बच्चे देश का भविष्य होते हैं उनके बचपन को यूं अबोध काल में विवाह करके मत जाया कीजिए जी हां बाल विवाह कानूनन अपराध है और जो कोई भी इसे करता है या किसी भी प्रकार से करवाने में मदद करता है उसके लिए सजा का प्रावधान है आज अक्षय तृतीया है जिसे अबूझ सावों का दिन भी कहा जाता है इस दिन कई बालिकाएं और बालक जो विवाह के अर्थ से भी महरूम है उनका विवाह करवा दिया जाता है भारत सरकार ने विवाह की उम्र निर्धारित कर रखी है जिसके तहत लड़की का 18 वर्ष का होना जरूरी है तथा लड़के की आयु 21 वर्ष हो तभी वे विवाह योग्य माने जाते हैं इससे कम आयु में इनका जानबूझ कर भी यदि विवाह किया जाता है तो वह बाल-विवाह की श्रेणी में आता है बाल विवाह एक सामाजिक समस्या है यह गृह क्लेश अपराध और रिश्तों में कटुता फैलाने की कुप्रथा है आइए अब जानते हैं कि कहां और क्यों होते हैं बाल विवाह,
मुख्यतः अशिक्षा के कारण और कुछेक जातीय परम्पराएं विशेष कर घुमंतु जातियों में सामाजिक असुरक्षा के चलते बाल विवाह करवाये जाते हैं, यहां तक कि कुछ जातियों में यह परम्परा है कि जब किसी बुजुर्ग व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उसके बाहरवें दिन घर में सभी अविवाहित कन्याओं का विवाह करवा दिया जाता है कुछ जातियां घुमक्कड़ प्रवृति की होती है इनमें अशिक्षा तो होती ही है क्योंकि ये रोजगार की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान भटकते रहते हैं और स्थायी आवास और सुरक्षा की कमी के चलते इनमें बाल विवाह सर्वाधिक प्रचलित रहते हैं। अशिक्षा के कारण लड़की को ऐसे समाज में बोझ समझा जाता है और जितना जल्दी हो सके उसका विवाह करके बोझ से निजात पाना इनकी परंपरा रही है । अबूझ सावे का फायदा उठाकर इस दिन बाल-विवाह होने की संभावना ज्यादा रहती हैं, तो भाइयों और बहिनों क्योंकि हम शिक्षित और जिम्मेदार नागरिक है अतः यह हमारा कर्तव्य बनता है कि हमारें आस-पास कोई भी बाल-विवाह जैसी घटना हो रही है तो उसे रोकने का प्रयास करें। आइये अब जानते हैं क्या दुष्परिणाम होते हैं बाल-विवाह सेः
बाल-विवाह से अपरिपक्व बालिकाओं में स्वास्थ्य बिगड़ने का खतरा हमेशा ही बना रहता है, अकेले भारत में बच्चों को जन्म देते समय ऐसी महिलाओं की मौत का ग्राफ सर्वाधिक है छोटी उम्र में मां बनने पर या तो मां को खतरा होता है या फिर बच्चे में शारीरिक अथवा मानसिक असक्षमता पाई जाती हैं खेलने - कूदने की उम्र में विवाह होने पर बचपन से वंचित रह जाने वाले बालक-बालिकाएं शिक्षा से भी वंचित रह जाते हैं और इस प्रकार समझ की कमी होने के कारण कम उम्र्र में ही वे माता-पिता बन जाते हैं और इस प्रकार जनसंख्या वृद्धि का भी कारण बनते हैं बाल-विवाह के कारण गृह क्लेश भी होता है छोटी उम्र में गृहस्थी की जिम्मेदारी के कारण और रोजगार नहीं मिलने से गृह क्लेश बढ़ता है कई बार यह देखा गया है कि बाल-विवाह के कारण महिलाओं के लिए स्थितियां नारकीय बन जाती हैं । छोटी उम्र में बाल-विवाह होने के बाद जब बच्चे बड़े होते हैं तो अपने जीवन साथी के सपने जो उन्होंने संजो कर रखे थे मसलन लड़का यह सोचता है कि उसकी विवाहिता पढ़ी -लिखी हो और जब वे बड़े होते हैं उनकी समझ बलवती होती है और उन्हें इस मर्म से महरूम होना पड़ता है कि उनका बचपन में विवाह करवा दिया गया था तो