आसमान पर एक अनोखी आंधी
लोग यह प्रश्न क्यों उठाते हैं कि किसी भी व्यक्ति को चाहे उसकी आर्थिक-सामाजिक स्थिति कैसी भी क्यों न हो उतना ही सम्मान मिलना चाहिए जितना किसी संपन्न कुलीन व्यक्ति को ? अम्बेडकर रचित संविधान ने व्यक्ति की गरिमा, सामान मानवीय सम्मान व भेद भाव रहित समाज की बात की होगी, परन्तु क्या हमारी सदियों की परम्पराएँ आधारहीन हो सकती हैं ? जिन्हें हमारे ऋषि-मुनियों ने परिभाषित किया था. जिनके दम पर कभी हम विश्वगुरु थे. और जिनके आधार पर कुछ लोग भारत को विश्वगुरु के आसन पर पुनर्स्थापित करना चाहते हैं. मालूम हुआ पश्चिमी विद्वानों द्वारा प्रतिपादित समानता का सिद्धांत और प्रगति पथ भारत को विश्वगुरु के पुरातन स्थान से दूर ले जाने वाला है. वह गौरवशाली समय तब लौटेगा जब स्त्रियाँ अपने पतियों के साथ जलाई जाएँगी. यह न्यायोचित भी होगा. कदाचित पत्नी ही तो मूल कारण है पति के पतन का. भारत का यशगान होगा जब महाकवि तुलसी जैसे मनीषी जन्म लेंगे, और पुनर्स्थापित होगा शूद्रों को प्रताड़ित करने का अधिकार. संसदीय चर्चा में राम विलास पासवान ने बताया था कि जब कभी कोई दलित अधिकारी या नेता बिहार के किसी गाँव में जाता है तो लोग उसे अपने गिलास में नहीं बल्कि अलग बर्तन में पानी पेश करते है. यह ठीक है. जब दलित जन्म से अछूत है तो वो कितनी ही तरक्की कर ले, कितना भी साफ़ सुथरा रह ले, रहेगा तो अछूत ही न. गाँव वाले सौभाग्यशाली हैं कि आज भी कुओं पर निर्भर हैं. सरकारों ने जलापूर्ति की आधुनिक व्यवस्था नहीं की है. वरना शहरों में सारे घर एक ही मोटे पाइप से जुड़े होते हैं जिस से पूजनीय ब्राह्मणों को कितनी पीड़ा होती होगी, अनुमान ही लगाया जा सकता है. मेरे पड़ोस में एक गोसाईं टोला है. पहले वहां गिरि संप्रदाय के गोस्वामी लोग रहते थे. पाइप के माध्यम से जलापूर्ति के व्यवस्था थी शहर में, लेकिन गोसाईं टोले के हर घर में कुआँ था और वे अपने ही कुँए का पानी पीते थे. दूसरे का पानी छू नहीं सकते थे. इसीलिए किसी को पानी लेने भी नहीं देते थे. बहुतों को याद होगा, चार सिंहमुखों वाले सरकारी बंबे पर छू जाने को लेकर कैसे झगड़े होते थे. अंग्रेजों के ज़माने में रेलगाड़ी रुकते ही स्टेशन पर हिन्दू पानी! मुस्लिम पानी ! हिन्दू चाय! मुस्लिम चाय! का शोर सुनाई देता था. ऊंची जाति के हिन्दू केवल ‘पानी पांडे ‘ ही के हाथों से पानी लेते थे. जब जगजीवन राम रेलमंत्री बने तो यह व्यवस्था समाप्त कर दी. क्योंकि उन्हें सवर्ण हिन्दुओं की आस्था का महत्त्व पता नहीं था. रेलगाड़ी तो स्वयं एक अत्याचार है कि इसमें सभी लोग, छूत अछूत, साथ साथ यात्रा करते हैं. आस्था के अनुसार तो अलग अलग ट्रेनें भी होनी चाहिए. या फिर बैलगाड़ियों का प्रयोग उचित रहेगा. आजकल मिड डे मील के नाम पर दलित रसोइयों का बनाया हुआ भोजन खाने को मजबूर किया जा रहा है.बहुत से बच्चे भोजन ग्रहण करने से इनकार कर रहे हैं. अपना धर्म जो बचाना है. लोगों की आस्था का सम्मान होना ही चाहिए. आखिर आस्था ही के आधार पर तो बड़े बड़े फैसले हो रहे हैं.


