व्यक्ति और समाज के मध्य परस्पर संबंधाें का समन्दर कई लहरों के साथ उछालें मारता है जहाँ संबंधों की वेगवती धाराओं के साथ आने वाली नदियाँ समाहित होती हैं और कई प्राणहीन तत्व अपने आप किनारे लग जाते हैं। मनुष्य को सामाजिक प्राणी इसीलिये कहा जाता है कि उसका जन्म समाज में, समाज के लिए हुआ है और समझदार होने से लेकर मरने तक उसे समाज के लिए किसी न किसी भूमिका में रहना और जीना पड़ता है। ऎसे में मनुष्य का जन्म तभी सार्थक है जबकि हम सामाजिक कहे ही नहीं जाएं, बल्कि सामाजिक होकर रहें तथा पूरी सामाजिकता को जीवन के प्रत्येक कर्म और व्यवहार में अपनाएं। वो जमाना चला गया जब हम पूरी तरह समाज के लिए जीते और मरा करते थे तथा समाज भी हमारे अपने समर्पण के प्रति पूरी तरह कृतज्ञ हुआ करता था।
आज हम समाज के नहीं रहे और यही कारण है कि हमारे भीतर सामाजिकता के ह्रास की वजह से समाज ने भी हमें स्वीकार करना और आदर देना करीब-करीब त्याग ही दिया है। समाज और व्यक्ति के बीच संबंधों का सेतु जितना अधिक स्नेह और श्रद्धा के साथ जुड़ा होगा उतना व्यक्ति और समाज को आनंद की अनुभूति होगी। आजकल यह आनंद समाप्त होता जा रहा है। आदमी समाज और अपने लोगों के बीच रहने की बजाय बाहर के आनंद को तलाशने भटकाव के दौर से गुजर रहा है और यही कारण है कि वह न घर का आनंद पाने में समर्थ हो रहा है और न ही बाहर के किन्हीं चकाचौंध भरे घाटों के। आज इसी फेर में वह सामाजिकता और मनुष्यता की मर्यादाओं को तोड़ने में आनंद महसूस करने लगा है और मनुष्यता के सारे संस्कारों को एक के बाद एक करके त्यागने लगा है।
अब मनुष्य सामाजिकता से ज्यादा सरोकार रखने की बजाय मर्यादाओं के सारे तटबंध तोड़कर हवा में उड़ने के लिए पंख फड़फड़ाने लगा है और इसी ऊहापोह भरी यात्रा के बीच उसे कहीं कोई चैन नहीं मिल पा रहा है। अपने जीवन के बहुमूल्य समय में आदमी कम समय में ज्यादा से ज्यादा पाने के फेर में अपनी ही तरह के लोगों के समूहों की तलाश करता है अथवा इनके बीच घिर जाया करता है और ऎसे में सभी तरफ संस्कारहीनता का वो दौर दिखाई देने लगा है जहाँ तेज रोशनी के समंदर के ठीक पीछे निस्सीम अंधियारा हमारी प्रतीक्षा को उतावला बना बैठा है। अपने उल्टे-सीधे कामों को पूरा करने और अपने मन की कल्पनाओं तथा इच्छाओं को साकार करने के लिए हमारे आस-पास एक ओर जहां अच्छे लोग हैं वहीं दूसरी तरफ ऎसे-ऎसे लोग हैं जिन्होंने मनुष्यता की सारी सीमाओं को तोड़ कर उस परिवेश में प्रवेश कर लिया है जहां चारों तरफ सत्संग और सकारात्मक माहौल की बजाय ऎसे लोगों का जमावड़ा होता जा रहा है जो स्वयं स्वेच्छाचारी हैं और यही कारण है कि जब एक बार कोई भी व्यक्ति मानवता और मनुष्यों तथा समाज के प्रति संवेदनशीलता छोड़ कर स्वेच्छाचारिता अपना लेता है फिर उसके लिए मनुष्य धर्म समाप्त होकर कभी आसुरी धर्म का आश्रय मिल जाता है और कभी पशु धर्म का।
आजकल कई सारे लोग संस्कारों को तिलांजलि देकर इतने बद्तमीज और उन्मुक्त हो गए हैं उनकी वाणी और व्यवहार दोनों में अहंकार के साथ ही साम्राज्यवादी बू आने लगती है जहाँ आदमी खुद को श्रेष्ठीजन और दूसरों को दास समझने लगता है और ऎसे में आदमियों की एक पूरी की पूरी प्रजाति ही आजकल ऎसी हो गई है जिसे न औरों के मान-सम्मान से मतलब है, न संस्कारों और मानवीय संवेदनाओं से, और न ही सेवा या परोपकार से। ऎसे लोगों के लिए यदि माता-पिता, भाई-बहन और कुटुम्बी भी किसी काम में न आने वाले हों तो उनका भी तिरस्कार करने में एक क्षण पीछे नहीं रहें। ऎसे जो भी संस्कारहीन लोग अपने संपर्क में आएं, उनके बारे में यह जान लीजियें कि ये कोई आदमी न होकर सौदागर हैं जो हर कहीं बिजनैसी मानसिकता के साथ उन तमाम अवसरों की तलाश करते हैं जो उनके घरों को भरने अथवा मिथ्या मान-सम्मान की भूख को शांत करें।
---डॉ.दीपक आचार्य---
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

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