125 साल की बड़की जलालपुर मुसहरी की कथा - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 14 मई 2013

125 साल की बड़की जलालपुर मुसहरी की कथा


4 लड़के और 2 लड़कियां ही मैट्रिक पास


आरंभ में समाज के किनारे रहने वाले महादलित मुसहर परिवार के लोग दर-दर भटके। इसके बाद इन लोगों ने गैर मजरूआ आम भूमि पर तिनका जोड़-जोड़ कर आशियाना बनाये। मजदूरी करके परिवार को जीर्वित रखें। इसके बाद बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दिये। इतना करते-करते 125 साल गुजर गये। परिणाम स्वरूप 125 वर्षों में 4 लड़के और 2 लड़कियां ही मैट्रिक उर्त्तीण हो सके। 
  
रूपसपुर नहर के पूरब की ओर बड़की जलालपुर मुसहरी है। 125 साल पुराना मुहसरी में 55 घर हैं और जनसंख्या करीब 300 है। लड़कों में अभी तक रंजय मांझी, संजय मांझी,धर्मेन्द्र मांझी और एक अन्य धर्मेन्द्र मांझी मैट्रिक उर्त्तीण हैं। वहीं 2012 में स्व0 महेन्द्र मांझी की पुत्री पिंकी कुमारी और जमीशन मांझी की पुत्री लीलीवती कुमारी ने मैट्रिक उर्त्तीण कर लड़कों को चुनौती दे डाली। दोनों द्वितीय श्रेणी में उर्त्तीण हुए। इसमें पिंकी कुमारी अधिक नम्बर लायी हैं। दोनों जे.डी.वीमेंस कॉलेज में कला निकाय में प्रथम वर्ष की छात्रा हैं। इस समय लड़के पढ़ाई पर जोर नहीं देकर कमाई पर जोर दे रहे हैं। मजेदार बात है कि इस क्षेत्र में ‘मंथन’ मानव संसाधन केन्द्र के द्वारा 50 सालों से शिक्षा की जोत जगायी जा रही है। 

इसी क्षेत्र में बिरजू सिंह रहते हैं। इनकी पत्नी रीता देवी ने सर्वप्रथम ‘मंथन’ मानव संसाधन केन्द्र से जुड़कर शिक्षा का प्रसार शुरू की थीं। कई जगहों में स्थानान्तरण होने के बाद प्रकाश मांझी के साथ मिलकर बच्चों को पढ़ाती हैं। इस  संदर्भ में रीता देवी ने कहा कि वह 14 सालों से बच्चों को पढ़ा रही हैं। उसका उत्साह पूर्ण परिणाम सामने आया है। बच्चे नियमित स्कूल आ रहे हैं। धीरे-धीरे ही सही मुसहर समुदाय के बीच शिक्षा-दिक्षा प्रसार हो रहा है।

मुसहर समुदाय के बच्चों को पढ़ने के लिए काफी पापड़ बेलना पड़ता है- प्रायः यह देखा जाता है कि महादलित मुसहर समुदाय के क्षेत्र में सरकार और गैर सरकारी संस्थाएं कार्यशील रहती हैं। दोनों के द्वारा समान रूप से कार्य किया जाता है। दोनों के बीच में अनबन रहता है। यहां के बच्चों को अपनी ओर खींचकर पढ़ना शुरू करते हैं। पहले बच्चे आंगनबाड़ी में जाते हैं। इसके बाद एनजीओ के पास भी पढ़ने जाते हैं। दोनों के खींचतान के बीच में बच्चों का विकास होता है। इस संदर्भ में लीलावती कुमारी कहती है कि पहले घर पर ही पढ़े हैं। इसके बाद 2006 में दानापुर में स्थित नारी गुंजन के द्वारा लालकोठी में खोले गये राजकीय मध्य विघालय,दानापुर में पढ़े। यहां से आठवीं कक्षा पास करने के बाद धनेश्वरी उच्च विघालय, दानापुर में नौवीं और दसवीं कक्षा तक पढ़े। यहां से मैट्रिक की परीक्षा न देकर राम लखन सिंह हाई स्कूल, पालीगंज से परीक्षा दिये। परीक्षा देने के बाद द्वितीय श्रेणी से उर्त्तीण घोषित हो गये। अभी जे.डी.वीमेंस कॉलेज में अध्ययनरत हैं।

खेतीहर मजदूर से साफ-सफाई करने वाले व्यक्ति तक का कार्य किया- जे.डी.वीमेंस कॉलेज में अध्ययनरत लीलावती कुमारी की मां प्रभावती देवी ने बच्चों को खिलाने,पिलाने,पढ़ाने आदि के लिए खेत-खलियानों में खेतीहर मजदूर बनकर कार्य किया। अपरिहार्य कारणों से पतिदेव से अनबन होने के कारण प्रभावती देवी अलग-थलग पड़ गयीं। हिम्मत नहीं हारी वीरांगना की तरह आगे बढ़ी अपने बच्चों के माता-पिता का प्यार और स्नेह देने लगी। इसी बीच किसी की सहायता से प्रभावती देवी को राजकीय मध्य विघालय, रूपसपुर,जलालपुर में साफ-सफाई करने के लिए बहाल कर लिया गया। उसे एक साल में सिर्फ पांच हजार रूपए प्राप्त होता है। साल साल से पांच हजार रूपए पर ही लटकी हुई हैं। उसे खुद पता नहीं कि वह सरकारीकर्मी हैं अथवा उक्त विघालय के शिक्षकों के रहमोकरम पर कार्य कर रही हैं। यहां के शिक्षकगण ही रकम देते हैं। यह जरूर ही जांच का विषय बन गया है कि इस विघालय में साफ-सफाई करने वाले व्यक्ति का पद सृजन है अथवा नहीं?

आंगनबाड़ी से नाखुश हैं बड़की मुसहरी के मुसहर- बड़का रूदल मांझी कहते हैं कि यहां पर संचालित आंगनबाड़ी केन्द्र बेहतर ढंग से संचालित नहीं हो रहा है। सेविका बच्चों की पढ़ाई पर और सहायिका बच्चों की खिलायी पर ध्यान ही नहीं देती हैं। इससे यहां के लोगों में काफी आक्रोश व्याप्त है। इसमें सुधार लाने पर बल दिया गया है।

बिहार निःशक्ता पेंशन योजना से महरूम- बिहार में भले ही 4.50 लाख निःशक्ता हैं। इनको पेंशन देने के लिए 162 करोड़ रूपए स्वीकृत है। परन्तु बड़की मुसहरी के स्व. रामनाथ मांझी के पुत्र गौरख मांझी और उसके अनुज गोलू मांझी को स्वीकृत राशि में से एक कौड़ी राशि भी नहीं मिल पा रही है। 20 साल के गौरख मांझी जन्मजात विकलांग हैं। वहीं उनके 17 साल का अनुज गोलू मांझी को बाद में पोलियो मारने से विकलांगता की श्रेणी में आनी पड़ी। फिलवक्त दोनों सहोदर भाईयों को पेंशन से महरूम होना पड़ रहा है। हालांकि उसके लिए कई बार प्रयास किया गया। जब यह क्षेत्र ग्राम पंचायत था तो मुखिया जी के दरवाजे पर जाकर माथा लगड़ते रहा। अब पटना नगर निगम के अधीन आ जाने से नगर पार्षद के पास जाकर घिघियाना पड़ता है। गौरख मांझी कहते हैं कि काफी कष्ट सहने के बाद जिदंगी की गाड़ी खिंचने के लिए शराब बेचने का धंधा शुरू कर दिये हैं। जीने के लिए रोजगार की जरूरत पड़ती है। यहां पर मनरेगा से कार्य नहीं होता है। यह अरबन स्मल एरिया है। अब तो जन प्रतिनिधि का कर्त्तव्य होता है कि हम दोनों सहोदरों की नाव पा करा दें।



---अलोक कुमार---
पटना 

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