हर जगह हर प्रकार के आदमियों की भीड़ छायी रहती है। कोई अच्छे और कोई बुरे होते हैं। कोई वाकई बुरे होते हैं जो न सिर्फ आप और हमारे लिए बल्कि सभी के लिए बुरे हैं और उन्हें समाज में मनुष्य के नाम पर कलंक माना जाता है। कुछ लोग अच्छे होते हैं जिन्हें लोग हृदय से स्वीकारते हैं लेकिन समाज से उतना सम्मान प्राप्त नहीं हो पाता है जो होना चाहिए। बहुत सारे लोग अपने कामों और स्वार्थों के पूरे होने या न होने अथवा भविष्य की संभावनाओं के आधार पर अच्छे-बुरे रहते हैें या हो जाते हैं। इस किस्म के लोग कुछ के लिए अच्छे होते हैं और कुछ के लिए बुरे। इस प्रजाति के लोगों की संख्या सर्वाधिक है जो न स्थायी रूप से अच्छे होते हैं और न बुरे बल्कि इनकी गिनती स्वार्थियों में आती है और ये अपने मुद्दों में सावधान होते हैं। कुछ लोग अच्छे या बुरे हो या न हों, लेकिन दूसरों के प्रभाव में एकदम आ जाते हैं और फिर जिन्दगी भर दूसरे लोगों पर निर्भर रहने के आदी हो जाते हैं। आदमियों की भीड़ में कई लोग सौभाग्यशाली और सुकून देने वाले होते हैं जबकि कई लोग हर दर्जे के दुर्भाग्यशाली और मनहूस होते हैं।
अच्छे लोग जहां कहीं होते हैं वहां प्रेम, आनंद और शांति का माहौल अपने आप स्थापित हो जाता है और इनके संपर्क में आने पर लोग प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। ये लोग जिस किसी दफ्तर, प्रतिष्ठान, समूह या धंधे में होते हैं उनके आस-पास जाने और उनका सान्निध्य पाने वाला हर कोई प्रफुल्लित हो उठता है और अपने तनाव भूल जाता है। वहीं दूसरी ओर आदमियोें की एक किस्म ऎसी है जिनका चाहा या अनचाहा सान्निध्य और सम्पर्क पग-पग पर तनावों और दुःखों का माहौल स्वतः जन्म ले लेता है। ये जिस किसी दफ्तर, प्रतिष्ठान या काम-धंधों में होते हैं वहाँ बिना किसी बात के सारा माहौल नकारात्मक हो जाता है, तनावों और दुःखों का साया पसरा रहता है और जो लोग इनके सम्पर्क में आते या रहते हैं वे सारे के सारे परेशान और त्रस्त रहते हैं। इन दुर्भाग्यशाली लोगों की जहाँ कहीं मौजूदगी होगी वहां पीड़ाओं और दुःखों के सिवा कुछ नहीं रहता और सभी लोग अशांत तथा उद्विग्न रहते हैं। ऎसे लोग जिस किसी दफ्तर या प्रतिष्ठान में होते हैं उसका विकास भी रुक नहीं पाता, फिर ऎसे दुर्भाग्यशाली लोग अहंकारी, विघनसंतोषी, भ्रष्ट, बेईमान और कामचोर भी होते हैं और इस वजह से इनके कारण ही उनका विभाग या प्रतिष्ठान कोई तरक्की नहीं कर पाता तथा कबाड़खाने जैसी हालत दिखने लगती है।
अपना पावन इलाका हो या और कोई क्षेत्र, स्थल, दफ्तर या प्रतिष्ठान, संस्थाएं या समूह आदि सभी स्थानों पर ऎसे दुर्भाग्यशाली और मनहूस लोगों का जमावड़ा है जिनके साथ रहने वाले सहकर्मी और इनका साथ लेने या देने वाले लोग अच्छी तरह इनकी विलक्षणताओं से वाकिफ हैं। इन लोगों की वाणी से लेकर चरणों की रज और दृष्टि तक दुर्भाग्य का साया मण्डरा देने वाली होती है। कहीं इन लोगों को काली जुबान वाला कहा जाता है तो कहीं दुर्भाग्यशाली पाँवों वाला। ये लोग जहाँ कहीें प्रवेश कर जाते हैं या जहां होते हैं वहाँ सब कुछ अपने आप उलटा-पुलटा और गड़बड़ होने लगता है। ये दुर्भाग्यशाली लोग चाहते हुए भी किसी व्यक्ति या घटना के प्रति सकारात्मक सोच नहीं रख सकते क्योंकि इनके रग-रग में आशंकाओं, नकारात्मक प्रवृत्तियों, भ्रमों और दूसरों को हीन दिखाने, नुकसान पहुंचाने की वृत्तियाँ हर क्षण हावी रहती हैं और वे इन्हीं नकारात्मक विचारों का चिंतन करते रहते हैं। इनसे इनके सहकर्मियों के साथ ही उनके परिजन भी परेशान रहते हैं। ऎसे लोगों का सान्निध्य पाना ही उन लोगों के लिए आत्मघाती हो जाता है जो इनकी तासीर से अपरिचित होकर इनके पास आते हैं।
ये लोग उन लोगों के लिए भी खतरनाक होते हैं जो इन्हीं की तरह नालायक और दुर्भाग्यशाली पांवों वाले होते हैं। इनका सान्निध्य जब भी कोई पाने लगता है, इनके बारे में समझदार लोग यह सटीक भविष्यवाणी कर ही डालते हैं कि अब इनकी बरबादी तय है। और ऎसा ही होता है। ये दुर्भाग्यशाली लोग जहाँ कहीं जाते हैं वहाँ का माहौल अशांत होने के साथ ही रचनात्मक गतिविधियां, प्रतिष्ठान और संस्थाएं तथा सृजनधर्मा संसार अपने आप सिमटने लग जाता है और एक समय ऎसा आता है जब ऎसे दुर्भाग्यशाली लोगों के चरणों की विलक्षण संहारक क्षमताओं से भरी चरण रज असर दिखाने लग जाती है और सब कुछ बरबाद हो जाता है। हर इलाके में इस किस्म के दुर्भाग्यशाली लोगों का वजूद होता है जिनके बारे में स्पष्ट कहा जाता है कि ये जहां जाना शुरू कर देंगे, जिनका साथ देंगे, जो इनका साथ लेते हैं या ये जिन्हें राय देने लगते हैं उसका तो डूबना तय ही है।
इस भविष्यवाणी के पीछे जानकार लोगों के पास कई उदाहरण और तर्क होते हैं जो भूतकाल में हुई सत्य घटनाओं का प्रमाण देते हैं। अपने इलाके के ऎसे दुर्भाग्यशाली लोगों के बारे में जानें तथा उनसे किनारा करें वरना ये हमें भी ले डूबेंगे। ऎसे लोगों को दूर से ही नमस्कार करते हुए मन ही मन इस मंत्र का पाठ करें - ‘दुर्जनं प्रथमं वंदे।’
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

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