संबंधों का समग्र मूल्यांकन करें, काम या स्वार्थ के आधार पर नहीं - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

शनिवार, 18 मई 2013

संबंधों का समग्र मूल्यांकन करें, काम या स्वार्थ के आधार पर नहीं


आजकल संबंधों का जुड़ना और बिखरना ऎसे हो गया है जैसे ताश के पत्तों का पारस्परिक चिपकाव और बिखराव या हवाओं से बनने-बिगड़ने वाले रेत के टीले। आदमी के जन्म से लेकर आदमी और समाज के बीच संबंध अनिवार्य तो है ही, एक-दूसरे के अस्तित्व को बनाए रखने तथा विकास, आने वाली पीढ़ियों के उन्नयन आदि के लिए जरूरी है। आदमी की पूरी जीवनयात्रा में ये संबंध घर-परिवार और कुटुम्ब से लेकर अपने समाज और अपने क्षेत्र में रहने वाले भांति-भांति के लोगों से होते रहते हैं जिनका समाज-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में दखल होता है। संबंधों के समीकरण कभी जीवन भर स्थायी नहीं हुआ करते हैं बल्कि कुछ स्थायी भाव वाले संबंधों को छोड़ दिया जाए तो अपने जीवन में संबंधों का बनना और बिगड़ना मृत्यु पर्यन्त जारी रहता है। इसी के साथ संबंधों में कभी कमी आ जाती है, कभी स्थिरता आ जाती है और कभी संबंधों में प्रगाढ़ता के भाव आकार लेने लगते हैं। संबंधों की सायास-अनायास यात्रा, मजबूरी में बनाए गए अथवा स्वार्थ से निर्मित संबंधों की बात हो या किसी भी प्रकार के निष्काम संबंध। सभी प्रकार के संबंधों में एकतरफा प्रवाह कभी नहीं होता। इनमें खट्टी-मीठी अविस्मरणीय यादों का संपुट लगा ही रहता है जिनकी वजह से संबंधों को हम पूरी जिन्दगी कई-कई बार याद करने लगते हैं और कभी इनसे सुकून मिलता है तो कुछ यादों से मन खिन्न और दुःखी भी होने लगता है।

संबंधों में आने वाले उतार-चढ़ावों का दौर यों ही न बना रहे तो एकरसता और जड़ता आ ही जाती है लेकिन इन सभी में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य बात यह है कि संबंधों में किसी भी प्रकार की कटुता का समावेश नहीं होना चाहिए। यह हो सकता है कि हमारे जिन लोगों से संबंध हैं उन लोगों का हमारे प्रति या हमारा उनके प्रति किसी भी प्रकार से संबंधों में न्यूनाधिक्यता का भाव दिखाई देने लगे तब भी संबंधों के स्थायित्व पर कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। मतभेद होना बौद्धिक लोगों की अपनी वह विशेषता है जो हमें पशुओं, मूर्खों, पागलों और अनुचरों से अलग करती है और ऎसा होना मनुष्यत्व के विकास के लिए जरूरी भी है। लेकिन इन सभी प्रकार की स्थितियों के बावजूद मनभेद का कोई स्थान नहीं होना चाहिए तभी संबंधों का माधुर्य या कड़वापन भले न रहे मगर स्थायित्व भाव लिया हुआ होना चाहिए। आजकल चारों तरफ पसरते जा रहे स्वार्थों, ऎषणाओं और कुत्सित वासनाओं की पूत्रि्त के लिए आदमी के संबंधों का चरित्र ही बदल गया है। आदमी संबंधों का समय तथा घनत्व अपने कामों के होने या न होने में सामने वालों की भागीदारी के हिसाब से तय करने लगा है।

अब आदमी के मूल्यों या आदर्शों पर जीने, समाज के लिए सर्वस्व न्यौछावर की भावना अथवा जगत के कल्याण की बजाय आदमी के दोहन और शोषण की क्षमताओं तथा पॉवर पर निर्भर होता जा रहा है। जहाँ शहद के छत्ते बन जाते हैं आदमी उस दिशा में दौड़ लगाकर शहद को चाटना और छत्ते को अपना बनाने के फेर में लगा रहता है। यहाँ तक कि शहद नोच और सोंख लेने के बाद बचे रहने वाले मोम तक को वह कच्चा चबा जाने या मुँह में दबा कर छीन ले जाने को उतावला बना रहता है और मौका पाते ही लपक लेता है। आदमी की इन सभी प्रकार की हरकतों के बीच संबंध ऎसे हैं जिन्हें हमेशा अच्छे-बुरे या कम-ज्यादा होने की स्थितियों में रहना पड़ता है। चाहे कितने ही स्थायी भाव लिए हुए संबंध हों, उनमें कमी-वृद्धि होती रहती है। यह सब होना स्वाभाविक ही है। आम तौर पर लोगों को शिकायत रहती है के उन्होंने सौ काम किसी के लिए अच्छे किए होते हैं और किसी वजह से कोई एक काम नहीं कर पाते हैं तो लोग इसके लिए दोषी ठहरा देते हैं और संबंधों में कटुता पैदा कर देते हैं अथवा दूरियां बना लेते हैंं। दूसरी तरफ कोई सौ अपराध कर चुकने के बाद हमारा एकाध मनचाहा काम कर देता है तो हम उसके अपने हो जाते हैं और संबंध स्थापित कर लिया करते हैं।

जो लोग हमारे अपने हैं उनके द्वारा दिए जाने प्रेम और किए जाने वाले कार्यों को हम कभी नहीं स्वीकारते बल्कि इसे उनका फर्ज मान लेते हैं और ऎसे में एकाध काम नहीं हुआ तो हमारा पारा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। यह स्थिति किसी भी व्यक्ति के मूल्यांकन का आधार नहीं होनी चाहिए। यदि पाने या खोने के प्रतिशत में समानुपाती स्थिति हो तो कुछ सोचा जा सकता है लेकिन पाने का प्रतिशत खूब ज्यादा हो और खोने का नगण्य या कुछ प्रतिशत। फिर निष्काम संबंधों में तो लेन-देन या खोने-पाने की कोई बात होती ही नहीं, पर निष्काम संबंध बहुधा कम ही देखने को मिलते हैं। ऎसे में किसी अच्छे आदमी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। किसी व्यक्ति से संबंध इस आधार पर खट्टे नहीं करें कि वह उनका कोई सा काम नहीं कर पाया है बल्कि उसके प्रति कृतज्ञ रहें कि ज्यादातर काम उसके सहयोग से हो चुके हैं और हो सकता है कि उसकी अब कोई विवशता हो। संबंधों में यह स्वार्थ की पराकाष्ठा ही है कि हम आत्मीयता को भुलाकर किसी काम के होने या न होने को संबंधों की बुनियाद मान लें। यदि हमारा यही पैमाना जिन्दगी भर बना रहा तो मौत आने तक कोई हमारा अपना नहीं हो सकता, और न हम किन्हीं और के। हमारी पूरी जिन्दगी पेण्डुलम की तरह बनी रहती है अथवा हमारा मन घोड़ों की तरह भागता फिरता है या श्वानोें की तरह भ्रमण और बंदरों की तरह उछलकूद में ही दिन-रात रमा रहता है।  संबंधों को शाश्वत धरातल दें और कामों या स्वार्थों को त्यागकर अपने रिश्तों के भीतर समाये भावों को देखें, तभी संबंधों के मूल्य और महत्ता को हम पहचान सकते हैं।





---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

कोई टिप्पणी नहीं: