विशेष आलेख : कहां गुम हो जाती है सहायता राशि !! - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

विशेष आलेख : कहां गुम हो जाती है सहायता राशि !!

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जम्मू कश्मीर में सरकार गठन के हलचल के बीच केंद्र सरकार ने राज्य में बाढ़ सहायता के नाम पर एक बार फिर अपना खज़ाना खोल दिया है। जनवरी के अंतिम सप्ताह में जम्मू कश्मीर के राजयपाल एनएन वोहरा की गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मुलाक़ात के बाद राष्ट्रीय आपदा कोष से 1102 करोड़ रूपए देने की घोषणा की गई। वहीं राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के तहत 20 करोड़ रूपए भी जारी किए गए हैं। यह राशि राहत और पुनर्वास के लिए केंद्र की और से पहली कि़स्त के रूप में है। हांलाकि राज्य सरकार की ओर से 45,000 करोड़ रुपए की मांग की गई थी। सरकार का दावा है कि बाढ़ की विभीषिका के तत्काल बाद जारी सहायता में से 634 करोड़ रुपए का उपयोग हो चुका है। लेकिन ज़मीनी स्तर पर हक़ीकत को देखने के बाद इस पर विश्वास करना मुश्किल हो रहा है। सहायता के नाम पर मिलने वाली राशि का आज भी बाढ़  पीडि़तों को इंतेज़ार है। त्रासदी में बर्बाद हुए मकानों की मरम्मत के लिए मिलने वाली राशि उन लोगों तक नहीं पहुंची जो इसके वास्तविक हक़दार हैंै। ऐसे पीडि़त आज भी सरकारी कार्यालयों का चक्कर लगाने को मजबूर हैं। याद रहे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिवाली के अवसर पर घाटी की यात्रा के दौरान आम लोगों के घरों की मरम्मत के लिए जम्मू कश्मीर को 570 कराड़ रुपए की सहायता की घोषणा की थी। यह राशि राज्य में बाढ़ के तत्काल बाद केंद्र सरकार की ओर से दिए गए 765 करोड़ रुपए और सार्वजनिक भवनों की मरम्मत के लिए 1000 करोड़ रुपए की विशेष सहायता के अतिरिक्त थी।
          
जम्मू कश्मीर के इतिहास की इस भयंकर त्रासदी का वास्तविक कारण का अब तक कोई पता नहीं चल पाया है। हालांकि वर्तमान में यह प्रश्न कोई मायने नहीं रखता है कि जम्मू कश्मीर में बाढ़ क्यों और कैसे आई? सवाल केवल इतना है कि किस प्रकार बाढ़ पीडि़तों की जि़दगी फिर से पटरी पर लौट आए। इस बाढ़ ने हर तरफ केवल तबाही मचाई थी। कुछ दिनों तक राज्य का लगभग हिस्सा पूरी तरह से पानी में डूब चुका था। इस प्राकृतिक आपदा में कई माओं के सामने उनके जिगर का टुकड़ा बह गया तो किसी का समूचा परिवार ही इस तांडव की भेंट चढ़ गया। कुछ दिनों बाद जब पानी उतरा तो इसकी विभीषिका झेलने वालों को राहत मिली और लोग अपनी जि़न्दगी को दुबारा समेटने की कोशिश में लगे। परंतु इससे हुए जानी और माली नुकसान ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ कर रख दिया था। ठीक उसी समय राज्य में विधानसभा चुनाव की घोषणा कर दी गई और एक के बाद सभी राजनितिक दल बाढ़ पीडि़तों का असली हमदर्द बनने का दावा कर उनके ज़ख्मों को फिर से कुरेदने का प्रयास करने लगे। लेकिन चुनाव का शोरगुल समाप्त होते ही न केवल उनके दावों की पोल खुल गई बल्कि उनके गैरजिम्मेदाराना रवैये के कारण बाढ़ पीडि़त फिर से खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगे हैं। 
           
