हर परिवर्तन लाता है नया सुकून !!
परिवर्तन सृष्टि का नियम है। पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड तक में सब कुछ परिवर्तनशील है और यह परिवर्तन ही है जो जीवन की एक रसता और जड़ता को तोड़कर नित नवीन ऊर्जा और बहुआयामी रस-रंगों से परिचित कराता है। हर परिवर्तन सुकूनदायी ही होता है। जीवन में परिवर्तन को छोड़ दिया जाए तो फिर आदमी की जिन्दादिली समाप्त होकर मुर्दानगी छा जाएगी। यही बात प्रकृति और परिवेश पर लागू होती है। जहां कहीं प्रवाह रुक जाता है वहां स्थिरता का सुकून जरूर पाया जा सकता है लेकिन उस सुकून के साथ ऎसी कई परिस्थितियां और आबोहवा का निर्माण हो जाता है जो सुकून को समाप्त कर तनावों और समस्याओं को पैदा करने लग जाता है। आदमी संरक्षण, स्थिरता और भविष्य की सुरक्षा के लिए सदैव प्रयत्नशील रहता आया है और इसी महानतम और सर्वोपरि ध्येय की वजह से वह अपनी और अपने परिवेश की एक फ्रेम निर्धारित कर लेता है और पूरी जिन्दगी इसी के इर्द-गिर्द भ्रमण करने का आदी रहता हुआ अपनी जीवनयात्रा के अंतिम पड़ाव तक वहीं जमे रहने के लिए हरचंद कोशिशें करता रहता है।
आदमी इसी फ्रेम के दायरे में घूमता रहकर संसार की सारी संपदाओं और आनंद को अपनी ओर आकर्षित करने के सारे जतन भी करता रहता है। कभी वह सफल होता है और कभी असफल। लेकिन वह इन सीमाओं से बाहर निकलने में अपने असुरक्षित मानता है और उसकी सोच यही होती है कि इस बंधे बंधाये ढर्रे और घेरे से बाहर निकलने पर शायद वह असुरक्षा की भावना से घिर न जाए। इस भय के मारे वह अपने दायरों में सिमटा रहता है। बात चाहे जमीन या अपने क्षेत्र की हो, मित्रों, परिचितों और रिश्तेदारों की हो या फिर अपने वैचारिक धरातल की। इन दायरों में सिमटा रहने वाला आदमी भले ही दायरों की दीवारों की वजह से अपने आपको सुरक्षित महसूस करे लेकिन इसका सबसे बड़ा खामियाजा उसके पूरे व्यक्तित्व और जीवन को भुगतना पड़ता है। क्योंकि एक तो उसके मौलिक हुनरों भरे व्यक्तित्व के पंखों की पूरी उड़ान पर पाबंदी लग जाती है, दूसरी ओर उसके लिए वे सारे रास्ते बंद हो जाते हैं जो उसकी पूरी जिन्दगी में नये पन और परिवर्तन को लाकर अपार सुख और आनंद की प्राप्ति कराना चाहते हैं।
यह तो रही संसार की बात। दूसरी तरफ ईश्वर चाहता है कि आदमी की जिन्दगी में ताजगी भरी रहे और पूरा जीवन निरन्तर नवीन ऊर्जाओं से भरा रहकर ऎसा कुछ कर दिखाए कि जिसे जमाना भी याद करे। लेकिन अपनी सीमाओं को तय कर उन्हीं में रमण करने में रमा हुआ आदमी इस परिधि से बाहर निकलने को तैयार ही नहीं होता। आजकल अधिकांश लोगों की मनःस्थिति इसी तरह की है। नवीन परिवर्तनों की भावभूमि को अस्वीकार करने वाले लोग जिन्दगी मेंं कभी भी विकास या ताजगी भरे अवसरों को नहीं पा सकते हैं। कई बार हम मित्रता और संबंधों को लेकर भी अपने दायरे बना लेते हैं और उन्हीं के साथ रहना और भ्रमण करना पसंद करते हैं। इसे मोह या जड़ता कुछ भी कह लें, मगर इसका सबसे बड़ा नुकसान हमें ही भुगतना पड़ता है। भगवान तो यही चाहता है कि हमारी जिन्दगी में वे सभी लोग आएं जिनसे हमें लाभ होने वाला है अथवा जिनको हम से लाभ पहुंचने वाला हैं। दुनिया में बहुत सारे लोग ऎसे हैं जो हमारे दायरों में जमा लोगों से हजार गुना अच्छे और महक वाले हैं।
ईश्वर ने हमारी तरक्की के सभी रास्तों को खुला रखा है लेकिन हमने बाहर निकलने के अपने रास्तों को जाम कर दिया है और कछुए की तरह सिकुड़े हुए भीतर ही जैसे-तैसे पड़े हुए हैं। हमने चंद लोगों को अपने रॉल मॉडल या खास प्रेरणादायी अथवा अंतरंग बना रखा है और उन्हीं की हवाओें में घुल-मिल कर उन्हीं की सीमाओं को दुनिया मानकर बैठे हुए हैं। ऎसे में भगवान भी चाहे तो हमारी जिन्दगी में सुधार या परिवर्तन नहीं ला पाने को विवश है। हमें ही अपने आपको बदलना होगा। जिन्दगी में प्रसन्नता और आनंद के साथ जीवन का सुकून पाना हो तो यह जरूरी है हम अपने आपको किसी दायरे में न बांधें बल्कि हर प्रकार के परिवर्तन के लिए तैयार रहें। यह परिवर्तन चाहे ईश्वर की इच्छा से हो अथवा प्रकृति की इच्छा से। हर परिवर्तन हमारे अच्छे के लिए ही आता है, इस बात को हमें अच्छी तरह समझ और स्वीकार लेना चाहिए। किसी व्यक्ति या स्थान विशेष का मोह छोड़कर जब हम परिवर्तन को सहज स्वीकार कर लेते हैं तब हमारे जीवन में जो नवीन स्थान या व्यक्ति आते हैं वे पुराने लोगों से ज्यादा अच्छे भी हो सकते हैं और आनंददायी भी। इसलिए सहजता से हर प्रकार के परिवर्तन को स्वीकारें और जीवन की विकास यात्रा को सुनहरी बनाएं। यह तय मानकर चलें कि जो परिवर्तन हमारे जीवन में आने वाला है वह हर प्रकार से सत्यं, शिवं और सुन्दरं की परिकल्पना को साकार करने वाला ही होगा।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
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