भारत की आजादी से लेकर अबतक 68 सालों की इतिहास में भारत में कुल 755 लोगों को फांसी दी गई है , जिसमें मुसलामानों की संख्यां मात्र 34 है , जो जनसंख्याँ के प्रतिशत के हिसाव से अन्य सम्प्रदाय की तुलना में लगभग मात्र 4 प्रतिशत है जबकि यदि जनसंख्याँ के अनुपात से देखें तो यह 20 प्रतिशत के आसपास होने चाहिए । लेकिन इस मामले में भारतीय मुस्लिम समाज का इतना पीछे रहना यह साबित करवाता है की भारत में मुसलमान अन्य के मुकावले कम अपराध करते हैं ।
पिछले कुछ दिनों में देखा गया है कि जैसे ही किसी आतंकवादी को मृत्युदंड की सजा दी गई , भारतीय मुस्लिम समाज विरोध स्वरुप उठ खड़ा हो जाता है । यहां तक की जब अजमल आमिर कसाब को फांसी की सजा दी गई थी ,तब भी मुंबई जैसे कुछ स्थानों को हाईएलर्ट इसलिए रखा गया था की मुसलमान आक्रामक हो सकते हैं । विश्व में जितने भी मुस्लिम कंट्री है , वहाँ आतंकवाद के लिए मृत्युदंड की सजा दी जाती है । अरब कंट्री में तो सर कलम करने तथा अन्य अपराध के लिए शारीरिक अंगभंग करने यहांतक कि गुप्तांग तक को काट डालने की सजा है , फिर भारत में आतंकवादियों को मृत्युदंड देने से विरोध होना, समझ से हटकर है ।
जब एक हिन्दू ब्राह्मण मुजरिम धनञ्जय चटर्जी जो कि एक अतिगंभीर मामले में दोषी करार दिया गया था , तथा उसको फांसी की सजा सर्वोच्चन्यायालय तक से दी गई थी , और जब यह याचिका दयायाचिका के रूप में दो बार तत्कालीन राष्ट्रपति स्वo अब्दुलकलाम जी के पास आयी थी , तो उन्होंने मामले की गम्भीरता के कारण फाँसी की सजा का विरोधी होते हुए भी दोनों बार दया याचिका ठुकरा दी थी । लेकिन उसी समय यदि मीडिया यह दिखाने लग जाती की धनञ्जय चटर्जी ने तो एक ही मर्डर किया था , वह कोई आतंकवादी भी नहीं था , जिसको छुड़ाने के लिए हवाईजहाज अपहरण की सम्भावना रहती ऐसी स्थिति में उसको मृत्युपर्यन्त जेल में भी रखा जा सकता था , अब उसकी बूढ़ी माँ का पालन कौन करेगा ? साथ ही धनञ्जय द्वारा किये गए पश्चाताप रूपी बातों को चैंनलों पर चलाया जाता , तो एक जघन्य वारदात को अंजाम देने वाले मुजरिम के पक्ष में किस तरह सहानुभूति देश या समाज में पैदा हो जाती ? जब धनञ्जय चटर्जी को फांसी मिली तथा उसके द्वारा जो किया गया गुनाह था उस हेतु कलाम सर को भी फांसी की सजा पर हस्ताक्षर करते हुए कोई पछतावा नहीं हुआ था , और नहीं ही हमलोगों को कोई पछतावा हुआ ।
अमेरिका ने जिस तरह से दुर्दांत आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को पकड़ कर मार डाला था , यदि भारत भी ऐसा ही करता तो भारत के ऊपर चौतरफा हमला यह होता की भारत के एजेंसी अति अमानवीय है । लेकिन सच तो यह है की जब भी कोई मानवता का दुश्मन जिसे मानव-बध में मजा आता है , यदि वो सही से आइडेंटीफाईड हो चुका हो तो उसको किसी भी स्तर पर यदि जांचएजेंसी द्वारा या समाज के लोगों द्वारा मुक्ति दिलवा दी जाय तब भी कोई हो हल्ला किसी के माध्यम से नहीं होनी चाहिए । लेकिन फिर जब कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए किसी आतंकवादी को सजा दिलवाने में 23-23 साल लग जाय, ऐसी हालात में मानवबध निर्दयिता से कर मजा की अनुभूति करने वाले आतंकवादी अपराधी के प्रति समर्थन सर्वथा अनुचित है ।
कुछ लोग हमेशा आतंकवाद को मुस्लिम कौम के साथ जोड़कर मुस्लिमकौम में आतंकवादी के लिए सहानुभूति की लहर उत्पन्न करवा देते हैं । ऐसे काम में राजनितिक तथा विदेशी धन से लाभान्वित होने वाले कुछ हिन्दू लोग भी लग जाते हैं , लेकिन यदि मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवी लोग सोचें तो ऐसे लोग ही मुस्लिम समाज के सबसे बड़े दुश्मन इसलिए हैं की ऐसी स्थिति में मुस्लिम समाज के बहुत से युवा वर्ग तथा आम वर्ग समाज की मुख्यधारा शिक्षा इत्यादि से न जुड़कर कुमार्गगामी हो जाते हैं । धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले लोग ऐसे अवसर की ताक में एवम अदृश्य रूप से पीछे से उकसाने में इसलिए लगजाते हैं की उनकी राजनितिक रोटियां फ्री में सिक जाती है, भले ही समाज विभिन्न तरह के अन्याय अत्याचार से क्यों न जूझता ही रहे लेकिन कुछ लोगों के लिए तो यह उनकी कामयाबी का हिस्सा मात्र होता है । इन सभी कारणों से भारत का सभी सम्प्रदाय अति असुरक्षित होता चला जाता है , जो किसी भी समाज के लिए सही नहीं है । मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवियों को भी आत्ममंथन करते हुए अपने समाज के लोगों को क़ानून के अनुसार चलने के लिए प्रेरित करना तथा करवाना होगा ।
जहाँ तक रामजन्भूमि बाबरीमस्जिद इत्यादि विवादित स्थल की बात है , तो सभी सम्प्रदाय के लोगों को चाहिए की ऐसे ऐसे स्थलों पर राम तथा अल्लाह के नाम से ऐसा अस्पताल खुलवा दिया जाय जिससे किसी भी सम्प्रदाय का एक भी व्यक्ति किसी भी गम्भीर बीमारी से पैसों की कमी के कारण इलाज से दम न तोड़ सके , अर्थात सभी का फ्री में इलाज हो , इससे बड़ी श्रद्धांजलि राम या अल्ला के लिए और क्या हो सकती है ?
आमोद शास्त्री ,
दिल्ली ।
मोब = 9818974495 & 9312017281

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