कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने उत्तरप्रदेश की मायावती सरकार के खिलाफ अभियान तेज करते हुए कहा है कि भट्टा पारसौल गांव का मुद्दा उत्तरप्रदेश की लड़ाई की शुरुआत है। उन्होंने कहा कि उनकी लड़ाई सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं बल्कि उत्तरप्रदेश के भविष्य की है।
बुधवार को वाराणसी में प्रदेश कांग्रेस कमेटी के दो दिनी अधिवेशन का उद्घाटन करते हुए राहुल ने कहा कि उनके पास समय और मुद्दों की कमी नहीं है। राज्य के गरीबों के हक और विकास की लड़ाई के लिए प्रदेश के कोने-कोने में जाएंगे। पार्टी के कार्यकर्ताओं का हाथ पकड़कर समस्याओं के खिलाफ लड़ेंगे। राहुल ने ग्रेटर नोएडा के भट्टा पारसौल में हुए कांड की न्यायिक जांच कराने की मांग दोहराई। राहुल ने आरोप लगाया कि राज्य की बसपा सरकार काम नहीं कर रही है। यह बात राज्य सरकार, हमको और जनता तीनों को ही पता है।
उन्होंने मायावती सरकार पर बुंदेलखंड की उपेक्षा करने व केंद्र सरकार से आए पैकेज का दुरुपयोग करने का आरोप भी लगाया। भट्टा पारसौल को प्रदेश की लड़ाई की शुरुआत बताते हुए राहुल ने कहा कि उप्र में कांग्रेस सिर्फ चुनाव नहीं जीतना चाहती बल्कि प्रदेश का गौरव वापस लाना चाहती है।
मायावती सरकार पर हमले के साथ ही राहुल ने प्रदेश कांग्रेस नेताओं को भी आईना दिखाया। उन्होंने कहा, ‘यह कांग्रेस नेताओं की खराब आदत है कि वे उत्तरप्रदेश में हमेशा बसपा या किसी अन्य पार्टी की आलोचना करते हैं। मैं पूछना चाहता हूं कि प्रदेश कांग्रेस क्या कर रही है। हम यह कहते हैं कि बसपा क्या कर रही है, सपा क्या कर रही है, इसे बंद करना होगा।’ प्रदेश कांग्रेस प्रभारी दिग्विजय सिंह ने अपने संबोधन के दौरान प्रदेश में गलतियां होना स्वीकारा और कहा, ‘बुरा जो देखन मैं चला मुझसे बुरा न कोई।’
शाम के वक्त चली आंधी के कारण अधिवेशन का पंडाल गिर गया। इस वजह से गुरुवार को अधिवेशन का दूसरा दिन रद्द कर दिया गया है। अब केवल सोनिया गांधी की जनसभा शाम चार बजे होगी। बुधवार को अधिवेशन में तब हड़कंप मच गया जब मंच पर शॉर्ट सर्किट से आग लग गई। हालांकि इस पर जल्द काबू कर लिया गया।
बसपा ने राहुल पर पलटवार करते हुए कहा कि राज्य में 38 वर्षों के शासन के दौरान यदि कांग्रेस पार्टी ने उत्तरप्रदेश का विकास किया होता तो यहां की जनता उसे सत्ता से बाहर क्यों करती। उत्तरप्रदेश सहित पूरे देश में दलितों के उत्थान और उनकी गरीबी दूर करने के लिए कांग्रेस सहित अन्य पार्टियों की सरकारों ने ईमानदारी से प्रयास किए होते तो बसपा के गठन की जरूरत ही नहीं पड़ती।

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