यथास्थितिवादी होना अपने आप में मृत्यु का पर्याय है। जबकि प्रगतिशील बने रहना आदमी के विकास का प्रतीक है। इसलिए जीवन को यदि चरम आनंद, शाश्वत शांति और आत्मतुष्टि के साथ गुजारना चाहें तो जिन्दगी भर कुछ न कुछ ऎसा करते रहें जो प्रगतिशील और उपयोगी होने की श्रेणी में आता है और इसका अपने जीवन से लेकर समाज और देश के लिए कुछ न कुछ उपयोग हो। अधिकतर लोगों का लक्ष्य जीवन निर्वाह के संसाधनों की प्राप्ति तक सीमित होता है जबकि कुछ लोग ऎसे होते हैं जिनके जीवन का लक्ष्य हर समय कुछ न कुछ जमा करने के चिंतन से प्रभावित होता है। इस किस्म के लोगों में दो प्रकार की मनोवृत्ति वाले लोग होते हैं। एक वे हैं जो सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं और वे ही काम करते हैं जिनसे उनके स्वार्थ और लोभ पूरे होते हैं। इस श्रेणी के लोग भौतिक सम्पन्नता को ही जीवन का सर्वस्व मानते हैं और इसके लिए ये अपनी मानवता, संस्कार और नैतिकता की बलि तक चढ़ा देने में पीछे नहीं रहते, आदर्शों की बात इनके लिए करना तो बेमानी ही है।
समाज और देश में बहुत कम संख्या में लोग ऎसे होते हैं जो समाज के लिए सोचते हैं और हमेशा समाज और देश का चिंतन करते हैं। ऎसे लोग भौतिक दृष्टि से खुद भले ही विपन्न हों मगर आदर्शों, नैतिक मूल्यों और दायित्वों के लिहाज से दूसरे सभी प्रकार के मनुष्यों के मुकाबले सर्वाधिक धनी और आत्मसंतुष्ट होते हैं। ऎसे लोगों के लिए सेवा और परोपकार के साथ सामाजिक विकास और राष्ट्रीय एकता, अखण्डता एवं सम्पन्नता सर्वोपरि होती है। इस प्रकार के लोगों का हर कर्म जमाने भर में महक फैलाता है और दूसरे लोगों को भी प्रेरित करने की अपार क्षमताओं से भरा होता है। अपने स्वार्थों और ऎषणाओं में पालतुओं की तरह जाने कितने-कितने बाड़ों में अपने आकाओं के तलवे चाटने वाले और परिक्रमा करने वाले लोग भले ही इन लोगों को कोई महत्त्व न दें, मगर हृदय में तो इनका अस्तित्व स्वीकार करते ही हैं। मनुष्य के रूप में विधाता ने सृष्टि को वो नायाब तोहफा दिया है जो ईश्वर के कार्यों को पूर्ण करने का सामथ्र्य प्राप्त कर सकता है लेकिन अधिकांश मनुष्यों की हालत ये है कि वे अपनी क्षमताओं और सामथ्र्य से बेखबर हैं या कि उनकी छोटी-छोटी मन्नतों और स्वार्थपूर्ण कामों ने उन्हें मनुष्यत्व की विराट ऊर्जाओं से विस्मृत कर दिया है।
इस किस्म के अधिकांश लोग एक समय बाद यथास्थितिवादी हो जाते हैं और इनके जीवन में ठहराव आ जाता है। इनमें बहुतेरे अज्ञानियों और संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों के दिमाग में यह कीड़ा घर कर जाता है कि ये सर्वज्ञ और सर्वगुण सम्पन्न हो गए हैं तथा अब उन्हें कुछ सीखना शेष नहीं रह गया है। इस किस्म के लोगों को जब भी कुछ नया सीखने या करने की कोई नसीहत देता है ये लोग छूटते ही कह देंगे कि हमने 20-25 साल निकाल दिए हैं, कितने ही बोस निकाल दिए हैं, इतना लम्बा तजुर्बा है। इन मूर्खों को कौन समझाए कि ये वहीं के वहीं ठहरे हुए हैं और उनकी स्थिति नदी के तट पर मजबूत रस्सी से बंधी नाव से ज्यादा हैसियत नहीं रखती। एक समय के बाद परिपूर्णता के भ्रम में जीने वाले ये लोग कुछ कर पाने की स्थिति से दूर भागते हैं और जमाने से पिछड़ने लगते हैंं। अधिकांश लोगों की यह स्थिति इस बात का संकेत है कि इनकी जीवनयात्रा का वह नाजुक क्षण शुरू हो चुका है जो मृत्यु की प्रतीक्षा के मार्ग की ओर जाता है। अपने कर्मयोग और जीवनयात्रा में हमेशा नित नूतन चिंतन और नवीन कर्मयोग को अपनाने के लिए व्यक्ति को सदैव उद्यत रहना चाहिए। जो लोग अपने आपको कुछ बनाना चाहते हैं उन्हें चाहिए कि वे जिस क्षेत्र में हों, जो उनकी मौलिक प्रतिभाएं हैं,वे फालतू काम छोड़कर, सारे विषयों में महारत हासिल करने के पागलपन को त्यागें और उस दिशा में अपनी ताकत ज्यादा लगाएं जिसमें उनकी मौलिक रुचि अथवा विशेषज्ञता है। मौलिकता अथवा ज्ञान या हुनर विशेष में निरन्तर अभ्यास और एकाग्रता के साथ कर्मयोग को साकार करते हुए क्षेत्र विशेष या हुनर विशेष में चरम स्तर की दक्षता पाने के लिए निरन्तर लगे रहें और अपने व्यक्तित्व को उस स्तर तक पहुंचाएं जहाँ उनकी दक्षताओं का कोई मुकाबला न हो।
हर व्यक्ति को यह प्रयास करना चाहिए कि अपने कर्मयोग को इतनी ऊँचाइयों तक ले जाए कि उसे उस क्षेत्र विशेष में सर्वोच्च स्तर पर पूरे आदर और सम्मान के साथ स्वीकारा जाए। किसी भी व्यक्ति के लिए यह जीवन का वो शिखर है जो दूर-दूर तक कीर्तिपताका लहराता दिखता है। यह व्यक्तित्व की पूर्णता का वह हिस्सा है जो चरम आत्मतुष्टि और महाआनंद की भावभूमि प्रदान करता है। जो लोग जहाँ कहीं काम कर रहे हैं उन्हें कामचलाऊ नहीं होना चाहिए। क्याेंकि कामचलाऊ लोगों को हमेशा किसी न किसी प्रकार की बैसाखियों की तलाश हमेशा बनी रहती है और ऎसे लोगों पर उनका स्वयं का आत्मानुशासन नहीं चलता बल्कि ये लोग बैसाखियों के भरोसे जीते और अधमरे रहते हैं। कामचलाऊ लोगों की भारी भीड़ हमारे चारों तरफ है। यह हमें तय करना है कि भीड़ का हिस्सा बनें या भीड़ से परे रहकर अपने शुभ्र व्यक्तित्व को सफलताओं के शिखरों का स्पर्श कराएं।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

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