...और अब हरी खाद से लहलहाएंगे खेत ! - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शनिवार, 18 मई 2013

...और अब हरी खाद से लहलहाएंगे खेत !


  • - दलहन की खेती को बढावा देने के मकसद से गरमा मूंग, हरी खाद की खेती को अपनाया जा रहा है और सरकार 90 फीसदी तक अनुदान दे रही है



भले ही कुसहा त्रासदी के बाद कोसी क्षेत्र में किसानों की स्थिति बेहद गंभीर हो गई हो, लेकिन नित नये प्रयोग ने किसानों को एक बार फिर मुस्कुराने का मौका दिया है। बाढ़ और बालू से बनी एक खास चरित्र की खेती के लिहाज से प्रतिकूल परिस्थितियों की श्रेणी में आने वाला बिहार का यह भू-भाग जिसे स्थानीय भाषा में दियारा, पसार और चैर के नाम से जानते हैं, अपनी कठिनाईयों समस्याओं और अनोखापन के साथ साथ असीम संभावनाओं के लिए भी जाना जाता है। इसी कड़ी में गरमा-2012 मौसम में हरी खाद के तौर पर मूंग की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है। लिहाजा दियारा क्षेत्र के किसानों में जहां उत्साह का माहौल है वहीं विभागीय अधिकारी भी क्षेत्र में हो रहे नये प्रयोग से बेहद खुश हैं। बता दें कि 2008 की बाढ़ के बाद जिले के अमूमन हरेक प्रखंड में विभीशिका मच चुकी थी और अधिकांश हिस्सों करीब 75,000 हेक्टेयर में पानी के साथ आये सिल्ट जमा हो जाने के कारण खेतों की हरियाली गायब हो गई थी। हरी खाद के प्रयोग से एक बार फिर किसानों के चेहरे पर जहां लालिमा लौट आयी है वहीं खेतों में भी हरियाली लौटने लगी है। इन क्षेत्रों में दलहन की खेती को बढ़ावा देने के मकसद से गरमा मूंग की खेती को अपनाया जा रहा है और सरकार 90 फीसदी तक अनुदान दे रही है। जिला कृषि पदाधिकारी के मुताबिक जिले में 14,000 एकड़ जमीन के लिए 1,126 कुंतल मूंग की बीज आवंटित की गई है और पिछले साल भी मूंग की खेती को बढ़ावा दिया गया था। उन्होंने कहा कि राजस्थान से आयी बीज की क्वालिटी अच्छी है, जिसके कारण किसानों में बीज की मांग अधिक है। उन्होंने कहा कि नई तकनीक से गरमा मूंग की खेती करने से न सिर्फ पैदावार बढ़ने की पूरी उम्मीद है, बल्कि जमीन की उर्वरा शक्ति भी बढ़ेगी। ध्यान देने वाली बात है कि कोसी क्षेत्र में अधिकांश जगहों पर सिल्ट जमा हो जाने के कारण मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित हो चुकी है ऐसे में विशेषज्ञों की मानें तो मूंग की खेती और जैविक खाद ही एकमात्र विकल्प है। बताते हैं कि मूंग की खेती करने से जमीन को आसानी से नाइटोजन की उपलब्धता हो जाती है और अतिरिक्त तौर पर कृत्रिम खाद की जरुरत आवश्यकता नहीं होती है साथ ही जमीन की उर्वरा शक्ति भी बढ़ती है।  

आटोमैटिक वेदर स्टेशन का मिल रहा है लाभ: देवन कुमार चैधरी, कनीय वैज्ञानिक, ;सस्य विभाग कहते हैं कि कोसी क्षेत्र में आटोमैटिक वेदर स्टेशन खुल जाने से अब किसानों की राह आसान हो गई है। समय से पहले किसानों को तापमान, आर्दता, मिट्टी का तापमान, बारिश, हवा की गति समेत कई अन्य जानकारी मिल जाती है। उन्होंने कहा कि प्रतिदिन तकरीबन 2500 किसानों को मौसम व फसल संबंधी जानकारी दी जा रही है। जिसके कारण कोसी क्षेत्र में बाढ़ की विभीषिका के बावजूद खेती अब चुनौती नहीं बल्कि आसान होती जा रही है। रासायनिक खाद व पालीथिन के अधिकाधिक प्रयोग के कारण खेती की समाप्त हो रही उत्पादक क्षमता को नवजीवन प्रदान करने के लिए कृषि विभाग द्वारा चलाए जा रहे हरित चादर योजना कोसी क्षेत्र के लिए वरदान साबित हो सकती है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि कोसी की मिट्टी के लिए यह बेहद ही उपयोगी साबित होगी। 

क्या है योजना: हरित चादर योजना के तहत ए-3 पी मूंग का प्रत्यक्षण, मूंग की अन्तरवर्ती खेती, मक्का प्रत्यक्षण के लिए प्रति किसान 1600 रुपए, मंूग की अन्तरवर्ती खेती के लिए 1000 और मक्का प्रत्यक्षण के लिए 1600 रुपए प्रति किसान मुफ्त कीट दी जाएगी। ढैंचा व गरमा मूंग के लिए किसानों को मुफ्त मंे बीज उपलब्ध होगा। ढैंचा को 30 से 45 दिन में और मूंग को पौधे से एकबार दाना तोड़ने के बाद उसे ख्ेात में ही छोड़कर जुताई कर दी जाएगी। जो खाद के रुप में खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ाएगी। 

कितने हेक्टेयर भूमि पर होगा प्रयोग: जिले के 1500 एकड़ भूमि में ए-3 पी मूंग, 3100 एकड़ में मूंग की अन्तरवर्ती, नौ हजार हेक्टेयर भूमि में ढैंचा व 36000 हेक्टेयर भूमि में गरमा मूंग की खेती होगी। इसके अलावा चार की समस्या को दूर करने के लिए 10,000 हेक्टेयर में मक्का चारा और मक्का की बेहतर उपज से रुबरु कराने के लिए 3250 एकड़ भूमि में मक्का का प्रत्यक्षण होगा। क्या कहते हैं्र कृषि वैज्ञानिक: कृषि  वैज्ञानिक डाॅ आरसी यादव कहते हैं कि ढैंचा व मूंग दलहनी फसल है। जिसका पौधा छीमीदार होता है। इसके जड़ में राईडोवियम नाम का जीवाणु पाया जाता है जो कि हवा से नाइट्रोजन खींचकर पौधे के लिए उपयोगी बना देता है। चूंकि गरमा मूंग की फसल के लिए कोसी क्षेत्र की भूमि सर्वाधिक उपयोगी है इसलिए यहां के खेतों के लिए यह फसल वरदान साबित हो सकती है। 

कुमार गौरव, 
सुपौल: 

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