जीवन के हर पहलू में साफगोई का होना जरूरी है। हम जितने पाक-साफ होंगे उतना ही हमारा व्यक्तित्व शुभ्र होने के साथ ही आनंद पाने और देने वाला रहेगा। यह स्वच्छता और शुद्धता मन-मस्तिष्क से लेकर शरीर सभी के लिए जरूरी है। सभी प्रकार की ज्ञानेन्दि्रयों और कर्मेन्दि्रयों की शुद्धता होने पर ही आत्म तत्व का जागरण होता है और दिव्य तथा शाश्वत सत्य से परिपूर्ण ज्ञान एवं आत्मतोष की प्राप्ति होती । मन-मस्तिष्क और शरीर में से किसी एक के भी दूषित हो जाने की स्थिति में हम न तो आत्मसंतुष्टि प्राप्त कर सकते हैं और न ही जीवन का लक्ष्य। जीवन में हराम की कमाई और ऎसी कमाई दिलाने में मददगार लोगों का प्रश्रय एवं संरक्षण या सामीप्य प्राप्त करते हुए आगे बढ़ना, पद-प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेना, कोई दर्जा पा लेना और अनाप-शनाप दौलत इकट्ठी कर लेते हुए अपने आपको अपने-अपने इलाकों के अधीश्वर के रूप में प्रतिष्ठित कर लेना तथा भोग-विलास की सारी सामग्री का अनियंत्रित एवं उन्मुक्त उपभोग कर लेना अलग बात है और मनुष्य के रूप में सफल होना अलग बात।
आज लोग जिसे सफलता मानकर फूल के कूप्पा हुए जा रहे हैं वह सफलता नहीं मानी जा सकती क्योंकि इससे आत्मसंतुष्टि या प्रसन्नता के भाव कहीं नहीं होते बल्कि इतना सब कुछ पा लेने के बावजूद हाय-हाय और असंतोष लगा ही रहता है। जबकि पुरुषार्थ से अर्जित सफलताएं आत्मतोष के साथ ही प्रसन्नता और प्रफुल्लता के चरम आनंद का अहसास हर क्षण कराती रहती हैं। मनुष्य जीवन को पूर्ण सफलता प्रदान करने के लिए यह जरूरी है कि जीवन का हर कर्म मनुष्यता से भरा-पूरा हो। इसके लिए जीवन के प्रत्येक क्षण में अपने आपको मनुष्य होने का स्मरण बना रहना तथा श्रेष्ठ कर्मों का अवलंबन जरूरी है। लेकिन आम तौर पर हम लोग ऎसा नहीं कर पाते हैं। अपनी छोटी-छोटी इच्छाओंं और निजी स्वार्थों को पूरा करने या करवाने की गरज से पूरी जिन्दगी कथनी और करनी में भारी अंतर रखते हैं और हर क्षण छद्म व्यवहार व दोहरे-तिहरे चरित्र के साथ जीते हैं। ऎसे छद्म व्यवहारी लोग जो अपने स्वभाव और आत्मा के साथ छल-कपट करने के आदी हो जाते हैं, उनके लिए दुनिया में फिर कहीं कोई लाज-शरम होती ही नहीं। ये लोग नंगों और भूखों की तरह हरकतें करते हुए हर कहीं दिख जाते हैं।
एक बार जो कोई व्यक्ति अपने आपको धोखा दे डालता है उसके लिए फिर दुनिया की किसी भी स्तर की चोरी-डकैती और आपराधिक घटना कोई खास मायने नहीं रखती। वह किसी भी सीमा तक नीचे गिरकर कुछ भी कर सकता है और ऎसा करते हुए उसे कभी कोई आत्मग्लानि का अनुभव नहीं होता है क्योंकि वह उन सभी पायदानों से नीचे गिरा हुआ होता है जहाँ से इंसानियत की मंजिलों तक पहुंचा जाता है। आजकल ऎसे लोगों की सर्वत्र खूब भरमार है। ऎसे लोग बिना ढूंढ़े हर कहीं पाए जाने लगे हैं। जो लोग दोहरा जीवन जीते हैं, पग-पग पर व्यवहार में छद्मता का प्रयोग करते हैं वे लोग बाहर से कितने ही फबने और लोकप्रिय होने का दंभ रखें मगर उनकी असलियत तो यही है कि इनका पूरा व्यक्तित्व खोखला होता है। जो बिजूका जितना ज्यादा खोखला होता है उसका अंग संचालन और क्रियाएं उतनी ही ज्यादा उछलकूदिया होती हैं। कुछ लोगों का तो पूरा जीवन ही इस कदर छद्म और दोहरे चरित्र वाला होता है कि ये लोग यदि अभिनय के क्षेत्र में होते तो खूब नाम भी कमाते और नोट भी।
कई लोग तो बहुरूपियों की तरह ही जिन्दगी जीने लगे हैं और कई ऎसे विनम्र होकर पसर जाते हैं कि जैसे वे सामने वाले लोगों की हर प्रकार की सेवा के लिए ही पैदा हुए हैं। भारी लोगोें का आजकल संकट होता जा रहा है। चाहे जिधर नज़र दौड़ायें वहाँ हल्के लोगों का जमावड़ा है जिनकी पूरी जिन्दगी ही उनके खोखले व्यक्तित्व को उजागर करती है। इन खोखले लोगों के स्वभाव का सबसे बड़ा संकेत यही होता है कि अनचाही होने पर बिदकने और बहकने लगते हैं और मनचाही हो जाने पर उत्साह के अतिरेक में इतने बावले हो जाते हैं कि पूरी दुनिया को अपना दास मानने लग जाते हैं। खोखले लोगों का वजूद हर कहीं अपने आप दिख जाता है। कभी हवाओं में उछल कर आवाज करते हुए, तो कभी पानी की लहरों पर बहते हुए, या कि किसी से बतियाते हुए इनका हलकापन अनचाहे ही झलक ही जाता है। आजकल खोखले लोगों की संख्या विस्फोटक होती जा रही है जिसने समाज के अच्छे और भारी व्यक्तित्व वाले लोगों का जीना हराम कर रखा है। हमें अच्छी तरह सोचना चाहिए कि हमारा जीवन सकारात्मक हो या नकारात्मक। दोनों नावों पर सवार होकर लक्ष्य की ओर नहीं बढ़ा जा सकता। ठीक उसी तरह जैसे कि किसी होटल पर लिखा हो कि शाकाहारी और माँसाहारी भोजन की सुविधा उपलब्ध है। ऎसे में कोई भी शाकाहारी आदमी उस दुकान की ओर कभी रूख नहीं करेगा। यही स्थिति हमारे स्वभाव की भी होती है। बुरे लोग हमारा सामीप्य और सान्निध्य पाने को उतावले हो सकते हैं लेकिन अच्छे लोग हमसे सायास दूरी बनाए रखते हैं। श्रेष्ठीजनों की तासीर होती है कि वे मूर्खों, नालायकों, दुष्टों और दंभियोें को कभी सीख देने का प्रयास नहीं करते हैं बल्कि उनसे कन्नी काट लिया करते हैं। हम चाहें कि हमारा व्यक्तित्व ठोस और प्रभावी हो, तो हमें चाहिए कि जो हैं, जैसे हैं, वैसे ही बने रहें, आडम्बरों का प्रयोग न करें तथा शुचिता पर ध्यान दें।
--डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
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