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रविवार, 26 मई 2013

अपनी उमर का लिहाज करें, व्यक्तित्व में गांभीर्य लाएँ

उम्र के अनुसार जीवनचर्या में बदलाव आना स्वाभाविक है तभी जीवन का निर्वाह भली प्रकार हो सकता है। शैशव से लेकर जीवन के अंतिम पड़ाव तक होने वाले शारीरिक परिवर्तनों के साथ यदि मानसिक परिपक्वता का अनुभव न हो तो समझ जाना चाहिए की पूरा जीवन न सिर्फ व्यथा है बल्कि पृथ्वी पर भार स्वरूप होने के सिवा कुछ नहीं है। हमारे अपने इलाके से लेकर आस-पास तथा देश-दुनिया भर में ऎसे खूब लोग हैं जिनकी आयु तो निरंतर बढ़ती चली जा रही है लेकिन मानसिक स्तर पर वे अपेक्षित या वांछित परिपक्वता प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। ऎसे लोगाें का मन-मस्तिष्क शारीरिक अवस्थाओं से पुराने काल तक सीमित रहता है। यह मानसिक अपरिपक्वता इन लोगों के जीवन में हरेक कर्म में प्रतिबिम्बित होती है। कई लोग तो उस स्थिति तक पहुंच जाते हैं जहाँ अब उनके पास सिवाय मरघट का रूख करने के कोई और विकल्प बचा ही नहीं होता।

इसके बावजूद ये अपने आपको युवा, परिपक्व और सर्वगुण सम्पन्न मानने का भ्रम बनाये रखते हुए समाज की छाती पर मूँग दलते रहते हैं। जबकि इनके पूरे जीवन और दिनचर्या के व्यवहारों से कहीं नहीं लगता कि ये आयु के कई पड़ावों को पार कर चुके हैं। ऎसे लोगों की मित्रता भी इनकी ही तरह के आत्महीन, स्वच्छन्द और नालायकों से होती है और इस किस्म के लोगों को धूत्र्तों और हरामखोरों के साथ रहने में ही आनंद आता है। ऎसे में इन लोगों की स्थिति उस युवा की तरह ही होती है जिसका मस्तिष्क अपरिपक्व होता है और इस कारण उसे अपनी वय से छोटे या अपरिपक्व लोगों के साथ रहने में आनंद आता है। अपनी आभासी ऊर्जाओं और वहमों की वजह से इनके अहंकार का ग्राफ भी इतनी ऊँचाई पर अटका होता है कि ये लोग अपने आपको संप्रभुता सम्पन्न और दूसरों को हीन समझते रहते हैं। हर इलाके में ऎसे कई लोगाें के साथ ही इनके स्वाथोर्ं और मानसिकता के अनुरूप इनके ढेरों समूह बनते-बिगड़ते ही रहते हैं। इस प्रकार के लोगाें की मिथ्या लोकप्रियता के आडम्बरी व्यवहारों को देखते हुए इन लोगाें के आदर-सम्मान के लिए कई सारे शब्दों का प्रयोग होने लगा है। इनके प्रति हृदय से कितनी ही घृणा का भाव क्यों न हो पर अपने स्वाथार्ें की खातिर हर कोई इन्हें ऊपर से तो आदर देने को विवश होता ही है।

हो भी क्यों न, इन लोगों की वृत्तियाँ ही ऎसी होती हैं कि कभी ये भाैंकने और गुर्राने वाले खूंखार कुत्तों की तरह व्यवहार करते हैं, कभी कोबरा से भी खतरनाक साँप की तरह फुफकार कर काटने दौड़ते हैं, कभी अपनी अजगरी बाँहों से जकड़ने को उतावले रहते हैं, कभी गिद्धों और लोमडों की तरह नोंच खाने की मुद्रा का दर्शन कराते हैं। फिर ऎसे लोगाें की वाणी तो नीम, करेले और गिलोय या महासुदर्शन चूर्ण से भी सौ गुना ज्यादा कड़वी इतनी की सुनने वाला भी भगवान को कोसने लग जाये। ऎसे लोग सभी जगह पाए जाते हैं जिनका चेहरा-मोहरा व जिस्म तो आदमी का, और व्यवहार में सारे असुरों व हिंसक जानवरों तक के दर्शन आसानी से कर लो। अपने आपको तीसमार खाँ समझने वाले ऎसे लोगाें की वजह से धरती माता भी बोझ के मारे परेशान है। मजे व हैरत की बात तो यह है कि ऎसे लोग जिन उपनामों या उपाख्यों से जाने पहचाने जाते हैं उन शब्दों से इनके जीवन का कोई मेल नहीं होता। बस एक बार किसी मूर्ख या घोर स्वार्थी आदमी ने जो नाम रख दिया, वह चल निकला।

स्वार्थी, भयग्रस्त और उनके करीबी लोग इन लोगों को विशेष नाम से पुकारते है। जैसे बोस, गुरु, मालिक, गुरुजी, महाराज आदि-आदि। हालांकि इस तरह के अनके नामों का इनके लिए कोई अर्थ नहीं होता बल्कि दूर-दूर तक इनका इन नामों से कोई रिश्ता तक नहीं होता। आम तौर पर ऎसे नाम उन लोगाें को मिलते हैं जो अधेड़ होते जाते हुए औरों के नेतृत्व का भ्रम पाल लेते हैं। ऎसे तथाकथित आदरणीयों की हरकतों से इनकी आयु का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता क्योंकि आयु के इतने पड़ावों को पार करने के बावजूद इनके द्वारा किये जाने वाले काम, इनकी मानसिकता और इनके साथ रहने वाले लोगाें की किस्म को देखें तो स्पष्ट पता चलता है कि ये भले ही ये लोकप्रियता पाए अधेड़ हो गए हों मगर इनकी हरकतों में न कोई गांभीर्य है न परिपक्वता। 




---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

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