राजनेता जो कभी सोशल नहीं रहे... - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

राजनेता जो कभी सोशल नहीं रहे...

  • कमाल की बात ये है कि सोशल मीडिया ने उन्हें भी सोशल बना डाला है, जिनका दूर-दूर से सामाजिकता से कोई सरोकार नहीं रहा। दशहरे का त्योंहार सामने है, सड़क के किनारे वे कारीगर देखे हैं आपने? जो बांस से कई फीट लंबा-चैड़ा रावण बना डालते हैं, फिर दशहरे के दिन उसे फूंक डाला जाता है। ये चुनाव भी ऐसे रावणों का दशहरा साबित होने वाले हैं।’’


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चुनावी दौर है। आचार संहिता लाचार है। धारा 144 का गारा हो चुका है। आचार संहिता लगती है तो कोई नेता अपने पक्ष में सभा या रैलियां नहीं कर सकता, पोस्टर नहीं चस्पा कर सकता, बैनर नहीं लगा सकता, चार लोगों को इक्ट्ठा कर अपना दुखड़ा या सुखड़ा नहीं रो सकता। अपनी कोई भी मन की बात लोगों को इक्ट्ठा कर नहीं कह सकता। वोट मांगने की बात अलग है। धारा 144 भी इन्हें यह करने से रोकने के लिए लगाई जाती है। 

चलिए। कोई नहीं। पढ़े लिखे और कंप्यूटर फ्रेंडली कंडीडेट न धारा 144 से डरते हैं ना आचार संहिता से। धारा का वे चूरमा बनाकर संहिता के अचार के साथ खा जाते हैं। क्योंकि उन्होंने अपनी वेबसाईटें बना डाली हैं, फेसबुक पेज बना डाले हैं और ट्वीटर पर टीं टीं करने के लिए आईटी बंदे बैठा दिए हैं। 

अब राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष वसुंधरा राजे को ही लीजिए। एक नजर उनके फेसबुक पेज पर डालें। वे हर तीसरे घंटे केले के छिलके की तरह गहलोत सरकार की परतें उतारने पर तुली हुई हैं। इस बीच वे मुख्यमंत्री कंडीडेट की तरह बाकायदा हर वोटर को पटाने के लिए तीर पर तीर छोड़़ रही हैं। अषोक गहलोत हों या वसुंधरा राजे। मेरी समझ में एक बात नहीं आती। इन सीएम और सीएम कंडीडेट्स की नींद चुनाव के मुहाने पर जाकर ही क्यों टूटती है। चार साल तक तो ये मि. इंडिया के अनिल कपूर बने रहते हैं। फिर चुनाव आते ही शाहरुख खान बनकर कहते हैं-’ऐ....मैं हूं ना।’

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कमाल है भाई। अब वसु मैडम को यह गलतफहमी हो गई है कि जनता उनके 2003 से 2008 तक चले सुराज को भूल चुकी है। जनता को गजनी समझकर एक बार फिर वे फेसबुक पर वे मुद्दे उठा रही हैं जिनपर सरकार में रहते हुए वे खुद कई बार घिरी। एक विज्ञापन आपने देखा होगा। ’’दाग अच्छे हैं।’’ लेकिन राजनीति में अपने नहीं, सिर्फ दूसरों के दाग अच्छे हैं ताकि उन्हें जनता को दिखा दिखा कर अपने पक्ष में स्वच्छ हवा बहाई जा सके। उनके फेसबुक पेज के आधार पर उनसे कुछ सवाल जरूर पूछे जाने चाहिएं-

-महारानी साहेबा ने फेसबुक पर कहा है कि सरकार घोषणाओं में हीरो है और उपलब्धियों में जीरो है। साढे चार साल तक सरकार सोयी रही और अब उठकर घोषणा दर घोषणा कर रही है। मैडम, कोई आपसे पूछे आप क्या कर रहीं हैं? आप क्यों फेसबुक पर लोगों को आपका वही 2003 से 2008 तक का शासन याद दिला रही हैं जिसे भोगकर जनता ने आपको बाइज्जत कुर्सी से उतार दिया था। आप क्यों कह रही हैं कि हमने गरीब को कुटीर ज्योति दी, बिजली दी, कच्ची बस्तियों के टैरिफ माफ किए, जनजातियों को पक्के आवास दिए, पत्रकारों का बस किराया माफ किया, संस्कृत पढाई। सरकार अगर साढ़े चार साल सोयी रही तो जगाने के आप कहां थी? आप भी सरकार के ही आस-पास कहीं चटाई बिछाकर सो रही थीं?

