दुनिया में मशहूर जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का उद्घाटन शुक्रवार सुबह यहां डिग्गी पैलेस में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, सांसद डॉ. कर्णसिंह, पर्यटन मंत्री बीना काक और नामी साहित्यकारों ने दीप जलाकर किया। दैनिक भास्कर के सहयोग से आयोजित इस साहित्य मेले में दक्षिण एशिया के करीब डेढ़ सौ रचनाकार, साहित्यकार, कॉपरेरेट व फिल्म जगत की हस्तियां शरीक हो रही हैं।
पांच दिवसीय फेस्टिवल के पहले दिन 22 अलग अलग सत्रों में 50 से अधिक साहित्यकारों, रचनाकारों, गीतकारों व शायरों ने विभिन्न विषयों पर संवाद किया। सबसे अधिक रोमांच दैनिक भास्कर संवाद में रहा, जिसमें मशहूर गीतकार गुलजार और अनुवादक पवन वर्मा ने नज़्मों के साथ उनके अनुवाद के दौरान आने वाली दिक्कतों के बारे में बताया। इससे पहले फेस्टिवल के उद्घाटन में डॉ. सिंह ने कहा कि भारत की अद्वितीय सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है। यहां की सभी 25 भाषाओं में साहित्य रचा जा रहा है, जैसा किसी और देश में नहीं। समृद्धि के इस स्तर पर कोई भी भाष छोटी-बड़ी नहीं होती, बल्कि अपने-अपने क्षेत्र की अपनी जुबान ही महत्वपूर्ण होती है।
सभी प्रांतीय भाषाओं को सम्मेलन का हिस्सा नहीं बनाया गया तो इसको सफल नहीं माना सकता। डॉ. सिंह ने कुछ कविताएं भी सुनाई। कोलंबिया यूनिवर्सिटी में संस्कृत के प्रोफेसर शैलेन पॉलोक ने कहा कि जयपुर में राजा जयसिंह द्वितीय के समय में बैठकें, गोष्ठियां और विभिन्न भाषाओं में चर्चा का माहौल था, जिसकी बदौलत राजस्थान का साहित्य, कला व संस्कृति समृद्ध है। पॉलोक ने वाल्मीकि रामायाण व अन्य संस्कृत साहित्य से कई संस्कृत श्लोक पढ़े और उनका भाव समझाया। उन्होंने कहा कि भारत में साहित्य एडवेंचर की तरह लिखा जाता है, जिसमें अच्छा इनसान बनने की सीख दी जाती है।
डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि साहित्य बहुरंगी और बहुमुखी भी है, पर यहां अनुवादकों की कमी है। उनको बहुत काम की आवश्यकता है। गद्य और पद्य के बीच बड़ा अंतर है। गद्य पढ़ने और पद्य सुनने के लिए है और सुनने की क्षमता बहुत महत्व रखती है। पॉलोक ने कहा कि आईआईएम और आईआईटी की तरह यहां इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्लासिकल स्टडीज खोलने की भी संभावनाएं तलाशी जानी चाहिए।
पांच दिवसीय फेस्टिवल के पहले दिन 22 अलग अलग सत्रों में 50 से अधिक साहित्यकारों, रचनाकारों, गीतकारों व शायरों ने विभिन्न विषयों पर संवाद किया। सबसे अधिक रोमांच दैनिक भास्कर संवाद में रहा, जिसमें मशहूर गीतकार गुलजार और अनुवादक पवन वर्मा ने नज़्मों के साथ उनके अनुवाद के दौरान आने वाली दिक्कतों के बारे में बताया। इससे पहले फेस्टिवल के उद्घाटन में डॉ. सिंह ने कहा कि भारत की अद्वितीय सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है। यहां की सभी 25 भाषाओं में साहित्य रचा जा रहा है, जैसा किसी और देश में नहीं। समृद्धि के इस स्तर पर कोई भी भाष छोटी-बड़ी नहीं होती, बल्कि अपने-अपने क्षेत्र की अपनी जुबान ही महत्वपूर्ण होती है।
सभी प्रांतीय भाषाओं को सम्मेलन का हिस्सा नहीं बनाया गया तो इसको सफल नहीं माना सकता। डॉ. सिंह ने कुछ कविताएं भी सुनाई। कोलंबिया यूनिवर्सिटी में संस्कृत के प्रोफेसर शैलेन पॉलोक ने कहा कि जयपुर में राजा जयसिंह द्वितीय के समय में बैठकें, गोष्ठियां और विभिन्न भाषाओं में चर्चा का माहौल था, जिसकी बदौलत राजस्थान का साहित्य, कला व संस्कृति समृद्ध है। पॉलोक ने वाल्मीकि रामायाण व अन्य संस्कृत साहित्य से कई संस्कृत श्लोक पढ़े और उनका भाव समझाया। उन्होंने कहा कि भारत में साहित्य एडवेंचर की तरह लिखा जाता है, जिसमें अच्छा इनसान बनने की सीख दी जाती है।
डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि साहित्य बहुरंगी और बहुमुखी भी है, पर यहां अनुवादकों की कमी है। उनको बहुत काम की आवश्यकता है। गद्य और पद्य के बीच बड़ा अंतर है। गद्य पढ़ने और पद्य सुनने के लिए है और सुनने की क्षमता बहुत महत्व रखती है। पॉलोक ने कहा कि आईआईएम और आईआईटी की तरह यहां इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्लासिकल स्टडीज खोलने की भी संभावनाएं तलाशी जानी चाहिए।

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