स्थितियों में समझौते करने पड़ते हैं ये समझौते या तो लड़के को करने होते हैं या फिर लड़की को और विवाह एक पवित्र बंधन नहीं बल्कि मजबूरी बनकर रह जाता है फिर अपराध और घरेलु हिंसा बढ़ती है परिणाम स्वरूप आज हजारों महिलाएं परित्यक्तताओं का जीवन यापन करने को मजबूर हैं ग्रामीण अंचलों में विशेषकर पिछड़े इलाको में यह सोचकर कि अब तो बेटी ब्याह दी गई है अब इसे पढ़ाकर क्या करेंगे जिससे कई महिलाएं अशिक्षित ही रह जाती है और पुरूष अच्छे ओहदों पर कार्यरत होने पर ऐसी अशिक्षित महिलाओं से अपने साथ हुए बाल-विवाह को अस्वीकार कर देते हैं या फिर साथ रहते हुए भी महिलाओं से असम्मानजनक व्यवहार करते हैं, मसलन उन्हें साथ लाने ले जाने में भी ऐसे पुरूषों को हीनता महसूस होती है और सामाजिक मानहानि का एहसास होता है। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि बाल विवाह महिलाओं पर अत्याचार हैं बल्कि यह तो महिलाआंे पर घटित होने वाले अपराधों की श्रेणी में सबसे पहले आना चाहिए, और बाल-विवाह एक ऐसी सामाजिक कुरीति है जो महिला अपराधों को और बढ़ावा देने वाली है जिससे हमारे देश की महिलाएं पिछड़ रही हैं भाइयो और बहिनों बाल-विवाह से निपटने के लिए हमें मिलकर जन-जागृति लानी होगी। अपने आस-पास हो रहे किसी भी प्रकार के बाल - विवाह को आपसी समझ करके रूकवाना होगा अन्यथा प्रशासन के साथ मिलकर कानून का सहारा लेना होगा।
बाल-विवाह रोक अधिनियम 1929 जिसे शारदा एक्ट के नाम से भी जाना जाता है जिसका श्रेय राय साहब हरबिलास शारदा को जाता है जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के समक्ष प्रतिवेदन रखकर कानूनी जामा पहनाया जिसके तहत 28 सितंबर 1929 को पास हुए कानून में लड़की के विवाह की आयु को 14 वर्ष निर्धारित कर दिया गया। यह ब्रिटिश साम्राज्य का पहला ऐसा सामाजिक कुप्रथा मिटाने वाला कानून था, समय के साथ साथ लड़के -लड़की की आयु में शारदा एक्ट में बदलाव करके लड़के की आयु 21 और लड़की की आयु 18 वर्ष निर्धारित कर दी गई है। इस एक्ट के तहत बाल-विवाह करवाने और उसमें किसी भी प्रकार के सहयोगी बनने वाले के लिए सजा का प्रावधान है फिर भी विडंबना है कि आज भी कई पिछड़े इलाकों में चोरी-छुपे ऐसे विवाह चलते आ रहे हैं प्रशासन मुस्तैद रहकर और अक्षय तृतीया से पूर्व ही जन-जागृति फैलाकर इसे रूकवाने के प्रयास करता रहता है लेकिन फिर भी अशिक्षित लोग जाने क्यों कानून के खिलाफ जाकर इसे अपनी झूठी शान समझते हैं ।
समाज के कर्णधारों को एक ऐसा सामाजिक परिवेश तैयार करना होगा जिसमें बाल विवाह के दुष्परिणामों के प्रति सभी जन को जागृत करना होगा, तथा इसे रोकने में प्रशासन की मदद करनी होगी, ये जरूर है कि कई स्वयं सेवी संस्थाएं इस ओर प्रशासन की मदद कर रही हैं लेकिन बिना जनसहयोग के ऐसे अपराधों को रोकने में कामयाबी हासिल नहीं की जा सकती है। प्रशासन को भी चाहिए कि वो मुष्तैदी से नजर रखे और शिकायत पर तुरंत कार्यवाही करे, और शारदा एक्ट को लागू करने के प्रति प्रतिबद्धता दर्शाए अधिक से अधिक महिला शिक्षा पर बल दिया जाकर इस सामाजिक कुप्रथा से बचा जा सकता है क्यांेकि महिलाएं शिक्षित होंगी तो समाज खुद - ब - खुद शिक्षित हो जायेगा और एक स्वस्थ समाज कहलायेगा।
आनन्द हर्ष
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