किसी भी आदमी को कोई काम बताया जाए और वह कहे कि अमुक समय मुझे याद दिला देना। इसका सीधा सा अर्थ यही है कि जो व्यक्ति याद दिलाने के लिए कह रहा है वह आपके विषय में गंभीर नहीं है तथा उसका पूरा जीवन बनावटी और आडम्बरी है वहीं यह तय मानकर चलें कि ऎसे लोग किसी भी कीमत पर भरोसेमंद नहीं हो सकते। व्यक्ति उन सभी विषयों को अच्छी तरह याद रखता है जो उसे करनी होती हैं या रोजाना करता रहता है। कई विषय उसके अवचेतन में भी पड़े होते हैं जिन्हें बार-बार बाहर निकल कर चेताते हुए वह देखता है। भगवान ने सभी लोगों को बराबर की याददाश्त दी हुई होती है लेकिन कुछ लोग भरपूर उपयोग करते हैं उनकी याददाश्त का कोटा उनकी योग्यता और शुचिता के आधार पर भगवान बढ़ा देता है जिस तरह आजकल ईमेल अकाउंट के मेल बाक्स की जीबी क्षमताएं।
कुछ लोग इसका बेजा कामों के इस्तेमाल करते हैं या उपयोग करने की स्थिति में नहीं होते। और कुछ ऎसे होते हैं जो पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाते। इनमें काफी संख्या उन लोगों की है जो बात-बात में कहा करते हैं कि हमें याद दिला देना। इस किस्म के लोग खुद प्रतिभाहीन हुआ करते हैं और समाज या देश के दुर्भाग्य या अपने भाग्य से उस स्थिति में पहुंच जाते हैं जहां ये दूसरे के काम आ सकते हैंं। लेकिन ऎसे लोगों में से कुछ बिरलों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर को जब भी कोई काम बताया जाए, यह कहने से नहीं चूकते कि मुझे याद दिला देना। इस किस्म के लोगोें में से नब्बे फीसदी लोग औरों के भरोेसे अपने भाग्य को आजमाने और काम करने वाले होते हैं।
इनमें भी एक किस्म ऎसी है जो किसी दूसरे आदमी का नाम बताते हुए यह कहती है कि किसी और को याद दिला देना। इसका सीधा सा अर्थ है उस काम का होना पूरी तरह संदिग्ध है और हम यदि ऎसे लोगों के भरोसे बैठे हैं तो यह हमारी गफलत है। हम मुगालते में हैं कि ऎसे लोग किसी काम कभी आएंगे भी। जो कोई व्यक्ति याद दिलाने की बात करता है वह उस विधाता का अपमान है जिसने फूल मेमोरी देकर भेजा है और सामने वाले को उस पर भरोसा तक नहीं है। याद दिलाने की बात कहने वाले लोगों की यह मनोवृत्ति इस बात का संकेत भी है कि कुछ वर्ष बाद ऎसे लोग धीरे-धीरे अपनी याददाश्त खो ही बैठेंगे, इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार जिन लोगों को किसी एक ही प्रकार के काम के लिए बार-बार याद दिलाने की जरूरत पड़ती है ऎसे लोग स्वयं प्रतिभा शून्य और पराश्रित स्वभाव वाले होते हैं और अपने बूते कोई सा काम नहीं कर पाते। बल्कि ये जो काम करते हैं या जो लोकप्रियता प्राप्त कर पाते हैं वह किसी न किसी गोरखधंधे, संबंधों या उन रास्तों से प्राप्त करते हैं जिनका मनुष्य के जीवन में कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
आजकल याद दिलाने की बीमारी महामारी का रूप लेती जा रही है। छोटा या बड़ा कोई भी हो, मामूली से कामों के लिए याद दिलाने की बात कहने लगे हैं। जबकि होना यह चाहिए कि जैसे ही कोई विषय या बात हमारे चिंतन में आए अथवा हमसे कही जाए, उसी क्षण तत्काल संबंधित तक पहुंचा कर मुक्त हो जाएं ताकि अपने मन-मस्तिष्क में किसी भी प्रकार का भार न रहे और हमेशा दिल और दिमाग ताजगी से भरा रहे। लेकिन सामान्य लोग ऎसा नहीं कर पाते, क्योंकि उनकी हर काम के पीछे जाने कितनी सारी मंशाएं होती हैं, कितने ही स्वार्थों की पूंछें बाल हिलाती नज़र आती हैं और ऎषणाओं के सुनहरे स्वप्न दिखाई देने लगते हैं। कई रहस्यों से भरा इनका जीवन इनके द्वारा सहजता और सरलता से कोई काम करवा ही नहीं सकता। ऎसे में किसी भी कुटिल चरित्र के आदमी के लिए यह कभी सहज नहीं रहता कि वह तत्क्षण कोई बात निस्तारित कर मुक्ति का अहसास कर सके। कुछ दशक पहले वाले जमाने में ऎसे लोग थे जो किसी भी प्रकार की बात के सामने आने पर संबंधित तक तत्काल पहुंचा देते थे और खुद मुक्त हो जाते थे।
यही कारण था कि उनकी लोकप्रियता और आयु दोनों ही बढ़ते रहते। वर्षों बाद आज भी ऎसे कई भारी लोगों को श्रद्धा और आदर से याद किया जाता है। फिर आजकल तो मोबाइल का जमाना आ गया है। तत्काल किसी से भी, कहीं भी बातचीत की जा सकती है। लेकिन यह स्पष्ट और तत्काल कार्यसंपादन का चिंतन तभी हम अपना सकते हैं जब हमारे मन में शुचिता हो, कोई स्वार्थ या कुटिलता न हो तथा जनसेवा और परोपकार की भावना कूट-कूट कर भरी हुई हो। काम ऎसे करें कि आपको या हमें किसी भी विषय पर याद दिलाने की जरूरत नहीं पड़े बल्कि लोग कार्य संपादन का सुकून पाकर हमें अर्से तक याद करते रहें। ऎसा कर पाएं तभी हमारा मनुष्य जन्म सार्थक है वरना खूब लोग आए जिन्हें हजारों बातें कई-कई बाद याद दिलायी गई लेकिन वे नहीं कर पाए और इन आकार नहीं पा सके कामों का बोझ लेकर मर गए।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
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