इस कुदरती आपदा का सबसे अधिक शिकार होने वालों में पाकिस्तान की सीमा से लगा जिला पुंछ भी है। अन्य क्षेत्रों की तरह पुंछ के सुरनकोट के लठोंग गांव भी बाढ़ ने ज़बरदस्त तबाही मचाई। बाढ़ के दौरान लठोंग गांव का तकरीबन हिस्सा पानी में डूब गया था। इस गांव के अधिकतर मकान बाढ़ के पानी में छतिग्रस्त हो गए थे। लेकिन इतना समय बीत जाने के बाद भी यहां के लोगों को अब तक मुआवज़ा नहीं मिला है। दूसरी ओर सरकारी कर्मचारियों का दावा है कि इस गांव में जिन पक्के मकानों को नुकसान हुआ है उन्हें सरकार की ओर से 75,000 रुपए दिए गए हैं। जिन कच्चे मकानों को नुकसान हुआ है उन्हें 17,000 रुपए मुआवज़ा दिया गया है। इसी प्रकार जिन पक्के मकानों को आंशिक नुकसान हुआ है उसके मालिक को 3000 रुपए जबकि आंशिक रूप से छतिग्रस्त कच्चे मकानों के पुनर्निर्माण के लिए 2300 रुपए उपलब्ध कराये गए हैं। लेकिन पीडि़तों को मुआवज़ा मिलना तो दूर उन्हें मुआवज़े  की रकम की आज तक कोई जानकारी भी नहीं पहुंची है। देखा जाए तो यह राशि केंद्र की ओर से मिली है जबकि इस आपदा के बाद न केवल राज्य सरकार बल्कि देश के अन्य राज्यों और गैर सरकारी संगठनों ने भी बाढ़ पीडि़तों की सहायता के लिए अपना अपना खज़ाना खोल दिया था। यदि इन सारी राशियों को जाड़ दिया जाए तो मुआवज़े की रकम इससे कई गुना अधिक हो सकती है। 
          
राज्य में आई भयानक बाढ़ में एक ओर जहाँ इंसानी जि़द़गी प्रभावित हुई वहीं दूसरी ओर खेतीबाड़ी पर भी इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। जिसकी निशानी अब भी नज़र आती है। लठोंग के 70 वर्षीय बुज़ुर्ग अब्दुल अज़ीज़ कहते हैं कि गांव के लगभग सभी लोग की रोज़ी रोटी खेती पर निर्भर थी। परन्तु बाढ़ में फसलों और ज़मीनों को ज़बरदस्त नुकसान हुआ है। खड़ी फसल न केवल बर्बाद हो गई बल्कि ज़मीन की उर्वरक क्षमता भी ख़त्म हो गई है। चिंता की बात यह है कि इतने बड़े स्तर पर नुकसान के बावजूद क्षेत्र के लोगों को कोई मुआवज़ा मिलना तो दूर, नुकसान का उचित आकलन करने अब तक कोई सरकारी अधिकारी नहीं आया है। जबकि दूसरी फसल चक्र आरंभ हो चुकी है। ऐसे समय में किसानों के सामने विकट समस्या उत्पन्न हो गई है। विशेषकर ऐसे किसानों के घर जिनकी रोज़ी रोटी केवल खेती पर ही निर्भर है। 
             
राज्य में तबाही का दौर गुज़रे हुए चार महीने हो चुके हैं। लेकिन लठोंग जैसे कई गांव हैं जहाँ लोगों को मुआवज़े का अबतक इंतेज़ार है। सवाल यह उठता है कि इतना पैसा मिलने के बाद भी मुआवज़े की रकम ज़मीनी सतह पर नज़र क्यों नहीं आ रही है? मुआवज़े की रक़म जब पीडि़तों के लिए जारी कर दी गई तो उनतक आखिर क्यूँ नहीं पहुंची? कहीं ऐसा तो नहीं कि पीडि़तों तक मुआवज़े की रक़म केवल कागज़ों में पहुंचा दी गई? बहरहाल इस लापरवाही के दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों को दंडित करने की आवश्यकता है ताकि ज़रूरतमंदों के साथ किसी प्रकार की नाइंसाफी न हो। इससे पहले ज़रूरी है कि बाढ़ पीडि़तों को जल्द आर्थिक सहायता प्रदान की जाये ताकि उनके जीवन की गाड़़ी चल सके। 






इम्तियाज़ अहमद भट्टी 
(चरखा फीचर्स)

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