-आपने फेसबुक पर कुछ अखबारों की खबरों को भी अस्त्र की तरह फेंक डाला है। षिक्षक भर्ती का मानते हैं कि घनष्याम तिवाड़ी ने आरपीएससी से लाख से ज्यादा भर्ती कर अच्छा काम किया, इसका के्रडिट उन्हें जाता है पर आवासन मंडल में भ्रष्टाचार की खबर को आप औजार कैसे बना सकती हैं, प्रदेष पर भारी कर्ज का मुद्दा आप किस मुंह से उठा रही हैं? 
क्या आप भूल गई कि सेज मामले में भूमि अधिग्रहण कर बिल्डरों को बेचने के मामले में आप पर कितने आरोप लगे थे? आप भूल गई कि आपके राज में ये ही दोनो बड़े हथियार भू-माफियाओं से आपकी मिलीभगत की सुर्खियों से भरे रहते थे। आपने भी तो राज्य को कर्ज में डुबोकर लंदन में कोठी खरीदी थी। 

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-आप अपने फेसबुक पेज पर हर चैथी पांचवी पोस्ट में स्वयं का उदाहरण देकर नारियों को आगे बढ़ने संघर्ष करने की सीख देती नजर आ रही हैं। आप किस मुंह से उन्हें यह सीख दे रही हैं। बाबूलाल नागर के मामले में आपने सरकार से यह कहकर इस्तीफा मांगा कि ’’नैतिकता के आधार पर सरकार को इस्तीफा दे देना चाहिए।’’ इसके जवाब में सरकार ने आप पर एक बड़ा भारी कटाक्ष किया था कि ’’नैतिकता का और आपका कोई संबंध नहीं है।’’ सरकार के उस कटाक्ष का क्या जवाब दिया आपने? शायद आपके पास जवाब नहीं था। क्योंकि नैतिकता को लेकर आप खुद घेरे में थी। आप पर कभी सरेआम शराबपार्टी करने के आरोप लगाते हुए कहा गया कि ’’8 पीएम, नो सीएम’’, कभी आप अपनी महिला मित्र के साथ सरेआम लिपलाॅक करते हुए देखी गई, क्या राजस्थान जैसे राज्य की मुख्यमंत्री यह सब करते हुए लज्जित नहीं हुई? आप नारियों को शराब का सेवन करने और परस्पर लिपलाॅक करने की प्रेरणा देंगी? 

-आपने अजमेर में भाजपा अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के माध्यम से सुराज सद्भावना सम्मेलन किया। वहां आपने 786 मुस्लिमों को भाजपा से जोड़ा और कहा कि कांग्रेस तो मुस्लिमों को गरीब बनाए रखना चाहती है, पिछड़ा बनाए रखना चाहती है, उनका शोषण करती है। उनके तुष्टिकरण के लिए काम करती है। आपने किस मकसद से मुस्लिमों को भाजपा में आने का न्यौता दिया है। क्या कभी आपने मुस्लिमों के हक के लिए कोई धरना प्रदर्षन किया है। क्या उनके जीवन, रहन-सहन और सामाजिक सुरक्षा के लिए आपने कोई बड़ा कदम उठाया? क्या आपने उनका यह भय दूर करना चाहा कि आपको अतिवादी हिन्दू संगठनों से कोई डर नहीं है। क्या आपने आपके समर्थक संघ या विहिप से यह समझौता कर लिया कि वे मुस्लिमों के लिए मनसा, वाचा, कर्मणा न बुरा सोचेंगे न बुरा करेंगे। 

-आप अपनी फेसबुक आईडी पर लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने का ऐलान करती हैं, सबको एक साथ लेकर राजस्थान के विकास की बात करती हैं, सुराज की बात करती हैं, पिछडों को साथ साथ लेने की बात करती हैं, लेकिन क्या आप उन दर्दनाक हादसों को भूल गई जो आपके राज में घटित हुए? आपने राजस्थान की एक महत्वपूर्ण पिछड़ी जाति गुर्जर समाज द्वारा अपने अधिकारों की मांग किए जाने पर उन्हें गोलियों से भुनवा दिया। क्या बातचीत का कोई रास्ता नहीं निकाला जा सकता था? क्या 70 लोगों की जान लेकर आपको अपने दिल पर कोई बोझ महसूस नहीं होता?

