प्रकृति से भय स्वरूप ही प्रीत करे......................तो विनाश से बचा जा सकता है।
भय बिन होत न प्रीत अर्थात् जिससे भय होता है उसी से प्रीती भी होती है। एक कुत्त्ता अपने मालिक से प्रीत करता है उसका हर कहा मानता है, अखबार लेकर आता है उठने को कहते हैं उठ जाता है! बैठने को कहो तो बैठ जाता है ! काम पर कर्मचारी समय पर पंहुच जाता है, अपने बाॅस का हर कहा भी मानता है, आॅवरटाइम करता है , कई बार घर के काम भी कर देता है वो भी प्रीती ही प्रतीत होती है। इस कहावत के अनुसार !
अन्य अर्थों में हम उन्हें बाॅस का चमचा या पिट्ठू कह देते हैं इन दोनों प्रकार के उदाहरणों में प्रीत कहीं भी नीहित नहीं है केवल एक डर एक जरूरत, एक मजबूरी छुपी है, एक आकांक्षा का भाव नीहित है, किसी से कुछ पाने का मोह है। क्योंकि कुत्ते को पता है अगर वह अखबार नहीं लेकर आयेगा तो मालिक मुझे मारेगा, यह उसकी प्रीत नहीं डर है कर्मचारी भी यदि अपने बाॅस से प्रीत करता तो वह बिना सेलेरी के काम करता चूंकि जहां प्रेम है वहां निःस्वार्थ भाव स्वतः निहीत होता है सेवा में जब आप होते हैं तो सिर्फ देते हैं कुछ बदले में पाने की ईच्छा “इन्वेस्टमेंट“ अथवा निवेश कहलायेगा।
गौपालक गाय को चारा दलिया देता है वह उसकी सेवा नहीं है वह उससे दूध प्राप्त करने वश ये सब कर रहा है, मन में आप यदि किसी से कुछ पाने की ईच्छा लाये बिना मदद का हाथ बढ़ाते हैं तो वह सेवा है, इम्तिहान में पास होना हो, बेटे की अच्छी नौकरी , मकान बनवाना हो हम भगवान को याद करते नहीं थकते सोच यह रहती है कि कोई कष्ट या तकलीफ जीवन में नहीं आये इसिलिये हम अपने इश्वर से प्रीत का दावा करते हैं वो प्रीत नहीं हैं डर है प्रीत मीराबाई की थी जिसने विष का प्याला पीकर भी अपनी श्याम मनोहर की आस नहीं छोड़ी, प्रीत सबरी की थी जिसने प्रभु श्रीराम को अपने झूठे फल खिलाये, इसलिए कि कोई कड़वा फल उन्हें नहीं चखना पड़े, प्रीत उस खेवनहार की थी जिसने प्रभु श्रीराम के वनवास के समय उन्हें नाव में बिठाने से पूर्व उनके कमलपद धोने की जिद की, प्रीत सुदामा की थी, हम और आप चूंकि सांस्सारिक मोह में फंसे हें इसलिए मीराबाई नहीं बन सकते छोडिये!
तो प्रीत और भय का सूक्ष्म विष्लेषण मैंने आपके समक्ष रखा अब भय बिन होत न प्रीत हर बार अलग अर्थों में प्रयुक्त होगा। भगवान और सभी धर्म तथा मतों के मानने वाले चाहें सेवा, प्रेम अथवा भयवष ही ईष्वर की पूजा अर्चना करते रहें लेकिन प्रकृति को भी भगवान के समान सर्वषक्तिमान समझें उसकी पूजा करें। यहां भय का होना आवष्यक जान पड़ता है नहीं तो विनाष संभव है।
प्रकृति मां स्वरूपा है जल वायु और मिट्टी के सभी तत्वों से मिलकर ममतामयी मां के रूप में वह हमारा पोषण करती है, उसके लिए सभी जीव उसके अपने बच्चे है वह हमारा विनाष कभी नहीं कर सकती लेकिन प्रकृति में संतुलन से कार्य निष्पादित होता है जहां संतुलन बिगड़ता है ट्रेन पटरी से उतर जाती है प्रकृति संतुलन बिगड़ने पर चेतावनी देती है जिसको भांप कर इंसान नहीं संभलता और फिर महाविनाषक तूफान और अकाल तथा बाढ़ एवं अतिवृष्टि जैसे हालात बन जाते हैं कहीं भूस्खलन कहीं भूकम्प आते हैं ये सब प्रकृति के प्रकोप हैं इनसे हमें डरने की जरूरत हैं । चीन में पिछले वर्ष जब मानव ने प्रकृति के मूल स्वरूप से खिलवाड़ करने की सोची तो बात आसमान से गिरा खजूर में अटका वाली कहावत सिद्ध हो गई चीन के एक प्रांत में जो काफी समय से भीषण अकाल की चपेट में था वहां प्राकृतिक वर्षा करवाने के लिए राॅकेट छोड़े गये लेकिन वर्षा होने के बजाय बादल फट गये और भारी बर्फबारी से जीवन का संकट और बढ़ गया।
हमने प्रकृति को मां स्वरूपा नहीं माना हमने उसकी पूजा नहीं की वो देती गई हम लेते गये और जरूरत से ज्यादा ही लेते गये कभी सोचा नहीं की क्या होगा जब प्रकृति की गोद खाली हो जायेगी हमने प्रकृति को दुधारू गाय समझा हम उसे दुहते गये बिना इस डर के कि जब दूध खत्म हो जायेगा तब क्या होगा हमें तब ज्ञात हुआ जब गाय ने दुलत्ती मारी हमारी चिरनिद्रा तब जाकर खुली। अतीव खनन प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन उसके मूल स्वरूप को बिगाड़ने वाला साबित हुआ यही विघटन का मुख्य कारण बना, असंतुलन की स्थितियां पैदा हुई जल निकासी के मार्गाें में अतिक्रमण कर हमने घर बना लिए तो बाढ़ आई, शहर का दायरा जंगल तक फैल गया जंगली पषु हमला करने लगे, जमीन का सीना चीर के हमने तेल और पेट्रोकेमिकल निकाले कोयला पत्थर निकाले समुद्री पानी और हवा तथा पाॅलिथीन से मृदा को दूषित किया, हमने पानी और भूमि में परमाणु परीक्षण किये जिसके दूरगामी परिणाम हमने नहीं सोचे, ये असंतुलन ही विनाष का कारण बन रहा है इसलिए प्रकृति से भय स्वरूप ही प्रीत करें तो विनाष से बचा जा सकता है।
आनन्द हर्ष
815,बल्ल्भ कुंज नानक मार्ग गांधी काॅलोनी,
जैसलमेर,(राज.)
पिन - 345001

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें