इसके वायरस का मानवों के बीच फैलना तक़रीबन नामुमकिन है.

डब्ल्यूएचओ सामान्यत: चिकित्सा के क्षेत्र में नई जानकारियों का स्वागत करता है लेकिन वो इस मामले को लेकर चिंतित है जिसमें शोधकर्ताओं ने बर्ड फ़्लू की एक नई क़िस्म विकसित करने की बात कही है. स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि कोई भी शोध, जिसमें एच-5-एन-1 की कोई ख़तरनाक क़िस्म विकसित हो सकती है, नए जोखिम पैदा कर सकता है, और इसे आगे तब तक जारी नहीं रखा जाना चाहिए जबतक आम लोगों के स्वास्थ्य संबंधी सारी चिंताओं का हल न ढूंढ़ लिया गया हो.

संगठन ने आगे कहा है कि प्रयोग में वायरस के इस्तेमाल और संबंधित शोध के क्षेत्र में नए नियमों को लागू किया जाना चाहिए. साल के दौरान डब्ल्यूएचओ के 194 सदस्य देशों ने महामारी से निपटने की तैयारी को लेकर कुछ नियम तैयार किए थे. डब्ल्यूएचओ के बयान से ये ज़ाहिर होता है कि शोधकर्ताओं ने उनका पालन उतनी कड़ाई से नहीं किया.

बृहस्पतिवार, 29 दिसम्बर 2011

घी के कई औषधीय महत्व.


भारतीय व्यंजनों,आयुर्वेदिक औषधियों का पुरातन काल से ही एक घटक रहा है घी। आयुर्वेद के ग्रंथों में तो घी के कई औषधीय महत्व को बताया गया है।  कहते हैं  घी को अन्य औषधि से सिद्धित करने पर यह अपने गुणों को न छोडते हुए उस औषधि के गुणों को भी अपने अन्दर समाहित कर लेता है- है न कमाल की बात ,ये तो अनुकरणीय भी  है। 

भारत में  गृहणियां इसे घरों में भी बना लेती हैं। गाय या भैंस के दूध से मलाई निकलकर उसे मथकर मक्खन प्राप्त किया जाता है । फिर मक्खन को धीरे-धीरे तबतक उबाला जाता है, जब तक मक्खन में स्थित दूध के ठोस कण तले में न बैठ जाए। ठंडा होने पर उसे पतले साफ़ कपडे से छानकर साफ  बर्तन में  रख दिया जाता है। ठंडा होने पर बर्तन का ढक्कन अच्छी तरह से बंद कर दिया जाता है,बस  ध्यान रहे घी को कभी भी फ्रिज में न रखें। आयुर्वेद की कई दवाओं में 'घी ' का प्रयोग होता है तथा गाय के घी को श्रेष्ठ माना गया है।

आयुर्वेद के इन औषधियों को औषधिसिद्धित घृत के नाम से जाना जाता है जो निम्न हैं : फलघृत : खून को बढाने वाला,बंध्या स्त्री को संतान्योग्य बनानेवाला।त्रिफलादीघृत :सभी प्रकार के उदर एवं कृमी रोगों को दूर करने वाला।वृहतकल्याणकघृत :गर्भ न ठहरने वाली स्त्री के लिए अत्यंत उपयोगी औषधि। अशोकघृत : लूकोरीया,कमर दर्द आदि में लाभकारी औषधि।

नवीनघृत :रुचिकारक,तृप्तिकारक,दुर्बलता दूर करने वाला,पुराणघृत या पुराना घी:10 वर्ष पुराना घी जुखाम ,खांसी ,मूर्छा,त्वक विकार ,उन्माद (पागलपन ) और अपस्मार (मिर्गी ) आदि रोगों में फयदेमंद ,पञ्चतिक्तघृत :त्वचा रोगों में प्रभावी होता है। आयुर्वेद मत से गाय का घी अन्य सभी घी की अपेक्षा स्वादिष्ट,बुद्धि ,कान्ति,स्मरणशक्ति को बढाने वाला,वीर्यवर्धक ,अग्निदीपक,पाचक ,यौवन को स्थिर रखने वाले गुणों से युक्त होता है, तो यूँ ही नहीं खाया जाता रहा है घी सदियों से ,बस आवश्यकता है शुद्ध एवं संयमित मात्रा में सेवन की।

मंगलवार, 6 दिसम्बर 2011

अनार का रस रक्तचाप नियंत्रित रखता है.


किसी ने सत्य कहा है एक अनार सौ बीमार। अनार के गुणों से तो  हम सभी परिचित हैं ही, लेकिन हाल का एक शोध आपकी इस सुन्दर फल के बारे में नयी सोच को पैदा करेगा इजराएल के वेस्टर्न गेली मेडिकल सेंटर में लीलेक शेमा और उनके साथियों का एक शोध यह सिद्ध कर रहा है , कि गुर्दे (कीडनी ) से सम्बंधित बीमारी से पीडि़त रोगी में अनार का रस अपने एंटी-ओक्सीडेंट गुणों की प्रचुरता के कारण कोलेस्ट्रोल एवं रक्तचाप को कम करने में मदद करता है। 

यह अध्ययन 101 डायलीसिस ले रहे रोगियों को अनार का रस साढ़े तीन ओंस की मात्रा में सप्ताह में तीन बार देकर किया गया। एक वर्ष तक लगातार प्रयोग के उपरान्त यह पाया गया, कि 22 प्रतिशत  रोगियों ने प्लेसीबो समूह की अपेक्षा, उच्च रक्तचाप की दवाओं को लेना छोड़ दिया था। इस अध्ययन से यह साबित हुआ है, कि अनार का रस पीने से आपके रक्त के कोलेस्ट्रोल स्तर के साथ रक्तचाप भी नियंत्रित रहता है तो।

मंगलवार, 22 नवम्बर 2011

लहसुन गुणों से परिपूर्ण.

कुदरत ने जो भी खाने पिने की वास्तु बनायी है उन सब में अपने गुण-दोष होते हैं। रोटी, चावल, दाल, सब्जी, तथा उनमें डाले जाने वाले मसाले आदि सभी के कुछ न कुछ गुण हैं। लहसुन भी गुणों से परिपूर्ण है

लहसुन खून में बढ़ी चर्बी कोलेस्ट्रोलको कम करने का काम करता है। उच्च रक्तचाप भी अनेक मारक रोगों का बढ़ा कारण माना जाता है। लहसुन का प्रयोग इन दोनों ही बीमारियों को जड़ से नष्ट करने की क्षमता रखता है। इसमे एक ऐब है, वह है इसकी दुर्गंध। लेकिन इसमें कोलेस्ट्रोल को ठीक करने की गजब की क्षमता होती है। 

रोज सबेरे बिना कुछ खाए- पीए दो पुष्ट कलियां छीलकर टुकड़े करके पानी के साथ चबाकर खा ले निगल जाए। इस साधारण से प्रयोग को नित्य करते रहने से रक्त में बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रोल तो कम होगा ही, साथ ही उच्च रक्तचाप रोगियों का रोग भी नियंत्रित हो जाएगा। शरीर में कही भी ट्युमर होने की संभावना दूर हो जाती है।

बुधवार, 16 नवम्बर 2011

रेशे युक्त भोजन आंत के लिए अच्छा.


यदि आप अपने आहार में रेशेदार भोजन की पर्याप्त मात्रा लें तो आंत कैंसर के खतरे को 20 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। वैसे उच्च रेशे युक्त भोजन को पहले से ही आंत के लिए अच्छा माना जाता है और यह आंत में होने वाले कैंसर से भी रक्षा करता है। लंदन के इम्पीरियल कॉलेज के एक अध्ययन में रेशे युक्त भोजन के फायदे बताए गए हैं।

पहले के करीब 20 लाख प्रतिभागियों की भागीदारी वाले 25 अध्ययनों के विश्लेषण में पता चला है कि रेशे युक्त भोजन की प्रति 10 ग्राम मात्र लेने से आंत कैंसर का खतरा 10 प्रतिशत तक कम हो जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि वयस्कों को एक दिन में 18 से 24 ग्राम रेशे युक्त भोजन लेना चाहिए, लेकिन ब्रिटेन में औसतन केवल 15 ग्राम रेशे युक्त आहार लिया जाता है। इम्पीरियल कॉलेज लंदन व डेनिश कैंसर सोसायटी के अध्ययन के मुताबिक रेशे युक्त भोजन खासतौर पर साबुत अनाज लेने से आंत के कैंसर का जोखिम कम होता है। आंत कैंसर से ब्रिटेन में हर साल करीब 16,000 लोग मारे जाते हैं। यह संख्या स्तन व प्रोस्टेट कैंसर से मारे जाने वाले लोगों से काफी ज्यादा है।

रविवार, 13 नवम्बर 2011

मछली खाइए मधुमेह भगाइए.

