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मंगलवार, 15 नवंबर 2011

रोहित ने अपील दायर की.

खुद को नारायण दत्त तिवारी का जैविक पुत्र बताने वाले रोहित शेखर ने मंगलवार को दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दायर कर इसके एकल न्यायाधीश वाले फैसले को चुनौती दी। इस फैसले में तिवारी को पितृत्व विवाद में डीएनए परीक्षण के लिए खून का नमूना देने से छूट दी गई थी।

रोहित ने 23 सितंबर के आदेश के खिलाफ अपनी अपील में तर्क दिया है कि न्यायाधीश यह विचार करने में विफल रहे कि यदि 85 वर्षीय तिवारी को अदालत के पूर्व के आदेश के अनुरूप खून का नमूना देने के लिए बाध्य नहीं किया गया तो उसके लिए न्याय पाना कठिन हो जाएगा।

रोहित (31) ने अपील में कहा कि एकल न्यायाधीश उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री तथा आंध्र प्रदेश के राज्यपाल रह चुके तिवारी के आनाकानी वाले व्यवहार से संतोषजनक तरीके से नहीं निपट पाए। उसने कहा कि अदालत यह तय करने में भी विफल रही कि किसी चीज का अनुमान लगाने और उसे वैज्ञानिक तरीके से सिद्ध करने में अंतर होता है। रोहित ने कहा कि हर गुजरते दिन के साथ न्याय पाने की संभावना इस आशंका से क्षीण हो रही है कि अत्यंत महत्वपूर्ण साक्ष्य हमेशा के लिए खो रहा है। सुनवाई के लिए अपील न्यायमूर्ति एसके कौल की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष आई। उन्होंने मामले को दूसरी पीठ को स्थानांतरित कर दिया और सुनवाई की अगली तारीख 22 नवम्बर निर्धारित की।

न्यायमूर्ति गीता मित्तल ने 23 सितंबर को व्यवस्था दी थी कि सितंबर 2010 के फैसले के कार्यान्वयन के लिए तिवारी को डीएनए परीक्षण के लिए शारीरिक रूप से बाध्य नहीं किया जा सकता। इसी समय न्यायाधीश ने यह भी कहा था कि तिवारी के लगातार इनकार से यह माना जा सकता है कि वह रोहित के पिता हैं। न्यायमूर्ति मित्तल ने अपने फैसले में कहा था कि तिवारी द्वारा इस बारे में इनकार किए जाने को यह प्रमाणित करने वाला साक्ष्य माना जा सकता है कि प्रतिवादी के खून के नमूने का परीक्षण वादी (रोहित) के दावे (तिवारी का जैविक बेटा होने) को साबित कर सकता है। अदालत ने यह फैसला तिवारी के आग्रह पर किया था जिसमें उन्होंने 23 दिसंबर 2010 के हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने अपने इस आदेश में तिवारी से डीएनए परीक्षण के लिए खून का नमूना देने को कहा था। तिवारी ने डीएनए परीक्षण के वास्ते खून का नमूना देने के लिए एक जून को हाईकोर्ट की डिस्पेंसरी में पेश होने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें इसके लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

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