ज्ञापन पर अनिश्चितकालीन विलम्ब न हो. - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 23 नवंबर 2011

ज्ञापन पर अनिश्चितकालीन विलम्ब न हो.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सरकार एहतियातन हिरासत में लेने के कानून के तहत बंदियों द्वारा दिए गए ज्ञापन पर अनिश्चितकाल के लिए विलंब नहीं कर सकती क्योंकि यह देश में रहने वाले हर नागरिक और विदेशियों के स्वतंत्रता के बहुमूल्य अधिकार का उल्लंघन करता है।

न्यायमूर्ति एके गांगुली और न्यायमूर्ति जेएस खेहर की पीठ ने अपने एक फैसले में कहा कि अदालतें बंदियों को पेश करने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट जारी करके लोगों के स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की रक्षा करने के लिए कर्तव्य से बंधी हुई हैं भले ही उनकी तरफ से दायर की गई याचिकाओं में तकनीकी गड़बड़ियां हों।

पीठ ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण के इस सिद्धांत को हमारे संवैधानिक कानून में शामिल किया गया है और हमारी राय है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक गणराज्य में जहां न्यायाधीश एक लिखित संविधान के तहत काम करते हैं और उसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के मौलिक अधिकार पर एक अध्याय है तो न्यायाधीशों का न सिर्फ नागरिकों बल्कि भारत के भीतर रहने वाले सभी लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करने का कर्तव्य है।

शीर्ष अदालत ने यह व्यवस्था चार महिलाओं उम्मू सबीना, सलियाल बीवी, सलुकल बीवी और एम परिमला की हिरासत को निरस्त करते हुए दी। उन्हें विदेशी मुद्रा विनियम संरक्षण एवं तस्करी निरोधक अधिनियम, 1974 के तहत हिरासत में लिया गया था। इन महिलाओं को 10 मार्च को हिरासत में लिया गया था और केंद्र ने संविधान पीठ के पूर्व के फैसले के बावजूद उनके ज्ञापन पर फैसला करने में दो महीने का समय लिया। संविधान पीठ ने कहा था कि इस तरह के मामले पर यथाशीघ्र फैसला किया जाना चाहिए। इन महिलाओं ने हिरासत में लिए जाने के खिलाफ केरल उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी जिसने उनकी याचिका को खारिज कर दिया था। उसके बाद शीर्ष अदालत में अपील की गई थी।

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