औरों का अहित न सोचें... - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शनिवार, 8 दिसंबर 2012

औरों का अहित न सोचें...


हृदय परिवर्तन का प्रयास करें !!!

संसार में अपने अवतरण का सीधा संबंध लोक उत्थान और क्षेत्र कल्याण से है। मातृभूमि की सेवा ही मनुष्य का सर्वोपरि कत्र्तव्य कर्म है और यही श्रेय और प्रेय की प्राप्ति कराता है। संसार में सेवा के अवसर अनंत और अपार हैं जो युगों से विद्यमान हैं और कभी कम न होंगे, युगों तक अखूट ही रहेंगे। सेवा के कई माध्यम हैं जिनसे जुड़कर सेवा को आकार दिया जा सकता है। लोगों की भलाई और परोपकार हो या फिर गौ सेवा या परिवेश का कोई सा काम। हर व्यक्ति के लिए जरूरी है कि सेवा के किसी एक माध्यम को पकड़े और उसे अपनी राह बना ले। सेवा के लिए धन का होना कोई जरूरी नहीं है बल्कि ढेरों काम ऎसे हैं जिनमें एक कौड़ी खर्च नहीं होती और सेवा ऎसी कि मुँह बोलती हैं।

और कुछ नहीं कर सकें तो सबसे बड़ी सेवा यही है कि औरों के प्रति अच्छा चिंतन न रख सकें तो कोई बात नहीं लेकिन बुरा चिंतन कभी न रखें।  सबकी भलाई और औरों के हितों का चिंतन करना समाज की सबसे बड़ी सेवा है जिसकी आज हर कहीं काफी कमी महसूस की जा रही है। आजकल लोग विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं लेकिन उनका एकमात्र दुर्गुण यही है कि वे औरों के लिए अहित का चिंतन करते हैं और पूरी जिन्दगी इसी में खपा देते हैं। आज इसकी और कल उसकी बुराई और अहित के बारे में सोचना आदमी की जिन्दगी का अहम् हिस्सा होता जा रहा है। औरों का अहित सोचने वाले लोगों की अपने यहां भरमार है। ऎसी ही भरमार सभी जगह होती है लेकिन अपना इलाका कुछ खास है जहां ऎसे लोग एक ढूंढ़ों तो हजार मिलेंगे।

हमारा वास्ता रोजाना ऎसे कई सारे लोगों से पड़ता है जो समाज-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कुछ न कुछ काम करते रहते हैं। इनमें अच्छे और बुरे सभी प्रकार के काम करने वाले लोग हैं लेकिन इनमें से अधिकांश में यही बुराई है कि औरों के बारे में चिंतन के आदी हो गए हैं।
भले ही सामने वाले लोगों से इनका दूर-दूर तक का कोई रिश्ता न हो, लेकिन इन्हेें औरों के बारे में सोचने, समझने में ऊर्जा खपाने के बाद दूसरों का बुरा सोचने और बुराइयों का चिंतन करने में जो रस आता है वह रस इन्हें अपने किसी आत्मीय के स्पर्श, लजीज खान-पान और दूसरे किसी कर्म या बात से नहीं आता। इसीलिए ऎसे समानधर्मा लोगों की भीड़ आवारा पशुओं की तरह कहीं भी किसी भी डेरे पर जम जाती है और शुरू हो जाती हैं गोष्ठियां।

समाज जीवन में परिवेश में कई मौके ऎसे आते हैं जब हम हमारे किसी स्वार्थ को लेकर सामने वाले लोगों के बारे में गलत धारणाएं बना लेते हैं और फिर उनका बुरा सोचने लग जाते हैंं। हम सामने वाले लोगों को शारीरिक और मानसिक से लेकर आर्थिक और सामाजिक क्षति पहुंचाने के लिए ऎसे तत्पर हो जाते हैं जैसे कोई पुण्य कर्म कर रहे हों। संसार में कोई व्यक्ति कैसा भी बर्ताव क्यों न करे, उसके बारे में अहित सोचने की बजाय कितना अच्छा हो कि उसे उसकी मूर्खता, उन्मादी अवस्था और पशुता के लिए क्षमा कर दें और उसे सुधरने का मौका दें। उसे सुधारने के लिए अहित चिंतन की बजाय ऎसे लोगों के हृदय परिवर्तन का अभ्यास करें। किसी भी व्यक्ति का हृदय परिवर्तन करना अपनी सबसे बड़ी विजय है क्योंकि इससे सामने वाला एक न एक दिन उस स्थिति में आ ही जाता है जब उसे सत्य का भान होता है और तब जैसे ही वह पश्चाताप और प्रायश्चित करने में मन से जुड़ जाता है उसी समय से उसकी बुद्धि और चित्त शुद्ध हो जाते हैं।

दुनिया का कोई भी व्यक्ति जब अहसास करने की स्थिति में आ जाता है तब वह शुद्ध बुद्ध होता है और यही स्थिति लाने के लिए हमें सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिए। इसलिए औरों के बारे में खराब बातों का चिंतन न करें बल्कि उनके हृदय पर अधिकार जमाने के प्रयास करें और यह तय मान कर चलें कि किसी के भी हृदय पर अधिकार करना किसी साम्राज्य पर अधिकार करने से कहीं ज्यादा मायने रखता है।



---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

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