सत्य साईं बाबा की हालत काफी नाजुक है। वे २८ मार्च से अस्पताल में भर्ती हैं और तभी से उनके श्री सत्य साईं सेंट्रल ट्रस्ट (एसएसएससीटी) की ४० हजार करोड़ की संपत्ति के उत्तराधिकारी के नाम पर चर्चा शुरू हो गई है। अभी तक किसी उत्तराधिकारी की घोषणा नहीं की गई है। संभावना है कि बिना किसी को उत्तराधिकारी बनाए, संपत्ति की पूरी जिम्मेदारी ट्रस्ट के हवाले कर दी जाए। उत्तराधिकारी के दौड़ में बाबा के भतीजे और ट्रस्टियों में से एक आरजे रत्नाकर राजू भी हैं। बाबा ने पुट्टपर्थी में रहने वाले अपने सारे रिश्तेदारों को खुद से दूर रखा और रत्नाकर राजू अकेले हैं, जो उनके ट्रस्ट में शामिल हैं।
सत्यनारायण राजू यानी सत्य साईं बाबा का जन्म 23 नवम्बर, 1926 को पुट्टपर्थी में हुआ था। 1940 में उन्होंने खुद के ईश्वर का अवतार होने का दावा किया था।
ट्रस्ट की पुट्टपर्थी, बंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई, मुंबई सहित विदेशों मे भी काफी प्रॉपर्टी है जिनकी कीमत ४० करोड़ रुपए से ज्यादा आंकी जाती है। इसके अलावा करीब १६५ दूसरे देशों में भी ट्रस्ट की चल अचल संपत्ति है। लेकिन आंध्र सरकार की भी नजर ट्रस्ट पर है। सरकारी अधिकारियों के एक दल ने कुछ समय पहले पुट्टपर्थी जाकर पूरे मामले की पड़ताल की थी। यदि उत्तराधिकारी का विवाद बढ़ा तो आंध्र सरकार केंद्र सरकार से ट्रस्ट की बागडोर अपने हाथों सौपने की गुजारिश कर सकती है। ट्रस्ट को करीब ६० लाख सक्रिय श्रद्धालुओं के अलावा ३ करोड़ १० लाख अन्य भक्तों से मिलने वाला सालाना चंदा करोड़ों रुपए होता है। यहां दिए जाने वाले चंदे को आयकर से छूट मिलती है। वर्तमान में ट्रस्ट के मुख्य कर्ता धर्ता सचिव के चक्रवर्ती हैं, जो आईएएस की सेवा से इस्तीफा देकर बाबा के साथ आए हैं।
ट्रस्ट पुट्टपर्थी में सत्य साईं विश्व विद्यालय, अस्पताल, स्टेडियम, संगीत महाविद्यालय आदि चलाता है। ट्रस्ट के बंगलुरु में भी दो अस्पताल हैं। ट्रस्ट ने एडुकेयर कार्यक्रम के तहत ३३ देशों में स्कूल खोले हैं। ट्रस्ट का मुख्यालय पुट्टपर्थी में प्रशांत निलयम है, लेकिन दफ्तर बंगलुरु, वृंदावन और कोडईकनाल में भी है। ट्रस्ट का पूरा काम मुख्य रूप से भारत के पूर्व न्यायाधीश पीएल भगवती, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज वीआर कृष्ण अय्यर और वी बालकृष्ण एराडी देख रहे हैं। ट्रस्ट को लेकर लंबे समय से विवाद है। पुट्टपर्थी में उनके करीब २०० रिश्तेदार हैं, जो ट्रस्ट को पारिवारिक बताकर हक जताते हैं। लेकिन साईं बाबा ने उन सभी को खुद से दूर रखा। ट्रस्ट में उनके केवल भाई आरवी जानकीराम थे, जिनका २००५ में निधन हो गया। आरजे रत्नाकर राजू उन्हीं के बेटे हैं। आरोप है कि कुछ रिश्तेदार शुरू से ही बाबा के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। बाबा के बाद उनके रिश्तेदार फिर एक बार सक्रिय होंगे। यदि विवाद ज्यादा बढ़ा तो राज्य सरकार १९५९ में बने हिंदू धर्म औऱ परोपकारी निधि कानून का सहारा लेकर, अधिग्रहण करने की कोशिश कर सकती है।

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