-आपको चित्तौड़ से निम्बाहेड़ा तक के गड्ढे तो दिखाई देते हैं लेकिन आपके अपने दल में हो रही खींचातान और नाराजगी दिखाई नहीं देती। क्या ये सच नहीं है कि आपकी गलत नीतियों के कारण आपके ही दल के वरिष्ठ नेता आपके विरोध में आ गए हैं। आप जब उनपर एक उंगली उठाती हैं तो बाकी तीन उंगलियां आपकी ही ओर होती हैं। 
आपको इस समय हर वर्ग, हर समाज, हर क्षेत्र दिखाई-सुनाई दे रहा है और महसूस हो रहा है। क्योंकि चुनाव नजदीक है और इसे भुनाना आपका कर्तव्य है। क्योंकि सत्ता में आना ही किसी दल की प्राथमिक जरूरत होती है। इस वक्त आप नारियों को चेता रही हैं, युवाओं के आर्थिक संरक्षण की बात कर रही हैं, सेना को रक्षा दिवस की बधाई दे रही हैं, हाईक्लास के लिए ’’आई बिलीव एप्लीकेषन’’ लांच कर रही हैं, अखबारों की वाहवाही कर रही हैं, अग्रसेनजी की आरती उतार रही हैं और 786 मुस्लिम एकत्र कर रही हैं। आप वह सब कुछ कर रही हैं जो आपको सत्ता में आने के लिए करना चाहिए। 

एक दोहा आपने सुना होगा-

’’सुख में सुमिरन सब करें, दुख में करे न कोय
 जो सुख में सुमिरन करे तो, दुख काहे को होय’’

आप भी प्रदेष से पूरे चार साल गायब रही। अब चुनाव के समय आपको जनता भी याद आ रही है और भगवान भी। पुष्कर के ग्वालियर घाट की याद भी आपको चुनाव से ठीक पहले ही आती है। आपने ईष्वर को भी वोटर समझ लिया। सत्ता का लालच ऐसा ही है। यहां सिर्फ समीकरण, जोड-बाकी, गुणा-भाग और सूत्र का गणित ही चलता है, विष्वास और जनप्रेम का नहीं। जितने ’’सोषल’’ आप ’’सोषल मीडिया’’ पर नजर आते हैं, उतने सोषल आप होते भी तो वाकई जनता में आपकी पूछ होती और आपको अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए किसी माध्यम की जरूरत न होती। आपका ’’फेस’’ ही किसी खुली ’’बुक’’ की तरह जनता के समक्ष साफ और स्पष्ट होता। वरना जो कभी सोषल नहीं रहे वे सोषल साइट्स पर अपने आप को सोषल जाहिर करते हुए अजीब लगते हैं। 



---राकेश कुमार---

अभी एक फ्रीलॅन्स लेखक हैं | 
पूर्व में सन् २००२-०४ तक हिन्दुस्तान समाचार पत्र में कार्यरत थे | 
२००५-०७ तक स्टार न्यूज़ में कार्य किया | 
इसके बाद इन्होने स्वयम् एक न्यूज़ पोर्टल की शुरुआत की, 
जो की युवाओं के बीच काफ़ी लोकप्रिय रहा | 

1 टिप्पणी:

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

यह पोस्ट पूर्णतया राजनतिक आलोचनाओं पर आधारित है जिसमें वसुंधरा राजे को निशाना बनाया गया है ! जिसको आर्यावर्त पर पढकर निराशा हुयी क्योंकि समाचार और उनका निष्पक्ष विश्लेषण हो तो ही तो अच्छा कहा जाएगा !