मधुमेह से बचना है तो मछली को आहार में शामिल कीजिए। यह बात स्पेन के वासियों की आहार आदतों को आधार बनाकर किए गए अध्ययन में सामने आई। वैलेंसिया विश्वविद्यालय के मर्सीडीज सोटोस प्रिएटो ने इस विषय पर अध्ययन किया जिसमें 55 से 80 वर्ष की उम्र के ऐसे 945 पुरुषों और महिलाओं को शामिल किया गया जिनमें हृदय से जुड़े रोगों की आशंका ज्यादा थी। शोध में पाया गया कि मछली के सेवन से मधुमेह का खतरा कम हो गया।

'न्युट्रिशियन हॉस्पीटैलेरिया' जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक लाल मांस ज्यादा खाने से दिल की बीमारियों, उच्च रक्तचाप, मधुमेह का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा कैंसर अथवा हृदय की बीमारी के कारण प्रत्याशित जीवन में भी कुछ कमी आती है। विश्वविद्यालय के एक बयान के मुताबिक लाल मांस के विपरीत भूमध्य सागर के पास रहने वाले लोग भोजन में मुख्यतया मछली का इस्तेमाल करते हैं जो ह्दय के लिए फायदेमंद है। शोधकर्ताओं ने मछली के सेवन और मधुमेह के बीच सम्बंध बनाने के लिए विविध अनुमान व्यक्त किए हैं। शोधकार्ताओं ने निष्कर्ष में पाया कि मछली खाने से मांसपेशियों की कोशिकाओं में 'ओमेगा-3' बढ़ने से इंसूलिन के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है जिसके कारण मधुमेह का खतरा कम हो जाता है।

बुधवार, 6 जुलाई 2011

तुलसी के गुण.

यों तो तुलसी धर्म और पूजा से जुड़ा हुआ है परन्तु सामान्य से दिखने वाले तुलसी के पौधे में अनेक दुर्लभ और बेशकीमती गुण पाए जाते हैं। पूजनीय  पौधा तुलसी हमारे लिए स्वास्थ्य वर्धक भी है। आज के भाग दौड़ की जिंदगी में शायद लोगों को इतनी फुर्सत नहीं है कि इनसब के पीछे समय दें पर पहले तो घर घर में तुलसी कि पत्तियों का सेवन किया जाता था। 


तुलसी के कुछ गुण एवं फायदे : 


प्रतिदिन 5 पत्तियां सुबह खाली पेट खाने से बीमार होने की संभावना काफी हद तक समाप्त हो जाती है, क्योंकि इससे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।
शरीर के वजन को नियंत्रित रखने में तुलसी बेहद कारगर और गुणकारी है। इसके नियमित सेवन से भारी व्यक्ति का वजन घटता है एवं पतले व्यक्ति का वजन बढ़ता है यानी तुलसी शरीर का वजन आनुपातिक रूप से नियंत्रित करती है।

तुलसी के रस की कुछ बूंदों में थोड़ा-सा नमक मिलाकर बेहोंश व्यक्ति की नाक में डालने से उसे शीघ्र होश आ जाता है। - चाय बनाते समय तुलसी  के 4-5 पत्ते साथ में उबाल लिए जाएं तो सर्दी, बुखार एवं मांसपेशियों के दर्द में तत्काल राहत मिलती  है।

 एक चाय की चम्मच तुलसी के रस को उतना ही  शहद के साथ सेवन करने से हिचकी एवं अस्थमा के रोगी को ठीक किया जा सकता है। तुलसी के काढ़े में थोड़ा-सा सेंधा नमक एवं पीसी सौंठ मिलाकर सेवन करने से कब्ज दूर होती है। दोपहर भोजन के पश्चात तुलसी की पत्तियां चबाने से पाचन शक्ति मजबूत होती है।

एक चाय की चम्मच तुलसी के रस के साथ 5 ग्राम शहद एवं 5 ग्राम पिसी कालीमिर्च का सेवन करने से पाचन शक्ति की कमजोरी समाप्त हो जाती है।  दूषित पानी में तुलसी की कुछ ताजी पत्तियां डालने से पानी का शुद्धिकरण किया जा सकता है।
 

सोमवार, 27 जून 2011

बिना दूध की चाय वजन नियंत्रित रखता है.


  यों तो लोग कहते हैं चाय की लत अच्छी नहीं होती परन्तु हर बुराई में कुछ न कुछ अच्छाई भी छुपी होती है। ऐसा ही कुछ चाय के साथ भी है। यदि हम आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांतों को माने तो चाय  हमारे स्वास्थ्य के लिये बेहद हानिकारक होती है। लेकिन चाय में तमाम खामियों के साथ ही एक बड़ी खूबी भी होती है और वह यह है कि चाय बढ़ते हुए वजन को नियंत्रण में रखता है। यह एक वैज्ञानिक शोध से पता चला है।

शोध से ज्ञात हुआ है कि चाय में एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, जो वजन कम करने में सहायक होते हैं। लेकिन हाल ही में हुई एक नई रिसर्च के मुताबिक अगर चाय में दूध मिला दिया जाए तो मोटापे से लडऩे वाले तत्त्व उतने प्रभावकारी नहीं रहते। भारतीय वैज्ञानिक की ओर से की गई रिसर्च के मुताबिक चाय में वसा कम करने के कई तत्त्व होते हैं, लेकिन दूध में पाया जाने वाला प्रोटीन वसा कम करने की इसकी क्षमता को प्रभावित कर सकता है।

चाय में पाए जाने वाले फ्लेविन्स और थिरोबिगिन्स शरीर की चर्बी घटाने और कोलेस्ट्रॉल कम करने में सहायक होते हैं। असम की टी रिसर्च एसोसिएशन के रिसर्चरों ने चूहों पर शोध किया और उसमें यह पाया गया कि उच्च वसायुक्त भोजन खाने वाले चूहों का वजन घटाने में फ्लेविन्स और थिरोबिगिन्स जैसे तत्वों ने काफी अहम भूमिका निभाई। लेकिन गाय के दूध में प्रोटीन की मात्रा अधिक होने के कारण इनका प्रभाव कम हो जाता है।

सोमवार, 20 जून 2011

चाय कैंसर की कोशिकाओं को नष्ट करता है.


कहते हैं चाय पीने के कई फायदे हैं. अब इस कड़ी में एक और जुड़ गया है. एक अनुसंधान के अनुसार रोज एक प्याला चाय पीने से कैंसर पनपने के खतरे को कम किया जा सकता है. पहले भी अनेक अनुसंधानों में पता लगा है कि चाय से कैंसर और हृदय रोगों के खतरों को कम किया जा सकता है.   

 अमेरिकी में हुए एक अनुसन्धान के अनुसार बिना दूध के बनाई गई चाय में मौजूद ‘थियेफ्लेविन-2’ (टीएफ-2) कैंसर की कोशिकाओं को नष्ट करता है.
अनुसंधान में देखा गया कि कैसे थियेफ्लेविन कैंसर की कोशिकाओं में तीन घंटे में ही सिकुड़न पैदा करता है. ब्रिटिश चाय सलाहकार पैनल के टिम बॉंड के अनुसार इस शोध रिपोर्ट से पता लगा है कि ब्लैक-टी के घटक ट्यूमर की संख्या को घटाने भी में सहायक सिद्ध होते हैं. इस अध्ययन के बाद अब ब्लैक-टी के मानव शरीर पर क्लीनिकल परीक्षण की आवश्यकता है ताकि इसके वास्तविक प्रभाव सामने आ सकें.

शुक्रवार, 3 जून 2011

आई पैड के लिए किशोर ने गुर्दा बेचा.

चीन के अन्हुई प्रांत में आईपैड-2 खरीदने के लिए एक किशोर द्वारा अपना गुर्दा बेचने का मामला सामने आया है। किशोर की मां को इस बारे में जानकारी नहीं थी, अब वह इस काम में उसकी मदद करने वाले लोगों को गिरफ्तार करवाना चाहती हैं।

खबरों के मुताबिक, 17 वर्षीय किशोर झियो झेंग आईपैड-2 खरीदना चाहता था, लेकिन उसके पास पैसे नहीं थे। स्थानीय समाचार चैनल डांगफेंग के मुताबिक, झेंग ने गुर्दा खरीदने वाले एक एजेंट से मुलाकात की और चीन के हुनान प्रांत में एक लोकल अस्पताल में ऑपरेशन कराया। इसके बदले में झेंग को 22,000 येन (3,900 डॉलर) का भुगतान किया गया। तब उसने नया आईपैड-2, आईफोन खरीदा और घर लौट गया।

चैनल के मुताबिक, किशोर की मां ने कहा कि झियो झेंग एक कम्प्यूटर और एपल फोन लेकर घर लौटा था। इस तरह के महंगे उपकरण खरीदने के लिए हमारे पास पैसा नहीं है। वह शुरुआत में मुझे बताना नहीं चाहता था कि इतना पैसा उसे कहां से मिला, लेकिन बाद में उसने बताया कि ये चीजें खरीदने के लिए उसने अपना दांया गुर्दा बेच दिया।

यह बात पता चलने पर झेंग की मां उसे उस अस्पताल ले गईं, जहां उसने ऑपरेशन कराया था। वहां पता चला कि ऑपरेशन थिएटर की जगह फुजान प्रांत के एक व्यापारी को किराए पर दी गई है। कई कोशिशों के बाद भी एजेंट का पता नहीं लग पाया। झेंग की हालत दिनों दिन बिगड़ रही है और उसकी मां को उम्मीद है कि जिन लोगों ने उनके बेटे को अपंग बनाया, वह उन्हें खोज लेंगी।

शनिवार, 28 मई 2011

गधी के दूध से शरीर का ऊर्जा स्तर बना रहता है.


 गधी का दूध ना केवल आपके वजन को कम करता है बल्कि आपके दिलो-दिमाग को भी दुरुस्त रखता है. इटली के अनुसंधानकर्ताओं ने एक अध्ययन में पाया है कि गधी का दूध कमर पर जादू की तरह काम करता है. इसमें ओमेगा-2 और कैल्शियम की उच्च मात्राएं और यह आपके दिल के लिए भी बहुत अच्छा है.

अनुसंधानकर्ताओं का यह भी कहना है कि गधी के दूध के सेवन से दिन भर शरीर का ऊर्जा स्तर बना रहता है. इस अध्ययन में इतालवी वैज्ञानिकों ने कुछ चूहों को उनके सामान्य एवं नियमित भोजन के साथ गाय का दूध दिया और कुछ को गधी का दूध दिया.
गाय का दूध का सेवन करने वाले चूहे सामान्य चूहों से मोटे हो गए जबकि गधी के दूध का सेवन करने वाले चूहों के वजन में गिरावट आई.

अध्ययनकर्ताओं ने गधी के दूध का सेवन करने वाले चूहों में धमनियों तथा दिल को नुकसान पहुंचाने वाले रक्त वसा और अन्य वसाओं के स्तर में गिरावट पाई. उन्होंने पाया कि ऐसे चूहों के माइटोकौंड्रिया बेहद आवेशित थे और बहुत तेज रफ्तार से भोजन को ऊर्जा में रूपांतरित कर रहे थे.

सोमवार, 2 मई 2011

एंडोसल्फान याचिका पर केन्द्र को नोटिस.

सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में एंडोसल्फान कीटनाशक पर प्रतिबंध लगाए जाने की मांग वाली याचिका पर केन्द्र को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा।मुख्य न्यायाधीश एस.एच. कपाड़िया, न्यायमूर्ति के.एस. राधाकृष्णन एवं न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की पीठ ने केन्द्र को नोटिस जारी कर सोलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम को 11 मई को अगली सुनवाई में उपस्थिति रहने को कहा।

वरिष्ठ वकील वेणुगोपाल ने माकपा की युवा इकाई डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (डीवाईएफआई) द्वारा दायर याचिका से कोर्ट को अवगत कराया, जिसके बाद पीठ ने यह आदेश पारित किया। डीवाईएफआई ने अपनी याचिका में कोर्ट से एंडोसल्फान को मौजूदा रूप में या बाजार में किसी अन्य रूप में बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के लिए केन्द्र को निर्देश जारी करने का अनुरोध किया है।

