अपने देश में धर्म वो ब्रह्मास्त्र हो गया है जिसके सहारे कोई भी कुछ भी करने और कहने को स्वतंत्र है। यों तो धर्म का सीधा संबंध सदाचारपूर्वक जीवनयापन का आदर्श स्थापित करना ही है जहाँ मनुष्य धर्म जो अपना लेता है वही सच्चा धार्मिक होता है और वही ईश्वर का सान्निध्य एवं शाश्वत आनंद की प्राप्ति कर सकने में समर्थ होता है। यह धर्म ऎसा है जिसका पालन करने पर हमारी वजह से औरों को किसी भी प्रकार की पीड़ा या दुःख का अनुभव नहीं होता बल्कि प्रसन्नता का भाव पसरने लगता है। मगर आजकल धर्म के नाम पर जो कुछ हो रहा है उसके बारे में किसी को ज्यादा कुछ बताने या कहने की आवश्यकता नहीं है। धर्म के मूल मर्म से अनजान लोगों का जमावड़ा आजकल कुछ ज्यादा ही फैलता जा रहा है और उसी अनुपात में समस्याओं और बाधाओं का ज्वार भी हमारे सामने दिखाई देने लगा है। मन्दिरों, भिखारियों, बाबाओं, यज्ञ अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और दूसरे कई प्रकार के धंधों के नाम पर धर्म का जिस प्रकार दोहन हो रहा है उसमें पुण्य कमाने के लिए गौसेवा भी पिछले कुछ समय से जुड़ गई है। गौसेवा अपने आप में महानतम पुण्य भरा वह कार्य है जिसका प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होता है और इससे ईश्वर की प्रसन्नता को बहुगुणित अनुभव किया जा सकता है। गौसेवा का जो फल प्राप्त होता है वह अक्षय है तथा पीढ़ियों तक सुकून देने वाला है। लेकिन होनी चाहिए सच्ची गौसेवा।
गौसेवा के नाम पर गौशालाएं चला देना, दान पेटियां रखवा देना और गायों की सेवा के नाम पर अनुदान और संसाधनों को जमा कर डालना अलग बात है और वास्तविक तथा सच्ची गौसेवा को मन से अपनाना दूसरी बात। आजकल गौसेवा के नाम पर बहुत कुछ हो रहा है। कुछ अच्छा भी है और कुछ के बारे में कहना ठीक नहीं है। मगर इतना जरूर है कि किसी भी पैमाने पर सही, गायों के नाम पर कुछ तो हो ही रहा है। एक समय था जब गायोें को पालक का दर्जा प्राप्त था और गौदुग्ध पर पलकर पीढ़ियां निखरती रहती थीं वहीं आजकल हरेक शहर और कस्बे में गौवंश को आवारा कहा जाने लगा है। यह हमारे अधःपतन का सीधा संकेत है जिसमें मातृस्वरूपा गायों को आवारा अथवा लावारिश की संज्ञा दी जाने लगी है। यह उन सभी लोगों के मुँह पर करारा तमाचा है जो उस क्षेत्र में रहते हैं और धर्म के नाम पर कुछ न कुछ नौटंकियां करते रहते हैं। जिन इलाको में गौवंश को आवारा या लावारिश कहा जाने लगता है वहाँ किसी साधु-संत, संन्यासी, मठों के महंतों, महामण्डलेश्वरों, बाबाओं, धार्मिक संस्थाओं के ठेकेदारों से लेकर पण्डितों और सनातनियों या जीवदया के नाम पर आडम्बर करने वालों, धर्म के नाम पर धंधे चलाने वालों, संस्थाओें का संचालन करने वालों और गौशालाएं चलाने वालों को जितना पाप लगता है उसकी भरपाई कई जन्मों में नहीं हो सकती। ऎसे लोगों को धर्म के नाम पर कुछ कहने अथवा मन्दिरों में घण्टे-घड़ियाल बजाने का कोई अधिकार नहीं है। जो लोग गौसेवा से दूर भागते हैं, जिनके इलाके में गौवंश को प्रताड़ित किया जाता है, लावारिश और आवारा की संज्ञा दी जाती है उस इलाके की कभी प्रगति नहीं हो सकती, शांति, खुशहाली और अमन-चैन तो दूर की बात है।
