‘सिंहम’ और:सिंहम रिर्टन’ फिल्मों में छवि बनाने वाले अजय देवगण एक बार फिर से ‘दृष्यम’ के द्वारा दर्शकों के बीच है। इस फिल्म में, उनको अलग रूप मे दिखाया गया है। तब्बू के साथ उनकी तकरार के सीन भी अच्छे बनें है। है। फिल्म में एक मुददा भी उठाया है कि इंसान अपराध क्यों करता है, ये जानना सबसे जरूरी है।‘दृष्यम’ इससे पहले फिल्म चार अलग-अलग भाषाओं में बन चुकी हैं। एक बेहद कसी हुई कहानी और अच्छे निर्देशन से सजी यह फिल्म अजय देवगन की मसाला फिल्मों के हीरो वाली छवि से काफी अलग है। माध्यातंर से पूर्व यह फिल्म कलाकारों का परिचय देती है,लेकिन उसके बाद में फिल्म का तेजी से चलना उसकी कमियों को छिपा लेता है। एक केबल ऑपरेटर ने कैसे पूरे पुलिस महकमे को चकमा दे अपने परिवार को कैसा बचाता है, अच्छा लगता है, और सैम के कत्ल के बाद मीरा की दमदार एंट्री फिल्म में जान डाल देती हंै।
कुमार मंगत पाठक, अभिषेक पाठक, अजित अंधारे द्वारा निर्मित और निशिकांत कामत द्वारा निर्र्देिशत फिल्म के दूसरे भाग को बिना किसी व्यावधान के काफी तेजी दौड़ाया है और यही वजह है कि करीब पौने तीन घंटे की यह फिल्म हिलने का मौका नहीं देती। पूरी फिल्म तब्बू और अजय देवगन पद केन्द्रित है। दोनो अपने किरदार के साथ न्याय करने का प्रयास किया है,जबकि श्रेया सरन का किरदार काफी कमजोर है। इशिता दत्ता और मृणाल जाधव ने किरदार के साथ न्याय किया है। हां, यहां कमलेश सावंत का जिक्र करना जरूरी है। गायतोंडे के किरदार से एक जलन और झल्लाहट सी होती है। कभी-कभी हंसी भी आती है। फिल्म की कहानी जीतू जोसफ व पटकथा और संवाद उपेन्द्र सिधेय ने लिखें है। गुलजार के बोल और विशाल भारद्वाज का संगीत दर्शकों को खास प्रभावित नही कर पाता है। कुल मिलाकर यह एक साधारण सी फिल्म है।
फिल्म की कहानी फिर से गोवा शुरू होती है। छोटे से कस्बे में रहने वाला विजय साल्गांवकर (अजय देवगन) एक केबल ऑपरेटर है। उसे फिल्में देखने का शौक है फिल्म हिन्दी है या अंग्रेजी इससे कोई फर्क मतलब नही। उसमें एक खासियत भी है कि वह लोगों का हितैसी है, इसी प्रवृति के चलते उसका अक्सर सामना होता है इंसपेक्टर गायतोंडे (कमलेश सावंत) से। वह जब किसी मजबूर इंसान से पैसे ऐंठता ह,ै तो विजय उससे बचाने का प्रयास करता है। कहते है कि परिस्थितियों नही पता होता कब आफत गले पड जाएं। विजय के साथ ऐसा ही होता है, कि एक दिन जब विजय घर आता है तो उसे पता चलता है कि उसकी पत्नी नंदिनी (श्रेया सरन), बड़ी बेटी मंजू (इशिता दत्ता) और छोटी बेटी अनु (मृणाल जाधव) ने एक लड़के सैम का कत्ल करके उसकी लाश अपने ही घर के बगीचे में गाड़ दी है। इस बात से अंजान कि सैम गोवा की आईजी मीरा देशमुख (तबू) के बेटा है,विजय इस कत्ल पर पर्दा डालते हुए सारे सुबूत मिटाने में जुट जाता है, लेकिन अगले ही दिन विजय को वास्तविकता का पता चलता है, तो वह ये सुन कर डर जाता है। इसके बाद भी अपने परिवार को बचाने की पूरी कोशिश करता है। मीरा देशमुख अपने बेटे को खोजने के लिए पूरे पुलिस महकमे पर दबाव बनाती है। गायतोंडे का शक विजय पर जाता है, बस, यही बात विजय के लिए मुसीबत बन जाती है।

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