डीवाईएफआई ने दलील दी कि एक बड़ा तबका एंडोसल्फान के इस्तेमाल से सीधे प्रभावित हुआ है और 81 देशों में इस पर पहले ही प्रतिबंध लग चुका है, जबकि अन्य 12 देशों ने इस पर रोक नहीं लगाई है। याचिकाकर्ता ने कहा कि विभिन्न अध्ययनों में यह बात सामने आई कि एंडोसल्फान मानव विकास को भी प्रभावित कर सकता है। उसने इस संबंध में केरल के कसारगोड जिले में स्वास्थ्य को हुए गंभीर नुकसान का उदाहरण दिया। डीवाईएफआई ने कहा कि एंडोसल्फान एकमात्र ऐसा कीटनाशक है, जिसका इस्तेमाल 20 वर्ष से कसारगोड में काजू की खेती में किया जा रहा है और इससे वहां पर्यावरण संक्रमित हुआ है।

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

थायरॉक्सिन के सेवन से हड्डी टूटने का खतरा.

शोधकर्ताओं के अनुसार जो बुज़ुर्ग थायरॉयड के लिए अधिक मात्रा में दवाई लेते हैं उनमें हड्डियाँ कमज़ोर होने और टूटने का ख़तरा बढ़ जाता है. जिन लोगों को थायरॉयड की समस्या होती है उन्हें थायरॉक्सिन हॉरमोन दवा के ज़रिए दिया जाता है जो एक सिंथेटिक हॉरमोन है.

ब्रिटिश मेडिकल जरनल में शोधकर्ताओं ने लिखा है कि इस हॉरमोन के ज़्यादा मात्रा में दिए जाने से हड्डी टूटने का का ख़तरा बढ़ता है. शोध में कहा गया है कि बढ़ती उम्र के साथ इसका सेवन कम कर देना चाहिए. अनुमान है कि 20 फ़ीसदी बुज़ुर्ग लोग हाइपोथायरोड के लिए लंबे समय तक दवा लेते हैं. माना जाता है कि मरीज़ों को समय-समय पर नियमित जाँच करवानी चाहिए ताकि वे सुनिश्चित कर सकें कि वो सही मात्रा में दवा ले रहे हैं या नहीं. लेकिन बहुत से लोग युवा अवस्था से लेकर बूढ़े होने तक उसी मात्रा में दवा लेते रहते हैं.

अपने शोध में टोरंटो के वुमेन्स कॉलेज रिसर्च इंस्टिट्यूट के दल ने 70 साल से ज़्यादा करीब दो लाख लोगों का अध्ययन किया. ये वो लोग थे जिन्हें 2002 और 2007 के बीच लेवोथायरॉक्सिन दिया गया जो थायरॉक्सिन का सिंथेटिक रूप है. लोगों को दो गुटों में बाँटा गया- जो लोग वर्तमान में दवा ले रहे हैं और और जिन लोगों ने अध्ययन से पहले दवा लेना बंद कर दिया था. नतीजे में पाया गया कि 10 फ़ीसदी से ज़्यादा लोगों में अध्ययन के दौरान फ़्रेक्चर हुआ. शोध में यह भी पाया गया कि जो लोग वर्तमान में थायरॉक्सिन ले रहे थे उनमें हड्डियाँ टूटने का ख़तरा ज़्यादा देखा गया. शोधकर्ताओं ने लिखा है कि इससे ये संकेत मिलते हैं कि दवा कितनी मात्रा में दी जानी चाहिए इस पर नज़र रखने की ज़रूरत है.

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

पानी से वजन कम करें.


 अगर आप वजन कम करना चाहती हैं तो यह आसान सा नुस्खा अपनाइए । बस इस मौसम में पानी की मात्रा बढ़ा दीजिए। आप जितना ज्यादा पानी पिएंगी, आपका वजन उतना ही कम होगा।

हाल ही में आए एक सर्वे के अनुसार, आपके बढ़ते वजन का कारण सिर्फ व्यायाम की कमी नहीं बल्कि आपकी खान पान भी है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ओबेसिटी में छपे रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले 20 सालों में तकनीकों में आए बदलाव के बावजूद हमारी शरीरिक गतिविधियों में कुछ खास बदलाव नहीं आया है। ऐसे में बढ़ते मोटापे का मुख्य कारण जरूरत से ज्यादा भोजन है।

वर्जीनिया पॉलिटेक्निक इंस्टीटय़ूट और स्टेट यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक, वजन घटाने के लिए हमेशा खाना खाने से पहले दो गिलास पानी पिएं। यह फॉर्मूला तीन माह के भीतर आपका कम-से-कम सात किलो तक वजन कम कर सकती हैं।