गौपालन को व्यवसाय मानने वालों से लेकर गौपालकों, डेयरी संचालकों और गौपालन तथा सेवा से जुड़े सभी लोगोें को चाहिए कि वे गौवंश के सम्मान की रक्षा करें तथा उन्हें समुचित महत्त्व दें तभी उनका दूध हमारी सेहत के लिए लाभकारी हो सकेगा अन्यथा सिर्फ पानी का ही काम करेगा। हर क्षेत्र मेंं सामूहिक रूप से सार्वजनिक गौशाला का संचालन किया जाना आज की प्राथमिक आवश्यकता हो गया है ताकि शहर या कस्बे भर का गौवंश बस्तियों से दूर प्रकृति के बगीच रहकर सम्मानपूर्वक निर्भय होकर जीवनयापन कर सके। कई लोग ऎसे होते हैं जो गौशालाओं के नाम पर जमीन तो पा लेते हैं मगर इसका गौपालन के लिए उपयोग करने को हीन समझते हैं। गायों के नाम पर जमीन के सौदे करने वालों को जिन्दगी भर सुकून की कामना कभी नहीं करनी चाहिए। कई लोग ऎसे हैं जो कस्बों और शहरों में गौसेवा के नाम पर पुण्य कमाने, अपने अनिष्टों की शांति तथा ग्रह बाधाओं के निवारण से लेकर मनोकामनाओं की पूत्रि्त के लिए घनी बस्तियों में मुख्य मार्गों पर हरा या सूखा चारा डाल देने, गुड़, रोटी तथा अन्य प्रकार की खाद्य सामग्री खिलाने में रमे रहते हैं।
कुछ दुकानदार भी इसमें पीछे नहीं हैं जो गुड़ खिलाने के नाम पर घनी बस्तियों और भरे बाजारों में गाय-बैलों का जमावड़ा करते हुए अपने धर्मात्मा और पुण्यात्मा होने का दिखावा करते हैं। गौसेवा के नाम पर पुण्य कमाने वाले इन लोगों की वजह से राहगीरों, वाहनधारियों और बाहर से आने वाले सैलानियों को कई प्रकार के बुरे अनुभवों के दौर से गुजरना पड़ता है और ये लोग इन आडम्बरी गौसेवियों को इतनी गालियां बकते हुए नज़र आते हैं जो इनके पुण्य की कमाई से कई गुना ज्यादा भारी होती हैं, बद दुआएं लगती हैं सो अलग। कई बार गुड़-चारा खिलाकर धर्म करने और गौसेवा का दिखावा कर पुण्य कमाने वाले पोंगापंथी, धर्मभीरू और नासमझ लोगों की वजह से लोक जीवन में व्यवधान होने के साथ ही मनुष्यों की जान पर बन आती है। ये पशु लोगों को सिंग मारकर घायल कर देते हैं अथवा अधमरा कर देते हैं। कई बार इन तथाकथित गौसेवियों की करतूतों ने कई लोगों को अस्पताल की राह दिखा दी है और कई लोग जिन्दगी भर इन मूर्ख गौसेवियों की वजह से शारीरिक अक्षमता का दंश भुगतने को विवश हो जाते हैं। पशुओं को खिलाकर पुण्य कमाते-कमाते ये लोग खुद इतने पशुबुद्धि हो जाते हैं कि उन्हें सिर्फ अपने पुण्य से सरोकार रहता है, दूसरों को होने वाली प्राणघातक हानि से नहीें।
हम जहाँ कहीं रहते हों, धंधा करते हों, वहाँ गौसेवा शौक से करें, खूब पुण्य कमा कर स्वर्ग तक के लिए सीढ़ी का प्रबंध कर लें मगर हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि हमारी पशुता की वजह से मनुष्यों पर किसी प्रकार का खतरा न मण्डराए, तभी हमारा धर्मात्मा और पुण्यात्मा होना सार्थक है.... वरना आज हम पशुओं को खिलाकर पुण्य पाने का जतन कर रहे हैं, आने वाले जन्म में हमें इन्हीं पशुओं के साथ रहकर खाने का मौका मिलता रहेगा ...।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

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