महिला श्रमिकों का जीडीपी में होगा 46 लाख करोड का योगदान - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 22 नवंबर 2015

महिला श्रमिकों का जीडीपी में होगा 46 लाख करोड का योगदान

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नयी दिल्ली, 22 नवंबर, पुरुषों के समान वेतन और अन्य सुविधाएं दी जायें तो महिला श्रमिकों का अगले दस वर्षों में देश के सकल घरेलू उत्पाद में 46 लाख करोड रुपए का योगदान हो सकता है जो अगले 18 साल तक रक्षा बजट का खर्च निकालने के लिए पर्याप्त हाेगा। वैश्विक वित्तीय सलाहकार कंपनी मैंकेजी ग्लोबल की ओर से जारी ताजा रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है। मैंकेजी के अनुसार देश के महिला श्रमबल में आने वाले समय में बढोतरी की प्रचुर संभावनाएं जिन्हें देखते हुए ऐसा अनुमान है कि वर्ष 2025 तक देश में महिला श्रमिकाें की संख्या 06 करेाड 60 लाख तक पहुंच जाएगी लेकिन इसके लिए उन्हें पुरुषों के बराबर पारिश्रमिक और अन्य सुविधाएं देने के उपाय करने होंगे । ‘द पावर ऑफ पैरिटी: एडवांसिंग वूमेन्स इक्वालिटी इन इंडिया’ शीर्षक से तैयार इस रिपोर्ट में देश के दस क्षेत्रों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है और कहा गया है कि महिला श्रम बल का देश के जीडीपी में सालाना 1.4 प्रतिशत का अतिरिक्त योगदान रहेगा। इसके लिए देश के श्रम बल में महिला श्रमिकों की मौजूदा 31 प्रतिशत की हिस्सेदारी को बढाकर 41 प्रतिशत पर ले जाना होगा। रिपोर्ट के अनुसार महिला श्रमशक्ति का यह योगदान कितना बडा होगा इसका अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि इससे होने वाली आय सरकार द्वारा सालाना स्वास्थ्य और शिक्षा पर किए जाने वाले खर्च का 45 गुना और दिल्ली, मुंबई, चेन्नई तथा कोलकाता के बीच 10 हजार किलोमीटर लंबी हाई स्पीड रेल लाईन बिछाने पर होने वाले अनुमानित खर्च का चार गुना अधिक होगी। 

मैंकेजी ने भाारत में महिला श्रमबल में बढोतरी की संभावनाओं को चार संकेतकों के आधार पर मापा है जिसमें महिलाओं को कार्यस्थलों में पुरुषाें के बराबर अवसर के अलावा आर्थिक अवसर तथा सभी आवश्यक सुविधाओ तक आसान पहुंच ,न्यायिक और राजनीतिक अधिकार तथा शारीरिक सुरक्षा और स्वायत्तता शामिल है। इन संकेतकों के आधार पर महिलाओं को पुरुषों के बराबर मिले अवसरों की गणना की गयी है। इस पैमाने के आधार पर लैंगिक समानता के लिए निर्धारित एक अंक की तुलना में भारत बस थोडा सा ही पीछे है इस पैमाने पर उसे दशमलव 48 अंक हासिल हुए हैं। रिपोर्ट में लैंगिक समानता के लिहाज से भारत के पांच राज्यों सिक्किम,मिजोरम,मेघालय,गोवा और केरल को चीन,अर्जेंटीना और इंडोनेशिया के बराबर रखा गया है। इस लिहाज से सबसे खराब स्थिति वाले राज्यों में बिहार, मध्यप्रदेश,उत्तर प्रदेश,राजस्थान,असम और झारखंड को शामिल किया गया है। इस मायने में इनकी स्थिति चाड और यमन के समतुल्य मानी गयी है। हालांकि पूरे महिला श्रमबल की संख्या देखें ताे कुछ और ही कहानी सामने आती है। जिन पांच राज्यों में लैंगिक समानता का स्तर सबसे अच्छा माना गया है उनकी वर्ष 2025 तक देश के कुल महिला श्रमबल में हिस्सेदारी महज चार प्रतिशत रहने की संभावना है जबकि इस मामले में खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों की हिस्सेदारी 32 फीसदी होने का अनुमान है। अगले दस सालों में शहरी श्रेत्र में महिला श्रम बल में दो करोड 10 लाख और ग्रामीण क्षेत्रों में चार करोड 70 लाख की बढोतरी होने का अनुमान है। इसमें तीन करोड 70 लाख शिक्षित महिलाएं होंगी। महिला श्रमिकों की संख्या में सबसे ज्यादा 70 फीसदी का योगदान आंध्रप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना,उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से होगा। 

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